बिहार विधानसभा चुनाव के बीच इस दंगल के दो बड़े चेहरों नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव के ट्विटर हैंडल से गुजरते हुए एक दिलचस्प बात पर ध्यान जाता है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के ट्विटर हैंडल पर चुनावी रैलियों से जुड़े उनके जो वीडियो पोस्ट किए गए हैं उनमें लगभग पूरे समय वे ही नजर आते हैं. रैलियों में आई भीड़ नहीं दिखती. यहां तक कि जिस ट्वीट में नीतीश कुमार विशाल जनसमर्थन दिखने की बात कहते हैं उसके साथ पोस्ट किए गए करीब चार मिनट के वीडियो में जन सिर्फ 13 सेकेंड के लिए दिखते हैं और वह भी टाइट फ्रेम में. जानने वाले जानते हैं कि राजनीतिक रैलियों की कवरेज के दौरान टाइट फ्रेम तब इस्तेमाल किया जाता है जब भीड़ कम हो और यह बात छिपानी हो.

उधर, बिहार की प्रमुख विपक्षी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) की कमान थामे तेजस्वी यादव के ट्विटर हैंडल पर तस्वीर अलग दिखती है. यहां जो वीडियो दिखते हैं उनका केंद्र रैलियों में आई भीड़ ही है जिसका केंद्र तेजस्वी हैं. इस भीड़ का आकार ही नहीं, मिजाज भी उस भीड़ से अलग दिखता है जो नीतीश कुमार की रैलियों में नजर आती है. तेजस्वी यादव की चुनावी रैलियों में लोग नारे लगाते, झंडे लहराते, तेजस्वी की मोबाइल से फोटो खींचने के लिए एक दूसरे पर गिरते और आरजेडी नेता की बातों का जवाब खूब बुलंद आवाज में देते दिखते हैं.

दूसरी तरफ, नीतीश कुमार के ट्विटर हैंडल पर उनकी रैलियों के जो वीडियो होते हैं उनमें इन रैलियों में आई भीड़ पहले तो दिखती नहीं और थोड़ी देर के लिए दिखती भी है तो उसमें वह जोश नजर नहीं आता. ऐसा तक होता दिखता है कि मुख्यमंत्री कोई बड़ी बात कहते हैं और मंच पर उनके पीछे मौजूद एक शख्स ताली बजाकर लोगों को इशारा करता है कि वे भी ऐसा ही करें.

बिहार में चुनाव प्रचार के दौरान तेजस्वी यादव की रैलियों ने सबसे ज्यादा भीड़ खींची है, यह अब छिपी हुई बात नहीं. कई विश्लेषकों की मानें तो यह बताता है कि 31 साल के इस राजनेता ने खुद को बिहार में एक नई ताकत के तौर पर स्थापित कर लिया है. दो महीने पहले तक बिहार चुनाव में एनडीए की जीत निश्चित बताने वाले विश्लेषक अब अगर यह कहने लगे हैं कि ऊंट किसी भी करवट बैठ सकता है तो इसमें तेजस्वी फैक्टर की अहम भूमिका है. कई मानने लगे हैं कि वे बिहार के अगले मुख्यमंत्री हो सकते हैं. उधर, एक तबके की राय है कि ऐसा इस बार नहीं तो अगली बार होना तय है, यानी यह तेजस्वी यादव के लिए फाइनल नहीं सेमीफाइनल हो सकता है.

लेकिन क्या रैलियों में उमड़ती भीड़ को देखकर ही चुनावी नतीजों के बारे में किसी पक्के निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है? बीते लोकसभा चुनाव को याद करें तो बिहार की ही बेगूसराय सीट पर खड़े कन्हैया कुमार की रैलियों में खूब भीड़ होती थी. लेकिन नतीजे आएं तो पता चला कि वे भाजपा के गिरिराज सिंह से करीब सवा चार लाख वोटों से हार गए थे. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी कह रहे हैं कि रैलियों की भीड़ से चुनावी जीत की भविष्यवाणी करना गलतफहमी पालना है. एक समाचार चैनल से बातचीत में 2005 और 2010 के विधानसभा चुनाव का हवाला देते हुए उनका कहना था, ‘चुनावी सभा में भीड़ का कोई मतलब नहीं, लालू प्रसाद की रैलियों की भीड़ याद कीजिए.’

