‘भारत एक ऐसा देश है जो मानवता के धर्म की राह पर चलता है, जहां हम सबसे अपेक्षा की जाती है कि हम जीवन और मृत्यु, दोनों स्थितियों में दूसरों का सम्मान करें... पीड़िता कम से कम इसकी हकदार तो थी ही कि उसका अंतिम संस्कार सम्मान और उन धार्मिक परंपराओं के साथ होता जो उसके परिवार द्वारा ही निभाई जानी थीं.’

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यह टिप्पणी हाथरस सामूहिक बलात्कार और हत्या मामले में नाराजगी जताते हुए की है. अदालत ने इस घटना का स्वत: संज्ञान लिया था. मामले की सुनवाई के दौरान उसने जो कहा है उसका सार यह है कि पुलिस-प्रशासन के स्थानीय से लेकर आला अधिकारियों तक ने इस मामले में अपना काम ठीक से नहीं किया.

यह मामला 19 साल की एक लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार और मारपीट का है. बुरी तरह से घायल पीड़िता ने 29 सितंबर को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में दम तोड़ दिया था. इसके बाद यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आ गया. लोगों का आक्रोश तब और बढ़ गया जब खबर आई कि पीड़िता के शव को हाथरस ले जाकर रात के तीन बजे खुद प्रशासन ने ही उसका अंतिम संस्कार कर दिया. परिवार का आरोप है कि उन्हें शव के अंतिम दर्शन भी नहीं करने दिए गए और उनकी सहमति के बिना ही पीड़िता का अंतिम संस्कार किया गया.

इस मामले में हाई कोर्ट का मुख्य जोर इस बात पर है कि क्या पुलिस-प्रशासन ने पीड़िता और उसके परिवार के बुनियादी और मानव अधिकारों का उल्लंघन किया है. अदालत ऐसे बड़े मुद्दों पर भी विचार कर रही है जो इस घटना से जुड़े हैं और उत्तर प्रदेश के सभी नागरिकों के अधिकारों को प्रभावित करते हैं. इस घटना से जुड़े सभी पक्षों ने अदालत में अपनी-अपनी बात कही है. इनमें पीड़ित पक्ष के अलावा स्थानीय प्रशासन और राज्य सरकार भी शामिल हैं. इन सभी पक्षों को न केवल अदालत ने पूरे संयम के साथ सुना है बल्कि बेहद संतुलित तरीके से उन पर अपनी राय भी रखी है. आइए. अदालती दस्तावेज से ही यह जानते हैं कि इस मामले से जुड़े सभी पक्षों ने अदालत में क्या कहा है और खुद अदालत इस मामले में क्या सोच रखती है.

पीड़ित परिवार

अदालत के मुताबिक ‘पीड़िता के पिता ओमप्रकाश का कहना है जब उनकी बेटी का दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में इलाज चल रहा था तो वे अपने छोटे बेटे संदीप के साथ वहां मौजूद थे. 29 सितंबर को उन्हें उनकी बेटी की मौत की खबर दी गई और बताया गया कि उसका शव पोस्टमॉर्टम के लिए ले जाया जा रहा है. उन्होंने तभी आखिरी बार बेटी के शव को देखा था. पोस्टमॉर्टम के बाद शव उन्हें नहीं सौंपा गया. बताया जा रहा है कि इसे एक एंबुलेंस में रखकर गांव ले जाया गया. ओम प्रकाश और संदीप को भी एक दूसरी गाड़ी से हाथरस ले जाया गया जिसमें एडीएम भी सवार थे. ये लोग आधी रात को गांव पहुंचे. उस समय उनके घर पर 70-80 लोग जमा थे. पिता ने कहा कि वे अपनी बेटी के लिए इंसाफ चाहते हैं. उन्हें अधिकारियों से कोई शिकायत नहीं है, सिवाय इस बात के कि उनकी बेटी का शव उन्हें नहीं दिया गया और हिंदू परंपरा के अनुसार उसका अंतिम संस्कार भी नहीं करने दिया गया. उनका कहना था कि वे या फिर उनके परिवार का कोई भी सदस्य अंतिम संस्कार के दौरान वहां नहीं था. उन्होंने यह भी कहा कि प्रशासन से कई बार आग्रह किया गया कि अंतिम संस्कार सुबह किया जाए लेकिन, ऐसा नहीं हुआ और शव रात में ही जला दिया गया.

