बीते मार्च के आखिर में कोरोना वायरस के चलते लगाए गए लॉकडाउन ने स्कूल-कॉलेजों को ठप कर दिया. बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह से इंटरनेट यानी ऑनलाइन माध्यम पर निर्भर हो गयी. बड़े-बड़े शहरों के प्राइवेट स्कूलों ने कुछ ही समय में ऑनलाइन क्लॉस लगाने का इंतजाम कर लिया. इन्हें देखते हुए केंद्र और राज्य सरकारों ने भी सरकारी स्कूलों के बच्चों की पढ़ाई ऑनलाइन माध्यम से कराने के आदेश जारी कर दिए. अधिकांश राज्यों का यह भी कहना था कि शुरुआत में जो दिक्कतें ऑनलाइन क्लॉस लगाने में आ रही हैं, उन्हें जल्द ही दूर किया जाएगा. इसके लिए उन्होंने सरकारी स्कूलों को हर तरह की मदद देने का वादा भी किया. तब से अब तक इतना लंबा समय गुजर चुका है फिर भी जमीनी स्थिति जस की तस ही नजर आती है. कई बुनियादी समस्याएं अभी भी ज्यादातर राज्यों में पहले जैसी ही हैं. हालांकि दो राज्य - दिल्ली और केरल - ऐसे हैं जो इस मामले में अन्य राज्यों से अलग नजर आते हैं.

दिल्ली

अन्य राज्यों की तरह ही दिल्ली में करीब ढाई महीने पहले सरकार ने ऑनलाइन क्लास चलाने का आदेश जारी किया था. अध्यापकों से कहा गया कि वे हर बच्चे तक अपनी पहुंच बनाए और कोशिश करें कि पढ़ाई लगभग उसी तरह हो, जैसी महामारी न होने पर हो रही थी. नीति केवल कागजों पर ही न रह जाए, इसके लिए सरकार ने अध्यापक से लेकर प्रधानाचार्य और शिक्षा अधिकारियों तक की जवाबदेही तय की. अध्यापकों को ऑनलाइन क्लास में पढ़ाने की ट्रेनिंग भी दी गयी.

पूर्वी दिल्ली में स्थित एक सरकारी स्कूल - सर्वोदय बाल विद्यालय - के प्रधानाचार्य दिनेश शर्मा (बदला हुआ नाम) सत्याग्रह से बातचीत में बताते हैं, ‘ये पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन है. पहले हमने बच्चों का एडमिशन ऑनलाइन किया फिर अलग-अलग क्लास के बच्चों के अलग-अलग वाट्सएप ग्रुप बनाये. उन्हें हम इन्हीं ग्रुप में ऑनलाइन पढ़ाते हैं और वर्कशीट देते हैं. कुछ ऐसे भी बच्चे हैं, जो आर्थिक रूप से बेहद कमजोर हैं और एंड्रॉयड फोन उनके घर में नहीं हैं, तो उनसे सम्पर्क कर उनके माता-पिता को स्कूल में बुलाते है और उन्हें वर्कशीट (होमवर्क) देते हैं.’

जब दिल्ली के स्कूलों में ऑनलाइन क्लास शुरू हुई थीं, तब कई अभिभावकों का कहना था कि उनके घर में एक ही एंड्रॉयड फोन है और कभी-कभी ऑनलाइन क्लॉस के समय फोन उनके पास होता है और वे घर पर नहीं होते, ऐसे में बच्चे की क्लास छूट जाती है. दिनेश शर्मा से जब हमने यह सवाल किया तो उनका कहना था, ‘हां, यह समस्या थी, साथ ही कई बार कुछ बच्चे इंटरनेट कनेक्टिविटी की प्रॉब्लम के चलते क्लास सही से नहीं कर पाते थे, इसका भी तरीका ढूंढा. टीचर्स क्लास में जो पढ़ाना है उसका वीडियो बनाकर ग्रुप में डालते हैं जिसे बच्चा किसी भी समय देख सकता है. कुछ टीचर वाट्सएप ग्रुप में वर्कशीट के साथ अपनी एक ऑडियो रिकॉर्डिंग भी डालते हैं जिसमें वर्कशीट में दिए गए होमवर्क को कैसे करना है यह समझाया जाता है.’

