अप्रैल 1936 में लखनऊ में हुए प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए प्रेमचंद ने साहित्य को ‘जीवन की आलोचना’ कहा था. उन्होंने कहा कि ‘साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफिल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है – उसका दरजा इतना न गिराइए. वह देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई भी नहीं, बल्कि उनके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है.’

कहना न होगा कि प्रेमचंद का समूचा रचनाकर्म ही अपने समय की राजनीतिक-सामाजिक हलचलों की बानगी देता है. ‘सोज़-ए-वतन’ की कहानियों से लेकर, ‘गोदान’ सरीखे उपन्यास और ‘महाजनी सभ्यता’ जैसे लेख इसके साक्षी हैं. प्रेमचंद और उनकी पत्नी शिवरानी देवी तीस के दशक में राष्ट्रीय आंदोलन में भी सक्रिय हो चुके थे. जवाहरलाल नेहरू की मां स्वरूप रानी के व्यक्तित्व और उनके त्याग से प्रेमचंद और शिवरानी देवी दोनों ही गहरे प्रभावित थे. सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान स्वरूप रानी नेहरू से प्रभावित होकर शिवरानी देवी ‘महिला आश्रम’ की सदस्य बनीं. नवंबर 1930 में शिवरानी देवी की गिरफ़्तारी हुई और तीन महीने बाद वे रिहा हुईं.

वर्ष 1932 में सविनय अवज्ञा आंदोलन के दूसरे चरण के दौरान जवाहरलाल नेहरू की मां स्वरूप रानी पर एक प्रदर्शन के दौरान लाठी बरसाई गई, जिससे उनके सर पर गहरी चोट आई. प्रेमचंद की जीवनी लिखने वाले मदन गोपाल लिखते हैं कि इस घटना से व्यथित होकर प्रेमचंद ने कानपुर से छपने वाले उर्दू पत्र ‘ज़माना’ के सम्पादक दयानारायण निगम को एक ख़त में लिखा था कि ‘सरकार की दमनकारी नीतियां अब असहनीय हो चुकी हैं. जवाहरलाल नेहरू की माता जी के साथ कितना क्रूर और अपमानजनक व्यवहार किया गया! मैं शर्मिंदा हूं कि इतना सब कुछ होने के बाद मैं अब भी जेल से बाहर हूं.’

राष्ट्रीय आंदोलन और प्रेमचंद का आर्थिक नज़रिया

वर्ष 1933 में जवाहरलाल नेहरू ने आर्थिक सवालों पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दृष्टिकोण को स्पष्ट करते हुए इलाहाबाद से छपने वाले अंग्रेज़ी दैनिक ‘लीडर’ में एक लेखमाला शुरू की. इस लेखमाला में नेहरू ने आर्थिक प्रश्नों पर कांग्रेस की नीति को स्पष्टता के साथ पाठकों के सामने रखा. 16 अक्तूबर 1933 को ‘जागरण’ में प्रकाशित संपादकीय में प्रेमचंद ने लिखा कि ‘जवाहरलाल नेहरू की नीति वही है जिससे भारत के गरीब से गरीब आदमी को दैहिक और मानसिक भोजन और समान अवसर मिले. आप पूंजीपतियों के फ़ायदे के लिए चाहे देश के हों चाहे विदेश के, गरीबों और मज़दूरों का पीसा जाना नहीं देख सकते और यही आपकी नीति है.’

प्रेमचंद ने ज़ोर देकर कहा कि यही सच्ची आर्थिक नीति है. उनका कहना था कि ‘इसके सिवा अगर कोई अर्थनीति है, तो वह धनवानों की, स्वार्थियों की, मोटी तोंद वालों की नीति है. जो नीति धन वालों को गरीबों के ख़ून पर मोटा करती है, उसका जितनी जल्दी अंत हो जाए उतना ही अच्छा.’ प्रेमचंद का मानना था कि कांग्रेस पूंजीपतियों की नीति का समर्थन करके राष्ट्रीय संस्था नहीं बन सकती.

