असहमति की व्याप्ति

डेढ़ेक बरस पहले अहमदाबाद विश्वविद्यालय की अध्यापिका प्रतिष्ठा पण्ड्या ने फ़ोन कर बताया कि उन्होंने मेरे सम्पादन में आयी ‘इण्डिया डिसेण्ट्स’ संचयिता देखी है और मैं असहमति पर उनके छात्रों और सहकर्मियों से संवाद करने उनके द्वारा संचालित एक बौद्धिक सीरीज़ ‘नालन्दा’ में भाग लूं. जाना कई कारणों से नहीं हो पाया और फिर कोविड महामारी आ गयी. सो अब यह संवाद ऑनलाइन हुआ. छात्रों और अध्यापकों ने पूरी तैयारी के साथ चर्चा में भाग लिया. मेरे लिए सुखद अचरज की बात यह थी कि सभी ने उस संचयन की भूमिका ‘असहमति की बहुलता’ ध्यान से पढ़ रखी थी. जो प्रश्न छात्रों ने पूछे वे सभी विचारोत्तेजक थे. उनमें से कई स्नातक स्तर की पढ़ाई कर रहे हैं और उनमें ईमानदार जिज्ञासा और प्रश्नाकुलता है. इसने बहुत आश्वस्त किया. यह प्रभाव पड़ा कि असहमति का भूगोल चुपचाप कम से कम कुछ युवा क्षेत्रों में फैल रहा है.

निरा मतभेद असहमति नहीं कहा जा सकता हालांकि बिना मतभेद के असहमति संभव नहीं है. पर असहमति भेद से आगे जाती है. उसमें किसी व्यापक व्यवस्था या सत्ता से, किसी बुनियादी अर्थ में, उसकी किसी दृष्टि, नीति, कर्म, प्रत्यक्ष या परोक्ष कार्रवाई आदि से मतभेद शामिल होता है. असहमति अपने मूल में नैतिक, प्रभाव और उपस्थिति में सामाजिक और बौद्धिक होती है. कई और शब्द हैं जो असहमति के नजदीकी रिश्तेदार हैं: प्रतिरोध, असहयोग, सिविल नाफ़रमानी, आपत्ति, प्रश्नांकन, विरोध इनमें से कुछ हैं. असहमति हिंसक भी हो सकती है और इस कारण अन्ततः विफल और पराजित होने के लिए अभिशप्त. उसका अहिंसक रूप ही अधिक प्रभावशाली और टिकाऊ होता है.

लोकतंत्र ऐसी व्यवस्था है जिसमें न सिर्फ़ असहमति की जगह, आदर और स्वागत होते हैं बल्कि कई राजनैतिक दलों के अस्तित्व और सक्रियता के रूप में वह उसकी संरचना में ही गुंथी होती है. असहमति के बिना लोकतंत्र सम्भव और सशक्त नहीं हो सकता. इस समय भारतीय लोकतंत्र खुले रूप में बहुसंख्यकतावाद की चपेट में है और असहमति की प्रायः सभी अभिव्यक्तियों को बाधित और दण्डित करने की प्रवृत्ति का वर्चस्व सा स्थापित हो गया है. ऐसे क़ानूनों और कार्रवाइयों की प्रचुरता सी है जो रोज़ असहमति का दमन करने के लिए सक्रिय हैं. स्वयं असहमति के सहारे सत्तारूढ़ शक्तियां अब असहमति को दबाने, चुप कराने का लगातार उपक्रम कर रही हैं.

जो प्रश्न पूछे गये उनके उत्तर में यह स्पष्ट किया गया कि भारत में असहमति की कम से कम तीन हज़ार बरस पुरानी परम्परा रही है. इस परम्परा ने वैदिक काल से लेकर अपने समूचे इतिहास में धर्म, आस्था, दर्शन, ज्ञान आदि में असहमति को जगह और सम्मान दिये हैं. आखि़रकार बौद्ध, जैन और सिख धर्म असहमति से ही उपजे धर्म हैं और भारत में ही जन्मे हैं. जो भारत में वाद-विवाद-संवाद को हाशिये पर डालता है, वह लोकतंत्र भर से नहीं भारतीय परम्परा से द्रोह करता है.

हमारे रोज़मर्रा, की ज़िन्दगी में इधर राजनीति, धर्म और मीडिया के तिहरे प्रभाव में बेवजह आक्रामकता, नागरिक व्यवहार में सौम्यता और परस्पर आदर के बजाय आहत होने, झगड़ने-लड़ने के मुहावरे बढ़ते जा रहे हैं. एक तरह का नागरिक लयभंग हो रहा है. सार्वजनिक जीवन तो अब हिंसा-घृणा-हत्या-बलात्कार आदि की अभद्र-अश्लील और हिंसक भाषा से आक्रान्त हो रहा है. झूठों का ऐसा घटाटोप है कि सच दिखना लगभग बन्द हो गया है. राज्य हर दिन अपनी मर्यादाओं का उल्लंघन कर रहा है और समाज उसका शिकार है. साफ़ है कि किसी भी तरह की असहमति अस्वीकार्य है. दूसरे शब्दों में, असहमति जोखिम और साहस का कर्म है और उसे व्यक्त करने वाले मुश्किल में पड़ते हैं. वर्तमान राजनीति में ध्रुवीकरण, संवादहीनता, दुर्व्याख्या और हिन्दुत्व आदि पर भी चर्चा हुई जिनके बारे में पहले ही लिखा जा चुका है.

