लॉकडाउन में कविता

मलयालम कवि के सच्चिदानन्दन और अमरीका में बसी निशि चावला ने ‘सिंगिंग इन द डार्क’ शीर्षक से 100 से अधिक कवियों की कोरोना प्रकोप के दौरान लिखी गयी मूल अंग्रेज़ी और अंग्रेज़ी में अनूदित कविताओं का एक विश्व संचयन संपादित किया है. पेंगुइन द्वारा प्रकाशित इस संचयन में हिन्दी से विष्णु नागर, अनामिका, मंगलेश डबराल, सविता सिंह आदि की कविताएं शामिल की गयी हैं. साढ़े तीन सौ पृष्ठों की पुस्तक हार्ड कवर के साथ 500 रुपये दाम की है.

कभी-कभार

हिब्रू कवि अमीर ओर की कविता: सूर्योदय के लिए सात पंक्तियां

और उस सबके बावजूद - जीवन, सबके बावजूद - प्रेम.

हम सचमुच देखेंगे हृदय का दरवाज़ा

खुलते हुए उम्मीद की एक दुनिया पर,

हम उसकी राहों पर फिर चलेंगे, उसकी सुन्दरता पर चकित होते हुए.

हमारी भावनाएं स्पष्ट और शान्तिपूर्ण.

हम सचमुच देखेंगे सुबह होते हुए

मनुष्य का सूर्योदय आते हुए.

मेसेडोनिया के कवि निकोला माज़िरोव की कविता: ख़ामोशी

दुनिया में कोई ख़ामोशी नहीं है.

सन्तों ने उसे गढ़ा है.

सुनने घोड़ों को हर दिन.

और विंग्स से गिरते पंखों को.

पोलिश कवि नार्बर्त गोरा की कविता है:

आकाश इतना साफ़ है

जितनी झील की सतह,

जब लोग बन्द हैं

अपने घरों में.

एक अप्रत्याशित विचार दाखि़ल हुआ

मन के क्षितिज पर

कौन सचमुच

वाइरस है यहां?

अन्तिम अरण्यसे

कुछ बरस पहले पुरुषोत्तम अग्रवाल के एक टीवी कार्यक्रम के अन्तर्गत शिमला में हमने निर्मल वर्मा के उपन्यास ‘अन्तिम अरण्य’ पर बात की थी. उस समय उस उपन्यास से कुछ उद्धरण एकत्र किये थे. आज उनकी याद आयी और वे मिल गये:

‘क्या कभी-कभी घर आदमियों की जगह नहीं ले लेते?’

‘काल्पनिक ही हो, तो उससे क्या अन्तर पड़ता है… है तो वह उनकी ही कथा!’

‘एक दिन कोई आता है, सब बुहारकर ले जाता है. कुछ भी बचा नहीं रहता. बढ़ती उम्र के ख़ाली पिछवाड़े...’

‘दुनिया के आदमी थे, लेकिन उसके साथ नहीं थे - अपनी दुनिया अपने साथ लेकर चलते थे.’

‘आदमी की काया उसे छोड़कर चली जाती है तो इसका मतलब यह नहीं कि वह अपने घर को छोड़ देता है, जहां उसके प्राण बसे हैं.’

‘यातना भी एक यात्रा है.’

‘लौटना क्यों ज़रूरी है?’

‘तुम इस जगह तब आये हो, जब सब कुछ बीत चुका है.’

‘ज्ञान जब आता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है... तब आदमी उसके क़ाबिल नहीं रहता. वह अपने चिमटे से सुख नहीं, उसकी राख उठाने आता है...’

‘जब कोई एक बार घर छोड़ देता है, तो वापस लौटना आसान नहीं होता.’

‘क्या उसी की थाह पाने लोग इतने ऊपर चले आते हैं, जहां खड़े होकर अपनी बीती हुई ज़िन्दगी के खंडहरों को देख सकें?’

