पिछले लगभग नौ महीनों से हम कोरोना महामारी के प्रकोप से इस क़दर ग्रस्त हैं कि जितनी तेज़ी से यह बीमारी फैल रही है, उससे कई गुना तेज़ी से उसका भय फैल गया है. हम ज़्यादातर कोरोना बीमारी से नहीं उसके भय से ग्रस्त हैं. तरह-तरह की सूचनाएं, हिदायतें, सावधानियों की सूचियां दी जा रही हैं और हममें से अधिकांश लोग, इन सूचनाओं की असलियत जाने बग़ैर, इनको सही या प्रामाणिक मानते जा रहे हैं. विकासशील समाज अध्ययन पीठ वाणी प्रकाशन के माध्यम से समय, समाज और संस्कृति पर केन्द्रित एक अनोखी वैचारिक पत्रिका ‘प्रतिमान’ अभय कुमार दुबे के सम्पादन में निकालती है. इसका पन्द्रहवां अंक हाल ही में प्रकाशित हुआ है. इस पत्रिका ने समझ, विश्लेषण, विचार आदि का जो प्रतिमान स्वयं अपने लिए निर्धारित किया है वह लगातार ऊंचा होता जाता है. ताज़ा अंक उसका, फिर, प्रमाण है.

‘भय की महामारी’ व्यापक शीर्षक के अन्तर्गत दो महत्वपूर्ण निबन्ध इसमें हैं - मदन सोनी का वैचारिक पर ‘कुछ असमाप्य गद्य’ और ‘कोरोना काल’ शीर्षक से प्रमोद रंजन का प्रामाणिक सन्दर्भों, तथ्यों आदि के विशद साक्ष्य से इस महामारी और उसके परिणामों का अत्यन्त तथ्यपरक विश्लेषण करता हुआ लम्बा परिनिबन्ध. अपने सम्पादकीय में अभय जी ने नोट किया है कि ‘रोजमर्रा की ज़िन्दगी पर ज़बरदस्त बंदिश लगाने वाले राजकीय आदेशों का ऐसा प्रश्नहीन अनुपालन पहले कभी नहीं देखा गया था. एकबारगी ऐसा लगा कि शायद हमारे देश ने एक आज्ञापालक समाज बनने की तरफ़ क़दम बढ़ा दिया है.’ वे यह भी कहते हैं कि ‘कोरोना ने लोकतंत्र, आज़ादी, सामुदायिकता, राज्य और समाज के संस्थागत विन्यास, व्यवस्था में ग़रीब और वंचित की जगह, इंसान के इंसान से रिश्ते और मनुष्य के बनाये संसार की आन्तरिक दुर्बलता पर बेरहम रोशनी फेंकी है.’ भारत में ‘करोड़ों प्रवासी मज़दूरों द्वारा चलाये गये स्वयं को बचाने के अहर्निश अभियान’ को वे ‘करुणा और संघर्ष की किसी पौराणिक महागाथा’ की संज्ञा देते हैं.

मदन सोनी की स्थापना है कि ‘कोरोना के रूप में आया संकट जिन अन्यान्य अर्थों में अभूतपूर्व है उनमें एक सबसे महत्वपूर्ण यह है कि इसके साथ मनुष्य का सामना, पिछले लगभग सौ वर्ष बाद, किसी मानवीय या अतिमानवीय नहीं, बल्कि एक अ-मानवीय, या अ-जैविक अन्य (अदर) से हो रहा है. (दूसरा विश्वयुद्ध या हमारे देश का विभाजन, जो इससे भी भीषण और जान के साथ-साथ माल की तबाही के कारण बने थे, उनमें एक-दूसरे के सामने ‘अन्य’ के रूप में मनुष्य ही थे). वे मानते हैं कि ‘इस महामारी ने सिर्फ़ इंसानी काया की प्रतिरक्षा-प्रणाली को ही नहीं बल्कि उससे अधिक हमारे समूचे ज्ञानात्मक निकाय की उस प्रतिरक्षा-प्रणाली को प्रश्नांकित किया है जो एक अननुमेय, अप्रत्याशित के समक्ष निहायत ही लाचार होकर रह गयी लगती है.’

