कश्मीर घाटी में पिछले साल 5 अगस्त को अनुच्छेद-370, जो जम्मू-कश्मीर को भारत के संविधान में एक विशेष स्थिति देता था, हटा दिये जाने के बाद से अब तक लगभग कोई भी राजनीतिक उथल-पुथल नहीं हुई थी.

लेकिन बीते कुछ दिनों में यहां का राजनीतिक माहौल एकदम से गरमा गया है. पिछले दिनों यहां तीन बड़ी घटनाएं घटीं और इन तीनों के तार एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं - जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने एक विवादित बयान दिया, एक और पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती की 14 महीने बाद रिहाई हुई और दोनों की पार्टियों ने कश्मीर घाटी के अन्य राजनीतिक दलों के साथ मिल कर एक गठबंधन बना लिया.

ये तीनों चीज़ें अनुच्छेद-370 हटाये जाने से जुड़ी हुई हैं और अलग-अलग तरीके से इसी एक मुद्दे के इर्द-गिर्द घूमती हैं.

घटनाक्रम के हिसाब से पहले बात फारूक अब्दुल्ला की करते हैं.

कुछ दिन पहले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के जम्मू-कश्मीर प्रवक्ता अलताफ़ ठाकुर ने नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) के अध्यक्ष, फारूक अब्दुल्ला को अगला चुनाव चीन के वुहान प्रांत से लड़ने की सलाह दी जबकि दिल्ली में बैठे भाजपा के कुछ लोगों ने फारूक को देशद्रोही भी कह दिया.

सुनने में यह थोड़ा सा अटपटा है, क्यूंकि फारूक अब्दुल्ला पिछले कई दशक से जम्मू-कश्मीर में ‘भारत’ के प्रतिनिधि माने जाते रहे हैं. तो ऐसा क्या हुआ कि अब उन्हें चीन जाने की सलाह दी जा रही है.

हाल ही में पत्रकारों से बात करते हुए फारूक अब्दुल्ला ने, ‘लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल’ (एलएसी) पर चल रहे भारत-चीन तनाव के बारे में पूछे गये एक सवाल के जवाब में कहा कि उन्होंने चाइना के राष्ट्रपति को भारत नहीं बुलाया था बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन्हें यहां लेकर आए थे और उन्हें झूला झुलाया था.

“इसके बावजूद चाइना को भारत का अनुच्छेद-370 हटाना बिलकुल रास नहीं आया और वो बार-बार इस चीज़ पर चेतावनी देते रहे. उन्होंने अपना इरादा स्पष्ट कर दिया था कि अगर 370 बहाल नहीं किया गया तो वो रुकेंगे नहीं” फारूक ने कहा.

लेकिन फारूक यहीं नहीं रुके और आगे उन्होंने कहा कि अल्लाह करे चाइना वालों के इस ज़ोर से हमारे लोगों की मदद हो “और हमें अपना हक़, जो कि 370 और 35ए है वापिस मिल जाये.”

उनका यह बयान आग की तरफ फैला और फौरन ही भाजपा के लोगों ने इस पर टिप्पणी करनी शुरू कर दी. भाजपा के वरिष्ठ प्रवक्ता संबित पात्रा का कहना था कि फारूक अब्दुल्ला ऐसा कहकर चीन की विस्तारवादी मानसिकता को उचित ठहरा रहे हैं.

“मुझे समझ में नहीं आता है कि एक सांसद इस प्रकार की बातें कैसे कर सकता है. एक लोकतान्त्रिक देश में अगर आप किसी चीज़ से सहमत नहीं हैं और आप उस पर टिप्पणी करते हैं तो वो अलग बात है लेकिन किसी और देश की मदद से 370 वापिस लाने की बात करना न केवल निंदनीय है बल्कि देशद्रोह है” पात्रा ने कहा.

कुछ छोटे-मोटे भाजपा नेताओं ने फारूक के खिलाफ एफ़आईआर तक की मांग की. उनकी निंदा करने वालों में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और जम्मू-कश्मीर के आखिरी महाराजा, हरी सिंह के पुत्र, करण सिंह भी शामिल थे.

