अक्टूबर में एपल ने आईफोन-12 सीरीज के चार मोबाइल फोन - आईफोन-12, आईफोन-12 मिनी, आईफोन-12 प्रो और आईफोन-12 प्रो मैक्स - लॉन्च किए हैं. नवंबर की शुरूआत में भारतीय बाज़ार में भी उपलब्ध हो चुके इन मोबाइल फोन्स की कीमत करीब 70 हजार रुपए से लेकर सवा लाख के बीच रखी गई है. चौंकाने वाला यह है कि ऐसी भारी-भरकम कीमत वाले आईफोन बॉक्स में मोबाइल के साथ वॉल-चार्जर (चार्जिंग एडॉप्टर) और ईयरफोन्स नहीं दिए जा रहे हैं. इसे लेकर एपल का कहना है कि उसने पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए यह कदम उठाया है और ऐसा करने से कंपनी न सिर्फ अपना कार्बन उत्सर्जन घटा सकेगी बल्कि बढ़ते इलेक्ट्रॉनिक कचरे को नियंत्रित करने में भी मददगार साबित होगी.

एपल के इस दावे से इतर तकनीक के जानकार इसे लागत को नियंत्रित करके मुनाफा बढ़ाने के लिए लिया गया फैसला बताते हैं. जानकारों के मुताबिक, एपल पहली बार अपनी किसी आईफोन सीरीज में 5जी तकनीक का इस्तेमाल कर रहा है और यह तकनीक उसके नये मोबाइल फोनों को पुरानों से बेहतर और महंगा बनाती है. टेक-एक्सपर्ट बताते हैं कि 5जी इंटरनेट और कनेक्टिविटी पाने के लिए आईफोन-12 में जो कम्पोनेंट्स लगाए गए हैं, उनकी लागत फोन की एक-तिहाई कीमत के बराबर है और ऐसे में, एपल के पास कीमतों में भारी बढ़त होने से बचाने के लिए एक्सेसरीज हटा देना ही पहला विकल्प था. इसके साथ ही वे यह संभावना भी जताते हैं कि आने वाले समय में जब बाकी कंपनियां भी 5जी तकनीक की तरफ कदम बढ़ाएंगी तो वे भी एपल की राह जाते हुए दिख सकती हैं. इसका एक मतलब यह भी है कि हो सकता है कि आने वाले समय में मोबाइल फोन के साथ एक्सेसरीज देने का चलन ही खत्म हो जाए.

लेकिन इसके अलावा भी, 5जी तकनीक की वजह से भविष्य में कई क्रांतिकारी बदलाव आने के दावे किए जा रहे हैं. ऐसे में सहज ही कुछ सवाल किए जा सकते हैं. मसलन, 5जी तकनीक आखिर क्या है, कैसे काम करती है, यह 3-जी और 4-जी से कैसे अलग है और क्या सच में कनेक्टिविटी और उससे जुड़े क्षेत्रों में इसकी वजह से कोई क्रांतिकारी बदलाव आने वाले हैं?

5जी तकनीक क्या है?

5जी या फिफ्थ जेनरेशन, ब्रॉडबैंड सेल्युलर नेटवर्क की वह तकनीक है जो आगे चलकर मौजूदा सबसे तेज सेल्युलर इंटरनेट कनेक्टिविटी यानी 4-जी (असलियत में 4जी-एलटीई यानी फोर्थ जेनरेशन लॉन्ग टर्म इवॉल्यूशन, जो 4-जी के मानकों पर पूरी तरह तो खरा नहीं उतरती है पर उनके पास पहुंचने की कोशिश करती है) की जगह लेगी. सेल्युलर नेटवर्क की पिछली पीढ़ियों का जिक्र करें तो 1-जी वायरलेस तकनीक से जहां टूटी-फूटी खरखराहट भरी आवाजों के जरिए संवाद मुमकिन हो पाया था, वहीं 2-जी के जरिये पहली बार स्पष्ट आवाज के साथ एसएमएस सरीखी बेसिक डेटा ट्रांसफर सर्विस मिली और मोबाइल इंटरनेट की शुरूआत हुई थी. 3-जी की बात करें तो इसके साथ इंटरनेट पर तमाम तरह का एडवांस्ड कम्युनिकेशन जैसे कि वेबसाइट्स को एक्सेस करना, वीडियो देखना, म्यूजिक सुनना और मेल करना आदि संभव हुआ, और 4-जी-एलटीई ने इसे तेज रफ्तार बनाया.

