‘लोकायुक्त का पद खत्म कर दिया जाना चाहिए. जनता का पैसा क्यों बेकार किया जाए?’

इस साल सितंबर के महीने तक गोवा के लोकायुक्त रहे जस्टिस (रिटायर्ड) प्रफुल्ल कुमार मिश्रा के इन शब्दों से उनकी निराशा ही नहीं झलकती एक ऐसी संस्था के हाल का भी कुछ अंदाज़ा लग जाता है जिस पर देश भर में लोकसेवकों के भ्रष्टाचार से निपटने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है. गोवा में लोकायुक्त की स्थापना 2011 में ही हो गई थी लेकिन देश भर में इस तरह की संस्था अनिवार्य बनाने का काम लोकपाल और लोकायुक्त कानून 2013 ने किया. यह उस विशाल आंदोलन की परिणति थी जो इसकी मांग के साथ देश भर में उमड़ा था.

अन्ना हजारे की अगुवाई में चले उस आंदोलन से पैदा हुई आम आदमी पार्टी आज दिल्ली की सत्ता में है. इस आंदोलन से उपजी तत्कालीन सरकार विरोधी भावनाओं का राजनीतिक लाभांश राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा को भी मिला और वह केंद्र की सत्ता पर काबिज हुई. भाजपा ने भी जोर-शोर से एक प्रभावी लोकपाल का समर्थन किया था और भ्रष्टाचार और सुशासन को केंद्रीय मुद्दा बनाकर चुनाव जीता था. इसलिए उसकी प्रचंड जीत के बाद कइयों को उम्मीद थी कि यह पार्टी एक सशक्त लोकपाल बनाएगी. लेकिन करीब सात साल बाद इस मोर्चे पर जो स्थिति है उसने इस उम्मीद को गलत साबित किया है.

आगे बढ़ने से पहले लोकपाल और लोकायुक्त कानून के बारे में कुछ जरूरी बातें समझते हैं. इस कानून में इसके मकसद के बारे में कहा गया है कि यह ‘कतिपय लोक कृत्यकारियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के अभिकथनों की जांच करने हेतु संघ के लिए लोकपाल और राज्यों के लिए लोकायुक्त के निकाय की स्थापना करने और उनसे संबंधित या उनके आनुषंगिक विषयों का उपबंध करने के लिए’ बनाया गया है. सरल भाषा में समझें तो लोकपाल के पास प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्रियों और सांसदों से लेकर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी तक किसी भी लोकसेवक के खिलाफ शिकायत पर जांच और सुनवाई का अधिकार है. केंद्र के स्तर पर जो काम लोकपाल का है वही राज्यों के स्तर पर लोकायुक्त का है.

एक संस्था के रूप में लोकपाल यानी ऑम्बुड्जमन की परंपरा दो सदी से भी ज्यादा पुरानी है. दुनिया में सबसे पहला लोकपाल 1809 में स्वीडन में नियुक्त हुआ था. इसके पीछे का मकसद कार्यपालिका से स्वतंत्र एक ऐसी संस्था बनाना था जो लोकसेवकों के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा सके और इस तरह जनता के अधिकारों की रक्षा करे. लोकपाल का अर्थ ही है जनता का रक्षक.

भारत में भी एक संवैधानिक ऑम्बुड्जमन होना चाहिए, यह प्रस्ताव सबसे पहले संसद में अशोक कुमार सेन ने रखा था. यह 1960 के दशक की बात है. अशोक कुमार सेन तब कानून मंत्री थे. जहां तक लोकपाल शब्द की बात है तो यह 1963 में प्रसिद्ध न्यायविद् डॉक्टर लक्ष्मीमल सिंघवी, जो कि वरिष्ठ अधिवक्ता और कांग्रेस नेता अभिषेक सिंघवी के पिता थे, ने दिया था. सबसे पहला लोकपाल विधेयक 1968 में पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण लेकर आए. वे अन्ना आंदोलन का भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा थे. यह विधेयक 1969 में लोकसभा से पारित भी हो गया था, लेकिन, राज्यसभा में अटक गया. इसके बाद ऐसी नौ और नाकाम कोशिशें हुईं. आखिरकार 2011 में इसके लिए हुआ विशाल आंदोलन रंग लाया. 2013 में संसद के दोनों सदनों ने लोकपाल और लोकायुक्त विधेयक पर मुहर लगा दी. इस तरह आधी सदी बाद भारत में लोकपाल ने कानूनी जामा पहन लिया.