लेकिन क्या बच्चे अपना होमवर्क पूरा करके उन्हें दिखाते हैं? दिल्ली के आनंद विहार इलाके में स्थित एक सरकारी स्कूल के टीचर अखिलेश कुमार (बदला हुआ नाम) कहते हैं, ‘क्लॉस की वीडियो डालने और उस क्लॉस से संबंधित वर्कशीट देने के बाद बच्चे का काम शुरू होता है. हम हर हफ्ते बच्चे को सभी विषयों की करीब 20-22 वर्कशीट देते हैं. इनमें दिया गया होमवर्क करके बच्चे को शनिवार तक स्कूल भेजना होता है. जो बच्चे वाट्सएप ग्रुप में जुड़े हैं, वे होमवर्क की फोटो खींचकर या उसे स्कैन करके ग्रुप में ही जमा करते हैं. ऐसे लगभग 90 से 95 फीसदी तक बच्चे होमवर्क पूरा करके जमा करा देते हैं. जो माता-पिता स्कूल से हर सोमवार को वर्कशीट लेने आते हैं, उनके लिए हमने नियम बनाया है कि जब तक बच्चा पिछले हफ्ते का होमवर्क करके नहीं देगा, तब तक हम उसे अगले हफ्ते की वर्कशीट नहीं देंगे. इसके चलते जो बच्चे ऑनलाइन नहीं जुड़े हैं, उनका होमवर्क हमें सौ फीसदी तक मिल जाता है.’ अखिलेश आगे जोड़ते हैं, ‘जो लोग स्कूल से वर्कशीट ले जाते हैं उनके बच्चे ऑनलाइन क्लास या वीडियो या ऑडियो तो देख और सुन नहीं पाते हैं, तो ऐसे लोगों से हम आस-पड़ोस के बच्चे (जिसके पास एंड्रॉयड फोन हो) से संपर्क साधने को कहते हैं जो उनके बच्चे को क्लास का वीडियो दिखा सकें. टीचर अपना मोबाइल नंबर भी देते हैं जिससे बच्चे कुछ न समझ में आने पर टीचर को फोन कर लें.’

बच्चों के रिस्पॉन्स को लेकर दिल्ली के यमुना विहार के एक सरकारी स्कूल में अध्यापक शिखा कन्नौजिया (बदला हुआ नाम) सत्याग्रह को बताती हैं, ‘देखिये, हम सभी अध्यापकों पर ऊपर से दबाव है. हमें बच्चों की ऑनलाइन क्लॉस में उपस्थिति से लेकर उनके रिस्पॉन्स की पूरी रिपोर्ट बनाकर प्रिंसिपल को देनी होती है. हमसे पूछा जाता है कि कितने बच्चे क्लॉस में थे, कितने बच्चों ने होमवर्क करके दिया है और जिन्होंने होमवर्क नहीं दिया तो क्यों नहीं दिया... हम होमवर्क न करने वाले बच्चे के माता-पिता को फोन तक करते हैं... हर तरह से कोशिश करते हैं कि बच्चा किसी तरह होमवर्क कर ले.’ बातचीत के दौरान शिखा जो एक बात कहती हैं उससे भी दिल्ली में इस वक्त शिक्षा की स्थिति का थोड़ा अंदाजा लग सकता है - ‘आपसे सच कहूं तो दिल्ली के सरकारी स्कूल में इस कठिन समय में भी केवल उसी बच्चे तक शिक्षा नहीं पहुंच रही होगी जिसने ठान लिया हो कि उसे पढ़ना ही नहीं है.’

दिल्ली के लिए कहा जाता है कि यहां रहने वाला हर तीसरा व्यक्ति किरायेदार है. यानी दिल्ली में ऐसे लोगों की संख्या बहुत ज्यादा है जो अन्य राज्यों के मूल निवासी हैं. कोविड-19 के चलते लगे लॉकडाउन के दौरान कई लोग आर्थिक तंगी की वजह से दिल्ली को छोड़कर अपने गृहराज्य चले गए. जाहिर सी बात है कि इन लोगों में से ज्यादातर के बच्चे दिल्ली के सरकारी स्कूलों में ही पढ़ते हैं. क्या ऐसे परिवारों से जुड़े बच्चों से संपर्क साधा गया था? इस सवाल के जवाब में कई अध्यापकों का कहना था कि उनकी ऐसे बच्चों से संपर्क करने की कोशिश जारी है. उन्हें विभाग को यह जानकारी भी देनी होती है कि ऐसे कितने बच्चों से संपर्क साधा जा सका है.