अब 5जी तकनीक के साथ एक नए तरह की वायरलेस कनेक्टिविटी का समय शुरू होने जा रहा है जिसकी स्पीड इतनी होगी कि घटनाओं के घटने और उनकी सूचना पहुंचने के बीच लगने वाला समय यानी लेटेंसी न के बराबर होगी. 5जी के जरिए न सिर्फ अभी की तरह लोग आपस में जुड़े होंगे बल्कि डिवाइसेज और मशीनें भी आपस में कनेक्ट होंगी और आपस में लगभग रियल टाइम में संवाद कर सकेंगी. यानी, आने वाले समय में घर, कार, मोबाइल और घरेलू उपकरणों जैसी तमाम चीजों के आपस में कनेक्ट होने वाले जिस स्मार्ट युग की अभी हम बातें ही करते हैं, वह 5जी तकनीक की वजह से परवान चढ़ने वाला है.

5जी पर कितना तेज़ इंटरनेट मिलेगा?

बताया जा रहा है कि 5जी तकनीक में गीगाबिट्स प्रति सेकंड (जीबीपीएस) की रफ्तार से डेटा ट्रांसफर किया जा सकता है. 5जी तकनीक पीक डेटा रेट्स यानी आदर्श परिस्थितियों में एक सेकंड में 20 गीगाबिट्स (बाइट नहीं बिट्स, 1 बाइट = 8 बिट्स) डेटा डाउनलोड और 10 गीगाबिट्स डेटा अपलोड करेगी. लेकिन इसके जरिये व्यावहारिक रूप से मिलने वाली इंटरनेट स्पीड 100 मेगाबिट्स प्रति सेकंड यीनी एमबीपीएस (डाउनलोडिंग स्पीड) और 50 एमबीपीएस (अपलोडिंग स्पीड) तक ही होगी. हालांकि यह स्पीड भी कितनी ज्यादा है, इसका अंदाजा 4-जी एलटीई कनेक्शन से इसकी तुलना करके लगाया जा सकता है. 4-जी में पीक डेटा रेट्स 300 एमबीपीएस और 150 एमबीपीएस होनी चाहिए. वहीं, व्यावहारिक रूप से 4जी-एलटीई के जरिये सिर्फ 40 एमबीपीएस डाउनलोडिंग और 25 एमबीपीएस अपलोडिंग स्पीड ही मिल पाती है.

लेटेंसी यानी इन्फॉर्मेशन के एक जगह से दूसरी जगह पर पहुंचने में लगने वाले समय की बात करें तो दो वस्तुओं के बीच कम्यूनिकेशन में आदर्श परिस्थितियों में एक मिलीसेकंड (सेकंड का हजारवां हिस्सा) और व्यवहार में चार मिलीसेकंड का समय लगने की बात कही जा रही है. इंटरनेट की इस तेज़ रफ्तार की ज़रूरत क्यों है, यह समझने के लिए अपने चारों तरफ तेज़ रफ्तार से दौड़ती ऑटोमैटिक कारों या दुनिया के एक कोने में बैठे डॉक्टर द्वारा दूसरे कोने में की जा रही रिमोट सर्जरी के दृश्यों की कल्पना की जा सकती है. इन परिस्थितियों में संवाद बिलकुल उसी रफ्तार से होना चाहिए जैसे हम आमने-सामने बैठ कर करते हैं, नहीं तो इसके गंभीर परिणाम देखने को मिल सकते हैं.

5जी कैसे काम करता है?

5जी कैसे काम करता है, यह समझने के लिए हमें थोड़ा सा रेडियो स्पेक्ट्रम के बारे में समझना पड़ेगा. सभी जानते हैं कि वायरलेस कनेक्टिविटी के लिए इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम या कहें कि रेडियो वेव्स (रेडियो तरंगों) का इस्तेमाल किया जाता है. एक निश्चित समय अंतराल में कोई रेडियो वेब जितनी बार खुद को दोहराती है, उसे वेव फ्रीक्वेंसी कहा जाता हैं. इसे अक्सर हर्टज़ में नापा जाता है जो यह बताता है कि एक सेकंड में कोई रेडियो वेव कितनी बार खुद को दोहराती है. कोई रेडियो तरंग खुद को एक बार दोहराने में जितना समय लेती है, उसे उसकी वेवलेंथ कहा है. इसका मतलब यह हुआ कि जब तरंगों की फ्रीक्वेंसी को बढ़ाया जाता है तो उनकी वेवलेंथ कम होने लगती है.