पीड़िता की मां ने कई बार कहा कि वे अपनी बेटी का चेहरा देखना चाहती हैं, लेकिन उन्हें इसकी इजाजत नहीं दी गई और उनकी इच्छा के खिलाफ शव का अंतिम संस्कार रात में ही कर दिया गया. यह बात बताते हुए वे रो पड़ीं. कथित बलात्कार की तारीख से अब तक लड़की के भाइयों ने भी लगभग एक ही तरह की बातें दोहराई हैं और कहा है कि अंतिम संस्कार के दौरान अधिकारियों ने उनकी जरा भी नहीं सुनी. उनके मुताबिक उनसे लगातार कहा जाता रहा कि उन्हें अंतिम दर्शन करने दिये जाएंगे और शव उनके घर पर लाया जाएगा. लेकिन जब शव गांव पहुंचा तो इसे एक घंटे तक एंबुलेंस से नीचे नहीं उतारा गया और फिर सीधे श्मशान ले जाया गया. परिवार में से कोई भी अंतिम संस्कार के दौरान मौजूद नहीं था.

मृतका की भाभी श्रीमती संध्या बहुत गुस्से में थीं और उन्होंने कहा कि अधिकारियों ने परिवार को बेवकूफ बनाया. यहां तक कि उनमें से कुछ ने मौके पर मौजूद उनके उन रिश्तेदारों के साथ गलत बर्ताव भी किया जिन्होंने एंबुलेंस को श्मशान की तरफ जाने से रोकने की कोशिश भी की थी. वे बहुत भावुक थीं और उन्होंने कहा कि शव परिवार को न सौंपने और आधी रात में ही उसका अंतिम संस्कार करने वाले अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए. उनका यह भी कहना था कि उनकी मुआवजे में दिलचस्पी नहीं है और परिवार को जो नुकसान हुआ है उसकी पूर्ति नहीं की जा सकती.’

स्थानीय प्रशासन

हाई कोर्ट के मुताबिक ‘हाथरस के जिला मजिस्ट्रेट का पूरी घटना पर अपना अलग पक्ष है. उनका कहना है कि वे लगातार पूरी घटना पर नजर रखे हुए थे. जिला मजिस्ट्रेट के मुताबिक दिल्ली में ही इस पूरी घटना को राजनीतिक रंग देने की कोशिश होने लगी थी. कई पार्टियों से ताल्लुक रखने वाले कुछ नेता शव को हाथरस ले जाने से रोकने की कोशिश करते हुए मांग कर रहे थे कि यह उन्हें सौंप दिया जाए. एंबुलेंस को रास्ते में कई जगह रोका गया. जिला मजिस्ट्रेट हाथरस से लगे जिलों के प्रशासनिक अधिकारियों के साथ लगातार संपर्क में थे और यह इंतजाम कर रहे थे कि एंबुलेंस दिल्ली से मृतका के गांव तक बिना किसी बाधा के पहुंच जाए. अगले दिन यानी 30 सितंबर 2020 को लखनऊ में सीबीआई कोर्ट बाबरी विध्वंस मामले के आरोपितों को लेकर फैसला सुनाने वाला था इसलिए पूरा राज्य हाई अलर्ट पर था. ज्यादातर पुलिस बल फैसले के बाद संभावित रूप से पैदा होने वाली स्थिति को संभालने के लिए तैनात थे. सो मामले की संवेदनशीलता और राजनीतिक दलों के इस पर हंगामे के चलते अलीगढ़ के कमिश्नर, आगरा के एडीजी, अलीगढ़ के आईजी, अलीगढ़ के ही एसपी और खुद उन्होंने सामूहिक रूप से फैसला लिया कि शव का अंतिम संस्कार रात में ही कर दिया जाए. आशंका थी कि अगर देर की जाएगी और मामला सुबह तक टाला जाएगा तो करीब 10 हजार लोग इकट्ठा हो जाएंगे और इसे जातिगत/राजनीतिक मामला बना देंगे. इस फैसले के पीछे कोई दुर्भावना नहीं थी और इसका मकसद यह था कि कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़े नहीं. पीड़िता के पिता भी रात में ही अंतिम संस्कार के लिए राजी थे. उनकी सहमति के बाद ही अंतिम संस्कार किया गया.’