“में उनकी निराशा और उनका गुस्सा समझता हूं, लेकिन उनका यह बयान कश्मीर के लोगों में अवास्तविक उम्मीदें जगा सकता है. उन्हें ऐसा नहीं कहना चाहिए था” सिंह ने कहा.

फारूक अब्दुल्ला ने इसके बाद से इस बयान पर कोई बात नहीं की है लेकिन उनकी पार्टी और उमर अब्दुल्ला का इस विषय में यह कहना है कि उनके बयान को तोड़-मरोड़ के पेश किया जा रहा है.

लेकिन सवाल यह पैदा होता है कि फारूक अब्दुल्ला ने यह बात कही तो क्यों कही?

एक इतना वरिष्ठ नेता, जो न केवल जम्मू-कश्मीर की बल्कि पूरे देश की राजनीति को काफी गहराई से समझता है, उसने ऐसा बयान क्यों दिया? क्या फारुक अब्दुल्ला का यह बयान करण सिंह के बयान के उलट, इस वजह से आया कि कश्मीर के लोगों ने भी चीन से कोई उम्मीद लगा रखी है? क्या फारूक अब्दुल्ला अपनी राजनीति बढ़ाने के लिए वह बोल रहे हैं जो कश्मीर के लोग पहले से ही सोच रहे हैं?

कश्मीर में जानकार इस बात को लेकर बटे हुए हैं. जहां कुछ लोग कहते हैं कि फारूक की यह बात लोगों में फिर से अपनी जगह बनाने की एक कोशिश है, वहीं कुछ लोग कहते हैं किे उनकी निराशा और गुस्सा उनसे ऐसी बातें करवा रहे हैं.

श्रीनगर में स्थित एक वरिष्ठ पत्रकार शम्स इरफान सत्याग्रह से बात करते हुए कहते हैं कि ज़्यादातर कश्मीरी लोग इस समय यह चाहते हैं कि जहां से भी हो उन्हें कोई मदद मिले.

“मैंने जिन लोगों से भी अभी तक बात की है सब चीन और पाकिस्तान की आस लेकर बैठे हुए हैं. कश्मीर घाटी में हर तरह के प्रदर्शन पर कड़े प्रतिबंध हैं, हजारों लोग जेलों में हैं और ऐसे में इन्हें सिर्फ भारत-पाकिस्तान में युद्ध ही एक रास्ता नज़र आ रहा था. और फिर एलएसी पर तनाव बढ़ा तो एक और उम्मीद जागी” इरफान ने सत्याग्रह से बात करते हुए कहा.

शम्स इरफान कहते कि वे भी इन उम्मीदों को उतना ही अवास्तविक मानते हैं जितना दिल्ली में बैठे लोग “लेकिन उम्मीद है तो है. और यह सब भांपने के लिए आजकल सिर्फ सोशल मीडिया पर एक नज़र डालने की ज़रूरत है, जो एनसी (नेशनल कॉन्फ्रेंस) वाले मेरे खयाल से बखूबी कर रहे हैं.”

अकेले फारुक अब्दुल्ला ही नहीं हैं जो चीन की भारत से नाराजगी को कश्मीर मसले से जोड़ते हैं? ‘देश का लगभग हर अखबार भारत-चीन तनाव को अनुच्छेद-370 हटाये जाने से जोडता दिखाई देता हैं” इरफान कहते हैं. सत्याग्रह ने भी हाल ही में भारत-चीन तनाव और अनुच्छेद-370 की इसमें भूमिका के बारे में विस्तार से लिखा है.

और यह कश्मीर के लोगों को पता है और उन्हें भी ऐसा ही लगता है. ऐसे में आप अगर कश्मीर में इस समय हैं और आम लोगों में उठते-बैठते हैं तो यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है कि भारत-चीन तनाव को लेकर कश्मीरी लोग कितने उत्सुक हैं.

