कोड़ा हवा में लहराया और अब्दुल की पीठ पर पड़ा. उसकी चमड़ी उधड़ गई और खून आने लगा. उसने अपने होंठ ज़ोर से काटे ताकि चीख ना निकले, फिर भी कराह की आवाज़ निकलने से अपने को रोक ना सका. उसके घुटने झूल रहे थे और वो जमीन पर गिर जाता. अगर उसके हाथ एक पेड़ की टहनी से रस्सी के सहारे बांधे ना गए होते.

अब्दुल को सालिक के अस्थायी पड़ाव पर लाया गया था. गांव के भंडार-घर को सिपाहियों की बैरक के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा था. और इसके पास में गांव के मुखिया का घर था जिस पर सालिक ने अपने निजी इस्तेमाल के लिए कब्जा कर रखा था. गांव में सालिक और राजा के सैनिकों के अलावा कोई नहीं था. कुछ घंटो पहले सारे गांव वाले भाग गए थे. अब्दुल को अस्थायी बैरक के सामने खुले चौराहे पर प्रताड़ित किया जा रहा था.

‘च्च,च्च.’ सालिक ने मजाक उड़ाते हुए आवाज़ निकाली. हाथ में शराब का प्याला लेकर उस तुर्क अफसर ने टहलते हुए अब्दुल की पीठ पर नज़र डाली. पीठ खून से लथपथ थी, और कई जगहों पर खुले हुए घाव के निशान थे जहां पर कोड़े ने चमड़ी को उधेड़ दिया था.

‘कितना दर्द भरा नज़ारा है.’ सालिक ने नकली फिक्र दिखाते हुए कहा. उसने शराब का घूंट लिया और मजाक उड़ाते हुए करीब से अब्दुल की पीठ देखी. फिर, अचानक उसने अब्दुल की घायल पीठ पर शराब थूक दी.

चौंककर अब्दुल, दर्द से तड़पता आगे झुक गया, जब शराब ने उसकी घायल पीठ को झुलसाया. ‘या अल्लाह!’ वो चिल्ला पड़ा.

सालिक पल भर के लिए जम सा गया. वो स्तब्ध था. वो जल्दी से अब्दुल के आगे आया, उसके बालों को हाथ में पकड़ा और सिर को उठाकर उसकी आंखो में देखते हुए पूछा. ‘तुम मुसलमान हो?!’

अब्दुल ने जवाब नहीं दिया. सालिक की ओर वो गुस्से में घूर रहा था, उसके शरीर के हर रोम से गुस्सा टपक रहा था.

‘मंदिर को बचाने की कोशिश में थे?! कैसे मुसलमान हो तुम?!’

अब्दुल ने नफ़रत भरी नज़रों से उसे घूरा. ‘तुमसे... कहीं बेहतर...’

‘मेरा विरोध करने की हिम्मत कैसे हुई तुम्हारी?!’ सालिक गरजा. ‘तुम एक मुसलमान हो!’

‘मैं पहले... एक भारतीय हूं...’

सालिक ने अब्दुल को ज़ोरदार थप्पड़ लगाया. ‘तुम मेरे जैसे मुसलमान के बजाय काफ़िर हिंदुओं के लिए लड़ते हो?!’

‘मैं अपने भारतीय भाइयों के साथ... एक तुर्क राक्षस के ख़िलाफ़ लड़ता हूं...’

सालिक ने अब्दुल को ज़ोर से मारा औऱ उसकी नाक तोड़ दी. और वो तब तक मारता रहा जब तक कि वो खुद थक ना गया.

और फिर उसने अब्दुल को थोड़ा और मारा. वो तभी रुका जब अब्दुल रस्सी पर बेहोश झूल गया.

सालिक अपने सिपाहियों की ओर मुड़ा. ‘इस कमीने को यहां सारी रात लटकने दो. कल मैं देखूंगा कि इसे कैसे मारा जाए.’


अब्दुल ने अपनी आंखें खोलीं. उसके शरीर का हर हिस्सा दर्द कर रहा था. ऐसा लग रहा था जैसे उसकी हर कोशिका को एक चक्रवात में फेंक दिया गया हो, जिसमें वो एक युग तक चोट खाती रही, और फिर हर कोशिका की एक तहस-नहस शरीर में सिलाई कर दी गई हो.

उसके कानों में चिर-परिचित आवाज़ आई. ‘तुम बहुत जल्दी अच्छे हो जाओगे.’

अब्दुल ने उठने की कोशिश की. ‘सुहेल...’

सुहेलदेव ने उसे बिस्तर पर लेटे रहने के लिए धीमे से धक्का दिया. ‘पीठ के बल लेटे रहो.’

‘कितना लंबा समय... मुझे...’

‘क़रीब-क़रीब एक पूरा दिन.’

सुहेलदेव और उसके आदमी अभी भी गांव में थे. और वो वहीं रहना चाहते थे जब तक अब्दुल पूरी तरह से ठीक नहीं हो पाए. गांव वाले लड़ाई के अवशेषों को साफ करने में लगे थे. अपने घरों की मरम्मत कर रहे थे. गांव के मंदिर की पुनर्स्थापना कर रहे थे. राजा के आदमियों की लाशों के हर निशान को साफ़ कर रहे थे. उन्हें दिखावा करना था कि सालिक और उसके सैनिक लूट के माल के साथ गांव से चले गए थे और उन्हें पता नहीं था कि उसके बाद सालिक कहां गया.

