गांधी की ज़रूरत

जो लोग और शक्तियां इस समाज को हिंसा-हत्या-घृणा से, भेदभाव और अन्याय से चलाना और उसमें नये विभाजन पैदा करना चाहते हैं उनकी एक ज़रूरत है गांधी की दुबारा से हत्या करने की, उनके विचार और दृष्टि को ध्वस्त करने की. पर जो लोग और शक्तियां इस सबका विरोध करते हुए सार्वजनिकता को, लोकतंत्र की आत्मा को, स्वतंत्रता-समता-न्याय के संवैधानिक मूल्यों को बचाने के संघर्ष में लगे हैं, उन्हें गांधी की और भी अधिक ज़रूरत है. यह इतिहास का अनोखा मुक़ाम है जहां दो परस्पर विरोधी दृष्टियों को सफल और सार्थक होने के लिए एक ही नायक चाहिये - एक को खलनायक की तरह, दूसरे को महानायक की तरह.

गांधी ने 1927 में याने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कहा था - ‘गहरे भरोसे से कहा गया ‘न’ कहीं बेहतर और महत्तर है उस ‘हां’ से जो सिर्फ़ तुष्ट करने या कि और भी बदतर तकलीफ़ से बचने के लिए कहा गया हो.’ ऐसे लोग, समूह और आन्दोलन बढ़ते जा रहे हैं जो आज ‘न’ कहने की हिम्मत कर रहे हैं. जो झूठे वायदों, झांसों, विश्वासघातों की सच्चाई पहचान चुके हैं. और जो अब हां में हां मिलाने से अपने को अलग कर रहे हैं. उनको बदनाम करने, उनकी देश के प्रति वफ़ादारी पर सवाल उठाने, उनको किसी न किसी ‘नाकरदा गुनाह’ के लिए धर-पकड़ने की नीच कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है. लेकिन लगता यह है कि गांधी की अहिंसक आत्मशक्ति, इनकार करने का साहस, सविनय अवज्ञा अब नये रूपाकार ले रही है.

गांधी ने 1927 में ही यह भी कहा था - ‘अगर सहयोग कर्तव्य है तो, मैं मानता हूं कि कुछ स्थितियों में असहयोग भी समान रूप से कर्तव्य होता है.’ घृणा, अन्याय, शोषण, भेदभाव, हिंसा-हत्या की मानसिकता से असहयोग आज हर भारतीय नागरिक का लोकतांत्रिक, नैतिक और धार्मिक कर्तव्य है. बेरोज़गारी भयानक रूप से बढ़ने और किसानों की अनसुनी करने के सन्दर्भ में जो नागरिक सजगता नज़र आ रही है, वह, एक तरह से, सत्ता की ज़ोर-जबर्दस्ती के बरक़्स, सविनय अवज्ञा ही है.

गांधी अपने जीवनकाल में भी एक व्यक्ति नहीं रह गये थे. वे एक कालजयी विचार, एक अपराजेय मानवीय दृष्टि और शैली बन चुके थे. और यही विचार, यही शैली फिर आज रूप ले रहे हैं. विचार के इस पुनराविष्कार को बाधित-लांछित-दंडित करने की नीच हरकतें फिर होंगी. पर उम्मीद करना चाहिये कि जो विचार गांधी की हत्या के 70 वर्ष बाद भी संसार भर में जीवित है, उन्हें आसानी से, हिंसा और क्रूरता से, पुलिस और धन बलों से दबाया या ध्वस्त नहीं किया जा सकेगा. गांधी की एक बड़ी सीख हार न मानने की भी है. याद करें कि दंगों की हिंसा से झुलसी नोआखाली में ‘एकला चलो रे’ गाते हुए बहुत कम लोगों के साथ चलते हुए गांधी ने हार नहीं मानी थी. अन्ततः जीत सत्य और अहिंसा की ही होती है, भले उन पर हमेशा ख़तरे मंडराते रहते हैं.

