साहचर्य

13 नवम्बर को मुक्तिबोध का जन्मदिन पड़ता है. वे स्वयं अपना जन्मदिन किसी विशेष रूप से मनाते होंगे इसका हमारे पास कोई रिकार्ड नहीं है. उनकी जो तस्वीर हिन्दी साहित्य के आधुनिक परिदृश्य में बन गयी है वह एक बेचैन, बेराहत लेखक की है जिसे अपने समय और समाज में अंधरे ज़्यादा नज़र आये जिनकी पूरी ईमानदारी और साहस के साथ उसने शिनाख़्त की. उसकी कविता का तापमान हमेशा ही ऊंचा रहा.

‘तीसरा साक्ष्य’ में संकलित निबन्ध ‘संस्कृति, समय और भारतीय उपन्यास’ में निर्मल वर्मा ने लिखा है: ‘आधुनिक हिन्दी कविता में कल्पना को पुर्नप्रतिष्ठित करने का संघर्ष काफ़ी लम्बे अर्से तक चलता रहा है - बहुत हद तक वह जीता भी जा चुका है. यह संघर्ष बाहर का नहीं, बल्कि अपने से, अपने बीच शब्दों की यथार्थता को खोजने का संघर्ष रहा है. मुक्तिबोध जैसे कवि को हमने उनकी ‘कल्पनालोक’ की अपनी शर्तों पर स्वीकार किया है, अपनी शर्तों पर हम बरसों उन्हें उपेक्षित करते आये थे. जिस जम़ीन पर आधुनिक हिन्दी कविता ने संघर्ष किया था वह उसे लम्बी विरासत से उपलब्ध हुई थी - एक लम्बी परंपरा का रेफ़रेन्स उसके पास था, तोड़ने की प्रक्रिया में जुड़ने की तीव्र आकांक्षा निहित थी, इसलिए ‘नहीं’ की चीख़ भी कहीं दूर अंधेरे में ‘हां’ की कौंध पैदा करती थी.’

यह एक कथाकार-आलोचक की कविता की समझ है. कथाकार कृष्ण बलदेव वेद ने ‘अंधेरे में’ का अंग्रेज़ी में अनुवाद किया था और उनकी डायरियों में कविता पर दिलचस्प टिप्पणियां हैं. कृष्णा सोबती ने मुक्तिबोध पर एक पूरी अनूठी पुस्तक ही लिखी. इन सबको ध्यान में रखकर सोचें तो आज का परिदृश्य बहुत विपन्न नज़र आता है. ऐसे कोई कथाकार दृश्य पर सक्रिय नहीं हैं जो समवर्ती कविता या किसी कवि के बारे में कुछ क़ायदे का कहें-लिखें. राजेन्द्र यादव जैसे लेखक-संपादक को यह दुश्श्रेय दिया जा सकता है कि उन्होंने जान-बूझकर कथा और कविता के बीच दूरी को बढ़ाया और बड़ी संख्या में युवा कथाकारों को कविता में रुचि लेने से विरत किया.

कविता की अपेक्षा कथा हमेशा अधिक लोकप्रिय रहती है. यह लोकप्रियता उसे ज़रूरी तौर पर कविता से बेहतर, अधिक यथार्थपरक, अधिक सामाजिक नहीं बना देती. भाषा की जिन शक्तियों का उपयोग कविता में होता है उनसे कथा अकसर काम नहीं लेती है. अगर कविता को कथा से आख्यान और चरित्ररचना की विधियां सीखना चाहिये तो कथा को भी भाषा में संभव संक्षेप, अन्तर्ध्वनिपरकता आदि का सबक लेना चाहिये. जो कथा में संभव है वह कविता में नहीं. पर उतना ही सही यह भी है कि जो कविता करती है वह कथा नहीं कर पाती.

साहित्य एक व्यापक बिरादरी है और उसमें साहचर्य और सहयोग का, सहकार और परस्पर तनाव का मूल्य होता है. सभी विधाओं की साझी शिरकत ही उस बिरादरी को समृद्धि और सघनता देती है. कोई भी विधा दूसरी किसी विधा से असम्पृक्त रहकर बहुत आगे नहीं जा सकती.