अखिलेश कुमार कहते हैं, ‘हमने दो रजिस्टर बनाये हैं, एक में वे छात्र हैं जो हमारे संपर्क में हैं और दूसरे में वे जो संपर्क में नहीं हैं. हमने शुरू से ही (जून-जुलाई से) अपनी स्कूल मैनेजमेंट कमेटी के हर सदस्य को 20-20 बच्चों को खोजने और स्कूल के सम्पर्क में बनाये रखने की जिम्मेदारी दे रखी है. इन लोगों ने बच्चों को खोजने के लिए काफी प्रयास किए हैं और हमें इसमें काफी सफलता भी मिली है. आज मेरे स्कूल में 1260 बच्चे में से 1050 से ज्यादा हमारे संपर्क में हैं... काफी बच्चे ऐसे हैं, जो लॉकडाउन के समय उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड जैसी जगह पर चले गए थे. इनमें से कुछ को हमने खोज निकाला और वे वहीं से ऑनलाइन क्लॉस भी ले रहे हैं.’

दिल्ली के शिक्षा विभाग की कोशिशों का बच्चों को कितना फायदा मिल रहा है, इसके लिए सत्याग्रह ने कुछ अभिभावकों से भी बातचीत की. इस दौरान उन्होंने ज्यादातर उन बातों से सहमति जताई जो सत्याग्रह को दिल्ली के शिक्षकों ने बतायी थीं. ‘बच्चों की पढ़ाई पर स्कूल की तरफ से जोर दिया जा रहा है, वर्कशीट दी जातीं है, टेस्ट भी ऑनलाइन हुए हैं. दिन भर बच्चा पढ़ाई में लगा भी रहता है, बच्चे के खाली बैठने से तो यह बहुत अच्छा है.’ उत्तर-पूर्वी दिल्ली के एक सरकारी स्कूल में पढ़ने वाली छात्रा के पिता विकास शर्मा इस मामले में एक अलग समस्या की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहते हैं, ‘लेकिन इससे वो फायदा फिर भी नहीं हो रहा, जो स्कूल की क्लास में बैठकर पढ़ने से बच्चे को होता है. इसमें टीचर लेक्चर देकर चले जाते हैं, बच्चे को अगर कुछ समझ में नहीं आता तो वह बार-बार तो टीचर को फोन नहीं करेगा, कोरोना के चलते साथी बच्चों से भी समस्या साझा नहीं कर सकते. आखिर में होता ये है कि वर्कशीट समझाने के लिए माता-पिता को बच्चे के साथ लगना पड़ता है क्योंकि समय पर होमवर्क जमा करना जरूरी है... मेरा मानना है कि इस सब में अभिभावकों पर बहुत बोझ बढ़ गया है.’

कई अन्य बच्चों के अभिभावकों ने भी सत्याग्रह से बातचीत में इस समस्या का जिक्र किया. एक बच्चे के पिता दुर्गा सिंह कहते हैं, ‘मेरे बच्चे के स्कूल वाले अच्छा प्रयास कर रहे हैं. लेकिन ऑनलाइन क्लास में वैसा तो नहीं हो सकता जैसा स्कूल में बैठकर पढ़ने में होता है, बच्चे को एक बार में समझने में परेशानी आती है.

लेकिन यह समस्या तो उस तरीके की ही है जो दुर्भाग्यवश इस समय पढ़ाई का सबसे अच्छा तरीका है. टीचर शिखा कनौजिया कहती हैं, ‘दिल्ली का शिक्षा विभाग इस मामले में काफी सख्त है. किसी तरह की कोताही नहीं बरती जा रही है. हमारे विभाग के डायरेक्टर और शिक्षा मंत्री (मनीष सिसोदिया) बेहद जागरूक हैं और इस ओर विशेष ध्यान दे रहे हैं. कोरोना के समय में भी वे हर दिन किसी न किसी स्कूल में दौरा करने आते हैं, अच्छा काम दिखने पर हमारी पीठ भी थपथपाते हैं. शिक्षा मंत्री खुद टीचर्स और अभिभावकों के साथ बैठक कर रहे हैं. इससे हम लोगों का उत्साह बढ़ता है.’

