कविता की कोशिश

आजकल लगभग हर चीज़ के बारे में बात दावे की पदावली में होती है. यह और बात है कि इन दावों की जांच-परख करने का उत्साह कम होता जाता है. करने वाले और उन्हें उचित मानने वाले दोनों ही, बहुत जल्दी, दावे भूल जाते हैं. कविता के बारे में कुछ कहना, ऐसे माहौल में, दावे करना जैसा लग सकता है जबकि तरह-तरह के दावे करने का लगभग मौरूसी हक़ हाल मुक़ाम राजनेताओं, धर्मगुरुओं, विज्ञापनकर्ताओं और मीडियाकर्मियों ने ले रखा है. कविता कोशिश भर कर सकती है, जिसमें कर्म और आकांक्षा आदि सब मिले-जुले हैं. यह भी याद रखने की दरकार है कि कविता के बारे में जो हम कहते हैं और जो करते हैं उनमें कुछ दूरी अनिवार्यतः रहती है.

हमारा समय इस क़दर निर्जन और बाधित है कि ऐसा लग सकता है कि यह कविता का समय नहीं है. लेकिन इसे कविता का समय बनाया जा सकता है: कवि की मानवीयता, सजग अन्तःकरण, भाषा की अन्तर्ध्वनियों को मुखर-सशक्त-उर्जस्वित करके, संवेदना, कल्पना और साहस से. इसका कोई बंधा-बंधाया ढांचा नहीं होता. यह ढांचे तोड़ने, नया तामीर करने का समय है.

जब, लगभग सारी सत्ताधारी और सत्ताकामी राजनीति मूल्य-विपन्न, घृणा-भेदभाव फैलाऊ, हिंसक, नीचता की हर हद पार करने पर उतारू हो रही है, कविता को एक तरह की प्रतिराजनीति की तरह उभर सकना चाहिये. उदार, समावेशी, अहिंसक अपनी मानवीयता में तात्कालिक और अदम्य.

भाषा में, ख़ास कर हिन्दी भाषा में और हिन्दी समाज में इतना झूठ, इतनी नफ़रत, इतना भेदभाव, इतनी साम्प्रदायिक संकीर्णता, इतनी हिंसा, इतना झगड़ालूपन आदि भर गये हैं कि भाषा में इन सबके सशक्त प्रतिरोध की तरह मानवीय गरमाहट, संग-साथ, मेल-जोल का पुर्नवास ज़रूरी है. कविता ऐसा पुनर्वास कर सकती है. भाषा को सत्याग्रह की विधा बनाकर, उसकी सांस्कृतिक-सामाजिक स्मृति जगाकर, उसमें कवि की हिस्सेदारी और जवाबदेही को चरितार्थ करते हुए.

कविता सार्थक हस्तक्षेप तभी हो सकती है जब वह पूरी तैयारी से, किसी तरह का वैचारिक उपनिवेश बनने से इनकार करते हुए, अपना स्वराज स्थापित करे, जटिलता, सूक्ष्मता, कल्पना, संवेदना, साहस, विकल्प की सचाई और सपने को गूंथते हुए. जो आम तौर पर अब राजनीति, धर्म, अन्य सामाजिक माध्यमों, मीडिया आदि में नहीं हो रहा है वह कविता में होना चाहिये, बिना अपने प्रथमतः और अन्ततः कविता होने से कोई समझौता किये या ढील दिये -सविनय अवज्ञा, सविनय प्रतिरोध की विधा.

मनुष्य का सच बल्कि उसके सभी सच असीम होते हैं और वह किसी एक विधा या माध्यम में न तो पूरा समा सकते हैं, न निश्शेष हो सकते हैं. कविता में भी नहीं. हर समय में, और हमारे समय में सच के दावेदार बहुत हैं, होते हैं. उनके दावों से अलग कविता अपने सचों की सम्पूर्णता का कोई दावा नहीं करती, कर सकती. उसके सभी सच संशयग्रस्त और अधूरे होते हैं जो मानवीय शिरकत और समझदारी और आत्मालोचन से ही मुक्त, पूरे और विविध हो पाते हैं. कविता सच पर इसरार करती है पर उसका कोई दावा नहीं करती.

कविता की कोशिश होती है, और इस समय यह कोशिश और भी ज़रूरी हो गयी है, रचने, बचने, बचाने, जताने, सुनने-सुनाने की और वह इन क्रियाओं का समाहार करती है. विस्मृति को बढ़ाने और स्मृति को नष्ट करने का एक बेहद दुष्ट पर अत्यन्त कुशल अभियान चल रहा है और उसके चलते कविता याद रखने, याद दिलाने की जगह है. कविता की सकर्मकता उसकी स्वतंत्र वैचारिक सत्ता उससे उद्भूत नैतिक विवेक से ही सम्भव होती है. विस्मृति और दुर्व्याख्या की मुहीम के बरक़्स कविता स्मृति का सजीव-सशक्त हस्तक्षेप हो सकती है. जैसे उम्मीद का, वैसे ही स्मृति का घर कविता हो सकती है.

