जीने का साहस

कोरोना महामारी ने सारी दुनिया के सामने जो तरह-तरह के संकट पैदा किये हैं उनमें से शायद एक यह भी है कि इस महामारी ने जीवन और मृत्यु, उनके आशय, अर्थ और गरिमा से संबंधित जो यक्षप्रश्न उठाये हैं उन पर कोई व्यवस्थित और गम्भीर चिन्तन बहुत कम हुआ है. इस सन्दर्भ में मेरे ईरानी दार्शनिक-मित्र रामिन जहांबेगलू की नयी पुस्तक ‘द करेज टु एग्जिस्ट’ (ओरिएंट ब्लैकस्वान) बहुत प्रासंगिक और सामयिक है. रामिन संसार से उदासीन या उसके वर्तमान से निस्संग दार्शनिक नहीं है. वे राजनैतिक घटनाओं और वृत्तियों पर लगातार अख़बारों में लिखते रहे हैं. उनका दर्शन भी इसी तरह अपने समय के संसार और उसकी गहरी समस्याओं को समझने में व्यस्त दर्शन है.

‘द करेज टु एग्जिस्ट’ ‘कोरोना काल में जीवन और मृत्यु का एक दर्शन’ प्रस्तावित करती है. उनका मत है कि इस महामारी ने हमें एक ख़तरनाक उपहार दिया है कि हम जीवन और मृत्यु के बारे में अपनी दृष्टि बदल सकते हैं. उनके अनुसार ऐसे भयावह समय में भी अतीत के हमारे चिन्तक-मूर्धन्य ऐसी दृष्टि विन्यस्त करने में बहुत मददगार हैं. वे स्वयं अरस्तू, प्लेटो, पास्काल, शोपेनहावर, नीत्शे, फ्रायड, आलबेयर काम्यू, सिमों द बुवा जैसे चिन्तकों से लेकर थोरो, गांधी, मार्टिन लूथर किंग आदि की धारणाओं से अपना दर्शन बुनते हैं. उनका विश्वास है कि कवि-चिन्तक भी हमारे बहुत काम के हैं और उन्होंने पुस्तक के आरंभ में ही फ्रेंच कवि जाक प्रिवेर की ये पंक्तियां उद्धृत की हैं: ‘और हम नहीं जानते कि जीवन क्या है/और हम नहीं जानते कि दिन क्या हैं/और हम नहीं जानते कि प्रेम क्या है.’

हालांकि बहुत सारी अपेक्षाएं जो रामिन हमसे करते हैं वे उदात्त आदर्श लगती हैं, उनका दर्शन किसी यूटोपिया से ग्रस्त नहीं है. वे अर्थ की खोज ‘यहां और अभी’ करते हैं. उनके लिए जीवन उम्मीद, ज़िम्मेदारी और सच में बद्धमूल है. वे गांधी की इस अन्तर्दृष्टि की ताईद करते हैं कि सामाजिक जीवन में अन्ततः खरापन या वैधता राजनैतिक नहीं, नैतिक होते हैं. गांधी के हवाले से वे इस पर इसरार करते हैं कि सत्य की खोज और ‘अन्य से प्रेम’ ऐसे हैं जिनसे ऐसा सार्थक जीवन हो सकता है जिसमें अन्य जीवनों की अन्तर्ध्वनि भी हो. वही जीवन सच्चा है जिसमें सहानुभूति, करुणा और सहवेदना की जगह हो. वे मार्टिन लूथर किंग को उद्धृत कर कहते हैं कि ‘प्रेम ज़िम्मेदारी है कि सभी के लिए जीवन बेहतर बनाने के लिए कोशिश की जाये.’

आधुनिक सभ्यता द्वारा सफलता को एक मूल्य का दर्ज़ा दिये जाने का रामिन सख़्ती से विरोध करते हैं क्योंकि सफलता की अन्धी दौड़ ने जीवन को अर्थशून्य कर दिया है. एक ऐसे समय में, जिसमें मृत्यु सिर्फ़ आंकड़ा बन कर रह गयी है, रामिन का आग्रह है कि दूसरों के लिए यातना सहने, सहवेदना से करुणा पर आधारित समाज बनाने से, मृत्यु में गरिमा वापस आ सकती है. यह सहवेदना हमें जीवन से प्यार करना सिखाती है और मृत्यु को अपमान से मुक्त करती है.

