साल 2020 में संसद केवल 33 दिन ही चली. आजादी के शुरुआती दशकों में हर वर्ष यह करीब सवा सौ दिन चला करती थी. पिछले कुछ समय से यह साल में लगभग 70 दिन चलती रही है. अगर पिछली यानी सोलहवीं लोक सभा की बात करें तो इसमें सिर्फ 331 दिन ही काम हुआ. अगर औसत निकालें तो यह करीब 67 दिन प्रति वर्ष होता है. संसद से जुड़े मसलों की जानकारी रखने वालों को यह भी कम लगता था. लेकिन इस बार कुछ और भी हुआ – केंद्र सरकार ने संसद के शीत सत्र को ही रद्द कर दिया. यानी कि अब संसद जनवरी के अंत में बजट सत्र के दौरान ही फिर से चलेगी.

हालांकि ऐसा जिस वजह से किया गया वह भी अभूतपूर्व है. दुनिया ने कोविड-19 जैसी महामारी पिछले सौ सालों में नहीं देखी थी. इसके चलते एक लंबे समय के लिए पूरा देश और ज्यादातर दुनिया अपने-अपने घरों में बंद हो गई. लेकिन क्या इसकी वजह से अब संसद के शीत सत्र को रद्द करना जायज़ है? संविधान का अनुच्छेद 85 कहता है कि संसद के दो सत्रों के बीच में छह महीने से ज्यादा का अंतराल नहीं हो सकता है. लेकिन वह यह नहीं कहता कि संसद को कम से कम कितने दिन चलना चाहिए. इस लिहाज से जो हुआ वह असंवैधानिक नहीं है. लेकिन परंपरा कहती है कि भारत में हर साल संसद के तीन सत्र – बजट सत्र, मानसून सत्र और शीत सत्र – होते हैं. लोकतंत्र में परंपराओं का महत्व संवैधानिक व्यवस्थाओं से कम नहीं होता. उदाहरण के तौर पर यूनाइटेड किंगडम का नाम लिया जा सकता है जहां का लोकतंत्र एक तरह से परंपराओं पर ही टिका हुआ है.

मोदी सरकार का कहना है कि इस मामले में ज्यादातर राजनीतिक दल एकमत थे कि कोविड-19 की वजह से संसद के शीत सत्र को रद्द कर देना चाहिए. मीडिया के मुताबिक लोक सभा में विपक्ष के नेता अधीर रंजन चौधरी को लिखे एक पत्र में संसदीय मामलों के केंद्रीय मत्री प्रह्लाद पटेल का कहना था कि सभी राजनीतिक दल यह मानते थे कि कोरोना वायरस की रोकथाम करने के लिए संसद के शीत सत्र को रद्द कर सीधे बजट सत्र को बुलाना ज्यादा सही होगा.

इसमें अचरज जैसी कोई बात नहीं है. पिछले काफी समय से संसद जिन कुछ मसलों पर एकमत या भारी बहुमत से सहमत होती दिखती है उनमें से एक इसके सदस्यों की तनख्वाह बढ़ाने का मुद्दा है और दूसरा इसके वर्तमान सदस्यों के हितों के खिलाफ जाने वाला महिला आरक्षण का मुद्दा. लेकिन यहां सवाल यह पूछा जा सकता है कि अगर सितंबर 2020 में संसद के मानसून सत्र को तब बुलाया जा सकता था जब हर रोज 95000 से ज्यादा लोग कोरोना संक्रमित हो रहे थे, तो अब तो यह आंकड़ा काफी कम है. इस समय करीब 20 हजार लोग हर रोज संक्रमित हो रहे हैं जो अपने आप में कोई छोटा आंकड़ा नहीं है, लेकिन सितंबर के आंकड़े के मुकाबले तो यह काफी छोटा है.

इसके अलावा अगर ब्रिटेन की संसद – हाउस ऑफ कॉमंस – सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों के पालन और कुछ सदस्यों की ऑनलाइन उपस्थिति के साथ काम कर सकती है तो भारतीय संसद ऐसा क्यों नहीं कर सकती? हाउस ऑफ कॉमंस ने सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों का पालन करने के लिए यह अस्थायी नियम बनाया कि उसके चैंबर में एक समय पर पचास से ज्यादा संसद सदस्य नहीं हो सकते हैं. उसने कोरोना महामारी को ध्यान में रखते हुए सदन में होने वाली वोटिंग के तरीके में भी बदलाव किया. ऐसे ही कुछ बदलावों के साथ क्या भारतीय संसद काम नहीं कर सकती थी?