‘जहां कुछ दिखायी नहीं देता, उसी के भीतर कुछ हो रहा है, नार्मल होना देह की आकांक्षा है, असलियत नहीं.’

‘जो आदमी पैदा होता है, वह क्या वही होता है जो मरता है? नहीं बाबूजी... वह कोई दूसरा होता है जिसके लिए हम रोते हैं.’

‘वहां समझना इतना ज़रूरी नहीं है, जितना सुनना, क्योंकि जब हम किसी को इतना कम जानते हों तब शब्दों के अर्थ इतना महत्व नहीं रखते, जितनी उनकी आवाज़.’

‘हमारा अतीत कोई एक जगह ठहरा हुआ स्टेशन नहीं है, जो एक बार गुज़रने के बाद ग़ायब हो जाता है, वह यात्रा के दौरान हमेशा अपने को अलग-अलग झरोखों से दिखाता रहता है.’

‘सुखी दिनों में हमें अनिष्ट की छाया सबसे साफ़ दिखायी देती है जैसे हमें विश्वास न हो कि हम सुख के लिए बने हैं. हम उसे छूते हुए भी डरते हैं कि हमारे स्पर्श से वह मैला न हो जाए और इस डर से उसे भी खो देते हैं, जो विधाता ने हमारे हिस्से के लिए रखा था. दुख से बचना मुश्किल है, पर सुख को खो देना कितना आसान है.’

‘हम जीते नहीं, उसकी कापी करते हैं, जो कहीं पहले से जिया जा चुका है.’

‘घर का कोई आदमी घर थोड़े ही छोड़ देता है.’

‘क्या उनकी कोई ज़िम्मेवारी नहीं, जो अपने पीछे दूसरों को छोड़ जाते हैं?’

‘रिश्ते होते नहीं बनते हैं... जब तक टीस नहीं उठती, पता नहीं चलता वे कितने पक गये हैं’

‘क्या यह ठीक है, इस तरह अपने घर के आगे चोरों की तरह खड़े होना, खुद अपने को घर की आवाज़ों को सुनना? इस उम्र में क्या आदमी इतना शक्की हो जाता है कि स्वयं अपनी दीवारों पर सन्देह करने लगता है?’

‘जिसे हम अपनी ज़िन्दगी, अपना विगत और अपना अतीत कहते हैं वह चाहे कितना यातनापूर्ण क्यों न रहा हो, उससे हमें शान्ति मिलती है. वह चाहे कितना ऊबड़-खाबड़ क्यों न रहा हो, उसमें हम एक संगति देखते हैं. जीवन के तमाम अनुभव एक महीन धागे में बिंधे जान पड़ते हैं.’

‘जितनी आसानी से युवा लोग आत्महत्या कर लेते हैं, बूढ़े लोग नहीं... वे जीने के इतने अभ्यस्त हो चुके होते हैं कि उससे बाहर निकलना दूभर जान पड़ता है.’

‘भूकम्प, बाढ़ महामारी... अगर न आयें तो हमारे अधूरे काम कभी पूरे न हों.’

‘जब कुछ लोग कहते हैं कि वे एक दिन के बाद दूसरे दिन में रहते हैं तो शायद असल में उनका मतलब होता है कि वे एक ही दिन में रहते हैं जो चलता रहता है.’

‘कभी-कभी कितनी छोटी सी चीज़ आदमी की ज़िन्दगी बदल देती है.’

‘क्या कोई अपने तन की त्वचा और मन के मैल से बाहर आ सकता है? कहीं भी जाओ, ये दोनों चीज़ें पीछा नहीं छोड़तीं.’

‘यहां आने का मतलब एक दुनिया को छोड़कर दूसरी दुनिया में जाना नहीं था, वह अपनी ही दुनिया में अपने को दुबारा पाने का प्रयत्न था....’

‘हम सब कहीं-न-कहीं उन जगहों पर बैठे थे, जिन पर हमारा कोई अधिकार नहीं.’