चालीस साल पहलेतीसरा साक्ष्य

1979 की बात है. मध्यप्रदेश कला परिषद् भोपाल से निकली साहित्य और कलाओं की आलोचना-पत्रिका ‘पूर्वग्रह’ के पांच वर्ष पूरे हो चुके थे. तब तक स्वयं रचनाकारों द्वारा लिखी जा रही आलोचना की ‘सृजनात्मक आलोचना’ के रूप में अलग पहचान बन चुकी थी जिसका प्रमुख मंच ‘पूर्वग्रह’ पत्रिका थी. उसमें पिछले पांच सालों में प्रकाशित सामग्री का एक संचयन ‘तीसरा साक्ष्य’ शीर्षक से सम्भावना प्रकाशन से आया था. आलोचना-संबंधी एक आयोजन में उसका लोकार्पण हुआ था और पहली प्रति पर चित्रकार जगदीश स्वामीनाथन, अम्बादास के अलावा नेमिचन्द्र जैन, नामवर सिंह, निर्मल वर्मा, श्रीकान्त वर्मा, मलयज, विष्णु खरे, प्रभात कुमार त्रिपाठी और रमेशचन्द्र शाह के हस्ताक्षर हैं. अभी संभावना प्रकाशन ने रज़ा पुस्‍तकमाला के अन्‍तर्गत इसका पुनर्प्रकाशन किया है.

‘तीसरा साक्ष्य’ में 16 रचनाकार-आलोचकों के निबन्ध संकलित हैं जिनमें कुंवर नारायण, निर्मल वर्मा, विपिन कुमार अग्रवाल, रघुवीर सहाय, कमलेश, नेमिचन्द्र जैन, रमेशचन्द्र शाह, मलयज, चंद्रकांत देवताले, सोमदत्त, भगवत रावत, विष्णु नागर, वेणु गोपाल, प्रयाग शुक्ल, प्रभात कुमार त्रिपाठी आदि शामिल थे. उसकी एक प्रति उलट-पुलट रहा था तो यह दुखद ख़याल आया कि इन सूचियों में से अधिकांश अब हमारे बीच नहीं हैं: हम सिर्फ़ चार बचे हैं - रमेशचन्द्र शाह, विष्णु नागर, प्रभात कुमार त्रिपाठी और मैं. पुस्तक को ‘आठवें दशक में सृजनात्मक आलोचना’ उपशीर्षक दिया गया था. वह लेखक-आलोचक गजानन माधव मुक्तिबोध को समर्पित थी.

निबन्धों के शीर्षकों की सूची इस प्रकार है जिससे पता चलता है कि सृजनात्मक आलोचना का वितान कितना विस्तृत था: ‘एक नैतिक आयाम की खोज’, ‘अमूर्तन के पक्ष में’, ‘पराधीन कल्पना’, ‘कला और समाज’, ‘आलोचना की ज़रूरत’, ‘रामचन्द्र शुक्ल के साथ’, ‘काव्यभाषा का इकहरापन’, ‘वागर्थ की अल्पता’, ‘तदर्थवाद और युवा रचना’, ‘तीसरे संसार की ज़रूरत’, ‘अज्ञेय का काव्यसंसार’, ‘पक्षधर की भूमिका’, ‘अन्तर्विरोधों के बावजूद’, ‘अदम्य सर्जनात्मक ऊर्जा’, ‘कविता के बीस साल’, ‘अधूरा नाटक’, ‘टुकड़ों में उड़ते सवाल’, ‘उदाहरण होने से बचकर’, ‘कविता की ज़रूरत’, ‘सुकवि की मुश्किल’, ‘कहानी और काव्यदृष्टि’, ‘स्मृति में बन्द रचना’, ‘रास्ता इधर से है’ और ‘संस्कृति, समय और भारतीय उपन्यास’. इनमें से कई लेख अज्ञेय, नागार्जुन, शमशेर बहादुर सिंह, रघुवीर सहाय, श्रीराम वर्मा, निर्मल वर्मा, लीलाधर जगूड़ी, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, धूमिल, विनोद कुमार शुक्ल की पुस्तकों की समीक्षा के रूप में लिखे गये हैं.

‘तीसरा साक्ष्य’ की सम्पादकीय भूमिका में मैंने यह दावा किया था कि ‘... यह बुनियादी पूर्वग्रह तो निश्चय ही है कि वे समकालीन रचनाप्रयत्न को महत्वपूर्ण मानते हैं और हमारे समय में सृजन की प्रतिष्ठा बढ़े इसमें उनकी गहरी दिलचस्पी है पर वे अपने समकालीनों को या साहित्य के ज्वलन्त प्रश्नों को बिना किसी रियायत और खुलेपन से समझने और परखने की कोशिश करते हैं. वे अपनी-अपनी दृष्टि के प्रति वफ़ादार हैं लेकिन उसकी तानाशाही उनकी आलोचना में नहीं है, बल्कि अपनी दृष्टि को भी जांचने-परखने का दुर्लभ साहस उनमें है. ... वे कृति को बिना उसकी संस्कृति के समझे पूरी तरह समझने के सरलीकरण से मुक्त हैं.’