नवंबर 1933 में जवाहरलाल नेहरू अपनी पत्नी कमला नेहरू के साथ बनारस आए. यहां उन्होंने कई सभाओं को संबोधित किया. वे सारनाथ स्थित मूलगंधकुटी विहार भी गए थे. तभी बनारस में साहित्यकारों के एक समूह ‘रत्नाकर रसिक मंडल’ ने जवाहरलाल नेहरू को मानपत्र दिया. इसके उत्तर में नेहरू ने साहित्यकारों से हिंदी की उन्नति करने और उसे समृद्ध बनाने पर ज़ोर दिया था. बनारस में दिए अपने इन व्याख्यानों में नेहरू ने विश्व इतिहास, राजनीति, विभिन्न देशों की शासन-पद्धतियों की चर्चा की. साथ ही, उन्होंने संसार में व्याप्त असमानता और विषमता के कुचक्र पर बात करते हुए समाजवादी नीतियों की वकालत की.

‘जागरण’ में 20 नवंबर 1933 को प्रकाशित संपादकीय में नेहरू द्वारा बनारस में दिए व्याख्यानों की चर्चा करते हुए प्रेमचंद ने लिखा कि ‘श्री जवाहरलाल नेहरू ने अपने व्याख्यानों में वैज्ञानिक साम्यवाद (साइंटिफिक सोशलिज़्म) शब्द का प्रयोग किया. आपका अभिप्राय यह था कि वर्तमान समाज में मनुष्य-मनुष्य में जो भीषण असमानता है, वह दूर हो. यह ठीक नहीं है कि एक मनुष्य के पास अथाह धन भरा पड़ा हो और दूसरा मनुष्य भूखा मरता हो. समाज का इस प्रकार संगठन होना चाहिए, जिससे कोई मनुष्य भूखा न रहने पावे, सबको पर्याप्त अन्न और वस्त्र मिले और सबको उन्नति करने का समान अवसर हो.’

इसी दौरान बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में दिए अपने व्याख्यान में जवाहरलाल नेहरू ने हिन्दू महासभा को आड़े हाथों लिया और हिन्दू महासभा की हिन्दू राज स्थापित करने, सरकार, राजाओं, महाराजाओं और जमींदारों से सहयोग करने, स्वतंत्रता की भावनाओं के विरुद्ध काम करने की नीति की कड़ी निंदा की. इसका ज़िक्र भी प्रेमचंद ने ‘जागरण’ के अपने संपादकीय में किया था.

उल्लेखनीय है कि अपनी असमय मृत्यु से कुछ समय पूर्व ही प्रेमचंद ने सितंबर 1936 में ‘महाजनी सभ्यता’ जैसा चर्चित लेख लिखकर पूंजवादी नीतियों और महाजनी सभ्यता की जमकर ख़बर ली थी. इसी लेख में प्रेमचंद ने लिखा था कि ‘महाजनी सभ्यता में तो सारे कामों की गरज महज़ पैसा होता है. किसी देश पर राज्य किया जाता है, तो इसलिए कि महाजनों, पूंजीपतियों को ज़्यादा-से-ज़्यादा नफ़ा हो. इस दृष्टि से मानो आज दुनिया में महाजनों का ही राज्य है. मनुष्य समाज दो भागों में बंट गया है. बड़ा हिस्सा तो मरने और खपने वालों का है, और बहुत ही छोटा हिस्सा उन लोगों का, जो अपनी शक्ति और प्रभाव से बड़े समुदाय को अपने बस में किए हुए हैं.’