लेकिन कानून आने के सात साल बाद भी इस संस्था को अमली जामा नहीं पहनाया जा सका है. यही वजह है कि लोकपाल देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई खास भूमिका निभाता नहीं दिखता. लोकपाल और लोकायुक्त कानून में कहा गया है कि केंद्र के स्तर पर लोकपाल और राज्य के स्तर पर लोकायुक्त की व्यवस्था को जनसेवकों के खिलाफ भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की तेज व निष्पक्ष जांच और सुनवाई के लिए बनाया गया है. इसे जांच, पूछताछ और मुकदमा चलाने की व्यापक शक्तियां दी गई हैं. इन शक्तियों का राज्य स्तर पर क्या हाल है, इसका अंदाजा गोवा के लोकायुक्त के बयान से हो जाता है. जहां तक केंद्रीय स्तर की बात है तो जिस अंदाज में लोकपाल को जमीन पर उतारने का काम हुआ, उससे ही यह साफ होने लगा था कि इस संवैधानिक संस्था का भविष्य क्या होने जा रहा है.

कानून में लोकपाल के तहत एक अध्यक्ष और आठ सदस्यों की नियुक्ति का प्रावधान है. यह काम एक चयन समिति करती है जिसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते हैं. उनके अलावा इसमें लोकसभा अध्यक्ष, इसी सदन में विपक्ष के नेता, भारत के मुख्य न्यायाधीश या उनके द्वारा नामित सुप्रीम कोर्ट का कोई जज और एक प्रतिष्ठित न्यायविद् सदस्य के तौर पर होता है. इस न्यायविद् को प्रधानमंत्री और दूसरे सदस्यों की सिफारिश पर ही समिति में रखा जाता है.

लेकिन मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के चार साल बीतने के बाद भी आलम यह था कि चयन समिति की एक भी बैठक तक नहीं हुई थी. मामला सुर्खियों में आया तो सरकार ने इस पर सफाई दी. उसका कहना था कि 2014 के आम चुनाव के बाद लोकसभा में सीटों की जो स्थिति है उसमें किसी भी पार्टी को मुख्य विपक्ष का दर्जा नहीं दिया जा सकता. सरकार का कहना था कि इसलिए लोकपाल की नियुक्ति के लिए चयन समिति नहीं बन पा रही. यह दर्जा पाने के लिए संबंधित विपक्षी पार्टी को कुल लोकसभा सीटों की कम से कम 10 फीसदी सीटें हासिल करनी होती हैं. 2014 में आम चुनाव के बाद 543 सीटों के हिसाब से मुख्य विपक्षी पार्टी का दर्जा पाने के लिए कांग्रेस को कम से कम 54 सीटें चाहिए थीं, लेकिन वह 44 के आंकड़े पर सिमट गई थी.

आखिरकार मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. वहां सरकार ने यह भी कहा कि वह लोकपाल एवं लोकायुक्त कानून में बदलाव के लिए एक संशोधन विधेयक ला रही है जिसमें सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता को चयन समिति में शामिल करने का प्रावधान है. उसका कहना था इससे मौजूदा तकनीकी दिक्कत दूर हो जाएगी. इस पर शीर्ष अदालत ने फैसला सुनाया कि सरकार कानून में इस बदलाव का इंतजार किए बिना भी लोकपाल की नियुक्ति कर सकती है. उसने इसी कानून की धारा-4 (2) का हवाला दिया जिसमें कहा गया है कि चयन समिति में किसी सदस्य के न होने पर भी उसके द्वारा की गई नियुक्तियां अवैध नहीं होंगी.