लेकिन बात सिर्फ भीड़ की नहीं है. और भी तथ्य हैं जो तेजस्वी यादव के बढ़े कद का अंदाजा देते हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन्हें निशाना बनाते हुए लोगों को ‘जंगलराज के युवराज’ से अलर्ट रहने की हिदायत दे रहे हैं. उधर, नीतीश कुमार भी अपने भाषणों में लगातार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि अगर उनकी सरकार नहीं बनी तो जंगलराज लौट आएगा. जानकारों के मुताबिक इससे संकेत मिलता है कि भाजपा और जेडीयू को तेजस्वी यादव की तरफ से बढ़ते खतरे का अहसास होने लगा है और इसीलिए दिग्गजों के हमलों के तीर उनकी तरफ मुड़ रहे हैं.

बिहार विधानसभा में कुल 243 सीटें हैं. बीते विधानसभा चुनाव में आरजेडी और जेडीयू महागठबंधन का हिस्सा थे और वे 100-100 सीटों पर लड़े थे. आरजेडी ने 80 सीटें जीतीं जबकि जेडीयू ने 71. महागठबंधन के शानदार प्रदर्शन में माइ यानी मुस्लिम यादव वोटों के उस मेल की प्रमुख भूमिका थी जिसे आरजेडी का परंपरागत समर्थक माना जाता है. चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक बिहार में 16 फीसदी यादव वोटर हैं और 17 फीसदी मुस्लिम. 33 फीसदी के इस मेल के बारे में माना जाता है कि 110 सीटों पर खेल बनाने और बिगाड़ने में यह सबसे अहम भूमिका निभाता है. पिछले विधानसभा चुनाव में 61 यादव विधायक चुनकर आए थे जबकि मुस्लिम विधायकों के लिए यह आंकड़ा 24 था. इससे भी समझा जा सकता है कि माइ समीकरण की बिहार की राजनीति में कितनी अहम भूमिका है. लालू प्रसाद यादव ने इसी समीकरण को साधकर 15 साल राज किया था. 2015 के चुनाव में आरजेडी के साथ गठबंधन से नीतीश कुमार और उनके जेडीयू को भी इसका फायदा मिला.

लेकिन अब आरजेडी, जेडीयू के साथ नहीं बल्कि सामने खड़ा है. कई जानकारों के मुताबिक यादव तो पार्टी के साथ हैं ही, जेडीयू के एनडीए के पाले में लौट जाने से मुस्लिम वोटों का एक बड़ा हिस्सा भी छिटक कर उसके पाले में आ सकता है जो नीतीश की सेकुलर छवि के चलते उनके साथ आया था. यानी इस बार फिर से आरजेडी का आधार वोट उसके साथ हो सकता है जो अगर चुनाव न भी जिताए तो नेता प्रतिपक्ष के रूप में तेजस्वी यादव को और भी मजबूती दे सकता है. अपने पिता और बीते विधानसभा चुनाव में साथ खड़े लालू प्रसाद यादव की परछाई से तो वे पहले ही काफी हद तक बाहर आ चुके नजर आते हैं.

और अगर माइ के साथ नीतीश कुमार से नाराज दिख रहे कुछ दूसरे वर्गों का वोट जुड़ जाए तो बाजी पलट भी सकती है. तेजस्वी यादव बार-बार कह ही रहे हैं कि वे सवर्णों से लेकर दलितों और अल्पसंख्यकों तक सबको साथ लेकर चलना चाहते हैं. वे इस पर भी जोर दे रहे हैं कि बिहार चुनाव में असल मुद्दे कमाई, दवाई, पढ़ाई और सिंचाई हैं. जानकारों के मुताबिक यह अपने परंपरागत वोट बेस के इतर दूसरे वर्गों को भी अपनी तरफ खींचने की कवायद है जो अगर सफल हो गई तो तेजस्वी के लिए संभावनाएं कहीं बेहतर हो सकती हैं. जानकारों के मुताबिक तेजस्वी यादव की रैलियों में माइ समीकरण से जुड़ी भीड़ के अलावा वे तमाम श्रमिक भी जुटते दिखे हैं, जो कोविड-19 के चलते घोषित लॉकडाउन में भारी मुश्किलें उठाकर अपने घर तो आए, पर बेरोजगारी झेलने को विवश हैं.