हाल ही में बिहार में चुनाव और मध्य प्रदेश में उपचुनाव हुए. हैदराबाद और जम्मू-कश्मीर सहित कई राज्यों में स्थानीय निकायों के चुनाव भी हुए. पश्चिम बंगाल में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों की तैयारी भी ज़ोर-शोर से चल रही हैं. देश के जिन राज्यों में चल सकती थीं वहां जमकर सरकारें तोड़ने-बचाने की कवायदें भी जमकर चलीं, आगे भी चलती रहेंगीं. और इन सभी क्रिया-कलापों में देश के सबसे बड़े नेताओं ने कोविड के बारे में ज्यादा सोचे बिना बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. इसके एक उदाहरण के तौर पर बिहार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुनावी सभाओं का जिक्र किया जा सकता है जिनमें सोशल डिस्टेंसिंग नाम की चिड़िया को ढूंढ़ पाना असंभव था. जब ऐसे कार्यों के लिए आम से लेकर सबसे खास व्यक्ति तक की सुरक्षा सुनिश्चित या दरकिनार की जा सकती है तो संसद में देश के लिए कुछ दिन काम करना इतनी बड़ी समस्या क्यों होनी चाहिए?

केंद्र और राज्य की सरकारें अब लोगों को सावधानी के साथ अपने-अपने काम पर जाने के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं. इन सरकारों के विभिन्न विभाग भी अपना-अपना काम कर रहे हैं. इनमें से कइयों ने अपना काम कभी रोका ही नहीं, बल्कि पिछले कुछ दिनों में पहले से कुछ ज्यादा ही किया. पुलिस, चिकित्सा, सफाई और परिवहन जैसे विभागों में काम करने वालों को देश आज अपना हीरो मान रहा है और ताली-थाली बजाकर उनका सम्मान और उत्साह बढ़ा रहा है. ऐसे में देश की सर्वोच्च संस्था में काम करने वाले सबसे शक्तिशाली लोग संसद को बंद करके किस तरह का संदेश दे रहे हैं? क्या यह कि 130 करोड़ लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार लोग अपनी सुरक्षा का भी ठीक से इंतज़ाम नहीं कर सकते ताकि देश को लोकतांत्रिक और सुरक्षित तरीके से चलाते रहा जा सके?

हमारे सांसदों को तनख्वाह ठीक मिलती है लेकिन उतनी ज्यादा भी नहीं मिलती. इसकी भरपायी घर, दफ्तर, सुरक्षा, सहायकों, सस्ती या मुफ्त यात्रा आदि सुविधाओं से हो जाती है. देश में इस वक्त लाखों लोगों के पास रोज़गार नहीं है. अपना व्यापार करने वाले करोड़ों लोग तमाम तरह की मुश्किलों से गुज़र रहे हैं. और नौकरी करने वालों में से कइयों को पिछले कुछ समय से आधी-अधूरी तनख्वाहें ही मिल पा रही हैं. ऐसे में केवल 33 दिन ही संसद में जाकर पूरी तनख्वाह लेने वाले हमारे सांसद किस तरह का संदेश दे रहे हैं. क्या यह थोड़ा अजीब नहीं है कि जब लाखों किसान कंपकंपाती सर्दी में संसद में बने एक कानून के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं तब संसद हर मर्यादा और दायरे के परे जाकर उनके बारे में विचार करने के बजाय ऐसा ही करके छुट्टी पर चली गई है. क्या यह अच्छा नहीं होता कि एक महीने से सड़कों पर मौजूद किसानों और उनकी मांगों के बारे में संसद में जल्द से जल्द चर्चा होती, और चर्चा होती उन तीन कृषि कानूनों पर भी जिन्हें सबसे पहले कोविड महामारी के सबसे बुरे दौर में एक अध्यादेश के रूप में लाया गया था और फिर संसद में बिना चर्चा और मतदान के पारित कर दिया गया.