सामान्य अवस्था में फ्रीक्वेंसी अधिक होने (या वेवलेंथ कम होने) पर तरंगें तेजी से एक से दूसरी जगह पर तो पहुंचती हैं लेकिन ज्यादा दूरी तक नहीं जा पाती हैं. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वेबलेंथ कम होने की वजह से ये तरंगें विभिन्न सतहों को भेद नहीं पाती हैं. इसका उल्टा यानी फ्रीक्वेंसी कम और वेवलेंथ ज्यादा होने पर वे कम गति के साथ ज्यादा दूरी तय कर सकती हैं.

इसे एक उदाहरण से समझें तो 1जी, 2जी, 3जी सेवाओं में 4जी की तुलना में लोअर फ्रीक्वेंसी बैंड पर इंटरनेट उपलब्ध होता है. इसलिए उसकी स्पीड कम लेकिन कवरेज ज्यादा होता है. यही वजह है कि दूर-दराज के इलाकों में धीमी रफ्तार की 2जी या 3जी इंटरनेट कनेक्टिविटी आसानी से मिल पाती है. वहीं, 4जी सेवा में अपेक्षाकृत हायर फ्रीक्वेंसी बैंड पर इंटरनेट उपलब्ध होता है जिससे फास्ट कनेक्टिविटी तो मिलती है लेकिन सुदूर इलाकों या बंद कमरों में कई बार 4जी कवरेज नहीं मिल पाता है. 5जी तकनीक इस तरह की सभी समस्याओं का हल बनने जा रही है क्योंकि इसमें लोअर, हायर और मिडरेंज फ्रीक्वेंसी बैंड को एक साथ इस्तेमाल किया जाता है. 5जी तकनीक में हायर-फ्रीक्वेंसी रेडियो वेव्स जहां कम कवरेज वाला तेज़ रफ्तार इंटरनेट उपलब्ध करवाएंगी, वहीं मिड रेंज और लोअर फ्रीक्वेंसी बैंड्स दूर तक और लगातार कनेक्टिविटी बनाए रखने में मदद करेंगे.

5जी तकनीक का जिक्र करते हुए अक्सर ही सब-6 (Sub-6) बैंड का नाम लिया जाता है. सब-6 बैंड में 450 मेगा हर्ट्ज से छह गीगा हर्ट्ज के फ्रीक्वेंसी स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल किया जाता है. 5जी में इस्तेमाल किया जा रहा लोअर और मिडरेंज फ्रीक्वेंसी स्पेक्ट्रम सब-6 का ही हिस्सा है. 5-जी का लोअर फ्रीक्वेंसी स्पेक्ट्रम (600-700 मेगाहर्ट्ज) लगभग वही होता है जिसे 4जी सेवाओं में इस्तेमाल किया जाता है, इसलिए लोअर बैंड 5जी की कनेक्टिविटी 4जी से थोड़ी ही बेहतर (30-100 एमबीपीएस) होगी. 5जी में लोअर-बैंड सेल टॉवर्स को शामिल किए जाने का फायदा यह होगा कि इसका कवरेज एरिया लगभग 4जी के बराबर हो जाएगा. यानी दूर-दराज़ के इलाकों में इसी बैंड का इस्तेमाल होगा.

मिड-बैंड 5जी में 2.5 से 3.7 गीगाहर्ट्ज के स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल किया जा सकता है जिस पर 100-900 एमबीपीएस की स्पीड से इंटरनेट इस्तेमाल किया जा सकेगा. मिड-बैंड, लोअर-बैंड की तुलना में अपेक्षाकृत छोटे इलाके में हाई स्पीड इंटरनेट उपलब्ध करवा सकेगा. इसके जरिये ज्यादातर बड़े शहरों में इंटरनेट उपलब्ध कराया जाएगा.

अगर हाई-बैंड 5जी की बात करें तो इसमें 25 गीगाहर्ट्ज़ से ऊपर के फ्रीक्वेंसी बैंड का इस्तेमाल किया जाता है. इसमें मिलीमीटर वेव-बैंड (30 गीगाहर्ट्ज़ -300 गीगाहर्ट्ज़) की निचली सीमा भी शामिल है इसलिए इसे मिलीमीटर वेव-बैंड भी कहा जा रहा है. जैसा कि हम ऊपर पढ़ चुके हैं, इस बैंड की वेबलेंथ बहुत कम होने की वजह से इनकी स्पीड बहुत ज्यादा और कवरेज एरिया बहुत सीमित होता है.