किसी भी कानून का मसौदा कैबिनेट यानी सरकार के रास्ते होता हुआ ही संसद पहुंचता है. तो क्या संभव है कि सरकार को इस धारा का पता न रहा हो? यही वजह है कि उस पर लोकपाल की नियुक्ति को जान-बूझकर लटकाने के आरोप लगे. यहां एक महत्वपूर्ण बात यह भी कही जा सकती है कि 2010 के विधानसभा चुनाव के बाद 243 सदस्यों की बिहार विधानसभा में राष्ट्रीय जनता दल को सिर्फ 22 सीटें मिली थीं. इस लिहाज से उसे भी मुख्य विपक्षी दल का दर्जा नहीं दिया जा सकता था. लेकिन नीतीश कुमार सरकार ने बड़प्पन दिखाते हुए राजद को मुख्य विपक्षी दल का दर्जा दे दिया था.

मोदी सरकार पर लोकपाल के मामले में ढिलाई बरतने के आरोप तब और तेज हो गए जब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी काफी समय तक मामला वहीं अटका रहा. गाड़ी तभी आगे बढ़ी जब शीर्ष अदालत में इस मुद्दे पर याचिका दाखिल करने वाले चर्चित संगठन कॉमन कॉज ने अदालत में अवमानना याचिका लगा दी. उसकी तरफ से इस मामले की पैरवी वही शांति भूषण पैरवी कर रहे थे जिन्होंने संसद में पहली बार लोकपाल का प्रस्ताव पेश किया था. शांति भूषण ने कहा कि अदालत के आदेश के बावजूद सरकार लोकपाल की नियुक्ति के मामले में आगे नहीं बढ़ रही और जिस संशोधन विधेयक की वह बात कर रही है उसे भी जान-बूझकर लटकाया गया है. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को फटकार लगाई और उसे आदेश दिया कि वह लोकपाल की नियुक्ति के लिए समय सीमा बताए.

शीर्ष अदालत की नाराजगी के बाद सरकार ने नेता प्रतिपक्ष के बिना ही एक चयन समिति बनाई. इसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष और मुख्य न्यायाधीश के अलावा प्रख्यात कानूनविद् के रूप में मुकुल रोहतगी को रखा गया. रोहतगी केंद्र में भाजपा की सरकार के दौरान भारत के अटॉर्नी जनरल रह चुके थे. उनके नाम की सिफारिश प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष और मुख्य न्यायाधीश ने ही की थी. विपक्ष में सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस के लोकसभा में नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को ‘विशेष अतिथि’ के रूप में चयन समिति की बैठकों में भाग लेने का निमंत्रण दिया गया था. लेकिन उन्होंने इसे प्रतीकवाद कहकर ऐसा करने से इनकार कर दिया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखी एक चिट्ठी में उनका कहना था, ‘लोकपाल चयन समिति की बैठक के लिए मुझे विशेष आमंत्रित सदस्य के तौर पर शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया है. लेकिन विशेष सदस्य के तौर पर लोकपाल के चयन में मुझे अपना पक्ष रखने का अधिकार नहीं होगा. लोकपाल का चयन एक गंभीर विषय है. ऐसे में विपक्ष की तरफ से एक मूक दर्शक के तौर पर शामिल होने का सरकार का यह प्रस्ताव मुझे स्वीकार्य नहीं है.’

नतीजतन चयन समिति का जो स्वरूप बना उसने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए. आरोप लगे कि इसमें ऐसे लोगों की संख्या ज्यादा है जिनका सत्ता पक्ष के प्रति झुकाव है. जैसा कि अपने एक लेख में चर्चित आरटीआई कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज ने लिखा, ‘यह लोकपाल कानून की मूल अवधारणा के खिलाफ है जिसमें कहा गया है कि लोकपाल का चयन करते समय सत्ता पक्ष बहुमत की स्थिति में नहीं होना चाहिए.’

