फिल्म : दृश्यम
निर्देशक : निशिकांत कामत
लेखक : जीतू जोसेफ, उपेंद्र सिद्धे
कलाकार : अजय देवगन, तब्बू, श्रिया सरन, रजत कपूर, इशिता दत्ता, कमलेश सावंत
रेटिंग : 2.5 / 5
दृश्यम है ‘द डिवोशन आफ सस्पेक्ट एक्स’ नाम के जापानी उपन्यास पर आधारित. साथ ही इसी किताब (और जापानी फिल्म ‘सस्पेक्ट एक्स’) का केंद्रीय विचार लेकर नया रचने वाली मलयालम फिल्म ‘दृश्यम’ पर भी. हिंदी ‘दृश्यम’ की यही दिक्कत है. ये जहां से निकली है उस गंगोत्री के दो मुख हैं, एक उद्गम स्थान हिंदुस्तान और एक मुख्य स्थान जापान.
दृश्यम इन दोनों ही पहचानों से मुक्त नहीं हो पाती. ये है मोहनलाल वाली मलयालम दृश्यम का साधिकार हिंदी अनुवाद, लेकिन मलयालम दृश्यम अनाधिकारिक तौर पर जापानी द डिवोशन आफ सस्पेक्ट एक्स से प्रेरित है. ये हिंदी की यात्रा पर निकलने से पहले कन्नड़, तेलगू और तमिल की यात्रा से आ चुकी है. इसी साल आई तमिल रीमेक में कमल हासन के अभिनय की तारीफ चंहु ओर हो चुकी है, और जिसने भी ओरिजनल मलयालम दृश्यम देखी है (हमने नहीं देखी), वे कहते हैं कि मोहनलाल के अभिनय के सामने कोई भी अभिनेता कहुं ओर नजर नहीं आता. ऐसा ही प्रभावशाली अभिनय जापानी फिल्म सस्पेक्ट एक्स का ग्रे शेड ओढ़े नायक भी करता है.
दृश्यम अति के बैकग्राउंड स्कोर व नकली लगते पुलिस स्टेशन, रेस्तरां, घर आदि की वजह से पहले हाफ में कम रियल लगती है लेकिन अपनी कहानी के दमपर यह सेकेंड हाफ में आपको थ्रिलर का सुख देती है
‘जो बीत गई सो बात गई’ वाले इस दौर में इतने विस्तार से किसी फिल्म की पोथी खोलने का मकसद सिर्फ एक बात समझाना है :  इन सभी फिल्मों में मुख्य अभिनेता के अभिनय ने ही फिल्म को यादगार बनाया है. हिंदी दृश्यम के पास स्क्रिप्ट पहले से ही बढ़िया थी, उसे सिर्फ अपने मुख्य अभिनेता के दम पर असाधारण होना था. ये वो नहीं हो पाती, क्योंकि अजय देवगन औसत से बेहतर अभिनय तो करते हैं, लेकिन विशिष्ट कुछ भी नहीं. उनकी पिछली फिल्मों को याद करें तो ये उनका बेहतर काम है लेकिन इस फिल्म में जैसे अजय देवगन की जरूरत थी वैसे की जगह काठ के शरीर और काठ के ही अभिनय वाले पुराने देखे-भाले अजय नजर आते हैं. उनके पास अभिनय का ऐसा कोई इमोशन नहीं बचा है जो अनदेखा हो या दुबारा देखकर ही अच्छा लगे. पूरी बांह वाली शर्ट पहनने के बावजूद बाहर झांकती बलिष्ठ भुजाएं वाला चौड़ा शरीर एक कमजोर, घबराए हुए नायक का पैरहन सलीके से नहीं पहन पाता. ऐसा नायक जिसका दिमाग जब तेजतर्रार चालें चले तो उसकी भावनाओं से हम सहानुभूति रखें.
अच्छी स्क्रिप्ट वाली इस फिल्म को मुख्य अभिनेता के दम पर असाधारण होना था जो वो नहीं हो पाती. अजय देवगन औसत से बेहतर अभिनय तो करते हैं लेकिन विशिष्ट कुछ भी नहीं
फिल्म समीक्षा की तमाम नुक्ताचीनी को अगर हम किनारे रख दें और अगर आपने दृश्यम का कोई भी संस्करण नहीं देखा है, तो आपको हिंदी दृश्यम अच्छी लगेगी. ‘वाचेबल’, जैसा कि कहने का चलन है, कम से कम सेकेंड हाफ के लिए तो आप ऐसा कह ही पाएंगे. भले ही कहानी कहने के अंदाज में ये निशिकांत कामत की ‘फोर्स’ जितनी ही नाटकीय लगे या इसमें ‘सस्पेक्ट एक्स’ वाली निर्देशकीय समझ का एक कतरा भी ढूंढ़े से न मिले. दृश्यम अति के बैकग्राउंड स्कोर व नकली लगते पुलिस स्टेशन, रेस्तरां, घर आदि की वजह से पहले हाफ में कम रियल लगती है (आर्ट डायरेक्शन की कमियों की वजह से), लेकिन अपनी कहानी के दमपर यह सेकेंड हाफ में आपको थ्रिलर का सुख देती है और यह बड़ी बात है.
कहानी का इतना ही खुलासा करना ठीक रहेगा कि एक हत्या होती है और अजय देवगन का पात्र अपने पूरे परिवार को साथ लेकर (और अपने सिनेमा प्रेम को मुख्य सहायक बनाकर) ऐसा चतुर खेल रचता है कि पुलिस उन्हें गुनहगार मानकर भी गुनहगार साबित नहीं कर पाती. कोशिश करती है, और इसी से थ्रिल पैदा होता है. इस चतुर खेल में उसका साथ पत्नी बनी श्रिया सरन और दो बेटियां देती हैं और तीनों ही साधारण अभिनय करती हैं. तब्बू बेहतर हैं, असाधारण नहीं. हालांकि शुरूआत में उन्हें टोकने का मन करता है कि लाउड बैकग्राउंड स्कोर के आगे स्लो मोशन में चलना और अंधेरे से उजाले में पुलिस की वर्दी पहनकर आना जैसे क्लीशे दृश्य उनके लिए नहीं बने हैं. लेकिन कुछ समय बाद जब वे क्रूर होकर अपने इमोशन्स की विस्तृत रेंज दिखाती हैं तो प्रभावित करती हैं.
दृश्यम एक बढ़िया स्क्रिप्ट पर बनी औसत से थोड़ी ही बेहतर फिल्म है जिसमें अगर अभिनय भी उत्कृष्ट होता तो कहने में खुशी मिलती कि स्क्रिप्ट सोना है और असाधारण अभिनय सोने पर सुहागा. फिल्म हमेशा याद भी तभी रहती. जैसे अभी सस्पेक्ट एक्स याद है. और मोहनलाल वाली दृश्यम देखने का विचार पास है.