“चाइना कहां पहुंचा?” “युद्ध होगा या नहीं?” “कितने किलोमीटर खा गए चीनी?” “लद्दाख है या चला गया?” “यार लद्दाख जाना था, अब वीसा तो नहीं लगेगा?” आज इस तरह के सवाल लगभग हर महफिल में सुनाई दे सकते हैं. हां, यह सब मज़ाक में कहा जाता है, लेकिन आप विस्तार से बात करें तो पता चल जाता है कि यह सिर्फ मजाक नहीं बल्कि लोगों की उम्मीदों से जुड़े हुए सवाल हैं.

“हम तो कुछ नहीं कर पाये इनका, हो सकता है अब चाइना ही कुछ कर दे” दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग जिले में एक दुकानदार से बात करते हुए सत्याग्रह को सुनने में मिला, “वरना जो कुछ चल रहा है अभी, वो दिन दूर नहीं जब कश्मीरी लोग कश्मीर में ही माइनॉरिटी बन के रह जाएंगे.”

फिर यह दुकानदार सत्याग्रह को अनुच्छेद-370, डोमिसाइल और प्रॉपर्टी के नियमों में बदलाव और बाहर के लोगों के कश्मीर में आकर बसने के बारे में विस्तार से समझाने लगा. कश्मीरी लोग डरे हुए हैं और फारूक अब्दुल्ला जैसे दिग्गज नेता इस चीज़ को भली-भांति जानते हैं और इसका फाइदा उठाना भी जानते हैं.

हालांकि कुछ राजनीतिक विशेषज्ञ फारूक अब्दुल्ला के इस बयान को लोगों से न जोड़ कर उनके अपने व्यक्तित्व और राजनीतिक व्यवसाय से जोडते हैं.

जैसे कश्मीर यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइन्स पढ़ाने वाले लेखक और राजनीतिक टिप्पणीकार, नूर अहमद बाबा. बाबा से सत्यागह की विस्तार से हुई चर्चा में वे कहते हैं कि उन्हें नहीं लगता है फारूक अब्दुल्ला ने चीन वाली बात गंभीरता से कही है.

“मुझे लगता है कि वो सिर्फ अपना गुस्सा और अपनी निराशा जाता रहे थे और साथ ही साथ वो अभी के हालात को पिछले साल 5 अगस्त से जोड़ना चाह रहे थे” बाबा सत्याग्रह को बताते हैं, “वे भारत सरकार को यह कहना चाह रहे थे कि उसे अपने 5 अगस्त वाले निर्णय पर फिर से गौर करने की ज़रूरत है.”

यह गुस्सा और यह निराशा, बाबा कहते हैं, बिलकुल जायज़ है क्योंकि पिछले 70 सालों से फारूक अब्दुल्ला कश्मीर में भारत का झंडा कंधे पर उठाए घूम रहे हैं और अब उनके साथ अपराधियों जैसा व्यवहार हो रहा है.

चाहे शम्स इरफान हों, नूर बाबा हों या फिर कश्मीर यूनिवर्सिटी के ही एक और लेखक - इजाज अशरफ वानी, सभी इस बात से सहमत हैं कि यह बात कैसे भी कही गयी हो लेकिन है काफी महत्वपूर्ण.

“ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि फारूक ने चाइना का नाम लिया हो. इससे पहले भी एक इंटरव्यू में उन्होंने यह कहा था कि कश्मीरी लोग इस समय भारत से ज़्यादा चाइना के शासन में रहना पसंद करेंगे. यह कोई इत्तेफाक नहीं है, मुझे लगता है फारूक ये बातें सोच-समझ के कर रहे हैं और लोगों की आकांक्षाओं को मद्देनज़र रखते हुए कर रहे हैं” वानी ने सत्याग्रह से बात करते हुए कहा.

वानी यह भी कहते हैं कि चाहे फारूक अब्दुल्ला के बयान हों या फिर उसके बाद बना नया गठबंधन दोनों इस बात के संकेत हैं कि यहां के राजनेता भारत सरकार को यह जता रहे हैं कि जो कुछ भी पिछले साल 5 अगस्त को हुआ ये लोग उसके खिलाफ हैं.

