शहरे आरजू

दिल्ली को कभी किसी ने कवियों का शहर कहा हो ऐसा याद नहीं आता. वास्तुकारों के एक समूह ने जब हाल ही में मुझसे दिल्ली पर ‘सिटी आव् पोएट्स’ के रूप में बात करने को कहा तो इस ओर ध्यान गया. हिन्दी के सन्दर्भ में इलाहाबाद, बनारस, पटना आदि शहर कवियों के शहर, उचित ही, कहे और माने जाते रहे हैं. पर दिल्ली के बारे में यह तथ्य अक्सर लक्ष्य नहीं किया जाता कि दिल्ली उर्दू, हिन्दी और पंजाबी, कम से कम तीन भाषाओं के सिलसिले में सबसे बड़ा शहर है. इन भाषाओं के बोलने-बरतने वाले जितने दिल्ली में हैं, उतने शायद किसी और शहर में नहीं हैं. पहले की सात दिल्लियों को भूल भी जायें, जो उजड़ीं-लूटी गयीं और बसीं, तो आज दिल्ली में तीन दिल्लियां तो कम से कम हैं - उर्दू दिल्ली, हिन्दी दिल्ली और पंजाबी दिल्ली. कम से कम हिन्दी दिल्ली के बारे में तो यह सही है कि जितने हिन्दी के लेखक और प्रकाशक दिल्ली में हैं उतने किसी और शहर में नहीं.

अगर हम अमीर खुसरो को खड़ी बोली और इसलिए हिन्दी और उर्दू दोनों का पहला कवि मानें तो वे दिल्ली में रहे, पटना से फ़ारसी के बड़े शायर बेदिल दिल्ली आये थे और मथुरा रोड़ पर मटका पीर के सामने सड़क के दूसरी और उनकी कब्र है. बरसों पहले ख़राब हालत में पहुंच गयी इस मज़ार का अफ़गान सरकार ने पुनरुद्वार कराया था. मीर ने दिल्ली के कई बार लूटे जाने का बखान आपबीती ‘जिक्ऱे मीर’ में और कविता में किया है. ‘शहां कि कुहे जवाहिर थी ख़ाके पा जिनकी/उन्हीं की आंख में फिरती सलाइयां देखीं.’ अन्यत्र उन्होंने यह भी कहा: ‘दिल वो नगर नहीं कि फिर आबाद हो सके/पछताओगे, सुनो हो ये बसती उजाड़कर’. मीर की तरह ग़ालिब दिल्ली में पैदा नहीं हुए थे पर आगरे से आकर बस गये थे. उनकी मज़ार भी यहीं है. उनके लिए यह शहरे-आरजू था. अब मैं हूं मातमे-यक-शहरे-आरजू/तोड़ा जो तूने आइना तिमसालदार था.’ उन्हें यह भी कहना पड़ा: ‘तुम शहर में हो, तो हमें क्या ग़म, जब उठेंगे/ले आयेंगे बाज़ार से, जाकर दिल्लो-जां और.’ 18वीं शताब्दी के एक शायर फ़ाइज़ देहलवी ने लिखा - ‘खूब-रू आश्ना हैं ‘फ़ाइज़’ के/मिल सबी राम राम करते हैं.’ अवधी-ब्रज के कवि रहीम का मक़बरा दिल्ली में ही है और उन्होंने श्रृंगार काव्य ‘नगर शोभा’ नाम से लिखा हालांकि उनके नीतिपरक दोहे अधिक लोकप्रिय हैं.