5जी महंगा क्यों है?

किसी भी सेल्युलर नेटवर्क में हमारे चारों तरफ का इलाका षटकोणीय आकार के सेल्स में बंटा होता है. इन सभी सेल्स के मध्य में एक बीटीएस (बेस ट्रांसीवर स्टेशन) होता है. इसमें मूलत: एक एंटेना, ट्रांसमिटर और रिसीवर यूनिट होते हैं. यह सेलफोन के साथ रेडियो वेब्स के जरिये कम्यूनिकेट करता है. सेलफोन नेटवर्क को सेल्स में बांटने की जरूरत इसलिए होती है क्योंकि न तो जरा सी पावर से चलने वाले मोबाइल फोन इतने शक्तिशाली सिग्नल भेज सकते हैं कि वे एक सीमा से आगे जा पाएं और न बेस स्टेशन से ही एक तय दूरी से ज्यादा सिग्नल भेजे जा सकते हैं. इसके अलावा रेडियो स्पेक्ट्रम एक दुर्लभ और सीमित संसाधन है और मोबाइल कंपनिया अपनी हर सेल में बार-बार उन्हें मिली फ्रीक्वेंसी का इस्तेमाल कर सकती है. अगर सेल्स न होतीं तो एक ही बीटीएस से सीमित रेडियो स्पेक्ट्रम के जरिये सभी सेलफोन्स के साथ संपर्क कर पाना संभव नहीं था. अभी होता यह है कि जब हम एक सेल से दूसरे सेल में जाते हैं तो हमारा कनेक्शन पहली सेल से कटकर दूसरी के बीटीएस के साथ कनेक्ट हो जाता है और हम लगातार बात करते या इंटरनेट एक्सेस करते रह सकते हैं.

5जी नेटवर्क की समस्या यह है कि अगर सरल भाषा में कहें तो इसमें सेल्युलर ब्रॉडबैंड उपलब्ध कराने के लिए तीन तरह की सेल्स (हाई, मीडियम और लो फ्रीक्वेंसी) और उनमें लगने वाले उपकरणों की जरूरत होती है. इसके लिए फ्रीक्वेंसी स्पेक्ट्रम भी ज्यादा चाहिए. अगर हमें 5जी में सबसे हाई स्पीड का इंटरनेट कनेक्शन चाहिए तो गली-गली में स्ट्रीट लाइट्स की तरह मिलीमीटर वेव्स के जरिये कम्यूनिकेट करने वाले बेस स्टेशन लगाने पड़ेंगे. इस तरह नई तकनीक, आधुनिक उपकरण और भारी संख्या में लगाए जाने की ज़रूरत होने के चलते, 5जी तकनीक इंटरनेट प्रोवाइडर्स के लिए उतनी ही भारी लागत वाले साबित हो रहे हैं.

ऐसे में इनकी लागत कम करने के लिए 5जी को सिर्फ उन भीड़-भाड़ वाले इलाकों में ही उपलब्ध कराया जा सकता है जहां एक साथ बहुत सारे लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं. जैसे कि इन्फोसिस जैसे बड़े ऑफिस या यूनिवर्सिटीज, बड़ी रेसिडेंशियल सोसायटीज या क्रिकेट स्टेडियम्स जहां हज़ारों लोग एक साथ काम करते हैं, रहते हैं या जमा होते हैं.