‘जिला मजिस्ट्रेट ने अपने बयान में यह भी कहा है कि अंतिम संस्कार पूरे सम्मान के साथ हुआ और यह कहना गलत है कि शव पर केरोसीन छिड़कर उसे जलाया गया. ठीक से चिता बनाई गई थी. अंतिम संस्कार में केरोसीन का इस्तेमाल नहीं हुआ और कुछ वीडियो में जो केन दिख रहे हैं वे शायद गंगा जल के हैं. जिला मजिस्ट्रेट ने इससे साफ इनकार किया कि रात में ही अंतिम संस्कार का यह फैसला उन्होंने ऊपर या लखनऊ से मिले किसी निर्देश पर किया. लेकिन इसके साथ ही उनका यह भी कहना था कि उन्हें इसकी कोई जानकारी नहीं है कि इस सामूहिक फैसले में उनके साथ जो वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे यानी अलीगढ़ के कमिश्नर, आगरा के एडीजी और अलीगढ़ के आईजी, उन्हें इस संबंध में राज्य सरकार से कोई निर्देश मिले थे या नहीं. लेकिन परिवार की परंपराओं के अनुसार पीड़िता के अंतिम संस्कार को लेकर जिला मजिस्ट्रेट हमें संतुष्ट नहीं कर पाए हैं.’

राज्य सरकार

अदालत के मुताबिक ‘हाथरस के जिला मजिस्ट्रेट के बयान का समर्थन करते हुए एडीजी (कानून व्यवस्था) श्री प्रशांत कुमार ने कहा है कि रात में ही अंतिम संस्कार का फैसला सभी स्रोतों से मिले सुरक्षा इनपुट को देखते हुए किया गया. उनके मुताबिक यह फैसला स्थानीय प्रशासन ने अपने स्तर पर लिया और इसके पीछे कोई दुर्भावना नहीं थी. अंतिम संस्कार रात में करने के पीछे सबूतों को नष्ट करने आदि जैसा कोई दूसरा मकसद नहीं था. उन्होंने साफ कहा है कि हाथरस के जिला प्रशासन ने किसी अतिरिक्त बल की मांग नहीं की थी. अगर ऐसी मांग हुई होती तो इसे पूरा किया जाता ताकि जमीनी हालात से निपटा जा सके.’

‘हमने श्री कुमार से पूछा कि जो जांच के साथ सीधे तौर पर जुड़ा हुआ नहीं है, क्या उसके लिए यह उचित है कि वह कथित अपराध से जुड़े किसी सबूत पर टिप्पणी करे या फिर उसके आधार पर यह निष्कर्ष देने लगे कि अपराध हुआ या नहीं, खास तौर से जब वह बलात्कार जैसा अपराध हो. वह भी तब जब जांच चल रही हो और वह इस जांच का हिस्सा न हो? उन्होंने माना कि ऐसा नहीं होना चाहिए. हमने उनसे पूछा कि क्या उन्हें पता है कि बलात्कार की परिभाषा से जुड़े कानून में 2013 के बाद सुधार हुए हैं और अगर दूसरे ठोस सबूत हों तो फॉरेंसिक जांच के दौरान सिर्फ वीर्य के न मिलने, हालांकि इसकी भी अहमियत होती है- से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि बलात्कार हुआ या नहीं. उन्होंने कहा कि उन्हें यह जानकारी है. हमने उनसे ये सवाल पूछे क्योंकि कहा जा रहा है कि श्री प्रशांत कुमार, एडीजी (कानून-व्यवस्था) और श्री प्रवीण कुमार लस्कर (डीएम, हाथरस) जैसे कुछ अधिकारियों ने फॉरेंसिक लैब की रिपोर्ट पर सार्वजनिक रूप से टिप्पणी की थी जबकि वे प्रत्यक्ष रूप से जांच का हिस्सा नहीं है जो अभी जारी है.’