‘क्या... मंदिर... सुरक्षित है?’ अब्दुल ने पूछा, पिछली रात सालिक और उसके आदमियों की निर्ममतापूर्वक पिटाई से वो अभी भी कमज़ोर था, लेकिन उसका दिमाग़ सतर्क था. स्थानीय वैद्य कुशल था.

सुहेलदेव ने सवाल को नज़रअंदाज़ कर दिया. उसने दृढ़ता से कहा, ‘ऐसा कभी दोबारा मत करना.’

‘सुहेलदेव...’

‘मुझे मालूम है, तुम क्या करने की कोशिश कर रहे थे. तुम्हें कुछ भी साबित करने की ज़रूरत नहीं है. ऐसा कभी दोबारा मत करना.’

‘लेकिन वो तुर्क... मंदिर की मूर्तियां...’

‘हम नई मूर्तियां बनाएंगे.’

अब्दुल चुप रहा.

सुहेलदेव ने बात जारी रखी. ‘हमारी आस्था हमारी शक्ति है. लेकिन तुर्कों ने हमारी आस्था को हमारी कमज़ोरी में बदल दिया है. वो जानते हैं कि हम अपनी मूर्तियों को बचाने के लिए किसी भी हद तक जाएंगे, यहां तक कि अपने प्राण भी न्यौछावर कर देंगे. और वो इसका इस्तेमाल हम पर दबाव बनाने के लिए करते हैं. हमारे संकल्प को तोड़ने के लिए करते हैं. हमें आसानी से हराने के लिए करते हैं.’

‘लेकिन...’

‘मेरी बात ध्यान से सुनो. यह मेरी आस्था है. मैं जानता हूं... भगवान हर जगह हैं. तारों में और आसमान में, पेड़ों में, नदियों में हवा में, हम सब में. हमारी आस्था ही है जो ईश्वर को एक मूर्ति में स्थापित करती है. अगर हम सभी मर जाएंगे, तो हमारी आस्था भी मर जाएगी. अगर हमारी आस्था मर जाएगी, तो फिर मूर्तियों की पूजा कौन करेगा? याद रखो, नई मूर्तियां हमेशा बनाई जा सकती हैं और उनमें प्राण प्रतिष्ठा की जा सकती है लेकिन अगर हमारी आस्था मर जाती है तो फिर सब कुछ खत्म हो जाता है. और हमारी आस्था केवल हमारे धड़कते हुए दिलों में रहती है. इसलिए अगर एक मूर्ति और हमारी जान में से एक को चुनने का विकल्प हो, तो मैं हमेशा ही अपनी जान को चुनूंगा.’

अब्दुल दूर देखने लगा. उसके गाल पर आंसू की एक बूंद लुढ़क आई. ‘तुम... नहीं समझते.’

अब चुप रहने की बारी सुहेलदेव की थी. उसने अब्दुल को बोलने दिया.

अब्दुल के आंसू तेजी से बहने लगे. ‘मैं दोषी... महसूस करता हूं... मुझे कुछ करना था... मुझे लड़ना था...’

‘तुम्हें किसी चीज़ के लिए दोषी महसूस करने की ज़रूरत नहीं है. तुर्कों या उनके अपराधों से तुम्हारा कोई लेना-देना नहीं है.’

अब्दुल ने सुहेलदेव की तरफ़ पीठ कर ली.

सुहेलदेव की आवाज़ थोड़ी सी कांपी, उसके मज़बूत जज़्बात भी फूटने लगे थे. ‘तुम उनमें से नहीं हो. तुम हममें से हो.’

अब्दुल के आंसू और तेज़ी से बहने लगे.

सुहेलदेव ने अब्दुल के हाथ को मजबूती से पकड़ लिया. ‘तुम हममें से एक हो. मैं तुम पर पूरा भरोसा करता हूं. मैं चाहता हूं कि तुम मेरी तरफ़ से लड़ो. लेकिन एक युद्ध लड़ने का लक्ष्य जीतना होता है, शहीद होना नहीं.’

अब्दुल चुप रहा.

‘याद है मैंने तुम्हें पहले क्या कहा था. मैंने बाबा से क्या सीखा था. गज़नी के दूत पर हमले के दिन मैंने क्या सीखा था. गुस्से में कोई प्रतिशोध नहीं. हम ठंडे मन से, निर्ममतापूर्वक प्रतिशोध लेंगे.’

अब्दुल ने सुहेलदेव की तरफ आदर भरी नज़रों से देखा. अभी तक उसने राजकुमार के प्रति आदर उसकी उभरती शख्सियत की वजह से कर रहा था. ऐसा नेता जो वो बन रहा था.

अब्दुल फुसफुसाया. ‘हां, राजन.’

सुहेलदेव ने मुस्कुराकर अब्दुल के कंधे को छुआ. ‘मुझे सुहेलदेव ही कहो.’

अब्दुल ने इनकार में सिर हिलाया. ‘नहीं, राजन.’