समस्या यही नहीं थी. लोकपाल कानून की धारा 4 (4) में स्पष्ट तौर पर प्रावधान किया गया है कि लोकपाल के सदस्यों व अध्यक्ष का चयन करते वक्त चयन समिति अपनी प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी रखे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. लोकपाल के लिए शॉर्टलिस्ट किए गए उम्मीदवारों की सूची भी सावर्जनिक नहीं की गई. यही नहीं, जब सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून के तहत चयन समिति की बैठकों की कार्यवाही की जानकारी (मिनट्स ऑफ द मीटिंग) मांगी गई तो उसे यह कहकर देने से इंकार कर दिया गया कि यह ‘गोपनीय दस्तावेज’ है. अंजलि भारद्वाज के मुताबिक इस तरह की पारदर्शिता का अभाव इसलिए भी चिंताजनक है कि चयन समिति विपक्ष के नेता के बिना काम कर रही थी. उनका आरोप है कि चयन की प्रक्रिया से समझौता करके मोदी सरकार ने कामकाज शुरू करने से पहले ही लोकपाल संस्था को कमजोर कर दिया.

खैर, कानून बनने के करीब पांच साल बाद और सुप्रीम कोर्ट के बार-बार दखल के बाद मार्च 2019 में जाकर लोकपाल के अध्यक्ष और इसके सदस्यों का चयन हो गया. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश पिनाकी चंद्र घोष ने लोकपाल के अध्यक्ष पद की कुर्सी संभाली. उसी महीने संस्था के चार न्यायिक और चार गैर-न्यायिक सदस्यों को भी शपथ दिला दी गई.

तब से संस्था का रिकॉर्ड देखें तो भविष्य के लिए उम्मीदें और भी धुंधलाती लगती हैं. इसकी वजह यह है कि सरकार ने लोकपाल तो बना दिया, लेकिन वह बुनियादी ढांचा अब भी काफी हद तक गायब है जिसके बूते यह कल्पना की गई थी कि यह संस्था भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में एक अहम हथियार साबित होगी. लोकपाल के पास शिकायत करने का फॉर्मेट और उससे जुड़े नियम इसी साल मार्च में बने हैं. यानी लोकपाल की नियुक्तियों के एक साल बाद. और अपने वजूद में आने के बाद बीते करीब डेढ़ साल में लोकपाल का क्या रिकॉर्ड रहा? इस बारे में उसकी वेबसाइट बताती है कि 30 सितंबर 2019 तक संस्था के पास 1065 शिकायतें आईं और इनमें से एक हजार का निपटारा हो चुका है. यह निपटारा किस तरह हुआ, कितने मामलों में जांच का आदेश हुआ और इस जांच का नतीजा क्या रहा, इस बारे में वेबसाइट पर कोई जानकारी नहीं मिलती.

हाल में इंडिया टुडे ने सूचना के अधिकार के जरिये यह जानने की कोशिश की कि लोकपाल ने बीते डेढ़ साल में क्या किया. इसके जवाब में यह जानकारी मिली कि इस साल एक मई तक लोकपाल के पास कुल 1426 शिकायतें आ चुकी थीं. इनमें 1200 का निपटारा कर दिया गया था. इनमें से कुछ मामले केंद्रीय सतर्कता आयोग, संबंधित मंत्रालय आदि जगहों को भेजे गए और उन पर रिपोर्ट देने या जरूरी कार्रवाई के लिए कहा गया. मिली जानकारी के मुताबिक कुछ मामलों में शिकायतकर्ताओं को नये नियमों और फॉर्मेट के हिसाब से शिकायत दायर करने को कहा गया. कई जानकार मानते हैं कि ये आंकड़े और इनमें छाई अपारदर्शिता उन उम्मीदों के साथ छल हैं जो लोकपाल कानून के वजूद में आने के वक्त जताई गई थीं.

ऐसा होना ही था. भ्रष्टाचार की शिकायतों पर लोकपाल की कार्रवाई निष्पक्ष और विश्वसनीय हो, इसके लिए प्रावधान किया गया था कि संस्था के पास जांच और मुकदमा चलाने के लिए दो अलग-अलग इकाइयां बनाने का अधिकार होगा. जांच खंड और अभियोजन खंड नाम की इन दोनों इकाइयों की कमान निदेशक (जांच) और निदेशक (अभियोजन) को संभालनी थी. लेकिन सूचना के अधिकार से मिली जानकारी बताती है कि इन दोनों इकाइयों की स्थापना अब तक नहीं हुई है. लोकपाल की वेबसाइट पर भी इस बारे में कोई अपडेटेड जानकारी नहीं है.