मलयज कहते हैं: ‘भाषा के भीतर जो अनुभूति है भाषा के बाहर वही कर्म है. कविता इन दोनों की संधि पर है. कविता सच्ची बनती है भाषा के भीतर की अनुभूति से, और बड़ी बनती है भाषा के बाहर के कर्म से. बौने जीवन से बड़ी कविता नहीं पैदा होती. पर जीवन बौना कर्म की असिद्धि से नहीं, कर्म-क्षेत्र की विविधता का अनुसन्धान न करने से बनता है.’ कमलेश का मत है: ‘धर्मवीर भारती या कुंवर नारायण की ऐसी रचनाओं में भाषा की रूपगत असफलताएं बरक़रार हैं, क्योंकि एक तो वहां भी विरोधी दृष्टियों और विरोधी प्रतीतियों को कोई स्वीकृति नहीं दी गयी है और जिन समकालीन मतवादों से वे प्रभावित हैं उनका पूरी कथा में निहित मतवाद से पूर्व में ही समन्वय करके एक रचना करने का कार्यक्रम बनाया गया है. कविता के संगठन में इन मतवादों के संघर्ष की कोई झलक नहीं मिलती. फलस्वरूप भाषा भी विरल प्रलम्बित हो जाती है.’

विपिन कुमार अग्रवाल ने बताया है कि ‘चारों और के वस्तु-संसार को यथार्थ मानकर चलना और उसके दुहराये जाने में आनंद लेना बीसवीं शताब्दी के पहले की, औद्योगिक क्रान्ति के समय की शुद्ध अंग्रेज़ी प्रवृत्ति थी, जो हमने उनसे विज्ञान के अधकचरे ज्ञान के कारण उधार ले ली थी... भारतीयता का अर्थ यही हो सकता है कि इस यान्त्रिक दृष्टि से छुटकारा पा हम भारतीय मानस को संभावना और अमूर्तन के संसार में सृजन करने दें. संभावनाओं, यहां तक कि विरोधी संभावनाओं, को केन्द्र में रखकर अमूर्तन के सहारे हम अपने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष पूरे यथार्थ को पल्‍लवित कर सकते हैं.’ निर्मल वर्मा तोलस्तोय के हवाले से अपने निबन्ध का समापन करते हुए कहते हैं: ‘दरअसल वह अर्थ नहीं था जो तोलस्तोय ने कला में खोजना चाहा था क्योंकि कला न तो रोटी की बदल हो सकती है और न बुराइयों के विरूद्ध हथियार की तरह काम दे सकती है और फिर भी हम वे उपन्यास पढ़ते हैं जो स्वयं तोलस्तोय ने लिखे हैं और अब हम जानते हैं कि सिर्फ़ कला हमें क्या दे सकती है - वह है रोशनी का एक ऐसा नाजुक हल्क़ा जो धुंधले शीशे के आर-पार देखने में हमारी मदद करता है - सिर्फ़ अंधेरे का चरित्र नहीं, अपनी भूख की गहराई भी.’

कुंवर नारायण ने इस ओर ध्यान दिलाया कि ‘केन्द्रीय मार्क्सवादी चिन्तन में भी ‘आध्यात्मिक’ शब्द बहिष्कृत नहीं है और इस ‘आध्यात्मिकता’ के सही सन्दर्भ वे मानव-मूल्य हैं जिनके पूरे विकास की कल्पना समाजवादी व्यवस्था में की गयी है… इसका विशेष रूप से ज़िक्र है कि कम्युनिस्ट आदर्शों को एक सच्ची मानवीय आध्यात्मिक संस्कृति से अलग नहीं किया जा सकता.’

कभी-कभी लगता है कि आज की हमारी आलोचना को इन सब विवेचनाओं, अवधारणाओं की कोई याद नहीं रह गयी है. समकालीन रचना तो स्मृतिवंचित है ही ज़्यादातर, आलोचना में भी स्मृति बहुत क्षीण और शिथिल हो गयी है.