पूरा विश्व जिन्हें अरबी अंक कहता है उनका मूल स्रोत गणित की प्राचीन हिंदुस्तानी पांडुलिपि बक्षाली है.
पिछले कुछ हफ्तों के दौरान ऊपर दी गई तस्वीर इंटरनेट पर खूब वायरल हुई है. लाखों लोगों ने इसे इस टिप्पणी के साथ शेयर किया है कि अंकों के अंतर्राष्ट्रीय प्रतीक - अरबी अंक (अरेबिक न्यूमेरल्स) प्राचीन अरबी सभ्यता में विकसित हुई ज्यामितीय आकृतियों के आधार पर बने हैं. तस्वीर के साथ लिखी इबारत के मुताबिक, ‘हर प्रतीक में जितने कोने या कोण हैं वह उस संख्या को बताता है.’
इस तस्वीर पर ज्यादा सवाल नहीं उठाए गए, लेकिन ऐतिहासिक नजरिए से यह अरबी अंकों के विकास की गलत कहानी कहती है. वास्तविकता यह है कि जिन अंकों को पूरा विश्व अरबी अंक या अरेबिक न्यूमेरल्स कहता है वे ईसा से दो शताब्दी पूर्व से लेकर तीसरी शताब्दी के बीच भारतीय गणितज्ञों ने विकसित किए थे. इतिहासकार मानते हैं कि इनका स्रोत बक्षाली या बख्शाली पांडुलिपि है. बक्षाली पांडुलिपि को भारतीय गणित का सबसे पुराना लिखित दस्तावेज माना जाता है. यह 1881 में तक्षशिला से तकरीबन 70 किमी दूर बख्शाली गांव (पाकिस्तान में पेशावर के नजदीक) में मिली थी. बक्षाली पांडुलिपि कुल 70 भोजपत्रों की है जिनपर गाथा भाषा (संस्कृत और प्राकृत का मिलाजुला रूप) और शारदा लिपि में गणितीय क्रियाओं के कुछ प्रारंभिक सूत्र लिखे हैं. माना जाता है कि शून्य का बुनियादी सिद्धांत इसी पांडुलिपि में दर्ज है.
मध्यकालीन युग (पांचवीं से पंद्रहवीं शताब्दी के बीच) में ये अंक प्राचीन ईरानी सभ्यता तक पहुंचे. फिर अरबी सभ्यता का इनसे परिचय हुआ
बक्षाली पांडुलिपी
बक्षाली पांडुलिपी
इस पांडुलिपि में गणितीय सूत्र जिन अंकों (इन्हें ब्राह्मी भाषा के अंक भी कहा जाता है) में दर्ज हैं उनको देखकर आसानी से समझा जा सकता है कि अरबी अंक असल में कहां से आए हैं. प्रसिद्ध भाषाविद आगस्टस रुडोल्फ होइरेनल ने 1887 में सबसे पहले इन पांडुलिपियों का अध्ययन किया था और आधुनिक विश्व को उनके जरिए ही यह ऐतिहासिक जानकारी मिली.
इन अंकों का यह आकार सीधे ही पश्चिमी गणित का हिस्सा नहीं बना. इनके वर्तमान आकार को देखते हुए यह कहा जा सकता है यहां तक पहुंचने में भी इन्हें लंबा अरसा लगा होगा. इतिहास के मध्यकालीन युग (पांचवीं से पंद्रहवीं शताब्दी के बीच) में ये अंक प्राचीन ईरानी सभ्यता तक पहुंचे. फिर अरबी सभ्यता का इनसे परिचय हुआ और वहां से यूरोप की दुनिया तक इनका विस्तार हुआ.
यूरोप में पहली बार अरबी अंकों का इस्तेमाल स्पेन में हुआ था. उत्तरी स्पेन में तीन संतों द्वारा कोडेक्स विजिलेनस नाम से इतिहास का एक दस्तावेज तैयार किया गया था. इसी ने सबसे पहले अंकों के इस आकार का परिचय स्पेनवासियों को करवाया था. यह 900 ईसवी के आसपास की बात है.हैरानी की बात है कि इन अंकों से यूरोप के बाकी देशों का पहला परिचय होने में तकरीबन 300 साल लग गए. इसका श्रेय इटली के गणितज्ञ लियोनार्दो इबोनाक्ची को जाता है. उन्होंने अपनी गणितीय सिद्धांतों की किताब लिबेर एबेकी (अंग्रेजी में इसका नाम बुक ऑफ कैलकुलेशन) में इन अंकों का प्रयोग किया और इसके बाद इनसे पूरा यूरोप परिचित हो गया. आने वाली शताब्दियों में अरबी अंक प्रणाली को यूरोपीय समाज की मुख्यधारा ने अपना लिया.
इनका नामकरण अरबी होने के पीछे बस यही संयोग है कि स्पेनवासियों ने इन्हें अरबी लोगों से सीखा था और इस तरह ये पूरे यूरोप में अरबी अंक बन गए.
15वीं और 16वीं शताब्दी में ब्रिटेन में बनने वाली घड़ियों में इन अंकों का इस्तेमाल होने लगा था. वहां संदेशों और लिखित सामग्री में भी इन्हें जगह मिल गई. इसके अलावा जर्मनी में इनका प्रयोग शैक्षिक कार्यों में होने लगा था. यूरोप में पुनर्जागरण काल (14वीं से 17वीं शताब्दी) के दौरान टाइपोग्राफी (छापे के अक्षर) का विकास हुआ और अंकों के आकार को इसने और स्थायित्व प्रदान किया.
1757 में फ्रांस के इतिहासकार जीन एटीने मोंटक्युला ने एक किताब लिखी थी - गणित का इतिहास. इसमें उन्होंने कुछ प्रतीकों के माध्यम से अरबी अंकों का तत्कालीन विकास दिखाया था. इस टेबल की सातवें नंबर की लाइन (ऊपर चित्र में) में जो अंक लिखे हैं उन्हें बड़ी आसानी से पहचाना जा सकता है. इस लाइन के आगे लिखा है शीफेर मॉडेर्न. फ्रैंच भाषा में इसका मतलब होता है आधुनिक अंक. वे अंक जो 18 शताब्दी में तकरीबन पूरे विश्व में प्रचलित थे. यही अंक आज भी प्रचलन में हैं. अंको के विकास की इस पूरी यात्रा में इनका नामकरण अरबी होने के पीछे बस यही संयोग है कि स्पेनवासियों ने इन्हें अरबी लोगों से सीखा था और इस तरह ये पूरे यूरोप में अरबी अंक बन गए. हालांकि लोकव्यवहार से अलग अकादमिक इस्तेमाल में आज भी यह इन्हें हिंदू-अरबी अंक ही कहा जाता है.