यह याद रखना और दिलाना ज़रूरी है कि कविता का संघर्ष, आत्मसंघर्ष, आत्मप्रश्नता, नैतिक बोध और विवेक सभी भाषा के अंतर्गत ही होते हैं. लहूलुहान होते हुए भी भाषा कविता में नैतिक आभा से दीप्त-ज्योतित होने की कोशिश करती है, कर सकती है. जीवन और सचाई हमेशा कविता से बड़े होते हैं. कविता की यह जैविक अपर्याप्तता है. अपने नाकाफ़ी होने के बोध से कविता कभी मुक्त नहीं हो पाती है पर उससे बाधित या लाचार भी महसूस नहीं करती.

क्रूर-हिंसक-अमानवीय समय में भी कविता जीवन की, सचाई की बहुलता का उत्सव मनाने की र्जुरत करती रहती है. वह उनकी अदम्य बहुलता का सत्यापन करती है, उस पर आग्रह करती है. वह एकसेपन की तानाशाही का स्वतःस्फूर्त पर अनिवार्य विरोध होती है.

हर दिन लोकतांत्रिक कटौती के भीषण समय में कविता उस जीवन को नज़रन्दाज़ नहीं करती जो राजनीति-धर्म-बाज़ार-मीडिया आदि से बाहर अपनी सनातन लय में स्पन्दित होता है. ऐसे कुसमय में कविता लोकतांत्रिक नागरिकता का एक नया जीवन्त और उत्तरदायी संस्करण हो सकती है. ऐसा रूप जिसमें असहमति या प्रतिरोध दृष्टि का नहीं, रुचि का मामला बन जाये, जहां सुन्दरता को दर्ज़ करना, उसका एहतराम करना पलायन न माना जाये, जिसमें बहुलता की पकड़-समझ संवेदना, कल्पना, यथार्थ, भाषा हर स्तर पर हो.

हम इतने अंधेरे में हैं और हर दिन यह अंधेरा और गाढ़ा और अभेद्य होता जाता है कि हमें ठीक से पता नहीं चल पाता कि हम अंधेरे में एक सीढ़ी और नीचे उतर गये हैं या कि एक सीढ़ी ऊपर चढ़ गये हैं. कविता ऐसे अंधेरे में उजाले की तलाश है. वह अटल दीवार में भी उजाले की कोई दरार खोज ही लेती है. नाउम्मीद समय में कविता उम्मीद का दूसरा नाम, उजाले की एक और शिनाख़्त है. एक और सम्भावना.

अन्ततः

ऋतुराज का नया कवितासंग्रह ‘हम उत्तर मुक्तिबोध है’ [कलमकार मंच जयपुर] मुझे हाल ही में मिला. उसकी कुछ कविताओं से कुछ अंशः

सोचते हो/हां, सोचते हो कि उनसे बदला लेने के लिये/भाषा के सिवा तुम्हारे पास कोई दूसरा अस्त्र नहीं/जबकि उनके पास तुम्हारी हत्या करने के लिये/सब कुछ है भाषा के सिवा

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वे कब तक किलाबन्दी करते रहेंगे तुम्हारी भाषा की?/कब तक उसे थकियाते रहेंगे भविष्य की वैद अंधेरी गलियों में?/करोड़ों शब्दों की तरह करोड़ों लोग मारे जा रहे हैं/उपेक्षा और भेदभाव से/पर अन्ततः जीत उसकी भाषा की होगी

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कहने को तो बहुत कुछ हो रहा है इस देश में/बस भाषा गंदी हुई है और बेहद झूठी

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शब्दों को डोरी से बांधते हैं तो वे गिरते हैं अंधकूप में/सल्फ़्यूरिक एसिड से जल जाते हैं काग़ज़/झूठे प्रतिबिम्ब से ग़ायब हो जाता है चेहरा/जन्मने की शोकधुनें बन जाती हैं कलाकृतियां/और तुम्हें कहना पड़ता है कि/‘मेरी किताबें अस्थियों हैं समय के कचरे के ढेर पर’

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‘तुम्हारे ग़रीबों से ऊपर हैं हमारे ग़रीब/क्योंकि वे हैं हमारे बहुत करीब’

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वह जिन्हें विवशता में अपना खून पिला रहा है/उनके शत्रु भीतर घुस कर कहते हैं, ‘उन्हें खून दिया है/तो हमें तुम्हारा मांस दो’

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पहचानता हूं कि झूठ की तरफ सच के भी/कई घिनौने रूप होते हैं

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सच का जो कार्यक्षेत्र है/वह झूठ का भी है/लेकिन झूठ इतना सीमित और ठोस है/कि पकड़ में आ जाता है/सच पकड़ में नहीं आता/कभी-कभी उसे पकड़ने के लिए/झूठ का सहारा लेना पड़ता है

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कोई कितना भी हल्ला मचाये/सचाई यह है कि गोवंश से पहले मनुष्यता मर चुकी है.

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कविता लिखना भी एक बेहद सनकी आत्मघाती/शग़ल माना जायेगा/टूटी टांगों वाले एक बूढ़े कवि के पास/कोई उपाय नहीं है/ कि वह अपने चेहरे को/अंधेरे से रोशनी की तरफ़ ला सके.