दिल्ली के मूल निवासी बहुत कम हैं. लगभग हर कोई बाहर से आकर यहां बसता रहा है. इनमें लोदी वंश, मुग़लों और अंग्रेज़ों से लेकर आज तक के शासक शामिल हैं. रघुवीर सहाय ने एक पुस्तक लिखी थी - ‘दिल्ली मेरा परदेश’. नवीन, दिनकर, बच्चन, मैथिलीशरण गुप्त से लेकर अज्ञेय, शमशेर, त्रिलोचन, नेमिचन्द्र जैन, गिरिजा कुमार माथुर, भारत भूषण अग्रवाल, प्रभाकर माचवे, नरेश मेहता, अजित कुमार, रघुवीर सहाय, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, श्रीकान्त वर्मा, केदारनाथ सिंह, कुंवर नारायण यहां आये-रहे. रामदरश मिश्र, विष्णुचंद्र शर्मा बाद में मलयज, विष्णु खरे, प्रयाग शुक्ल, कमलेश, सुरेश सलिल, मंगलेश डबराल, विष्णु नागर, अनामिका, लीलाधर मण्डलोई, गगन गिल आदि की लम्बी सूची है. बिलकुल युवा पीढ़ी के अनेक कवि दिल्ली में ही रहते हैं.

मेरे जैसा किंचित् कवि भी पिछले 28 वर्षों से यहां है. इसे विडम्बना ही कहा जा सकता है कि कोई भी कवि अपने को दिल्ली का नहीं मानता. उसमें उसका कोई पिछला शहर भी बसा रहता है और उसकी कविता अकसर ‘शहरे-आरजू’ की तलाश करती रहती है. दिल्ली को कई और शहरों के लोग लगातार कोसते रहते हैं पर यह भी सही है कि बनती नहीं है बात, दिल्ली आये बग़ैर. कभी ‘आलम में इन्तख़ाब’ और कभी ‘उजड़ा दयार’, दिल्ली अब ऐसा शहर है जहां शहर को अपना कवियों का भी शहर होना याद नहीं है.

कपिला वात्स्यायन

कपिला वात्स्यायन का देहावसान एक साथ भारतीय संस्कृति के कई क्षेत्रों में क्षति है. वे स्वतंत्र भारत में उन थोड़ी सी आवाज़ों में से एक थीं जिन्हें भारतीय सभ्यता की आवाज़ कहा जा सकता है. उनकी विद्वत्ता गहरी थी और वे भारत के पारंपरिक पण्डितों से लेकर अन्तरराष्ट्रीय भारतविदों तक से संवादरत रहती थीं. उनको भारत में परम्परा और आधुनिकता के बीच के द्वन्द्व और संवाद का सजग अहसास था और उनका आग्रह हर कहीं सन्दर्भ में रखकर किसी बात को समझने का होता था. परम्परा की बहुलता की उन्हें अच्छी पहचान थी और आधुनिकता को भी एकवचन मानने से कभी सहमत नहीं हुई. उन्होंने शास्त्रीय नृत्य की कई शैलियों जैसे कथक, मणिपुरी आदि में अच्छन महाराज, गुरु अमोबी सिंह आदि से प्रशिक्षण लिया था और वासुदेव शरण अग्रवाल के अन्तर्गत भारतीय परंपरा में शिल्प और नृत्य के बीच संबंध पर शोध किया था. वे आधुनिक, शास्त्रीय और लोक कलाओं के बीच, औपनिवेशिक मानसिकता के अन्तर्गत लादे गये विभाजन को सिरे से अमान्य करती रहीं और उनमें निरन्तरता देखती-दिखाती रहीं. उन्हें इसका पूरा यक़ीन था कि आधुनिक लोकतांत्रिक भारत में उसकी पारम्परिक बहुलता को नये और सशक्त रंग से समकालीनता के प्रसंग में रूपान्तरित किया जा सकता है.

एक अर्थ में कपिला जी भारतीय संस्कृति के स्वाभिमान का प्रतीक भी बन गयीं, ख़ास कर अन्तरराष्ट्रीय सांस्कृतिक सम्मेलनों में वे बहुत स्पष्टता और प्रखरता से भारतीय दृष्टि पर इसरार करती रहीं और ऐसे अवसरों पर उनकी उपस्थिति अलक्षित नहीं जा पाती थी. मैंने 1992 के एक यूनेस्को सम्मेलन में, उनकी यह चित्ताकर्षक और विचारोत्तेजक उपस्थिति अपनी आंखों देखी थी.