यहां पर सत्ता में आते ही युवाओं को 10 लाख सरकारी नौकरियां देने के तेजस्वी यादव के ऐलान का खास तौर पर जिक्र करना होगा जिसने बिहार के युवाओं में जबर्दस्त हलचल पैदा की है. जानकारों के मुताबिक इसके चलते ही भाजपा को 19 लाख रोजगार देने का जवाबी ऐलान करना पड़ा. चुनाव आयोग के मुताबिक प्रदेश में सात करोड़ 18 लाख वोटर हैं. इनमें तीन करोड़ 66 लाख ऐसे हैं जिनकी उम्र 18 से 39 साल है. यानी कुल वोटरों में से आधे युवा हैं जिनके लिए रोजगार सबसे अहम मसला होता है. जानकार मानते हैं कि आरजेडी के परंपरागत वोट बैंक में अगर दूसरे समुदायों से ताल्लुक रखने वाले युवा वोटरों का एक बड़ा हिस्सा भी मिल जाए तो तेजस्वी मैदान मार सकते हैं.

इस तरह देखें तो बिहार चुनाव हालिया कुछ चुनावों से इस मायने में भी अलग दिखता है कि इसमें विपक्ष मुद्दे तय कर रहा है. रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे खूब चर्चा में हैं और इसमें तेजस्वी यादव की सबसे बड़ी भूमिका है. जैसा कि बीबीसी से बातचीत में राज्य के वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर कहते हैं, ‘अगर पिछले कुछ चुनावों को देखें तो पहली बार ऐसा लग रहा है कि विपक्ष ने चुनाव का नैरेटिव सेट किया है. तेजस्वी यादव चैलेंजर बनकर उभरे हैं और सत्तारूढ़ एनडीए को रक्षात्मक रुख अपनाना पड़ रहा है.’

इसके अलावा यह बात भी अपनी जगह है कि नीतीश कुमार को सत्ता में करीब डेढ़ दशक हो चुका है. इतने समय के बाद वोटरों को ऊब और नतीजतन बदलाव की इच्छा होने लगती है. हालांकि कई मानते हैं कि अगर मामला सिर्फ ऊब का होता तो नीतीश कुमार के लिए इतनी चिंता की बात नहीं थी, लेकिन इन दिनों साफ दिखता है कि उनके प्रति लोगों में नाराजगी है. कभी उनकी रैली में लालू प्रसाद के समर्थन में नारे लगते हैं तो कभी उनकी तरफ प्याज फेंके जाते हैं. जानकारों के मुताबिक इसमें कोई शक नहीं कि अपने पहले कार्यकाल में कानून-व्यवस्था से लेकर लड़कियों की शिक्षा तक नीतीश कुमार ने कई मोर्चों पर शानदार काम किया. लेकिन वे यह भी मानते हैं कि इसका पुरस्कार उन्हें 2010 और फिर 2015 में फिर से सत्ता के रूप में मिल चुका है. नीतीश कुमार का तीसरा कार्यकाल आलोचना के घेरे में रहा है. माना जा रहा है कि विशाल जनादेश पाए महागठबंधन को छोड़ने से लेकर कोरोना महामारी से निपटने और प्रवासी मजदूरों के मामले में उनका जो रुख रहा, उससे काफी लोग उनसे नाराज हैं.

लेकिन क्या यह गुस्सा इतना गहरा है कि एनडीए के परंपरागत वोटरों यानी ऊंची जातियों, अति पिछड़ी जातियों और महादलितों का एक बड़ा हिस्सा उससे छिटक जाए? तेजस्वी यादव के भविष्य की संभावनाओं का एक सिरा इस सवाल से भी जुड़ता है जिसका जवाब अब बस कुछ ही दिन दूर है.