और यही बात महबूबा मुफ़्ती ने भी 14 महीने बाद रिहा होते ही कही थी. रिहा होते ही अपने ट्विटर हैंडल (जो अब तक उनकी बेटी चला रही थीं) पर महबूबा मुफ्ती ने एक ऑडियो मैसेज में वह वापिस लेने की बात की “जो दिल्ली ने हमसे छीन लिया है.”

“हम पिछले साल 5 अगस्त की लूट और अपमान को नहीं भूल सकते हैं. अब हम सबको वो वापस लेने के लिए साथ जुड़ना होगा जो हमसे असंवैधानिक और अवैध तरीके से छीन लिया गया था” महबूबा ने अपने संदेश में कहा.

उन्होंने, बाहर के जेलों में अभी भी बंद पड़े कश्मीरी लोगों की रिहाई की मांग करते हुए कहा कि आगे का रास्ता आसान नहीं है, “लेकिन मुझे पूरा यकीन है कि हमारी हिम्मत और दृढ़ निश्चय हमें हमारी मंज़िल तक ज़रूर लेकर जाएंगे.”

महबूबा के इस बयान के एक दिन बाद ही एक नया गठबंधन सामने आया जिसमें कश्मीर की लगभग सारी मुख्यधारा की पार्टियां शामिल हैं. यह गठबंधन “गुपकार डेक्लेरेशन” को आगे बढ़ाते हुए बनाया गया है, जो पिछले साल 4 अगस्त को कश्मीर की लगभग सभी मुख्यधारा के नेताओं ने फारूक अब्दुल्ला के घर पर हुई एक बैठक के बाद जारी किया था.

इस घोषणापत्र में कहा गया था कि कश्मीर के सभी दल एकजुट होकर जम्मू-कश्मीर की अलग पहचान और विशेष स्थिति को बचाएंगे. नया गठबंधन यह कह कर बनाया जा रहा है कि “जो हमसे छीना गया है उसको वापिस लेंगे.” इस गठबंधन का उद्देश्य अपने राजनीतिक हितों को पीछे रखकर कश्मीर की पहले वाली स्थिति को बहाल करवाना है.

इस मुद्दे पर लोगों की राय बटी हुई है. जहां कुछ लोगों का मानना यह है कि यह सिर्फ अपनी राजनीति को बचाने के चक्कर में किया जा रहा है वहीं कुछ का मानना है कि कश्मीरी लोगों के पास इस समय इन राजनेताओं पर विश्वास जताने के अलावा और कोई चारा नहीं है. यानी कि कुछ और नहीं तो यही सही.

लेकिन आम लोगों में से ज्यादातर इस गठबंधन को एक और ड्रामा बताते हैं. उनके हिसाब से इस गठबंधन में शामिल सभी पार्टियां अभी तक कश्मीर में भारत सरकार के गुणगान करती रही है और वे ही कश्मीर की वर्तमान दशा के लिए जिम्मेदार भी हैं.

“लाया कौन था भाजपा को कश्मीर में? महबूबा मुफ़्ती. हम भूले थोड़े ही हैं. अब ये लोग ड्रामे करेंगे अपनी राजनीति बचाने के लिए तो करें, लेकिन हमारे नाम पर नहीं” श्रीनगर के एक सरकारी स्कूल के टीचर सत्याग्रह से बात करते हुए कहते हैं.

और लोग भी, जिनसे सत्याग्रह ने बात की, महबूबा और उमर अब्दुल्ला के शासन काल में हुए “अत्याचारों” की बात करते हुए इस गठबंधन के बारे में कुछ ऐसी ही बातें कहते हैं.

हालांकि, विशेषज्ञ इस गठबंधन को थोड़े अलग नज़रिये से देखते हैं.

इजाज अशरफ वानी की ही बात करें तो वे कहते हैं कि यह गठबंधन है तो इन सब लोगों की राजनीतिक साख बचाने की ही कोशिश, लेकिन है महत्वपूर्ण. “राजनीति हमेशा अवसरवाद ही होती है, और ये लोग जानते हैं कि इन्हें राजनीति कश्मीर में ही करनी है. और राजनीति करनी है तो लोगों की आकांक्षाओं को परे रख कर तो की नहीं जा सकती!”