स्त्री-शिक्षा का प्रश्न

वर्ष 1934 में जवाहरलाल नेहरू ने प्रयाग महिला विद्यापीठ में दीक्षांत भाषण दिया जिसमें उन्होंने स्त्रियों के आत्मनिर्भर और आर्थिक रूप से सक्षम बनने की वकालत की थी. प्रेमचंद ने 29 जनवरी 1934 को ‘जागरण’ में लिखे एक संपादकीय में नेहरू के स्त्री-शिक्षा संबंधी विचारों का समर्थन किया. नेहरू को उद्धृत करते हुए प्रेमचंद ने लिखा कि ‘जवाहरलाल नेहरू का ख़्याल है कि महिलाओं को केवल वैवाहिक जीवन के लिए क्यों तैयार किया जाए. उन्हें जब तक आर्थिक स्वतंत्रता न प्राप्त होगी उस वक़्त तक पति-पत्नी में साम्यवाद न उत्पन्न होगा.’

प्रेमचंद ने इस संपादकीय में उन लोगों की कड़ी आलोचना की, जो महिलाओं को केवल माता और गृहिणी बनाने वाली शिक्षा देने के हिमायती थे. ऐसी सोच रखने वाले पुरुषों पर टिप्पणी करते हुए प्रेमचंद ने लिखा कि ‘पुरुषों में प्रधानता की जो भावना उत्पन्न हो गई यह केवल उनकी मूर्खता के कारण है. वह समझते हैं वे बाहर से धन कमाकर लाते हैं, इसलिए उनका महत्त्व अधिक है. उन्हें यह भूल जाता है कि स्त्री घर में जो काम करती है, वह उनकी कमाई से कई गुना ज़्यादा महत्त्व की चीज है. जहां पुरुष बिलकुल गधे नहीं हैं वहां पराधीनता की गंध तक नहीं है.’

जनवरी 1934 में बिहार में भयानक भूकंप आया, जिससे जान-माल को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुँचा. भूकंप के बाद शुरू हुए राहत कार्य में जवाहरलाल नेहरू ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था. लेकिन दुर्भाग्य से फरवरी 1934 में ब्रिटिश सरकार ने उनकी गिरफ़्तारी का फरमान जारी कर दिया और उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया. नेहरू की असमय गिरफ़्तारी पर टिप्पणी करते हुए प्रेमचंद ने 19 फरवरी 1934 को ‘जागरण’ में लिखा था :

इस अवसर पर जब कि पं. जवाहरलाल जी बिहार के उद्धार-कार्य में अपना लहू-पसीना एक कर रहे थे, सरकार ने उन्हें गिरफ़्तार करके उदारता का परिचय नहीं दिया. हम इसके लिए तैयार तो थे ही, सरकार ने कोई असाधारण बात नहीं की, लेकिन यह समझते थे कि यह सरकार भी उस काम की कुछ कद्र करेगी, जो पंडित जी इस समय कर रहे थे, लेकिन मालूम हुआ कि सरकार किसी तरह का सहयोग हमसे नहीं करना चाहती –

सैयाद की मर्जी है कि अब गुल की हवस में

नाले न करे मुर्ग गिरफ़्तार कफ़स में.

साहित्य और साहित्यकारों की भूमिका

वर्ष 1935 में अल्मोड़ा जेल में रहते हुए जवाहरलाल नेहरू ने ‘प्रताप’ में एक लेख लिखकर भारत भर के साहित्यकारों का एक प्रतिनिधि संगठन बनाने की हिमायत की थी. उल्लेखनीय है कि ठीक उसी समय ‘हंस’ द्वारा भी भारतीय साहित्य के संगठन व समन्वय के उद्देश्य की पूर्ति के लिए ‘भारतीय साहित्य-संघ’ स्थापित करने की ज़रूरत पर विचार किया जा रहा था. नेहरू और ‘हंस’ की इस मुहिम में सादृश्यता पर टिप्पणी करते हुए प्रेमचंद ने ‘हंस’ में नवंबर 1935 में प्रकाशित संपादकीय में लिखा कि ‘नेहरू और हमारे आयोजनों में अद्भुत सादृश्य है. इससे यह सिद्ध होता है कि राष्ट्र की विचारधारा सांस्कृतिक एकता की ओर कितने वेग और कितनी एकरसता के साथ दौड़ रही है. नेहरू जी राष्ट्र के प्राण हैं और उनका हृदय राष्ट्र का हृदय है, जिसमें राष्ट्र की सम्पूर्ण आकांक्षाएं और भावनाएं प्रतिबिंबित होती हैं. साहित्यिक और सांस्कृतिक एकता राष्ट्र के विकास का मुख्य अंग है और यह भविष्य का शुभ लक्षण है कि वह भावना राष्ट्र के मन में प्रबल हो उठी है.’

