13 सितंबर को रूसी साइबेरिया में क्षेत्रीय चुनाव हैं. 44 वर्षीय अलेक्सेई नवाल्नी वैसे तो पेशे से वकील हैं, किंतु पिछले कुछ वर्षों से रूसी राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन के सबसे मुखर आलोचक के तौर पर प्रसिद्ध हो गये हैं. स्थानीय लोगों को यह समझाने के लिए कि राष्ट्रपति पुतिन की पार्टी को साइबेरिया की राजधानी नोवोसिबिर्स्क की विधानसभा में बहुमत कतई नहीं मिलना चाहिये, वे साइबेरिया के प्रमुख शहरों के दौरे पर थे. गुरुवार 20 अगस्त को मॉस्को लौटने के लिए वे साइबेरिया के तोम्स्क नगर में विमान में चढ़े. विमान के उड़ने के कुछ ही समय बाद वे दर्द से बुरी तरह कराहने लगे और देखते ही देखते बेहोश हो गये.

उनकी हालत देख कर विमान को साइबेरिया के ही ओम्स्क नगर में उतारना पड़ा. नवाल्नी को तुरंत एक सरकारी अस्पताल में पहुंचाया गया. डॉक्टरों ने जांच के बाद उसी शाम कहा कि वे बेहोशी में हैं. सांस नहीं ले पा रहे हैं, इसलिए उन्हें कृत्रिम रूप से ऑक्सीजन देनी पड़ रही है.

कोई विष मिलाया गया था

विमान में उनके साथ के दूसरे लोगों का कहना था कि अलेक्सेई नवाल्नी ने तो तोम्स्क के हवाई अड्डे पर एक बार चाय लेने के सिवाय सुबह से ही कुछ और खाया-पिया ही नहीं था. तो फिर उनकी हालत अचानक इतनी ख़राब क्यों होनी चाहिये थी! इन लोगों को शक होने लगा कि चाय में ही शायद कोई विष मिलाया गया था. वे अतीत की उन घटनाओं को याद करने लगे, जिनमें सरकार के आलोचक या उसके लिए ख़तरनाक बन गये लोगों को किसी न किसी प्रकार का कोई विष देकर मार डालने के प्रयास हो चुके हैं.

ऐसा ही एक पिछला बहुचर्चित कांड मार्च 2018 में ब्रिटेन में हुआ था. वहां रूस के पूर्व जासूस सेर्गेई स्क्रिपाल और उनकी वयस्क बेटी यूलिया स्क्रिपाल को ‘नोविचोक’ वर्ग के बेहद घातक रसायन द्वारा मार डालने की कोशिश हुई थी. दोनों को अस्पताल में लंबे इलाज के बाद बचा लिया गया था. स्क्रिपाल पर रासायनिक हमले को लेकर ब्रिटेन ने रूस को पूरी तरह ज़िम्मेदार ठहराया था. इशारा सीधे राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की तरफ था. उस समय यूरोपीय संघ के देशों नें रूस से अपने राजदूत तक वापस बुला लिये थे.

इलाज़ जर्मनी में होना चाहिये

अलेक्सेई नवाल्नी के सहयोगी और उनका परिवार चाहता था कि उनका इलाज़ रूस के बदले जल्द से जल्द जर्मनी में होना चाहिये. उन्हें डर था कि रूस में इलाज़ होने पर उनकी जान नहीं बचेगी. वहां के अस्पताल और डॉक्टर सरकारी दबाव की अनदेखी नहीं कर पायेंगे. एक पश्चिमी परोपकारी संस्था ने तुरंत एक विमान भी किराये पर लिया, पर विमान सरकारी ढीला-ढाली के कारण अगले दिन, यानी शनिवार 21 अगस्त को ही, उन्हें लेकर जर्मनी की तरफ़ उड़ सका. इस बीच जर्मन सरकार ने बर्लिन के सबसे बड़े अस्पताल ‘शारिते’ में अपने ख़र्च पर उनका इलाज़ कराने और उनकी सुरक्षा के लिए आवश्यक सारे प्रबंध करने का जिम्मा लिया. जर्मनी की वैदेशिक गुप्तचर सेवा बीएनडी के एजेंट अस्पताल में नवाल्नी की रखवाली करते हैं.

