दिल्ली से लगती हरियाणा और पंजाब की सीमा पर बीते 25 दिनों से लाखों की संख्या में किसान आंदोलन कर रहे हैं. किसानों और सरकार के बीच यह जंग तब शुरू हुई थी, जब केंद्र की मोदी सरकार नए कृषि कानून लेकर आयी. किसान इस कानून को वापस लेने की मांग कर रहे हैं. इसके अलावा किसानों की तीन और मांगें भी हैं. ये तीन मांगे - एमएसपी को कानूनी जामा पहनाया जाए, एनसीआर में प्रदूषण रोकने के लिए बने कानून के तहत कार्रवाई के दायरे से किसानों को बाहर रखा जाए और विद्युत संशोधन विधेयक 2020 के मसौदे को मोदी सरकार वापस ले. हालांकि, इन तीन मांगों में दोनों पक्षों के बीच सबसे प्रमुख मुद्दा न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी की गारंटी का है. किसान कह रहे हैं कि उन्हें मोदी सरकार से एमएसपी की गारंटी चाहिए, सरकार ने उनसे कह दिया है कि वह एमएसपी पर लिखित आश्वासन देने को तैयार है. लेकिन इसके बावजूद किसान मानने को तैयार नहीं हैं, वे एमएसपी की गारंटी को लेकर नए कानून की मांग कर रहे हैं. आईये जानते हैं कि क्यों किसान एमएसपी को लेकर कानूनी गारंटी मांग रहे हैं और इससे कम पर पीछे हटने को क्यों तैयार नहीं हैं?

दरअसल, एमएसपी पर सरकार का कहना है कि वह इसकी पहले से चली आ रही व्यवस्था को खत्म नहीं करेगी और इसे पहले की तरह ही जारी रखेगी. इसका मतलब यह हुआ कि सरकार नए कृषि कानून लागू होने के बाद भी पहले की तरह ही हर साल फसलों के समर्थन मूल्य का ऐलान करती रहेगी. एमएसपी पर अब तक चली आ रही व्यवस्था से किसानों को दिक्कत यह है कि केंद्र सरकार 23 फसलों की एमएसपी घोषित करती है लेकिन उन सभी को खरीदती नहीं है. यहां तक कि वह जिन मुख्य फसलों – गेंहू और धान – को खरीद में तरजीह देती है, उनका भी करीब-करीब आधा हिस्सा ही वह खरीदती है.

एनडीटीवी की एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2019-20 में देश में 1184 लाख टन चावल का उत्पादन हुआ जिसमें से 511 लाख टन ही सरकार द्वारा खरीदा गया. इसी साल हुए 1076 लाख टन गेहूं में सरकारी खरीद की मात्रा 390 लाख टन थी. इसके अलावा 231 लाख टन दाल में से सिर्फ 28 लाख टन और 454 लाख टन मोटे अनाज जैसे ज्वार बाजरा आदि में से चार लाख टन की ही सरकारी खरीद हुई. यानी सरकार ने इन फसलों की कुल पैदावार का करीब 32 फीसदी हिस्सा ही खरीदा. ऐसा भी सिर्फ उन फसलों के मामले में किया गया जिन्हें सरकार खरीदती है. सरकार एमएसपी घोषित करने के बाद भी कुछ फसलें बिलकुल नहीं खरीदती. यही वजह है कि एमएसपी की मौजूदा व्यवस्था से गिने-चुने किसानों को ही फायदा मिलता है. केंद्र सरकार की ही एक रिपोर्ट के मुताबिक सरकार की एमएसपी पर खरीद का फायदा देश के केवल छह फीसदी किसानों को ही मिलता है.

एमएसपी पर फसल की खरीद साल-दर-साल घटती जा रही है

बीते सालों के आंकड़ों को देखें तो एमएसपी पर फसल की खरीद साल-दर-साल घटती जा रही है. देश में साल 2015-16 में जहां गेहूं की एमएसपी पर खरीद के लिए 20,088 खरीद केंद्र थे. वहीं साल 2016-17 में इसकी संख्या घटकर 18,181 रह गई. इसके बाद 2017-18 में खरीद केंद्रों की संख्या और कम होकर 17,596 पर पहुंच गई. 2018-19 में गेहूं के खरीद केंद्रों में बढ़ोतरी हुई और ये आंकड़ा 19,280 पर पहुंच गया. लेकिन अगले ही साल 2019-20 गेहूं के खरीद केंद्रों में काफी ज्यादा की गिरावट आई और साल 2015-16 की तुलना में 26.13 फीसदी की कमी के साथ ये संख्या घटकर सिर्फ 14,838 ही रह गई है.