इसके साथ ही, ‘प्रताप’ में छपे उस लेख में नेहरू ने भारतीय भाषाओं और साहित्य की वर्तमान स्थिति के बारे में लिखते हुए भारत की विभिन्न प्रांतीय भाषाओं के बीच संवाद बढ़ाने पर ज़ोर दिया था. भारतीय साहित्यकारों का आह्वान करते हुए नेहरू ने लिखा कि वे विश्व भर के साहित्यकारों से संवाद स्थापित करें और अंतरराष्ट्रीय साहित्य संघों में भी हिस्सा लें जिससे कि भारतीय साहित्य को अपेक्षित विश्व-दृष्टि मिल सके. इस बात का समर्थन करते हुए प्रेमचंद ने यह भी लिखा कि अंतरराष्ट्रीय संघों में शामिल होने के लिए राष्ट्रभाषा की ज़रूरत होगी.

प्रेमचंद का कहना था कि ‘अगर हम संसार-साहित्य में वह स्थान प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमें अपनी राष्ट्रभाषा बनानी होगी और उसी के आधार पर संसार साहित्य-समाज में भाग लेना पड़ेगा.’ इसी संदर्भ में, प्रेमचंद ने उन भारतीय नेताओं को भी आड़े हाथों लिया जो भारतीय भाषाओं की उपेक्षा कर रहे थे. प्रेमचंद ने लिखा कि ‘हमारे शिक्षित वर्ग की यह हालत हो गई है कि उनमें से अधिकांश अपनी मातृ-भाषा में एक लाइन भी शुद्ध नहीं लिख सकते. दुःख तो यह है कि जो हमारे नेता कहलाते हैं, उनमें से अधिकांश अपनी मातृ-भाषा से अनभिज्ञ हैं और जिस समाज के नेता जनता से इतनी दूर हट गए हों कि उनमें भाषा का संबंध भी न हो, उस समाज की दशा जो हो रही है, वह हम अपनी आंखों देख रहे हैं.’

नेहरू ने ‘प्रताप’ में छपे उसी लेख में अंग्रेज़ी के अलावा दूसरी यूरोपीय भाषाओं को सीखने का भी आग्रह किया था. नेहरू ने लिखा था कि ‘अंग्रेज़ी काफी नहीं है और सिर्फ अंग्रेज़ी जानने की वजह से हम अक्सर धोखा खा चुके हैं. हम सारी दुनिया को अंग्रेज़ी ऐनकों से देखने लगे हैं और यह नहीं महसूस करते कि वह एकतरफ़ी है. अंग्रेज़ी हुकूमत से राजनीतिक मुक़ाबला करते हुए भी हम विचारों से उनके गुलाम हो गए… अगर हम फ्रेंच या जर्मन या रूसी किताबें या अख़बार पढ़ें, तो मालूम होता है कि दुनिया में कोई और चीज भी है, और अंग्रेज़ी का उसमें इतना बड़ा हिस्सा नहीं है, जितना हम समझते थे.’