केरल

भारत में कोरोना महामारी के मरीज सबसे पहले केरल में ही मिले थे. फरवरी और मार्च में कोरोना के मरीजों के मामले में केरल अव्वल भी था. लेकिन मई के अंत तक केरल सरकार की सक्रियता के चलते स्थिति पलट गयी और कोरोना के मरीजों की संख्या में बड़ी गिरावट आने लगी. कोविड-19 से निपटने के लिए भारत के अन्य राज्यों को केरल से सीख लेने की सलाह दी जाने लगी. कोरोना से निपटने में वाहवाही बटोरने वाला यह राज्य, अब शिक्षा के मामले में अन्य राज्यों के सामने उदाहरण पेश करता दिख रहा है. केरल सरकार ने जिस तरह से ऑनलाइन शिक्षा शुरू की है, उसकी हर तरफ तारीफ़ हो रही है और उससे सीख लेने की बात की जा रही है.

राज्य सरकार से जुड़े अधिकारियों की मानें तो केरल सरकार को अप्रैल और मई के दौरान ही इस बात का आभास हो गया था कि कोरोना महामारी जल्द जाने वाली नहीं है. शिक्षा विभाग ने उसी समय से बच्चों की पढ़ाई को लेकर बैठकें शुरू कर दी थीं. मई से ही कई स्कूलों में वाट्सएप या ज़ूम जैसी एप के जरिये ऑनलाइन क्लास करवाई जाने लगी थीं. लेकिन, शिक्षा विभाग के कई अधिकारियों का कहना था कि अगर केवल इंटरनेट पर निर्भर हो गए तो राज्य के लाखों बच्चे पढ़ाई से वंचित रह जाएंगे. इसका कारण यह था कि राज्य के दूर-दराज के गांवों में ऐसे बच्चों की संख्या बहुत ज्यादा है जिनके पास कंप्यूटर या एंड्रायड फोन नहीं हैं. बताते हैं कि फिर कुछ अधिकारियों ने अध्ययन के बाद ऑनलाइन क्लास टीवी चैनल के माध्यम से करवाने की सलाह दी. इनका कहना था कि टीवी न रखने वाले अभिभावकों की संख्या, स्मार्टफोन न रखने वाले अभिभावकों की संख्या के आधे से भी कम है. अमूमन देखने में भी आता है कि किसी गांव में गिने-चुने लोग ही ऐसे होते हैं जिनके पास टीवी नहीं होता है.

अधिकारियों का मानना था कि अगर टीवी पर क्लास चलती है तो बहुत कम बच्चे ही ऐसे होगें, जो टीवी उपलब्ध न होने के चलते क्लास नहीं कर पाएंगे. और हर गांव में ऐसे बच्चों की संख्या इतनी कम होगी कि अगर इन्हें किसी जगह पर इकट्ठा करके क्लास एक साथ करवाई जाएगी तो इनके कोविड की चपेट में आने का खतरा न के बराबर ही होगा. इसके बाद सरकार ने एक सर्वेक्षण करवाया जिसमें पता लगा कि केरल में करीब 45 लाख ऐसे बच्चे हैं जिनके पास टीवी और स्मार्टफोन हैं और वे ऑनलाइन क्लास करने में सक्षम हैं. लेकिन, 2.61 लाख बच्चे ऐसे भी हैं जिनके पास न तो टीवी है, न ही स्मार्टफोन. और ऐसे बच्चे ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में ज्यादा हैं.

इस सर्वेक्षण के बाद केरल सरकार ने फैसला लिया कि एक जून 2020 से नया सत्र शुरू होगा और ऑनलाइन क्लास केरल सरकार के अपने चैनल - विक्टर्स पर चला करेंगी. इस योजना का नाम ‘फर्स्ट बेल’ रखा गया. इसके बाद से विक्टर्स चैनल पर पहली से बारहवीं कक्षा के बच्चों की ये कक्षाएं पूरे दिन आयोजित होती हैं. हर क्लास का फिक्स टाइम होता और दो क्लासों के बीच आधे घंटे का गैप दिया जाता है. हर रोज टीवी पर सभी क्लास का प्रसारण होने के बाद इनके वीडियो फेसबुक और यूट्यूब पर भी अपलोड किये जाते हैं. सरकार ने हर जिले के प्रशासन को यह आदेश दिया कि जिन बच्चों के घर में टीवी की उपलब्धता नहीं है, उन्हें आंगनबाड़ी केंद्रों और लाइब्रेरी में टीवी लगाकर क्लास करवाई जाए. कई नेताओं और स्वयंसेवी संगठनों ने भी दूर-दराज के गांवों तक टीवी पहुंचाने की मुहीम चलाई. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने अपने संसदीय क्षेत्र वायनाड में करीब 350 टीवी सेट्स दिए हैं, ताकि बच्चों को ऑनलाइन क्लास लेने में कोई दिक्कत ना आए.