इजाज़ अशरफ वानी कहते हैं कि ये लोग भारत सरकार को भी यह बता रहे हैं कि जो कुछ भी हुआ वह कश्मीर में लोगों को मंजूर नहीं है, “देखते हैं आगे क्या होता है,”

वहीं श्रीनगर में बसे एक और पूर्व पत्रकार और लेखक गौहर गिलानी इस मामले में कुछ और पहलू जोड़ते हुए कहते हैं कि “कश्मीर में या तो मुख्यधारा की राजनीति थी या फिर अलगाववाद की. अब अलगाववादी कहीं नज़र नहीं आ रहे हैं क्यूंकि ज़्यादातर बंद हैं और जो बंद नहीं भी हैं वो बात नहीं कर रहे हैं. ऐसे में यही लोग हैं जो बात कर रहे हैं.”

गिलानी कहते हैं कि इन लोगों पर सवाल इस बात को लेकर उठ रहे हैं कि ये लोग हमेशा से भारत के समर्थक रहे हैं जो सच है. “लेकिन यह भी सच है कि ये लोग अभी भी वही खड़े हैं. ये लोग अलगाववाद की बात तो कर नहीं रहे न! ये सिर्फ 370 वापिस मांग रहे हैं. अगर ये लोग इस काम में असफल होते हैं तब इन पर टिप्पणी करें तो बात भी है. बेवजह की टिप्पणी ठीक नहीं है.”

लेकिन लोगों का कहना है कि पिछले कई दशकों से कश्मीर के राजनेताओं ने भारत की एक छवि को यहां के लोगों को बेचा. यह छवि पिछले एक साल से बिलकुल झूठ साबित होती दिखाई दे रही है. ऐसे में वे इन पर फिर से विश्वास कैसे करें? कैसे इन पर सवाल न उठाएं? इनको लगता है कि अंत में यह स्थिति भारत सरकार के ही पक्ष में ही जा सकती है.

ऐसा और भी कई लोगों को लगता है. इनका मानना है कि अंत में ये राजनेता व्यवस्था में कुछ हल्के-फुल्के बदलावों और केंद्र सरकार के कुछ आश्वासनों के बाद फिर से पहले जैसे हो जाएंगे. इन बदलावों में जम्मू-कश्मीर को फिर से पूर्ण राज्य बनाना और उसके लिए एकाध विशेष प्रावधान करना शामिल हो सकते हैं. लोगों को डर है कि कहीं ऐसा न हो कि जल्द ही कश्मीर की डेमोग्राफी में भी काफी बदलाव आ जाएं और फिर कुछ समय बाद जब ये नेता उन्हें फिर से निराश करें, फिर से तरह-तरह के समझौते करें तब करने के लिए कुछ बचे ही नहीं.

कश्मीर के राजनेताओं के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती है. इसी वजह से उन्होंने गठबंधन बनाया है ताकि लोग उनके इरादों को गंभीरता से लें. कई जानकारों के मुताबिक यह एक सबसे बड़ी वजह है कि फारुक अब्दुल्ला जो कह रहे हैं वह कह रहे हैं. फारुक अब्दुल्ला से बेहतर इसे कोई नहीं समझता कि अंत में इस गठबंधन में शामिल जो भी नेता और दल कश्मीर के लोगों को अपनी भावनाओं के सबसे ज्यादा करीब लगेगा वही अंत में यहां की राजनीति के केंद्र में भी होगा.

कश्मीर के लोग और राजनेता कुछ भी सोच रहे हों. जो हो रहा है उसमें मोदी सरकार की कोई भूमिका हो या नहीं, लेकिन उसके लिए यह स्थिति बुरी नहीं है. वह अनंत समय तक कश्मीर को इसी स्थिति में नहीं रख सकती. और उससे बाहर आने के लिए यहां सबसे पहले राजनीतिक प्रक्रिया को शुरू करने की जरूरत है. लोगों की भावनाओं को निकलने का रास्ता देने की जरूरत है. बाकी जो भी होगा वह इसी रास्ते से संभव हो सकता है.