सच की विडम्बना

यों तो हर समय और समाज में सच बहुत सारे झूठों से घिरा होता है और अकसर उसे झूठों की भीड़ में अलग से पहचान पाना मुश्किल होता है. हमारे समय में झूठ की भीड़ और शक्ति, उसका प्रचार-प्रसार और गति सभी बहुत बढ़ गये हैं. झूठ पर भरोसा करने वालों की संख्या भी बहुत बढ़ गयी है. झूठ खुद को अनेक रंगों-छवियों, लोकलुभावन पहनावों में पेश करता रहता है. सच उनकी मुट्ठी में है ऐसा दावा करने वाले भी राजनीति, धर्म, बाज़ार और मीडिया में बेहद बढ़ गये हैं. सच, लगता है, पहले की अपेक्षा और भी अल्पसंख्यक हो गया है. ऐसे दमघोंटू माहौल में फिर गांधी को याद करना एक सशक्त और हौसला बढ़ाने वाला सहारा है.

1927 में गांधी ने कहा था - ‘संसार के सभी धर्म, भले कई मामलों में एक-दूसरे से भिन्न हों, मिलकर यही घोषणा करते हैं कि संसार में सच के अलावा और कुछ भी जीवित नहीं रहता.’ उन्होंने जोड़ा कि ‘चीज़ों का आधार नैतिकता है और नैतिकता का सत्व सत्य है.’ गांधी मानते थे कि ‘आचरण का सुनहरा नियम परस्पर सहिष्णुता है, यह देखते हुए हम सभी कभी एक जैसा नहीं सोचेंगे सत्य को विभिन्न दृष्टिकोणों से हमेशा टुकड़ों में ही देखेंगे.’ उनके सामने यह स्पष्ट था कि ‘सत्य की खोज गुफा-कन्दरा में नहीं की जा सकती. चुप्पी का कोई अर्थ नहीं जब ज़रूरी हो बोलना.’

हम इस समय दृश्य पर यह महसूस कर सकते हैं कि बोलने वाले, सारी बाधाओं के बावजूद, बढ़ रहे हैं. हालांकि गांधी-दर्शन जैसी विद्या को अब व्यापक मान्यता मिल चुकी है, गांधी सकर्मक चिन्तक थे. उनका सोच-विचार कर्म द्वारा सत्यापित होता था और उसी से अक्सर निकलता भी था. उनकी स्पष्ट मान्यता थी कि ‘धर्मग्रन्थ तर्क और सच को अतिक्रमित नहीं कर सकते. उनका अभीष्ट है तर्क को शुद्ध करना और सच को आलोकित.’

गांधी ने एक बार यह भी कहा कि ‘मेरे निकट यह रहस्य ही है कि कैसे लोग अपने को गौरवान्वित अनुभव करते हैं अपने साथ के प्राणियों को नीचा दिखाकर, अपमानित कर.’ हम देख सकते हैं कि अनेक अन्धभक्त और बहुत सारे टेलीविजन एंकर ऐसे अपमान करने को बहादुरी मानते हैं और उन्हें ऐसा करते देखते करोड़ों लोग मज़ा लेते हैं. गांधी की मूर्ति पर जूते मारते, गांधी की तस्वीर पर गोली दागते लोग इन दृश्यों को सार्वजनिक मीडिया पर अपनी बहादुरी के दृश्य बनाकर पेश करते हैं. नीचता, तरह-तरह की नीचता, शायद हर समाज में हर समय में रही है. पर नीचता का ऐसा अभद्र, अश्लील और भौंड़ा प्रदर्शन शायद पहले कभी नहीं होता था.

नयी तकनालजी ने जहां एक ओर लोकतांत्रिकता, शिरकत आदि बढ़ायी हैं, वहीं दूसरी ओर उसने नीचता, घृणा, हिंसा आदि को फैलाने का काम भी बखूबी किया है. हम साफ़ देख सकते हैं कि बाज़ार और बहुसंख्यकतावाद नीचता और घृणा से कतई संकोच नहीं कर रहे हैं. ऐसे में फिर गांधी याद आते हैं जिन्होंने अपनी अदम्य लोकतांत्रिकता के चलते कहा था कि ‘हर कोई चाहे तो अपने अन्दर की आवाज़ सुन सकता है. वह हर किसी में है.’ क्या हम यह आवाज़ आज सुन पा रहे हैं या कि उसको दबाने, उसकी अनसुनी करने में लगे हैं?