‘अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) श्री अवनीश कुमार अवस्थी को अंतिम संस्कार के दौरान इस तरह से मानवाधिकारों के उल्लंघन को लेकर अदालत की चिंताओं की जानकारी दी गई. उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने भी इससे इनकार नहीं किया है कि इस तरह की दुर्भाग्यपूर्ण घटना हुई है. उनके मुताबिक इसे छिपाने की कोई कोशिश नहीं की गई है बल्कि सरकार हर तरह से अदालत के साथ सहयोग के लिए तैयार है, और यही वजह है कि एसआईटी का गठन किया गया और अब जांच सीबीआई को दे दी गई है. राज्य को अहसास है कि नागरिकों के अपने अधिकार हैं और अदालत की सलाह या निर्देशों के हिसाब से वह इस तरह की मौतों के मामले में अंतिम संस्कार या फिर पीड़ित परिवारों को मुआवजा देने के संबंध में एक नीति लाने के लिए तैयार है.’

‘हमने श्री अवस्थी से साफ-साफ पूछा कि अगर पीड़िता का अंतिम संस्कार करने का फैसला सामूहिक था, जैसा कि हाथरस के जिला मजिस्ट्रेट ने खुद कहा है, तो सिर्फ जिले के एसपी को क्यों सस्पेंड किया गया जबकि जिला मजिस्ट्रेट अभी भी अपने पद पर बने हुए हैं. उन्होंने कहा कि अपनी पहली रिपोर्ट में एसआईटी ने उन्हें दोषी पाया था. लेकिन जब यह पूछा गया कि क्या एसआईटी ने जिला मजिस्ट्रेट को क्लीन चिट दे दी थी या फिर क्या एसआईटी की जांच के दायरे में इस घटना में जिला मजिस्ट्रेट की भूमिका भी थी तो उन्होंने इससे इनकार कर दिया. दोनों अधिकारियों के साथ अलग-अलग व्यवहार क्यों हुआ, इस बारे में वे कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सके. फिर हमने उनसे पूछा कि क्या यह ठीक और/ या निष्पक्ष है कि इस मामले से जुड़े तथ्यों को देखते हुए हाथरस के जिला मजिस्ट्रेट अपने पद पर बने रहें, खास तौर पर तब जब इस घटना से जुड़ी प्रक्रियाओं में उनकी भूमिका थी और जांच अब भी चल रही है. इस पर श्री अवस्थी ने कहा कि सरकार मामले के इस पहलू पर विचार करेगी और फिर फैसला लेगी. हमें उम्मीद है कि इस पूरी प्रक्रिया से जुड़ी निष्पक्षता को ध्यान में रखते हुए जल्द से जल्द इस संबंध में एक उचित फैसला लिया जाएगा.’

अदालत का अपना निष्कर्ष

‘ऊपर जिन तथ्यों और परिस्थितियों का जिक्र हुआ, उनसे अब तक पहली नजर में यह लगता है कि पीड़िता के शव को उसके परिवारवालों को सौंपे बिना ही रात में उसका अंतिम संस्कार करने का फैसला स्थानीय स्तर पर प्रशासन ने सामूहिक रूप से लिया और इसे हाथरस के जिला मजिस्ट्रेट के आदेश पर अमल में लाया गया. राज्य के अधिकारियों ने भले ही यह फैसला कानून-व्यवस्था के नाम पर लिया हो, लेकिन प्रथम दृष्टि में यह पीड़िता और उसके परिवारों के मानवाधिकारों के उल्लंघन का मामला है. पीड़िता कम से कम इसकी हकदार तो थी ही कि उसका अंतिम संस्कार सम्मान और उन धार्मिक परंपराओं के साथ होता जो उसके परिवार द्वारा ही निभाई जानी थीं. शवदाह संस्कारों में गिना जाता है यानी अंतिम संस्कार एक महत्वपूर्ण संस्कार माना जाता है जिसके साथ कानून-व्यवस्था की स्थिति की आड़ लेकर समझौता नहीं किया जा सकता था. प्रशासन हमारे सामने अभी तक कोई ऐसा कारण पेश नहीं कर पाया है जिसके चलते शव को कुछ समय के लिए, आधा घंटे के लिए ही सही, परिवार को नहीं सौंपा जा सकता था जिससे वे घर पर ही अपनी रस्में पूरी कर लेते और इसके बाद भले ही रात में या फिर अगले दिन अंतिम संस्कार कर दिया जाता.’