2019-20 में पूरे देश में 14,838 खरीद केंद्रों में से करीब 95 फीसदी खरीद केंद्र राज्य एजेंसियों के थे. गेहूं खरीदी के लिए देश भर में केंद्रीय एजेंसी भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के महज 728 खरीद केंद्र थे, जो कि कुल खरीद केंद्र का सिर्फ पांच फीसदी ही है. इन केंद्रों की घटती संख्या का सीधा प्रभाव किसानों पर पड़ता है. साल 2019-20 के रबी खरीद सीजन में कुल 35.6 लाख किसानों को एमएसपी का लाभ मिला था जो कि 2018-19 में लाभान्वित 39.8 लाख किसानों के मुकाबले करीब चार लाख कम है, जबकि इस दौरान गेहूं का उत्पादन काफी बढ़ा है. साल 2016-17 में गेहूं का कुल उत्पाद 9.85 करोड़ टन था, जो कि 2018-19 में बढ़कर 10.36 करोड़ टन हो गया. इसमें से केवल 3.4 करोड़ टन की खरीद ही एमएसपी पर की गई थी, यानी कुल उत्पादन के करीब 33 फीसदी की ही खरीदी एमएसपी पर हुई. बाकी बची 67 फीसदी फसल को किसान प्राइवेट बाजार या घरेलू बजार में बेंचता है, इसमें से अधिकांश हिस्सा किसान को एमएसपी से काफी कम दाम पर बेचना पड़ता है. एमएसपी पर काफी कम फसल खरीदे जाने के चलते ही किसान अब चाहते हैं कि सरकार एमएसपी की पूरी व्यवस्था को ही बदल दे और एक नयी व्यवस्था लाकर उनकी परेशानी को दूर करे.

नए कृषि कानूनों की वजह से किसानों को किस बात का डर सता रहा है?

केंद्र सरकार हर साल अपने फसल खरीद लक्ष्य को संशोधित करती है. वह हर साल यह तय करती है कि उसे किसानों से कितना अनाज खरीदना है. इससे ही यह भी तय होता है कि उसे एमएसपी पर प्रत्येक किसान से अधिकतम कितना अनाज खरीदना है. कुल मिलाकर कहें तो किसान चाहें कितना ही अनाज पैदा करें, लेकिन सरकार उनसे एक निश्चित मात्रा से ज्यादा अनाज नहीं खरीदती है. बाकी बची फसल को किसान बाहर बेचता है. मोदी सरकार के नए कृषि कानून के मुताबिक अब प्राइवेट कंपनियां किसान से सीधे फसल खरीदने के लिए स्वतंत्र होंगी. नए कृषि कानूनों में कही गयी इस बात के चलते किसानों को यह डर है कि अगर भविष्य में सरकार ने एमएसपी पर फसल की खरीद का बहुत कम लक्ष्य निर्धारित किया तो उन्हें बहुत बड़ी मात्रा में अपनी फसल बाहर बेचनी पड़ेगी. और तब अगर प्राइवेट कंपनियां उनकी फसल ओने-पौने दामों पर खरीदने लगीं तो वे क्या करेंगे?

पंजाब और हरियाणा के किसान इस वजह को लेकर सबसे ज्यादा चिंतित हैं क्योंकि अभी सरकार एमएसपी पर सबसे ज्यादा अनाज इन्हीं दो राज्यों से खरीदती है. नीति आयोग की 2016 की एक रिपोर्ट के मुताबिक पंजाब में सौ फीसदी किसान फसल को एमएसपी पर बेचते हैं. यही वजह है कि इन दो राज्यों के किसान कड़ाके की ठंड में भी नये कानूनों के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं. अब सवाल यह है कि एमएसपी पर किसान चाहते क्या हैं? किसानों का कहना है कि सरकार ऐसा कानून बनाए कि अगर उनकी फसल को कोई व्यापारी या कोई प्राइवेट कंपनी खरीदे तो वह उसे एमएसपी पर या उससे ज्यादा कीमत पर ही खरीदे. यानी एक ऐसा कानून जिसके चलते कोई भी फसल को एमएसपी से नीचे खरीद ही न पाए. लेकिन मोदी सरकार किसानों की इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं है. और इसी वजह से दिल्ली की सीमाओं पर आंदोलन जारी है.