मेरे जाने प्रमोद रंजन ने अपने परिनिबन्ध में जो सामग्री एकत्र की है, उसका विश्लेषण किया है, जो सम्पुष्ट तथ्य-संग्रह किया और अनेक अदृश्य पर वास्तविक फलितार्थों की प्रस्तुति की है, वह हिन्दी या भारतीय भाषाओं बल्कि शायद अंग्रेज़ी में भी अभूतपूर्व है. उनके परिनिबंध के उपशीर्षकों की सूची यह बताने के लिए काफ़ी है कि उनका अध्ययन कितना विशद और प्रश्नवाची है: ‘कोरोना: एक हालिया इतिहास’, ‘कोविड-19 के आंकड़े’, ‘मरीज और मृतक की पहचान’, ‘पद्धति के अन्तर्निहित कारण’, ‘भारत में डब्ल्यूएचओ के दिशा-निर्देश’, ‘कोविड-19 कितना जानलेवा और पीड़ादायक है?’, ‘कितनी मौतें कोवड-19 से और कितनी प्रतिबंधों से?’, ‘शव-परीक्षा पर रोक: विज्ञान पर लॉकडाउन’, ‘शव-परीक्षा न होने के क्या कारण हैं?’, ‘बीमारियों के महासागर में कोविड-19 की जगह’, ‘भारत में बीमारियां’, ‘अतिरिक्त मौतें और व्याख्या की राजनीति’, ‘अनुपातहीन भय के कथासूत्र’, ‘भयादोहन के इतिहास की एक झलक’, ‘कैसे शुरू हुआ भय का खेल’, ‘विज्ञान के नाम पर सांख्यिकी के करतब’, ‘अलगोरिद्म, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और प्रौद्योगिकी के बड़े खिलाड़ी’, ‘परम्परागत समाचार-माध्यमों पर पहरा और क़ानून के जरिये उत्पीड़न’ और ‘किताब पर भी प्रतिबन्ध’.

प्रमोद रंजन अपने परिनिबन्ध का समापन करते हुए कहते हैं - ‘आर्टिफ़िशियल इंटेलीजेंस और सांख्यिकी-आधारित मॉडलिंग ने हमें ऐसे अंधकार में धकेल दिया है जिससे निकलने में शायद वर्षों लग जायेंगे. यह अनुपातहीन भय मनुष्य पर प्रौद्योगिकी की जीत के बढ़ते क़दमों का भी प्रमाण है, जिनका लाभ इनसे जुड़ी लोभी और सनकी संस्थाएं उठा रही हैं. दिन-ब-दिन गहरे होते जा रहे इस अंधकार से निकलने का एक रास्ता यह है कि हम असंवेदनशील-अविवेकी विशाल पूंजी की गुलाम कृत्रिम बुद्धि और कथित विज्ञान की जगह सहस्राब्दियों के दौरान विकसित हुए मानवीय विवेक की संवेदनशीलता को प्राथमिकता दें और मनुष्य को गुलाम बनाने वाली प्रविधियों के खि़लाफ़, चाहे वे कितने ही धवल वस्त्रों में क्यों न आयें, असहमति में हाथ उठा दें.’

दोनों ही निबन्ध ऐसे हैं कि उन्हें एक पुस्तिका में अलग से प्रकाशित कर उसका व्यापक प्रसार होना चाहिये ताकि वे हमें भय की गुलामी से मुक्त कर विचार और संवेदना, प्रश्नांकन और ईमानदार सन्देह के परिसर में वापस ले जा सकें.

गुरु-शिष्य

इधर कुछ वरिष्ठ अध्यापकों के सेवानिवृत्त होने पर उनके कुछ छात्रों द्वारा उनसे मिली शिक्षा, समझ आदि का जो गुणगान फ़ेसबुक पर देखा तो लगा कि भले हमारे यहां गुरु-शिष्य परम्परा, कितनी ही शिथिल क्यों न हो गयी हो, पूरी तरह से ग़ायब नहीं हुई है. फ़ेसबुक जैसा माध्यम सुलभ होने कारण यह सम्भव हो पा रहा है कि हम इन अध्यापकों के अवदान का उनके छात्रों द्वारा आकलन, उनका कृतज्ञता-ज्ञापन आदि जान पाते हैं. कई बार हमें ऐसे अध्यापकों का भी पता चलता है जो कहीं दूरदराज़ के इलाकों में किसी अप्रसिद्ध शिक्षा-संस्थान में सक्रिय रहे आये हैं और जिनकी शिक्षा को उनके छात्र कृतज्ञतापूर्वक आलोकन मानते-समझते हैं.

चूंकि इधर शिक्षा को उपकरणात्मक करने और मानने की ज़हनियत व्यापक हुई है, इस संबंध का दूसरा पक्ष भी शायद है. छात्र शिक्षकों की चापलूसी, भक्ति आदि सार्वजनिक रूप से कर उन्हें मिल सकने वाली नौकरी में ऐसे शिक्षकों की कृपादृष्टि बनाये रखना चाहते हैं. अकसर ऐसे शिक्षक भी अपने छात्रों का, इस सन्दर्भ में, विशेष ध्यान रखते हैं.

पिछले कई दशकों से भाषायी विभागों में नियुक्तियों का एक आधार वैचारिक वफ़ादारी रही है. उस कारण नौकरी पाये युवतर अध्यापक फिर अपने गुरु के जीवन-भर ध्वजावाहक बने रहते हैं. इसका लाभ उठाने या शोषण करने में हमारे अनेक अध्यापक-आलोचक पीछे नहीं रहे हैं. यह भी साफ़ देखा जा सकता है कि कई बार इसी वैचारिक वफ़ादारी के कारण सुपात्रों की अवहेलना हुई है और अज्ञातकुलशील नौकरी पा गये हैं. इस प्रथा ने वर्तमान निज़ाम में पलटा खाकर एक बेहद संकीर्ण विचारधारा को सत्तारूढ़ कर दिया है और स्थिति अब नित-नये विद्रूप गढ़ रही है.