केरल के एक गांव में विक्टर्स चैनल के माध्यम से क्लास करते बच्चे | फोटो : ट्विटर

केरल के पत्रकार एस रामा कृष्णा कहते हैं कि केरल सरकार ने शिक्षा के मामले में बहुत जमीनी स्तर पर काम किया है. उसने न सिर्फ सर्वेक्षण कराये, बल्कि इस पर भी काफी समय तक काम किया कि एक टीचर को क्लास किस तरह से पढानी है. वे कहते हैं, ‘अध्यापकों को काफी रिहर्सल और ट्रेनिंग के बाद ही ऑनलाइन क्लास के लिए चयनित किया गया और उनके वीडियो टीवी पर प्रसारित किये गए. सरकार यह ध्यान भी रख रही है कि क्लास होने के समय बिजली की कटौती न की जाए.’

केरल सरकार ने इस बात पर भी ध्यान दिया है कि कहीं उनका यह प्रयास एकतरफ़ा न रह जाए, यानी सरकार टीवी पर ऑनलाइन क्लास का प्रसारण करती रहे, लेकिन ऐसा न हो कि बच्चे अपना होमवर्क ही न करें. ऐसा न हो इसके लिए सरकार ने अपने टीचर्स को काम पर लगाया है. उनसे कहा गया है कि हर हफ्ते टीचर को बच्चे के घर जाना है और वह किस तरह से क्लास ले रहा है, होमवर्क कर रहा है कि नहीं ये सब देखना है. टीचर्स को माता-पिता से ऑनलाइन क्लास को लेकर फीडबैक लेने के लिए भी कहा गया है. साथ ही बच्चे पढ़ाई में होने वाली कोई भी परेशानी टीचर से फोन पर साझा कर सकते हैं. विक्टर्स चैनल पर हफ्ते में एक बार माता-पिता के लिए भी क्लास आयोजित की जाती है जिसमें उन्हें ऑनलाइन क्लास का महत्व बताया जाता है. बच्चे और अभिभावक क्लास को गंभीरता से लें, इसके लिए यह भी साफ़ तौर पर कह दिया गया है कि कोरोना के दौरान इसी तरह से क्लास चलेगीं और परीक्षाएं भी आयोजित की जाएंगी.

केरल सरकार के इस तरह के प्रयास को देखते हुए कई अन्य राज्य भी उसी की राह पर चलने का मन बना रहे हैं. बीते हफ्ते ही तेलगाना सरकार ने केरल के ऑनलाइन क्लास के मॉडल का अध्ययन करने के लिए अपने एक आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल को वहां भेजने का फैसला किया है. तेलंगाना सरकार के शिक्षा से जुड़े चैनल - टीएटी - के सीईओ आर शैलेश रेड्डी ने यह जानकारी देते हुए कहा कि ऑनलाइन कक्षाओं में माता-पिता और शिक्षकों की भागीदारी सुनिश्चित करने में केरल का अनुभव अनुकरण करने लायक लग रहा है. इसलिए हमने यह फैसला लिया है.’