अस्पताल से हर दिन यही सुनने में आ रहा था कि कुछ सुधार ज़रूर है, पर नवाल्नी की हालत अब भी बहुत गंभीर है. वे लगातार ‘कोमा’ में हैं. उनकी यह हालत किसी बीमारी या शारीरिक विकार के कारण नहीं है. उन्हें ज़रूर कोई विष दिया गया है. बुधवार 2 सितंबर को नवाल्नी-प्रकरण ने एक गंभीर राजनैतिक मोड़ ले लिया. जर्मनी की चांसलर (प्रधानमंत्री) अंगेला मेर्कल ने एक वक्तव्य देते हुए कहा, “नवाल्नी को पक्के तौर पर एक अपराध का शिकार बनाया गया है.”

मुंह बंद कर देने की कोशिश हुई है

चांसलर अंगेला मेर्कल का मानना है कि नवाल्नी का “मुंह बंद कर देने की कोशिश हुई है.” वे चाहती हैं कि “रूस की सरकार इस घटना के बारे में स्पष्टीकरण दे. अब ऐसे कई बहुत ही गंभीर प्रश्न पैदा हो गये हैं, जिनके उत्तर केवल रूसी सरकार ही दे सकती है, और उसे ही देना भी पड़ेगा.” नवाल्नी के भाग्य को ले कर सारी दुनिया को चिंता हो रही है. “दुनिया (रूसी सरकार के) उत्तर का इंतज़ार कर रही है... यह एक ऐसा अपराध है, जो उन मौलिक मूल्यों और अधिकारों के विरुद्ध है, जिनके हम कायल हैं.”

चांसलर मेर्कल ने यह भी कहा कि रूसी उत्तर मिलने के बाद जर्मनी, यूरोपीय संघ और पश्चिमी देशों के सैन्य संगठन नाटो के अपने सहयोगियों के साथ परामर्श द्वारा किसी सामूहिक प्रतिक्रिया के बारे में निर्णय करेगा.

रासायनिक विष दिया गया है

चांसलर मेर्कल को ऐसा कठोर वक्तव्य इसलिए देना पड़ा, क्योंकि जर्मन सेना की एक विशेष प्रयोगशाला ने पाया है कि अलेक्सेई नवाल्नी को “बिना किसी संदेह” के ‘नोविचोक’ वर्ग का एक स्नायविक रासायनिक विष दिया गया है. यह उसी प्रकार का अत्यंत घातक विष है, जिससे मार्च 2018 में, ब्रिटेन में पूर्व रूसी जासूस सेर्गेई स्क्रिपाल और उनकी बेटी यूलिया स्क्रिपाल मरते-मरते बचे थे.

रूस के साथ जर्मनी ही नहीं, सभी पश्चिमी देशों के संबंध पहले से ही अच्छे नहीं हैं. इस नयी घटना से इन संबंधों में और अधिक मरोड़ आने का डर है. जर्मनी के विदेश मंत्रालय ने रूसी राजदूत को बुला कर प्रयोगशाला के जांच परिणाम दिखाये और जर्मनी का विरोध प्रकट किया. जर्मन सरकार के प्रवक्ता ने कहा कि नीदरलैंड में हेग स्थित रासायनिक हथियारों पर प्रतिबंधों की निगरानी करने वाली संस्था OPCW (ऑर्गनाइज़ेशन फॉर प्रोहिबिशन ऑफ केमिकल वेपन्स) से भी रूस की शिकायत की जायेगी.

हालांकि रूसी सरकार और ओम्स्क के डॉक्टर जर्मन प्रयोगशाला और जर्मन डॉक्टरों के इस निष्कर्ष से बिल्कुल सहमत नहीं हैं कि नवाल्की को कोई विष दे कर मारने की कोशिश हुई है. उनका दावा है कि उनकी जांच में ऐसा कुछ नहीं मिला था.