रामिन के दर्शन का एक ज़रूरी हिस्सा प्रतिरोध है. वे मतभेद और विरोध को सर्जनात्मक प्रतिरोध का दर्ज़ा देते हैं और इस बात का ज़िक्र करते हैं कि तथाकथित उदार लोकतंत्रों में भी प्रतिरोध को दबाने-कुचलने का दुश्चक्र चल रहा है. काम्यू ने प्लेग को ‘मृत्यु की हिंसा’ का एक प्रकार माना था. महामारी हमें जीवन की निरर्थकता का सामना करने पर मजबूर करती है. उनका एक चरित्र पादरी से कहता है कि ‘मेरे नज़दीक प्रेम का एक भिन्न विचार है. मैं मरते दम तक ऐसे किसी उपक्रम को प्यार नहीं कर सकता जिसमें बच्चों को यन्त्रणा दी जाती हो.’ चैक दार्शनिक यान पैटोच्का के हवाले से वे प्रतिपादित करते हैं कि आत्मबलिदान और आत्मयातना के अनुभव से प्रतिरोधी असहमत लोग विचलित लोगों की समभावी बिरादरी बनाते हैं. नैतिकता ईश्वर ने नहीं बनायी है, वह मनुष्य की निर्मिति है. लेकिन सारी मानवता के लिए समान नैतिकता, जो सभी मनुष्यों के लिए, सभी समयों में, बिना किसी शर्त और सारी परिस्थितियों से मुक्त, समान और वैध हो. ऐसी मानवता ही मृत्यु के भय से मुक्त कर हमें जीवन की नयी परिभाषा दे सकती है.

रामिन को इस बात का तीख़ा अहसास है कि कोरोनावायरस प्रकोप मनुष्यता की ग़लतियों और अहंकार का प्रतिफल है और हमें यह अवसर देता है कि हम मनुष्य की ज़रूरतों और इच्छाओं की सीमाएं पहचानें. वे साफ़ कहते हैं: ‘महामारी और संसार के बहुसंख्यक नेताओं द्वारा उसका कुप्रबन्धन इसी नैतिक विफलता की अभिव्यक्ति है.’ उनका मत है कि आज संसार नैतिक नेतृत्व से वंचित है. संसार की राजनैतिक व्यवस्थाएं लगातार निर्मम और अनुत्तरदायी होती जा रही हैं और उनकी जवाबदेही की मांग करने वाली नागरिकता सांसत में है. ऐसे में व्यक्तिगत आचरण और सामूहिक समभावी प्रतिरोध अलग-अलग कर्म नहीं है. वे एक ही तरह का नैतिक हस्तक्षेप हैं. राज्य जब अपनी मानवीय और सामाजिक ज़िम्मेदारी से मुकरने लगे तो मुखर-सक्रिय नागरिकों की निःस्वार्थ बिरादरी ही उसे, उसके सोये लोकतांत्रिक अन्तःकरण को जगा सकती है. यह सफलता का नहीं, सार्थकता का आयाम है जो जीवन को फिर अर्थ से भर और समृद्ध कर सकता है. यह सजग नागरिकता अपने अधिकारों पर उतना आग्रह नहीं करेगी जितना अपनी ज़िम्मेदारियों पर.

जब लाखों प्रवासी लोग बड़े शहरों से, अचानक बिना किसी पूर्व सूचना के लागू कर दिये गये लॉकडाउन के दौरान, सड़कों पर चलकर सैकड़ों किलोमीटर की दूरियां, निहायत दारुण हालत में पार कर रहे थे तो हमारा लोकतांत्रिक राज्य निर्लज्ज निर्ममता से, उन्हें कोई कारगर सहायता फ़ौरन पहुंचाने के अपने कर्तव्य से चूकता रहा. तब साधारण नागरिकों के कई समूहों ने इन अभागों की मदद की. यह समभावना और सहवेदना की नागरिक बिरादरी बनने का ऐतिहासिक क्षण था. जहां राज्य जान-बूझकर विफल था वहां नागरिकता स्वतः स्फूर्त ढंग से नैतिक रूप से सफल हुई, भले पूरी तरह नहीं. इस पुस्तक का एक संदेश यह भी है कि हम व्यक्तिगत और सामुदायिक दोनों ही स्तरों पर परिवर्तन और सार्थकता ला सकने की उम्मीद छोड़ नहीं सकते. हम अकेले और मिलकर अब भी, जहां हैं वहां, उम्मीद का स्थापत्य गढ़ सकते हैं.