जानकारों के मुताबिक नियमों और जरूरी मशीनरी के बिना काम कर रहा लोकपाल अगर लोगों की उम्मीदें पूरी नहीं कर सका है तो इसमें हैरत कैसी. लोकपाल की यह नख-दंत विहीन अवस्था तब है जब देश में भ्रष्टाचार लगातार बढ़ रहा है. चर्चित संस्था ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा हर साल जारी किए जाने वाले भ्रष्टाचार सूचकांक में भारत बीते साल नीचे की तरफ दो स्थानों का गोता लगाते हुए 180 देशों की सूची में 80वें स्थान पर पहुंच गया.

दिलचस्प बात यह भी है कि कुछ समय पहले तक लोकपाल का दफ्तर दिल्ली के एक फाइव स्टार होटल से चल रहा था. इस पर किराए के रूप में हर महीने 50 लाख रु का खर्च हो रहा था. इसी साल जून में सूचना के अधिकार से मिली जानकारी बताती है कि किराए के रूप में खर्च की जा रही इस रकम का आंकड़ा तब तक छह करोड़ 21 लाख रु के करीब हो चुका था. उधर, संस्था से जुड़े वेतन-भत्ते के मद में करीब तीन करोड़ रु खर्च हो चुके थे. लोकपाल के अध्यक्ष को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जबकि सदस्यों को सुप्रीम कोर्ट के जज के बराबर वेतन-भत्ते मिलते हैं.

लोकायुक्तों के मामले में भी हाल खास जुदा नहीं है. करीब ढाई साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने 12 राज्यों को फटकार लगाते हुए उनसे पूछा था कि लोकपाल और लोकायुक्त कानून आने के कई साल बाद भी उन्होंने अपने यहां लोकायुक्तों का गठन क्यों नहीं किया है. इनमें तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और खस तौर पर दिल्ली जैसे राज्य शामिल थे. शीर्ष अदालत की फटकार के बाद ही इन राज्यों में से कई ने अपने यहां लोकायुक्त नियुक्त करने शुरू किए. हालांकि अब तक तक भ्रष्टाचार के किसी मामले में उनकी ऐसी किसी कार्रवाई के दर्शन नहीं हुए हैं जिसे मिसाल और उम्मीद की तरह गिनाया जा सके.

दूसरी तरफ, गोवा का उदाहरण सामने है. लगभग साढ़े चार साल तक यहां के लोकायुक्त रहने वाले प्रफुल्ल कुमार मिश्रा का कहना है कि अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने 21 मामलों में सरकार को कार्रवाई करने के लिए कहा था. इसमें एक पूर्व मुख्यमंत्री सहित अलग-अलग लोकसेवकों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करने से लेकर उन्हें पद के अयोग्य घोषित करने जैसी संस्तुतियां थीं. लेकिन इन पर अब तक कुछ नहीं हुआ. जस्टिस मिश्रा का कहना है, ‘मैं हमेशा असहाय रहा और जो अपनी शिकायतें लेकर मेरे पास आते थे उन्हें भी मैं यही बताता था. मेरे पास अपने आदेशों का पालन करवाने की शक्ति नहीं थी.’ उन्होंने आगे कहा, ‘जब कानून ही बलपूर्वक कूड़ेदान में फेंका जा रहा है तो बेहतर है लोकायुक्त का पद ही खत्म कर दिया जाए.’

लोकपाल और लोकायुक्त कानून को जमीन पर आने में करीब आधी सदी से ज्यादा समय लग गया. लेकिन इसे अमल में लाने वाले ढांचे का जो हाल है, उसे देखते हुए कह सकते हैं कि कोई ठोस जमीनी बदलाव लाने की दिशा में इस संस्था को अभी लंबा सफर तय करना पड़ सकता है.