कविता और इतिहास

कविता और इतिहास के सम्बन्ध में विचार करने पर पहली बात जो ध्यान में आती है वह उनकी कुछ अर्थों में समानता की है. दोनों ही अपने समय, समाज, मानवीय अनुभव, सामुदायिकता आदि के गल्प रचते हैं और दोनों के केन्द्र में मनुष्य होता है. इतिहास तो औरों का भी होता है और कविता भी कई बार मनुष्य से इतर को सम्बोधित करती है पर दोनों अपने लक्ष्य और व्यवहार में मनुष्य-केन्द्रित ही होते हैं. दोनों भाषा में घटते हैं यानी भाषा में लिखे जाते हैं पर वह कविता में सिर्फ़ माध्यम नहीं कुछ और अनुभव भी होती है जबकि भाषा इतिहास-लेखन में माध्यम होती है, प्रायः उससे अधिक कुछ नहीं.

कविता इतिहास को हिसाब में लेती है, इतिहास भी यदा-कदा कविता को हिसाब में लेता है, ख़ास कर जब उसे अन्य साक्ष्य उपलब्ध न हों. कविता का प्रभाव इतिहास पर बहुत कम, न के बराबर पड़ता है जबकि वह अक्सर ही इतिहास से प्रभावित होती है. हाल तक इतिहास सत्ताओं, राजवंशों, युद्धों, राज्य-साम्राज्य आदि के बखान और विश्लेषण पर केन्द्रित रहा. जबकि कविता में साधारण जीवन की केन्द्रीयता, आधुनिक काल में, एक शताब्दी पुरानी है. कह सकते हैं कि साधारण मनुष्य इतिहास में आने से बहुत पहले कविता में आ गया. जबकि सबआल्टर्न इतिहास-लेखन हाल की घटना है. कविता अपने गल्प में विशेषीकरण का आग्रह करती है जबकि इतिहास सामान्यीकरण का. कविता अपनी गल्पता सहज स्वीकार करती है जबकि इतिहास को अपनी गल्पता स्वीकार करने में हमेशा बहुत संकोच होता रहा है. दोनों में ही ब्यौरे दृष्टि-विशेष के आधार पर चुने जाते हैं - दृष्टिहीन कविता या इतिहास सम्भव नहीं हैं. कई बार कविता को ‘दूसरा इतिहास’ कहा जा सकता है पर इतिहास को ‘दूसरी कविता’ कहने की कोशिश शायद ही किसी ने की हो. इतिहास में कविता की तुलना में आत्मविश्वास अधिक होता है और आत्मसंशय अक्सर बहुत कम.

इतिहास अधिकतर बाहरी संसार, उसमें सक्रिय राजनीति, आर्थिकी, सत्ता और अन्य सामाजिक वृत्तियों पर एकाग्र होता है जबकि कविता बाहरी और अन्दरूनी संसारों में समान रूप से विचरण करती है. इतिहास में निजी का ख़ास महत्व नहीं लेकिन कविता में निजी महत्वपूर्ण होता है. वह निजी और सामाजिक के द्वैत को ध्वस्त करती है. इतिहास समय तक सीमित रहता है जबकि कविता समयातीत को भी छूने, सम्बोधित करने की चेष्टा करती है. ऐसा भी होता है कि जो लोग, जो आवाज़ें, सामाजिकता और निजीपन के अनेक रूप इतिहास में जगह नहीं पाते, उन्हें कविता में जगह मिलती है. कविता के लिए शायद इतिहास से अधिक बड़ा सृजनस्रोत परम्परा होती है. परम्परा में इतिहास शामिल होता है पर वह अधिक व्यापक स्मृति-क्षेत्र को समाहित करती है. उसमें जातीय स्मृति की जो सक्रियता होती है, वह इतिहास में नहीं होती.

परम्परा और इतिहास में एक मौलिक अन्तर यह है कि परम्परा यह नहीं कहती कि ‘ऐसा हुआ था’ बल्कि यह कि ‘ऐसा होता आया है.’ परम्परा अपने को निरन्तर पुनर्नवा करती रहती है जबकि इतिहास का ऐसा पुनर्नवीकरण कम ही होता है. हिन्दी में भी कविता ने इतिहास से कम, परम्परा से अधिक ग्रहण किया है. उसने जिन आख्यानों, प्रसंगों, चरितनायकों आदि को चुना है वे परम्परा से आये हैं, इतिहास से बहुत कम. यह संयोग नहीं है कि हिन्दी में ऐतिहासिक उपन्यासों और प्रबन्ध-काव्यों की सम्पदा अधिक नहीं है.

इतिहास सत्ता से आक्रान्त होता है और प्रायः हमें भी सत्ता से आक्रान्त करता है: कविता, इसके बरक़्स, सत्ता के आतंक से मुक्त होती है और हमें भी मुक्त करती है. इतिहास समवर्ती सत्ता का प्रतिरोध वैसे स्पष्ट ढंग से नहीं करता जैसे कविता करती है. हमारे समय में विचारधाराओं का तीख़ा द्वन्द्व होता रहा है और कविता और इतिहास इस द्वन्द्व से अछूते नहीं रहे हैं. सत्ताएं अक्सर इतिहास में हस्तक्षेप कर उसकी अपने अनुकूल व्याख्याएं करती-कराती हैं और वैकल्पिक इतिहास लिखे जाने का दबाव बनाती हैं. कविता का सामाजिक प्रभाव और उसकी सामाजिक उपस्थिति कम होने के कारण वे कविता में ऐसा हस्तक्षेप कम करती हैं.