अन्य राज्यों का हाल

देश के अन्य सूबों में कोरोना काल में शिक्षा व्यवस्था किस तरह से चल रही है यह जानने के लिए सत्याग्रह ने कुछ और राज्यों की स्थिति का भी जायजा लिया. देश के सबसे ज्यादा आबादी वाले उत्तर प्रदेश सहित अन्य सभी राज्यों में शिक्षा की स्थिति बदहाल ही नजर आयी. यहां के पीलीभीत जिले में बेसिक शिक्षा विभाग में बतौर डिस्ट्रिक्ट कॉऑर्डिनेटर (ट्रेनिंग) तैनात डॉ दीपक जैसवार से सत्याग्रह ने कोरोना काल में सरकार द्वारा किये जा रहे प्रयासों पर बातचीत की. ‘हमने बच्चे तक शिक्षा पहुंचाने के लिए तीन माध्यम तैयार किए हैं. इनमें पहला हर स्कूल का वाट्सएप ग्रुप, दूसरा डीडी उत्तर प्रदेश चैनल और तीसरा माध्यम दीक्षा ऐप है.’ वे आगे कहते हैं, ‘हर विद्यालय का वाट्सएप ग्रुप बनवाया गया है, इसमें उस विद्यालय के सभी अध्यापक और (जितने संभव हो सकें उतने) बच्चों को जोड़ा गया है. सभी शिक्षक इस ग्रुप के माध्यम से बच्चों को होमवर्क देते हैं, वीडियो डालते हैं, राज्य शिक्षा परिषद द्वारा तैयार किया गया स्टडी मटेरियल डालते हैं, ऐसे लिंक डालते हैं जिन पर क्लिक करके बच्चा ऑनलाइन पढ़ाई कर सकता है.’

दीपक के मुताबिक जो बच्चे वाट्सएप ग्रुप में नहीं हैं, उनके लिए डीडी उत्तर प्रदेश चैनल पर रोज सुबह नौ बजे से एक बजे तक शिक्षा से जुड़े कार्यक्रम प्रसारित किये जाते हैं. एक घंटे का कार्यक्रम रेडियो पर भी आता है. ‘बच्चों तक शिक्षा पहुंचाने के तीसरे माध्यम के तौर पर अध्यापकों से केंद्र सरकार के दीक्षा ऐप को अभिभावकों के स्मार्टफोन में डाउनलोड करवाने के लिए कहा गया है. इस ऐप में प्रत्येक कक्षा का स्टडी मटेरियल मौजूद है जिससे बच्चा पढ़ाई कर सकता है’ बच्चों से रिस्पॉन्स मिल रहा है कि नहीं यह पूछने पर दीपक जैसवार का कहना था, ‘हमारे टीचर लगातार बच्चों से फोन के माध्यम से सम्पर्क में हैं, बच्चों से पूछते हैं कि उन्होंने टीवी कार्यक्रम पर दिखाया गया और वाट्सएप ग्रुप में भेजा गया, स्टडी मटेरियल देखा कि नहीं.’

दीपक जैसवार ने जो जानकारी दी, उससे लगा कि उत्तर प्रदेश में शिक्षा के मामले में सब कुछ दुरुस्त है. लेकिन जब हमने छानबीन की तो सरकार के इन प्रयासों का असर जमीन पर होता नहीं दिखा. सत्याग्रह से बातचीत में राज्य के कई शिक्षकों और अभिभावकों ने साफ़ तौर पर कहा कि केवल कागजों पर ही यहां पढ़ाई होती नजर आ रही है, जबकि हकीकत ये है कि बच्चे शिक्षा से बिलकुल दूर हो गए हैं. उत्तर प्रदेश के एक प्राथमिक विद्यालय में कार्यरत अवधेश सक्सेना (बदला हुआ नाम) सत्याग्रह को बताते हैं, ‘शासन ने वाट्सएप ग्रुप बनाने का आदेश दिया है, लेकिन इस कवायद से बच्चों को कोई फायदा नहीं हो रहा. गांवों में बच्चों के माता-पिता के पास स्मार्टफोन ही नहीं हैं, शहरों और कस्बों में फिर भी 15 से 20 फीसदी बच्चों के माता-पिता के पास स्मार्टफोन हो सकते हैं, लेकिन गांवों में मुश्किल से दो-चार फीसदी के पास ही होंगे. अब आप ही बताइये कि ऐसे में कैसे पढ़ाई हो सकती है.’

एक अन्य गांव के जूनियर स्कूल में सहायक अध्यापक अरविंद दीक्षित (बदला हुआ नाम) भी लगभग वही बातें बताते हैं, जो अवधेश सक्सेना ने बतायीं. अरविंद बताते हैं, ‘मेरे विद्यालय में 170 बच्चों में से महज सात बच्चों के माता-पिता के पास एंड्रायड मोबाइल हैं, 160 के पास साधारण मोबाइल हैं और तीन बच्चों के माता-पिता के पास मोबाइल ही नहीं है. बहुत प्रयासों के बाद 15 से 17 बच्चों को हमने वाट्सग्रुप में जोड़ लिया है. इनमें कुछ के माता-पिता का नंबर है तो कुछ बच्चों के चाचा-ताऊ का. ग्रुप में स्टडी मटेरियल डालते रहते हैं. लेकिन यह बेहद कम बच्चों के पास ही पहुंच रहा है... यह पूरी कवायद केवल एकतरफा ही है, जिन दो-चार बच्चों को स्टडी मटेरियल और वर्कशीट मिलते हैं वो भी उसे पूरा करते हैं या नहीं इसकी गारंटी नहीं है. हम बच्चे पर किस तरह से दबाव बनायें.’