हुसैन और निर्मल

जैसा कि उनका स्वभाव था एक दिन अचानक मक़बूल फ़िदा हुसैन प्रगट हुए. तब हम लोग शाहजहां रोड के एक सरकारी मकान में रहते थे. वे अपनी आत्मकथा ‘हुसैन की कहानी अपनी जुबानी’ पाण्डुलिपि लेकर आये थे और चाहते थे कि निर्मल वर्मा उसकी भूमिका लिखें. उनका आग्रह था कि मैं उनके साथ निर्मल जी से यह आग्रह करने चलूं. 2002 में प्रकाशित इस जीवनी की भूमिका निर्मल जी ने ‘मक़बूल की हुसैनी कलम’ शीर्षक से लिखी. हुसैन की जीवन कथा और कलायात्रा पर यह एक अद्वितीय निबन्ध है. इस पर ध्यान कम गया है, कला जगत् में भी, क्योंकि वह हिन्दी में है जबकि कलालोचना ज़्यादातर और प्रभावोत्पादक अंग्रेज़ी में ही लिखी जाती है.

निर्मल जी के अनुसार ‘अमृता शेरगिल के बाद हुसैन शायद पहले चित्रकार हैं, जिनके चित्रों को अपने विशिष्ट अलगाव में याद किया जा सकता है जैसे हम किसी लेखक की अलग-अलग कृतियों को याद करते हैं... हुसैन का समय एक लीक पर अग्रगामी दिशा में नहीं चलता. वहां बहुत सी दिशाएं एक-दूसरे में गुंथी दिखायी देती हैं, विभिन्न कालखण्डों का बहुआयामी कोलाज. उनका अतीत कोई बीता हुआ विगत नहीं है, वह एक नदी की तरह उनके वर्तमान पाटों पर बहता है - सतत प्रवाहमान - जो कभी था, वह अब भी है, वहां कुछ नहीं बीता, न पंढरपुर की पोटली, न दादा की अचकन, न अपनी नयी मां के नंगे कोमल पैर, जो उनके घाघरे से बाहर निकल कर आज भी उन्हें चलती ट्रेन के डिब्बे में दिखायी दे जाते हैं... हुसैन की दुनिया एक कार्नीवल, एक उत्सव, एक सर्कस का मिला-जुला समारोह है जहां सब कुछ सम्भव है.’

हुसैन की आत्मकथा पढ़ते हुए निर्मल जी का कथाकार और कला रसिक दोनों समान रूप से एक साथ सक्रिय रहते हैं. वे इस कथा के आरम्भ का एक अंश उद्धृत करते हुए कहते हैं ‘ज़रा देखिये उसकी शुरूआत, जैसे आप शब्दों के भीतर से फिल्म का कोई सीन देख रहे हों... मिट्टी का घड़ा, छत से लटकती लालटेन, खामोश. तकिए के नीचे किताब का चौदहवां पन्ना खुला, टीन सन्दूक में बेजोड़ कपड़े... गर्द के मैले रंग की नीली कमीज, साइकिल की टूटी चैन, मलमल का नारंगी दुपट्टा, बांस की बांसुरी, गुलाबी पतंग के कागज़ की पुड़िया में अंगूठी.’

आगे निर्मल जी का मत है कि ‘हुसैन की दृष्टि में हर चीज़ का अपना ओज है, अपना आलोक, अपना ईश्वरीय अक़्स. चीज़ की उपस्थिति में ही उसकी पवित्रता निहित है - जैसे अस्तित्व में इबादत हो और इबादत में उसका अर्थ. हुसैन ने स्वयं लिखा है: ‘लोगों की आम आदत है कि लालटेन को देखने के बजाय चारों ओर उसकी मौजूदगी की वजह ढूंढ़ते हैं. वह जल रही तो रात, वह बुझी है तो दिन. यह कोई नहीं देखता कि लालटेन कितनी नाज़-ओ-आद से जम़ीन पर टिकी है. उसके पेंदे गोलाई में उठती दो सन्तुलित बांहों के बीच धरी शीशे की चिमनी... गुम्बद की गोलाई और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का सिमटा हुआ उजाला.’

निर्मल जी लक्ष्य करते हैं कि ‘यह हुसैन हैं जो सिमटे हुए उजाले में सारा ब्रह्माण्ड देख लेते हैं उनके लिए सुन्दरता उसमें नहीं है जिसका कोई प्रयोजन है, वह खुद उसके होने में है, चाहे वह आकाश में उड़ते हुए पहाड़ ले जाते हनुमान हों या दो पहियों की साइकिल पर सवार हुसैन. साइकिल का जादू क्या पहाड़ की भव्‍यता से कम है? राममनोहर लोहिया ने हुसैन को रामायण और महाभारत को चित्रित करने के लिए प्रेरित किया यह बताने के बाद निर्मल जी जोड़ते हैं: ‘क्या यह अजीब विडम्बना नहीं है कि हुसैन के भीतर पहली बार जिस व्यक्ति ने भारतीय संस्कृति के महाकाव्यों - रामायण और महाभारत - के प्रति प्रेम जगाया था, वह एक नास्तिक समाजवादी हिन्दू था - उनसे कितना अलग जिन्होंने कुछ वर्षों बाद उसी ‘संस्कृति’ के नाम पर अहमदाबाद की गुफा में उनके चित्रों को तहस-नहस कर डाला था?’