विनोबा भावे ने कहा था कि हम हमेशा यह कहते हैं कि अकबर के समय या युग में तुलसीदास हुए, यह क्यों नहीं कहते कि तुलसीदास के समय में अकबर हुए. यह याद करना इस प्रसंग में ज़रूरी है कि तुलसीदास ने रामराज्य के रूप में एक तरह का प्रतिराज्य प्रस्तावित किया था जिसे सदियों बाद महात्मा गांधी ने औपनिवेशिक राज्य के विकल्प के रूप में प्रासंगिकता दी. कई बार कविता में जो होता है, वह इतिहास के ध्यान में से छूट जाता है. इतिहास में भी ऐसा कुछ दर्ज़ होता है जो कविता हिसाब में नहीं ले पाती.

किसी नवाचारी को ऐसा इतिहास लिखने की चेष्टा करनी चाहिये जिसमें कविता को अपने समय और समाज का पर्याप्त और प्रामाणिक साक्ष्य माना गया हो. एक सूक्ति यह भी हो सकती है: कविता छूट गया इतिहास हो सकती है और इतिहास अधूरी रहने को अभिशप्त कविता.

एक वीथिकाकार के संस्मरण

घरबन्दी का एक लाभ यह है कि ऐसी कई पुस्तकें जो अधपढ़ी या अनपढ़ी छूट गयी थीं उन्हें पढ़ पा रहा हूं. उनमें से एक है जर्मनी से अंग्रेज़ी में प्रकाशित अमरीकी वीथिकाकार विलियम काप्ले की छोटी सी संस्मरण-पुस्तक - ‘रिफ़्लेशक्शन ऑन ए पास्ट लाइफ़’. उनकी कला-वीथिका कैसे बनी, कैसे तब के कुछ मूर्धन्यों का उन्हें सहयोग मिला और कैसे वह वित्तीय विफलता के बाद बन्द हुई इसका बहुत रोचक वृत्तान्त है. रैने माग्रीत के सिलसिले में काप्ले कहते हैं: ‘कलावीथिका होने की बड़ी बात यह है कि आप ऐसे कमरों में रहते हैं जहां चित्र लगे हैं. चित्र त्वचा के अन्दर अचेत प्रक्रिया से प्रवेश कर जाते हैं. आंखों का इससे कुछ लेना-देना नहीं. माग्रीत इसका सबसे अच्छा उदाहरण हैं. उनके चित्रों ने मुझे यह सिखाया. वे देखे जाने के बजाय अन्य कारणों से उपजे हैं. उनके बिम्ब बस हुए हैं. पैर के अंगूठे जूते हो गये हैं, स्तन नाइटगाउन को चीरकर निकल आये हैं, पत्तियाँ चिड़ियां हो गयी हैं, हम कभी भी माग्रीत के आश्चर्यों से चकित नहीं होते.’

रावर्तों माता के बारे में (जो एक बार ललित कला अकादेमी की त्रैवार्षिकी में भाग लेने दिल्ली आये थे) काप्ले कहते हैं: ‘माता हमेशा सारे यूरोप में मकान खरीदने के लिए चित्रों का व्यापार करते हैं, सूटों और नुकीले इतालवी जूतों के लिए. वे अपने कई बच्चों का पालन करते हैं... मुझे वे विस्मित करते हैं किसी भी बहाने से अपना ब्रश छोड़ने की क्षमता से. उन्हें अवरुद्ध करने जैसी कोई चीज़ नहीं होती. वे बातचीत और लोगों को पसन्द करते हैं जितना अपनी निजता भी.’

मैक्स अर्नस्ट की प्रदर्शनी के दौरान हुई एक घटना काप्ले बताते हैं: ‘नौ या दस साल का एक लड़का भटकता हुआ वीथिका में आया और लम्बे समय चित्र देखता रहा. अगले दिन वह फिर अपने एक दोस्त के साथ आया और वे देर तक चित्र देखते रहे. फिर वे चार हो गये. उनकी संख्या अगले दिन दूनी हो गयी. वे न तो हंसते थे, न मज़ाक बनाते थे. वे मैक्स अर्नस्ट की फैंटसियों को चुपचाप, गंभीरता से, उनसे गहरे उद्वेलित होते हुए देखते रहते. हमने जिस सफलता का सपना देखा था वे उसका लघु संस्करण थे.’

अपनी पुस्तक का समापन काप्ले इस सीधी-सादी पर मार्मिक पंक्ति से करते हैं: अतीत हमेशा सुन्दर समय होता है.

नहीं हो पाया

चारेक बरस पहले उत्तर प्रदेश में, विशेषतः उसके बनारस, इलाहाबाद, लखनऊ, गोरखपुर, अलीगढ़, मथुरा, अमेठी आदि में स्वतंत्रता-समता-न्याय के लिए साहित्य-ज्योति जगाने के उद्देश्य से आयोजनों की एक श्रृंखला सोची थी. नाम भी रख लिये थे : कबीर चौपाल, तुलसी चौरा, सूर मढ़िया, जायसी संगत, प्रसाद विभावरी, निराला शक्ति, महादेवी आवाज़, प्रेमचन्द मशाल, मजाज़ आवारगी, ज़िक्रे जिगर, कैफ़ी सोहबत. ख़ैर साधन नहीं जुटे. जिन सहयोगियों की सूची बनायी थी उनमें से मुद्राराक्षस और दूधनाथ सिंह हम बीच दिवंगत हो गये.