इसी तरह, मोबाइल और बाकी डिवाइसेज की बात करें इनमें भी 5जी की रफ्तार से चलने वाले बेहतरीन प्रोसेसर लगाए जाने की ज़रूरत भी इनकी लागत को बढ़ा देती है. जैसी कि ऊपर आईफोन-12 का जिक्र करते हुए बताया गया है. अभी उपलब्ध 4जी मोबाइल फोन्स पर 5जी की इंटरनेट सुविधा इस्तेमाल नहीं की जा सकती है. 5जी सेवा का इस्तेमाल किया जा सके, इसके लिए मोबाइल फोन्स में अलग-अलग स्पेक्ट्रम बैंड पर कनेक्टिविटी और उनके बीच स्विचिंग की सुविधा होना ज़रूरी है. यहां पर यह जानना दिलचस्प है कि 5जी तकनीक के इस्तेमाल के लिए अभी तक उपलब्ध सबसे अच्छे प्रोसेसर जैसे कि क्वालकॉम स्नैपड्रैगन एक्स-55 और स्नैपड्रैगन एक्स-60 मॉडर्न-आरएफ सिस्टम्स के जरिए भी पीक डेटा रेट 7.5 जीबीपीएस ही हासिल किया जा सका है जबकि 5जी पर पीक डेटा रेट 20 जीबीपीएस तक पहुंचता है. कहने का मतलब है कि 5जी सेल्युलर कनेक्टिविटी पाने के लिए मोबाइल डिवाइसेज को भी लगातार बेहतर बनाए जाने की ज़रूरत होगी. इससे मोबाइल और बाकी गैजेट्स की कीमतों में काफी बढ़त देखने को मिल सकती है.

क्या 5जी तकनीक और मिलीमीटर वेव-टॉवर के कुछ खतरे भी हैं?

अब चूंकि वेव-टॉवर लोगों के घरों के बेहद करीब लग सकते हैं, इसलिए इनसे होने वाले रेडिएशन और जीव-जंतुओं, पर्यावरण समेत इंसान पर उसके असर की भी चर्चा की जा रही है. पिछले दिनों कई मीडिया रिपोर्टों में यह दावा किया गया था कि 5जी सेलफोन कैंसर के मरीजों में बढ़ोतरी की वजह बन सकता है. कुछ शोधपत्रों के हवाले से यह भी कहा जा रहा है कि 5जी नेटवर्क के लिए लगाए जा रहे मिलीमीटर वेव-टॉवर से होने वाला हाई-फ्रीक्वेंसी रेडिएशन कैंसर के साथ-साथ बांझपन, डीएनए और तंत्रिकातंत्र से जुड़ी असामान्यताओं की वजह बन सकता है. हालांकि इन तमाम आशंकाओं को वैज्ञानिक सिरे से नकार देते हैं.

वैज्ञानिकों का मानना है कि यह सही है कि एक्स-रे या गामा-रे जैसी हाई-फ्रीक्वेंसी तरंगें इंसान और बाकी जीव-जंतुओं के लिए हानिकारक होती हैं लेकिन 5जी के लिए इस्तेमाल किया जा रहा स्पेक्ट्रम इससे कहीं नीचे हैं. इसके अलावा, वैज्ञानिक 5जी तरंगों को खतरा बनाने वाले शोधों पर टिप्पणी करते हुए यह भी बताते हैं कि इन शोधों में यह तो देखा गया है कि तरंगें मस्तिष्क की कोशिकाओं पर असर डालती हैं, लेकिन इस पक्ष को नज़रअंदाज दिया गया है कि ये मनुष्य की त्वचा को पार ही नहीं कर पाती हैं.

ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी में कैंसर रिसर्चर, डेविड रॉबर्ट ग्राइम्स, द गार्डियन के लिए लिखते हैं, ‘मोबाइल फोन कोई स्वास्थ्य आपदा नहीं है. हमें यह समझना चाहिए कि हर तरह का रेडिएशन नुकसानदायक नहीं होता है. बीते कुछ सालों को देखें तो मोबाइल का इस्तेमाल अब कई गुना बढ़ चुका है. अगर यह किसी भी तरह से कैंसर की वजह होता तो अब तक इसके मामलों में उल्लेखनीय बढ़त देखने को मिल चुकी होती.’ इसके अलावा, विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) भी कह चुका है कि ‘बीते दो दशकों में हुए कई शोध यह कहते हैं कि मोबाइल फोन आने वाले समय में कई स्वास्थ्य समस्याओं की वजह बन सकता है. सैद्धांतिक रूप से इनके सही साबित होने के बावजूद अभी तक व्यावहारिक तौर पर मोबाइल फोन के इस्तेमाल से स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ने के कोई सबूत नहीं मिल पाए हैं.’