हिंदी साहित्य की वस्तु-स्थिति

कलकत्ता से छपने वाली हिंदी की प्रसिद्ध पत्रिका ‘विशाल भारत’ में जवाहरलाल नेहरू ने जुलाई 1935 में एक लेख लिखा. इसका शीर्षक था ‘हमारा साहित्य’. इस लेख में नेहरू ने अपने हिंदी साहित्य संबंधी ज्ञान की अल्पज्ञता को स्वीकार करते हुए यह जानना-समझना चाहा था कि ‘हिंदी-साहित्य में आजकल क्या-क्या विचारधाराएं चल रही हैं, क्या-क्या सवाल उसके सामने हैं, उसकी निगाह किधर है?’ नेहरू ने इसी संदर्भ में हिंदी में राजनीति, विश्व-इतिहास, अर्थशास्त्र, विज्ञान, समाज-विज्ञान की पुस्तकों के अभाव की चर्चा भी की. नेहरू ने लिखा कि ‘जिन विषयों में मुझे दिलचस्पी है, उनमें मुझे अभी तक हिंदी में बहुत कम पुस्तकें मिली हैं. मैं आजकल की दुनिया को समझना चाहता हूं. जो ऊपरी वाक़यात होते हैं और जिनका हाल हम कुछ समाचार-पत्रों में पढ़ते हैं, मैं उनके पीछे देखना चाहता हूं, ताकि मैं समझूं कि वे क्यों हुए; क्या-क्या अंदरूनी ताक़तें दुनिया के लोगों को इधर-उधर धकेल रही हैं; क्या-क्या भावनाएं उनके दिलों में हैं, कौन-कौन से बड़े-बड़े सवाल संसार भर को और हमारे देश को परेशान कर रहे हैं?’

जनवरी 1936 के ‘हंस’ में प्रकाशित एक संपादकीय में प्रेमचंद ने नेहरू के ‘विशाल भारत’ वाले लेख की चर्चा की थी. प्रेमचंद ने लिखा था कि ‘हमें तो यही आश्चर्य है कि पंडित जी ने कैसे यह विश्वास कर लिया कि हिंदी में साहित्य ने इतनी उन्नति कर ली है. जब पढ़े-लिखे लोग हिंदी लिखना अपनी शान के खिलाफ़ समझते हैं, जब हमारे नेता हिंदी-साहित्य से प्रायः बेख़बर-से हैं, जब हम लोग थोड़ी-सी अंग्रेज़ी लिखने की सामर्थ्य होते ही हिंदी को तुच्छ और ग्रामीणों की भाषा समझने लगते हैं, तब यह कैसे आशा की जा सकती है कि हिंदी में ऊंचे दर्जे के साहित्य का निर्माण हो.’

एक ओर भारत की पराधीनता तो दूसरी ओर शिक्षित वर्ग द्वारा हिंदी समेत दूसरी भारतीय भाषाओं की उपेक्षा भारतीय भाषाओं की राह में कैसे अवरोध खड़े कर रहे थे. इस सच्चाई से भी प्रेमचंद भलीभांति वाकिफ़ थे. इसीलिए उन्होंने लिखा कि ‘एक तो पराधीनता यों ही हमारी प्रतिभा और विकास में चारों ओर से बाधक हो रही है, दूसरे हमारा शिक्षित समुदाय हिंदी-साहित्य से कोई सरोकार नहीं रखना चाहता, तो साहित्य में प्रगति और स्फूर्ति कहां से आए?’

प्रेमचंद का विश्वास था कि उत्कृष्ट साहित्य की रचना तभी संभव होगी जब शिक्षित समुदाय उस सृजन-प्रक्रिया में हिस्सा लेगा, उसके गुण-दोष पर चर्चा की जाएगी. उन्होंने लिखा कि ‘ऊंचा साहित्य तभी आएगा, जब प्रतिभा सम्पन्न लोग तपस्या की भावना लेकर साहित्य-क्षेत्र में आएंगे, जब किसी अच्छी पुस्तक की रचना राष्ट्र के लिए गौरव की बात समझी जाएगी, जब उसकी चाय की मेजों पर चर्चा होगी, जब विद्वान लोग साहित्य में रस लेंगे.’