स्वतंत्र भारत में जितनी संस्कृति के क्षेत्र में राष्ट्रीय संस्थाओं की स्थापना और विकास से कपिला जी जुड़ी रहीं उतना शायद ही कोई और व्यक्ति रहा होगा. तीनों राष्ट्रीय अकादेमियों, उच्चतर तिब्बती अध्ययन संस्थान, इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, सीसीआरटी, इण्डिया इण्टरनेशनल सेण्टर आदि सबसे उनका गहरा संबंध रहा है. उन्होंने स्वतंत्र भारत में राजकीय स्तर पर संस्कृति के महत्व को स्वीकार कराने में निर्णायक भूमिका निभायी. वे उन सिविल सेवकों में एक थीं जिनका संस्कृति के क्षेत्र में सक्रिय मूर्धन्य लेखकों, कलाकारों, विद्वानों, पारंपरिक गुरुओं, आधुनिक अध्येताओं आदि से निजी परिचय और संवाद था. शिक्षा व्यवस्था में उन्होंने कई बार हस्तक्षेप कर उसमें संस्कृति के तत्व को सशक्त और व्यापक करने पर बल दिया.

कुछ बरसों पहले कपिलाजी की अधिकृत जीवनी अंग्रेज़ी में आयी थी जिसमें लगभग चार सौ पृष्ठों में दो हज़ार लोगों का नामोल्लेख था. इस पर मज़ाक और व्यंग्य हुए थे. पर वे उनके समय के भारतीय सांस्कृतिक जगत् के ‘हूज़ हू’ की तरह हैं. उसमें वात्स्यायन जी का नाम सरसरी तौर पर ही है और उनके साथ सम्बन्ध का कोई विश्लेषण या आत्मपक्ष नहीं है. अलबत्ता 2011 में अज्ञेय शती के अवसर पर वत्सल निधि और रज़ा फ़ाउण्डेशन के एक संयुक्त आयोजन में कपिला जी आयी थीं और भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित अज्ञेय रचनावली के पहले खण्डों का लोकार्पण उन्होंने सहर्ष किया था, हालांकि इस दौरान पूरी शालीनता से वे चुप रहीं, कुछ बोली नहीं. कई बार लगता रहा है कि वात्स्यायन जी के साथ सम्बन्ध बिगाड़ का एक दुष्प्रभाव उन पर यह पड़ा कि वे समकालीन हिन्दी साहित्य से विरत हो गयीं.

पिछले छह महीनों में कला-जगत् के अनेक मूर्धन्य दिवंगत हुए हैं. इनमें चित्रकार सतीश गुजराल, चित्रकार ज़रीना हाशमी, मूर्तिकार नागजी पटेल, रंगकर्मी और कलाविद् इब्राहिम अलकाज़ी, कवि-चिन्तक मुकुन्द लाठ, शास्त्रीय संगीतकार पण्डित जसराज और कलाविद् कपिला वात्स्यायन शामिल हैं. याद नहीं आता कि कभी पहले इतनी कम अवधि में, जो वैसे भी कालछाया में है, इतनी मूर्धन्यता को काल ने हमसे छीना हो.

मुझे याद आता है कि एक लेखक के रूप में मेरी पहली विदेश यात्रा कपिला जी के कारण ही सम्भव हुई थी. उनसे कई बार मतभेद के अवसर भी आये. इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र का कुछ समय मैं न्यासी था और उसे समकालीन सर्जनात्मकता से जोड़ने का एक विफल प्रयत्न मैंने किया था. कपिला जी इसके विरुद्ध थीं. रज़ा फ़ाउण्डेशन के जो कार्यक्रम इण्डिया इण्टरनेशनल सैण्टर में हुए उनमें से कई में वे आती रहीं. जिनमें नहीं आ पायीं उनकी रिकार्डिंग उन्होंने बाद में सुनीं. संस्कृति के क्षेत्र में ऐसे हज़ारों लोग हैं आज जो उनके देहावसान से उत्पन्न शून्य को बहुत दुखद पा रहे होंगे.