रेडिएशन के अलावा, कोरोना वायरस सरीखी स्वास्थ्य आपदा को भी कई जगहों पर 5जी तकनीक से जोड़कर देखा जा रहा है. बीते अप्रैल में, यूरोप के कई शहरों में लगे दसियों मिलीमीटर वेव-टॉवर्स को पेट्रोल-बम से उड़ा दिया गया या तोड़-फोड़ दिया गया. इस घटना की वजह एक अफवाह थी जिसमें इन वेव-टॉवर्स को कोरोना वायरस संक्रमण के फैलाव के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा था. इसी तरह की कुछ अफवाहों में यह भी शामिल था कि कोरोना वायरस कोई महामारी नहीं है बल्कि 5जी तकनीक के दुष्प्रभावों को छिपाने के लिए रची गई एक साजिश है. कई कॉन्सपिरेसी थ्योरीज में यह भी कहा गया कि 5जी तकनीक आसपास होने पर कोरोना संक्रमण से मरने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है.

जानकार इन अफवाहों को बेसिर-पैर का बताते हुए तर्क देते हैं कि 5जी तकनीक अभी दुनिया में ज्यादातर जगहों तक नहीं पहुंच पाई है लेकिन कोरोना वायरस उन जगहों पर भी पहुंच चुका है जहां 4-जी की भी पहुंच अभी ढंग से नहीं हो पाई है. इसके साथ ही, वे यह भी कहते हैं कि यह मानना कि इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वेव्स के जरिए कोई बायोलॉजिकल वायरस एक से दूसरी जगह पर पहुंच सकता है, बहुत अतार्किक है. 5जी वेव्स के जरिए केवल कम्यूटर के वायरस ही एक से दूसरे कम्प्यूटर तक पहुंच सकते हैं और यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि वे इंसान को शारीरिक रूप से कोई नुकसान नहीं पहुंचाते हैं. इसके अलावा, कुछ मीडिया रिपोर्टों में इसे लोगों को गुमराह करने और उकसाने के लिए जान-बूझकर फैलाई गई गलत जानकारी भी बताया गया है. दरअसल, कुछ महीने पहले, अमेरिका में प्रसारित होने वाले एक रूसी समाचार चैनल ने लगातार 5जी पर बहुत आक्रामक कवरेज की थी और इसे कई तरह से स्वास्थ्य के लिए खतरनाक बताया था. इसलिए जानकार मानते हैं कि 5जी से जुड़ी कई अफवाहें अमेरिका और रूस की आपसी खींचतान और रूस की अमेरिकी चुनावों को प्रभावित करने की कोशिशों का नतीजा थी, जिसके चंगुल में कई अन्य देश और वहां के लोग भी आ गए और, 5जी को भविष्य की उम्मीद की बजाय खतरे की तरह देखा जाने लगा.

भारत में यह कब तक उपलब्ध होगा?

संभावना जताई जा रही है कि साल 2021 की पहली तिमाही में देश में 5जी स्पेक्ट्रम की नीलामी की जाएगी. जानकार अंदाज़ा लगाते हैं कि इसके बाद भी देश भर में फाइबर केबल का नेटवर्क तैयार करने और वेव-टॉवर इंस्टाल करने में लगभग दो से तीन साल का वक्त लग सकता है. हाल ही में एक इन्वेस्टर समिट में बोलते हुए भारती एयरटेल के मैनेजिंग डायरेक्टर गोपाल विट्टल का कहना था कि ‘भारत में 5जी तकनीक के लिए इकोसिस्टम अभी तक तैयार नहीं हो पाया है. मुझे लगता है कि देश में 5जी तकनीक की उपस्थिति का पता चलने में ही अभी कम से कम दो साल का वक्त लग सकता है.’

हाल ही में आई कुछ मीडिया रिपोर्टों में भी कहा गया था कि 2025 तक देश में लगभग 20 करोड़ लोगों तक 5जी कनेक्टिविटी पहुंच सकेगी. हालांकि जानकार इसे भी दूर की कौड़ी बताते हैं और कहते हैं कि अभी भारत में एक तिहाई से भी कम टॉवर्स तक फाइबर कनेक्टिविटी पहुंच पाई है और इस आंकड़े तक पहुंचने के लिए कम से कम 60 फीसदी टॉवर्स का फाइबराज्ड होना ज़रूरी है जिसमें अभी कई सालों का वक्त लग सकता है. लेकिन वे इस बात की उम्मीद ज़रूरत जताते हैं कि दिल्ली, मुंबई जैसे महानगरों में साल 2022 की शुरूआत तक यह सेवा ज़रूर शुरू की जा सकती है. इसके साथ ही, वे भारतीय यूजर्स को 5जी फोन या बाकी गैजेट्स खरीदने की जल्दबाज़ी न दिखाने की सलाह भी देते हैं.