तेजस्वी यादव और उनकी पार्टी का प्रदर्शन कैसा रहेगा, यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता किस हद तक एनडीए के लिए वोटों में तब्दील होती है. इस लोकप्रियता ने 2019 के लोकसभा चुनावों में एनडीए को बिहार की 40 में से 39 सीटें दिलाई थीं. कोरोना संकट के दौरान स्वास्थ्य सेवाओं के मोर्चे पर राज्य के बुरे हाल और लॉकडाउन से पस्त अर्थव्यवस्था के बावजूद जमीनी रिपोर्ट और सर्वे बता रहे हैं कि लोग नरेंद्र मोदी से संतुष्ट हैं. उन्हें लगता है कि मौजूदा हालात में उपजी चुनौतियों के बीच प्रधानमंत्री जो कर सकते थे वह उन्होंने किया है. उन्हें यह भी लगता है कि अगर कोई खामी रही है तो वह राज्य सरकार के मोर्चे पर रही है.

भाजपा भी इस बात को समझती है और इसलिए वह पूरा चुनाव नरेंद्र मोदी को आगे रखकर ही लड़ती नजर आ रही है. खुद नीतीश कुमार के लिए नरेंद्र मोदी कितने अहम बन गए हैं, यह एक उदाहरण से समझा जा सकता है. बीते महीने के आखिरी हफ्ते दरभंगा, मुजफ्फरपुर और पटना में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार ने संयुक्त रैलियां कीं. तीनों रैलियों में नीतीश कुमार ने नरेंद्र मोदी को तीन बार श्रद्धेय और छह बार आदरणीय कहा, जबकि नरेंद्र मोदी ने दो बार नीतीश कुमार के लिए परम मित्र शब्द का इस्तेमाल किया.

तो क्या नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता नीतीश कुमार को तार पाएगी? क्या वह बिहार के मुख्यमंत्री से मतदाताओं के गुस्से की काट साबित होगी? हाल के समय में हुए चुनाव संकेत देते हैं कि लोग अब राष्ट्रीय और स्थानीय मुद्दों में फर्क करते हुए वोट दे रहे हैं. अगर ऐसा होता है तो हो सकता है कि एनडीए के ट्रंप कार्ड यानी नरेंद्र मोदी इस बार इतने असरदार साबित न हों.

तेजस्वी यादव भी शायद इस बात को समझते हैं, इसलिए उनके हमलों के केंद्र में लगातार राज्य सरकार और इसके मुखिया नीतीश कुमार रहे हैं. जानकारों के मुताबिक उन्होंने दूसरे राज्यों के उन हालिया चुनावों से सीख ली है जिनमें भाजपा को मात मिली है. सीख यह कि राष्ट्रीय मुद्दों के बजाय स्थानीय मुद्दों की बात की जाए और नरेंद्र मोदी को निशाना बनाने और अपना नुकसान करवाने के बजाय स्थानीय नेतृत्व पर हमला बोला जाए. हाल में प्रधानमंत्री के ‘जंगलराज का युवराज’ वाले तंज के जवाब में तेजस्वी का कहना था, ‘वो देश के पीएम हैं, कुछ भी बोल सकते हैं. मुझे इस पर कोई टिप्पणी नहीं करनी है, लेकिन वो आए थे तो उन्हें बिहार के विशेष पैकेज, बेरोज़गारी, भुखमरी पर बोलना चाहिए था, लोगों की उम्मीद थी कि वो इस पर बोलेंगे. लेकिन उन्होंने इस पर कुछ नहीं बोला.’ लालू यादव के दौर में बढ़े अपराध को लेकर विपक्ष के लगातार हमलों पर वे एनसीआरबी के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताते हैं कि आज बिहार में उससे भी खराब स्थिति है. यानी तेजस्वी यादव पूरी तरह से सधे कदमों के साथ चल रहे हैं.