विष अवैध रूप से विकसित किया गया

‘नोविचोक’ एक रूसी नाम है. उसका अर्थ है ‘नवागंतुक.’ यह जानलेवा क़िस्म के 100 से अधिक रूसी रासायनिक विषों का सामूहिक नाम है. ‘नोविचोक’ समूह वाले सभी रासायनिक विषों को, 1970 से 1990 के बीच, तत्कालीन कम्युनिस्ट सोवियत संघ की प्रयोगशालाओं में - रासायनिक अस्त्र प्रतिबंध संधि की अवहेलना करते हुए - अवैध रूप से विकसित किया गया था. वे सभी प्रायः किसी चूर्ण जैसे ऐसे एन्ज़ाइम (किण्वक) हैं, जो त्वचा और सांस के रास्ते से शरीर में पहुंच कर तंत्रिकातंत्र (नर्वस सिस्टम) को इस तरह क्षतिग्रस्त कर देते हैं कि हृदय सहित शरीर की सभी मांसपेशियों में सिकुड़न पैदा होने लगती है. प्रभावित व्यक्ति का शरीर अकड़ने और दम घुटने लगता है और कुछ ही देर में उसकी मृत्यु हो जाती है.

यह विष अपनी रासायनिक संरचना में इतना जटिल है कि उसे पहचानना और प्रमाणित कर सकना बहुत ही कठिन काम है. ‘नोविचोक’ के विकास के पीछे उद्देश्य संभवतः यही था कि रासायनिक अस्त्रों पर प्रतिबंध लगाने वाली संधि के तहत किसी जांच के समय जांचकर्ता उसे पहचान न सकें.

रूसी गुप्तचर सेवाओं का कारनामा

वकील अलेक्सेई नवाल्नी रूसी क़ानूनों की उपेक्षा और व्यापक भ्रष्टाचार के लिए राष्ट्रपति पुतिन को ज़िम्मेदार ठहराते हैं. इस समय वे रूस के सबसे प्रबल, प्रसिद्ध और प्रभावी सरकार-आलोचक हैं. उन्होंने भ्रष्टाचार-विरोधी एक न्यास (ट्रस्ट) भी बना रखा है और इसके तहत ख़ूब प्रदर्शन-आन्दोलन करते हैं. उनके न्यास के निदेशक इवान शाद्नोव ने एक ट्वीट में लिखा, “केवल राज्यसत्ता ही नोविचाक का उपयोग कर सकती है, इसमें तो कोई शक ही नहीं हो सकता. इस कारण केवल रूसी गुप्तचर सेवा एफ़एसबी और सैन्य गुफ्तचर सेवा जीआरयू ही ऐसे कारनामे कर सकती है.”

जर्मनी इस बीच ऐसे रूसियों की शरणस्थली बन गया है, जिन्हें राजनैतिक कारणों से पलायन करना पड़ता है. जर्मन अस्पतालों में पूर्वी यूरोप के रूस जैसे देशों के जाने-माने सरकार-विरोधियों को आसानी से प्रायः सरकारी ख़र्च पर उपचार की सुविधा मिल जाती है. जर्मनी को इससे एक उदार लोकतंत्र होने के प्रचार के साथ-साथ परोपकारी होने का एक अलग ही आत्मसुख भी मिलता है. पुतिन को जर्मनी में बिल्कुल पसंद नहीं किया जाता. इसलिए उनके कथित अत्याचारों से पीड़ितों का यहां की जनता भी विशेष स्वागत करती है. लेकिन सवाल यह है कि चांसलर अंगेला मेर्कल जिस सहजता से व्लादिमिर पुतिन को खरी-खोटी सुना देती हैं, वह सहजता चीनी राष्ट्रपति शी जिंगपिंग के प्रसंग में ग़ायब क्यों हो जाती है?