गद्य में कविता

कविता में गद्य की घुसपैठ का ज़िक्र होता रहा है, प्रायः निन्दा के भाव से, जबकि गद्यधर्मी उल्लेखनीय कविता लिखी गयी है और गद्यकविता की हिन्दी में पिछले पांचेक दशकों में एक सशक्त धारा रही है. इस धारा के कवियों पर आलोचना ने ज़्यादा ध्यान नहीं दिया है जिसे समझ पाना कठिन है. बहुत साल पहले एक बार नामवर सिंह से हिन्दी में ऐसे गद्य की चर्चा अनायास हो रही थी कि गद्य में कहां वह कविता जैसा लगने लगता है. तब यह भी सोचा था कि इसका एक संचयन तैयार किया जाये पर वह हो नहीं पाया. बहरहाल, उस शाम हम लोगों ने ऐसे गद्यांशों के बारे में सरसरी तौर पर सोचा जिसे कविता का दर्ज़ा दिया जा सके.

शुरू किया था बालमुकुन्द गुप्त और प्रताप नारायण मिश्र के गद्य से. फिर प्रेमचन्द की दो कहानियां ‘कफ़न’ और ‘पूस की रात’ याद आयीं. जैनेन्द्र कुमार और अज्ञेय के यहां भी ऐसे अंश मिलते हैं. रेणु, निर्मल वर्मा, कृष्ण बलदेव वैद, कृष्णा सोबती, विनोद कुमार शुक्ल के यहां ऐसे बहुत सारे अंश मिल जायेंगे जो काव्यात्मक हैं. अश्क, अमृतलाल नागर, हजारीप्रसाद द्विवेदी, ज्ञानरंजन, अमरकान्त, मार्कण्डेय, शेखर जोशी, शैलेश मटियानी, शानी, असगर वज़ाहत, आदि के गद्य में. शिवानी, मृदुला गर्ग, ज्योत्स्ना मिलन, मृणाल पाण्डे, अनामिका आदि में भी. श्रीकान्त वर्मा, मनोहर श्याम जोशी, रघुवीर सहाय, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, कुंवर नारायण, धर्मवीर भारती के यहां निश्चय ही क्योंकि ये सभी कथाकार के अलावा कवि भी थे.

इस सिलसिले में यह याद रखना ज़रूरी है कि गद्य की भी अपनी लय होती है, वह उसके कथ्य का नहीं, शिल्प का अंग होती है. प्रायः सभी बड़े कथाकार वे होते हैं जिनके गद्य में ऐसी लय रूपाकृत होती है और वह उनके गद्य से मिलने वाले आनन्द के लिए अनिवार्य कारक होती है. यह कहते हुए मुझे यह पूरा ख़याल है कि आजकल साहित्य से आनन्द की बात करना थोड़ा पिछड़ा होना है. पर सच तो यह है कि साहित्य हमें विचलित करता है पर आनन्द भी देता है. हम साहित्य सिर्फ़ सचाई को जानने-समझने भर के लिए नहीं पढ़ते, हम उसकी निर्ममता और क्रूरता से कुछ मानवीय राहत पाने के लिए भी साहित्य पढ़ते हैं.

बहरहाल, किसी युवा मित्र को गद्य के कविता का एक छोटा सा सही सुशोधित और सुविचारित संचयन करना चाहिये. मेरा क़यास है कि लगभग सौ पृष्ठों की सामग्री तो निकल ही आयेगी. जिन नये कहानीकारों विशेषतः राजेन्द्र यादव और कमलेश्वर ने कथा और कविता के स्वाभाविक और लम्बे संबंध और सहकार की समझ भोंथरी कर दी है उसे फिर से दृश्य पर लाने का यह अच्छा अवसर हो सकता है. ऐसे किसी भी संचयन में बाद के युवा लेखकों को भी शामिल करना चाहिये ताकि यह भी साक्ष्य मिल सके कि गद्य और कविता का संबंध हमारे यहां अटूट रहा आया है. परस्पर आदान-प्रदान दोनों को समृद्ध करता रहा है. आज भी युवा पीढ़ियों के यहां कर रहा है.