अरविंद दीक्षित ने बच्चों तक शिक्षा पहुंचाने का व्यक्तिगत प्रयास भी किया, लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ कि वे इन प्रयासों से पीछे हट गए. उनके मुताबिक ‘विद्यालय तो सभी शिक्षक रोज जाते ही हैं, इसलिए हमने सोचा क्यों न बच्चों को गांव के किसी मैदान में दूर-दूर बिठाकर पढ़ाया जाए. कई माता-पिता इसके लिए तैयार हो गए, एक-दो दिन क्लास लगाई ही थी कि अखबार में पढ़ा कि बलिया में एक शिक्षक कुछ बच्चों को बिठाकर पढ़ा रहा था तो पूरा स्टॉफ निलंबित हो गया. यह खबर पढ़कर मेरी हिम्मत टूट गई.’

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा बच्चों तक शिक्षा पहुंचाने के तीसरे माध्यम दीक्षा ऐप को लेकर कुछ शिक्षकों का कहना है कि उनसे दीक्षा ऐप बच्चों के फोन में डाउनलोड करवाने के लिए कहा गया है. लेकिन यहां भी स्मार्टफोन की ही समस्या है. डीडी उत्तर प्रदेश चैनल पर आने वाले कार्यक्रम को बच्चे देखते हैं या नहीं, इसे लेकर भी सत्याग्रह ने कुछ अध्यापकों से सवाल किया. तो अधिकांश शिक्षकों का कहना था कि उन्हें यह जानकारी नहीं है कि रोज किसी चैनल पर बच्चों की पढ़ाई से जुड़े कार्यक्रम प्रसारित होते हैं. इन लोगों का कहना था कि उन्हें यह पता है कि कभी-कभार ऐसे कार्यक्रम टीवी और रेडियो पर प्रसारित होते हैं, जब भी ये प्रसारित होते हैं उससे कुछ दिन पहले विभाग की ओर से उन्हें इनकी जानकारी दे दी जाती है.

शिक्षकों के साथ-साथ अधिकांश अभिभावकों को भी इस बात की जानकारी नहीं है कि हर रोज चार घंटे किसी चैनल पर उनके बच्चों के लिए कार्यक्रम प्रसारित किये जा रहे हैं. कुछ माता-पिता का कहना है कि सरकार वाट्सएप ग्रुप बना ले या फिर टीवी पर कार्यक्रम चलवा ले, लेकिन जब तक अध्यापक घर-घर नहीं जाएंगे, इन कोशिशों का सकारात्मक नतीजा नहीं मिलने वाला. इन लोगों के मुताबिक ऐसा इसलिए है क्योंकि जब अध्यापक बच्चे के पास आकर उससे होमवर्क का हिसाब मांगेगा तभी बच्चे पर दबाव बनेगा और तब ही वह पढ़ाई करेगा.

कोरोना काल में उत्तर प्रदेश जैसी ही समस्याएं राजस्थान में भी नजर आ रही हैं. राजस्थान सरकार ने ऑनलाइन शिक्षा के लिए स्माइल (सोशल मीडिया इंटरफेस फॉर लर्निंग एंगेजमेंट) प्रोग्राम शुरू किया है. सवाई माधोपुर में एक जूनियर स्कूल में पढ़ाने वाले रजत अग्रवाल (बदला हुआ नाम) इस प्रोग्राम पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं, ‘छात्रों को रोज यूट्यूब वीडियोज भेजे जाते हैं. ये वीडियोज शिक्षक ही बनाते हैं और शाला दर्पण (शिक्षा विभाग का वेबपोर्टल) पर भेजते हैं. जिन्हें स्टेट लेवल पर बैठा पैनल सलेक्ट करके राज्य भर में भेजता है. स्कूलों में हर शिक्षक के पास एक क्लास का ग्रुप होता है. ऊपर से आने वाले कॉन्टेंट को हम बच्चों को फॉरवर्ड कर देते हैं. ये सारा उपक्रम बिल्कुल किसी आम व्हाट्सएप मैसेज फॉरवर्ड की तरह होता है, बतौर शिक्षक हमारी भूमिका ही खत्म हो गई है. मैसेज भेजने के बाद हमारी जिम्मेदारी ये होती है कि हम रोजाना पांच बच्चों को फोन करके पूछें कि उन्हें जो कॉन्टेंट भेजा गया था, उसे उन्होंने देखा या नहीं. इस जानकारी को हम ऑनलाइन अपडेट भी करते हैं. इसके अलावा रेडियो और टीवी प्रोग्राम भी सरकार चला रही है. बस बुरा ये है कि इतनी सब कवायद के बाद भी ये सब बहुत कम बच्चों तक ही पहुंच पा रहा है.’