वैसे इस चुनाव में उनका और उनकी पार्टी का प्रदर्शन इससे भी तय होना है कि लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) के नए अगुवा चिराग पासवान ने जो दांव खेला है वह क्या रंग लाता है. एलजेपी को पिछले विधानसभा चुनाव में दो सीटें और करीब पांच फीसदी वोट मिले थे. एनडीए की यह पार्टी इस बार एनडीए की ही साझीदार जेडीयू के खिलाफ लड़ रही है. यानी उसके उम्मीदवार सिर्फ उन्हीं सीटों पर लड़ रहे हैं जहां जेडीयू मैदान में है. कई मान रहे हैं कि यह भाजपा की ही रणनीति है. पार्टी के कई नेता और समर्थक पार्टी छोड़कर एलजेपी में जा चुके हैं और टिकट पा चुके हैं. जानकारों की मानें तो इससे पासवान ने यह संदेश देने की भरसक कोशिश की है कि चुनाव के बाद भाजपा, एलजेपी के साथ मिलकर जेडीयू को दरकिनार करने जा रही है.

विश्लेषकों का एक वर्ग भी मानता है कि अगर भाजपा पर्याप्त सीटें जीत ले और वह एलजेपी के थोड़े से विधायकों के समर्थन से सरकार बनाने की स्थिति में हो तो पार्टी नीतीश कुमार को छोड़ सकती है, या फिर वह कम से कम अपना मुख्यमंत्री रखने की जिद कर सकती है. चिराग पासवान ने हाल में कहा ही है कि नीतीश कुमार किसी भी हाल में बिहार के मुख्यमंत्री नहीं बनेंगे. उनका यह भी दावा है कि भाजपा-एलजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाने की स्थिति में होगी.

जैसा कि एक समाचार वेबसाइट से बातचीत में वरिष्ठ पत्रकार अरविंद मोहन कहते हैं, ‘बिहार में एनडीए में जो हो रहा है वो चुनाव के लिए नहीं बल्कि चुनाव के बाद की सियासी पटकथा लिखी जा रही है. एलजेपी के अलग चुनाव लड़ने से निश्चित तौर पर जेडीयू को नुकसान होगा जबकि बीजेपी को चुनाव में सीधे तौर पर कोई नुकसान नहीं होगा. एलजेपी के पास दलितों के एक तबके का अच्छा खासा वोट है, जो जेडीयू के खिलाफ वोट कर सकता है. वहीं, बीजेपी बिहार में मजबूत बनकर उभरेगी तो चुनाव के बाद नीतीश कुमार ज्यादा बारगेनिंग की पोजिशन में नहीं होंगे.’ दूसरी तरफ, कई यह भी मानते हैं कि एलजेपी के चलते एनडीए के वोट बिखर भी सकते हैं और इसका फायदा तेजस्वी यादव को हो सकता है.

जानकारों के एक वर्ग के मुताबिक भाजपा अब भी यह नहीं भूली है कि कैसे नीतीश कुमार ने 2013 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित होने के बाद अचानक एनडीए से नाता तोड़ दिया था और इसलिए पार्टी उन पर पूरी तरह से विश्वास नहीं करती. राज्य भाजपा के कई नेता मौजूदा सरकार में पर्याप्त हिस्सेदारी न मिलने से असंतुष्ट भी रहे हैं. पार्टी में एक बड़े वर्ग को लगता है कि यह बिहार में जूनियर से सीनियर पार्टनर की भूमिका में आने का सबसे अच्छा मौका है. इसलिए कई विश्लेषकों के मुताबिक भले ही नरेंद्र मोदी कहें कि बिहार में एनडीए की सरकार नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही बनेगी, ऐसा होना 100 फीसदी तय नहीं माना जा सकता. और बीते दो महीनों के दौरान यह चुनाव जितना अनिश्चित हो गया है उसमें यह भी तय नहीं माना जा सकता कि बिहार में एनडीए की ही सरकार बनेगी.

नौ नवंबर को तेजस्वी यादव का जन्मदिन है. इसके एक दिन बाद यानी 10 नवंबर को यह साफ हो जाएगा कि बिहार की जनता ने सत्ता का तोहफा किसे दिया है. लेकिन फिलहाल यह तय है कि इस चुनाव से वे बिहार की राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण लोगों में से एक बन गये हैं और आने वाले समय में सबसे महत्वपूर्ण भी बन सकते हैं.