बुराई का भारी पलड़ा

अच्छाई और बुराई के बीच हमेशा एक महाकाव्यात्मक द्वन्द्व चलता रहा है. यह सदियों से हो रहा है लेकिन हमारे समय में अधिक विकराल हो गया लगता है. जितने साधन अच्छाई के पास अपने को फैलाने-बढ़ाने के हैं उतने ही बुराई के पास हैं और कई बार लगता है कि बुराई के पास अच्छाई के मुक़ाबले अधिक कौशल, अधिक क्षमता है. उसके प्रति आकर्षण भी अधिक बढ़ गया है. हमारे समाज में हिंसा-हत्या-घृणा-भेदभाव का जो बढ़ता हुआ प्रचार-प्रसार है वह इसी का जीता-जागता सुबूत है.

धर्म के नाम पर जो अन्याय और अत्याचार हो रहे हैं उनका कितने धर्माचार्यों-मौलानाओं आदि ने खुलकर विरोध किया है? विधर्मी के साथ बलात्कार तक तो उचित और नैतिक माना जा रहा है. पहले भी ऐसा हुआ है पर हमारे समय में यह स्पष्ट है कि धर्म अपनी हिंसा, कट्टरता और पाखण्ड से और कई अनाचारों पर चुप्पियों से मनुष्य के साथ, उसके अनिवार्य अध्यात्म के साथ विश्वासघात कर रहे हैं.

इस पर ध्यान कम जाता है कि इस समय संसार पर, राजनैतिक व्यवस्थाओं के आर-पार, तीन शक्तियां निर्णायक भूमिका निभा रही है. पहली है शस्त्र-व्यवस्था. पश्चिम की अनेक महाशक्तियां, विशेषतः अमरीका और कई यूरोपीय देश संसार के कई क्षेत्रों में युद्ध उकसाते हैं ताकि प्रभावित देशों को अपने हथियार बेच सकें. हथियारों का सारा व्यापार राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर गोपनीय होता है और देशों का गुपचुप, भयानक रूप से बढ़े दामों पर, शस्त्रीकरण हो रहा है. इसका सीधा प्रतिकूल प्रभाव उन देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है और विशेषतः सामाजिक कल्याण, शिक्षा, स्वास्थ्य की योजनाओं के लिए पर्याप्त राशि उपलब्ध नहीं हो पा रही है.

दूसरी ऐसी ही व्यवस्था है दवाइयां बनाने वाली कंपनियां. नये-नये रोग पैदा हो रहे हैं. जैसे कि कोराना वाइरस और उनके उपचार के लिए नयी वैक्सीन विकसित करने की होड़ लगी है. एक-दूसरे को नीचा दिखाने के अलावा ये कंपनियां अपने हितसाधन के लिए विशेषज्ञता के क्षेत्रों में अनैतिक हस्तक्षेप कर रही हैं और तरह-तरह के भ्रम और ग़लतफ़हमियां धड़ल्ले से, डाक्टरों के सहयोग से, फैला रही हैं. ऐसे डाक्टरों और मेडिकल संस्थाओं की कमी नहीं है जो इन कंपनियों से घूस लेकर उनके एजेण्ट की तरह काम कर रहे हैं, शिकार हैं हम सामान्य जन जिनको पता भी नहीं है कि जो दवाई हमें दी जा रही है वह उपयुक्त है या नहीं. ये कंपनियां राजनैतिक दलों आदि को भी अपने भ्रष्टाचार के दायरे में आसानी से शामिल कर लेती हैं.

तीसरी व्यवस्था है फेसबुक. उसके नियन्ताओं ने यह समझ लिया है कि उसके माध्यम से घृणा, भेदभाव आदि फैलाकर समाजों को तोड़ा जा सकता है और ऐसी राजनैतिक शक्तियों को समर्थन दिया जा सकता है कि वे इस टूट के आधार पर सत्ता हासिल करें. अमरीका, फ्रांस, भारत आदि कई देशों में यह किया गया है. यह बात प्रमाण सहित सामने आ चुकी है.

हम जब तक इस सचाई को पहचानेंगे नहीं, बुराई का पलड़ा भारी होता जायेगा और भलाई हलकी पड़ती जायेगी.