‘हो सकता है प्रशासन ने पीड़िता का चेहरा आखिरी बार देखने की परिवार की अपील सीधे तौर पर न ठुकराई हो, लेकिन यह तथ्य तो अपनी जगह है ही कि उनकी बार-बार अपील के बावजूद उन्हें अंतिम दर्शन नहीं करने दिए गए. इस तरह ऐसा लगता है कि सम्मान के साथ जीने का बुनियादी अधिकार, मरने के बाद भी सम्मान का अधिकार और सम्मान के साथ अंतिम संस्कार के अधिकार का उल्लंघन हुआ. इससे न सिर्फ परिवार के सदस्यों बल्कि मौके पर इकट्ठा हुए सभी लोगों और रिश्तेदारों की भावनाओं को चोट पहुंची.’

‘इसलिए अपराध, जिसकी जांच पुलिस/सीबीआई कर रही है, के अलावा हमारे सामने जो अहम मुद्दे हैं उनमें से एक यह भी है कि क्या पीड़िता के अंतिम दर्शन परिवार को करवाए बगैर और उसकी सहमति के बिना हड़बड़ी में रात को ही उचित सम्मान के बिना अंतिम संस्कार किए जाने से उसके उन बुनियादी और मानव अधिकारों का गंभीर उल्लंघन हुआ है जो भारतीय संविधान ने अनुच्छेद 21 और 25 के तहत नागरिकों को दिए हैं. अगर हां, तो इसके लिए कौन जिम्मेदार हैं ताकि उनकी जवाबदेही और जिम्मेदारी तय की जा सके. मुददा यह भी है कि परिवार को इसकी क्षतिपूर्ति कैसे की जाए.’

इस तरह देखें तो हाई कोर्ट इस मामले में स्थानीय प्रशासन और राज्य सरकार के आला अधिकारियों के जवाब से संतुष्ट नहीं है. अदालत के मुताबिक उसका जोर फिलहाल दो बातों पर है - पहली, क्या पीड़िता और उसके परिवार के बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन हुआ है और दूसरी, वे मुद्दे जिनका संदर्भ इस तरह के अधिकारों से जुड़ता है ताकि महत्वपूर्ण संवैधानिक अधिकारों का कोई लापरवाही और मनमर्जी के साथ उल्लंघन न कर सके, खासकर तब जब इसका शिकार होने वालों में दलित, अशिक्षित और गरीब लोग हों. अपने फैसले में अदालत ने कहा है, ‘आजादी के बाद सरकार और प्रशासन का मार्गदर्शक सिद्धांत लोगों की सेवा और सुरक्षा करना होना चाहिए, राज और नियंत्रण करना नहीं जैसा आजादी के पहले हुआ करता था. इस तरह की परिस्थितियों में जिले के अधिकारियों को क्या करना चाहिए, इस बारे में सरकार को उचित प्रक्रियाएं बनानी चाहिए. अदालत भी ऐसे तौर-तरीकों पर विचार कर रही है जिनसे भविष्य में इस तरह के विवाद पैदा होने की नौबत न आए.’

हाई कोर्ट ने इस मामले में ‘अभिव्यक्ति की आजादी के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ किये बिना’ मीडिया और राजनेताओं से ऐसा कुछ न कहने का ‘अनुरोध’ भी किया है जिससे समाज में कड़वाहट पैदा हो. राज्य सरकार से दो नवंबर तक ऐसे दिशा-निर्देश पेश करने को कहा गया है जिनसे भविष्य में ऐसी घटनाएं रोकी जा सकें. उसी दिन मामले की अगली सुनवाई होनी है.