अन्य राज्यों की तरह ही झारखंड सरकार ने बीते मई में ऑनलाइन शिक्षा का आदेश जारी कर दिया था. राज्य के हर स्कूल में वाट्सएप ग्रुप बनाया गया है इसमें अध्ययन सामग्री डाली जाती है. इसके अलावा ग्रुप में रोज सुबह नौ बजे से दस बजे तक ऑनलाइन पढ़ाई होती है और जिस अभिभावक के पास स्मार्ट फोन नहीं है उनसे कहा गया है कि अपने पड़ोसी या दोस्त से एक घंटे के लिए मांग कर बच्चों को दें.

झारखंड के तोर्पा जिले में एक सरकारी स्कूल में पढ़ाने वाली सुमन गुप्ता डॉयचे वेले से बातचीत में कहती हैं कि पूरे स्कूल में पढ़ने वाले 115 बच्चों में से अब तक कुल 20-25 बच्चे ही ऑनलाइन क्लास का हिस्सा बन पा रहे हैं. क्योंकि ज्यादातर के पास या तो फोन नहीं, या इंटरनेट की कनेक्टिविटी इतनी खराब है कि बच्चों का ऑनलाइन आ पाना ही मुश्किल है. सुमन आगे कहती हैं, ‘कभी हम ऑनलाइन आ पाते हैं तो एक या दो बच्चे ही होते हैं, सिर्फ कुछ बच्चों को पढ़ाने का क्या फायदा जब बाकी बच्चों को अलग से पढ़ाना ही पड़ेगा.’ सुमन के मुताबिक उनके गांव में ज्यादातर लोग फीचर फोन इस्तेमाल करते हैं, और जिन गिने चुने घरों में स्मार्टफोन हैं भी, तो वहां या तो पिता के साथ फोन सारा दिन घर के बाहर रहता है, या फिर बड़े भाई के हाथ में. बच्चों की क्लास के टाइम के हिसाब से फोन मिल ही नहीं पाता.

देश के अलग-अलग राज्यों के सरकारी स्कूलों में कोरोना काल के दौरान ऑनलाइन पढ़ाई-लिखाई की स्थिति को लेकर पत्रकार राकेश मालवीय कहते हैं, ‘शिक्षा के क्षेत्र में संसाधनों और दूरदर्शिता की कमी तो पहले से ही थी, कोरोना वायरस की वजह से स्थित और भी खराब हो गई है. बीते चार महीनों के ये अनुभव बताते हैं कि सरकारों ने गांव-गांव ऑनलाइन शिक्षा का आदेश तो जारी कर दिया, लेकिन इस बात पर गौर नहीं किया कि इंटरनेट और स्मार्टफोन की सुविधा का विस्तार और लैपटॉप या टैबलेट हर छात्र को देने की व्यवस्था करने की जरूरत है.’ राकेश मालवीय बच्चों की बेहतरी के लिए काम कर रहे कुछ स्वयंसेवी संगठनों से भी जुड़े हैं. सत्याग्रह से बातचीत में वे कहते हैं, ‘बच्चों से पहले सरकार को शिक्षकों को डिजिटल शिक्षा के लिए तैयार करने की जरूरत है और उनकी ट्रेनिंग कराने की जरूरत है. डिजिटल शिक्षा के लिए पाठ्यक्रम भी बदलना होगा और नए टीचिंग मटीरियल तैयार करने होंगे. इस सबके बाद ही ऑनलाइन क्लास की बात सही लगती है.’