याकूब की फांसी के बाद सजा-ए-मौत पर जारी बहस में निष्कर्ष की एक राह नॉर्वे भी दिखा सकता है.
अप्रैल 2012 की बात है. नार्वे की राजधानी ओस्लो में चल रहे एक मुकदमे पर सारी दुनिया की निगाहें लगी थीं. यह मुकदमा आंदर्स बेहरिंग ब्रेविक नाम के एक आरोपी पर चल रहा था. ब्रेविक पर बम विस्फोट और अंधाधुंध गोलीबारी करके करीब 100 लोगों की हत्या करने का आरोप था. इसी दौरान खबर आई कि इस मामले की सुनवाई कर रहे पांच जजों में से एक को हटा दिया गया है. सुनवाई में शामिल तीन जज पेशेवर थे जबकि दो जजों को नागरिक समुदाय की तरफ से शामिल किया गया था. उन्हीं में से एक थॉमस इनड्रेबो ने फेसबुक पर टिप्पणी कर दी थी कि ब्रेविक को मौत की सजा मिलनी चाहिए. इस टिप्पणी के बाद दोनों तरफ के वकीलों ने इनड्रेबो को इस मामले से हटाने की मांग की थी.
यूरोपीय संघ के देशों में मौत की सजा खत्म हो चुकी है. नॉर्वे ने 1979 में इस पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया था. हालांकि तब भी स्थिति कुछ ऐसी थी कि भविष्य में जरूरत पड़ने पर इस सजा को फिर से बहाल किया जा सकता है. लेकिन 2014 में नॉर्वे के संविधान में संशोधन करके इसे हमेशा के लिए खत्म कर दिया गया. नॉर्वे का मानना है कि अगर कोई राज्य व्यवस्था जान के बदले किसी अपराधी की जान लेने का रास्ता अपनाती है तो वह खुद को नैतिक रूप से गिराकर उस अपराधी के बराबर ही ला खड़ा करती है. नॉर्वे में आम राय भी यही है कि न्याय को हर हाल में दंडात्मक से ज्यादा सुधारात्मक होना चाहिए.
नॉर्वे का मानना है कि अगर कोई राज्य व्यवस्था जान के बदले किसी अपराधी की जान लेने का रास्ता अपनाती है तो वह खुद को नैतिक रूप से गिराकर उस अपराधी के बराबर ही ला खड़ा करती है.
जुलाई 2011 में ब्रेविक ने पहले ओस्लो में एक दफ्तर के बाहर बम विस्फोट किया था. इसके बाद वह शहर के बाहर चल रहे लेबर पार्टी के एक यूथ कैंप में गया. वहां उसने अंधाधुंध गोलीबारी की. दोनों घटनाओं में कुल मिलाकर करीब 100 लोग मारे गए. पुलिस के पहुंचने पर ब्रेविक ने भागने की कोशिश नहीं की बल्कि वह आराम से गिरफ्तार हो गया. बाद में सुनवाई के दौरान उसने दावा किया कि उसने नॉर्वे को मुस्लिमों के हमले से बचाने के लिए आत्मरक्षा में यह कार्रवाई की. उसका तर्क था कि सरकार की उदार नीतियों के चलते नॉर्वे में 'बाहरी' लोगों की आबादी बढ़ती जा रही है.
ब्रेविक ने हत्याकांड को अंजाम देने की बात मानी, लेकिन वह खुद को दोषी मानने के लिए तैयार नहीं था. आखिर में उसे 21 साल की सजा हुई. नॉर्वे में किसी भी अपराध के लिए अधिकतम इतनी ही सजा हो सकती है. एक दूसरा विकल्प पांच-पांच साल के हिसाब से इस सजा को बढ़ाने का भी होता है जिसमें अपराधी को तब तक कैद में रखा जा सकता है जब तक उसे समाज के लिए खतरा माना जाता रहे.
ब्रेविक को मिली इस सजा से दुनिया में कइयों को बहुत हैरानी हुई. फेसबुक पर तंज करती एक टिप्पणी थी कि 21 साल की सजा का मतलब यह है कि ब्रेविक को हर हत्या के लिए सिर्फ ढाई महीने की सजा हुई है. लोगों ने हैरत जताई कि नॉर्वे का समाज ब्रेविक जैसे हत्यारे को मिली इस हल्की सजा को कैसे पचा गया.
इसका एक जवाब ओस्लो की उस अदालत में तलाशा जा सकता था जहां फैसले के बाद पीड़ितों के रिश्तेदार एक दूसरे से गले मिल रहे थे. उनका मानना था कि न्याय की जीत हुई है और उन्हें इंसाफ मिला है. इस हमले में अपनी बेटियों को खोने वाले मुस्तफा राशिद और जेल फ्रेडरिक ली ने अदालत के फैसले के बाद कहा कि वे आतंकी ब्रेविक के बारे में अब और ज्यादा सोचकर या उससे नफरत कर अपना समय बर्बाद नहीं करेंगे. उनका माना था कि ऐसे लोगों की उपेक्षा करना ही बेहतर है.
खुद को बार-बार ईसाई उग्रवादी कहने वाले ब्रेविक ने पूरी कोशिश की थी कि वह इस सुनवाई को बहुसंख्यक ईसाई समुदाय की आबादी को भड़काने के लिए इस्तेमाल करे.
अदालत के इस फैसले और इस पर पीड़ितों की प्रतिक्रिया को कइयों ने ब्रेविक और उसकी आतंकी विचारधारा की हार के रूप में देखा. खुद को बार-बार ईसाई उग्रवादी कहने वाले ब्रेविक ने पूरी कोशिश की थी कि वह इस सुनवाई को बहुसंख्यक ईसाई समुदाय की आबादी को भड़काने के लिए इस्तेमाल करे. वह लगातार कहता रहा कि उसने पूरे होशोहवास में यह काम किया है और इसके लिए उसे या तो मौत की सजा मिलनी चाहिए या फिर उसे छोड़ दिया जाना चाहिए. उसने कहा कि अगर उसे पागल करार देकर फैसला सुनाया गया तो वह इसके खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील करेगा. ब्रेविक का यह भी कहना था कि उसने एक सुनियोजित लक्ष्य के साथ सालों तक रणनीति बनाकर इस हमले को अंजाम दिया है. उसे कोई पश्चाताप नहीं बल्कि अफसोस था कि मौतों का आंकड़ा और ज्यादा क्यों नहीं हुआ.
ऐसे ही एक पैंतरे के तहत अपनी बात रखते हुए ब्रेविक उग्रपंथी राष्ट्रवादियों से कम मौतों के लिए माफी मांग रहा था कि जज ने बीच में ही उसके माइक्रोफोन का कनेक्शन काट दिया और उसे चुप रहने के लिए कहा. बाद में अपने 90 पन्नों के निर्णय में अदालत ने कहा कि ब्रेविक की प्रवृत्ति को देखते हुए उसे यह विश्वास नहीं है कि 21 साल बाद 53 साल के हो चुके ब्रेविक को जेल से रिहा कर दिया जाएगा. लेकिन उसे यह पूरा विश्वास है कि नॉर्वे का लोकतंत्र तब भी ऐसा ही रहेगा और इसमें अलग-अलग धर्मों और संस्कृतियों के फलने-फूलने की जगह रहेगी. अदालत के इस फैसले पर टिप्पणी करते हुए इस नरसंहार में बच जाने वाले बोर्न मैग्नस इलस का कहना था, 'ऐसा ही होना चाहिए था. यह बताता है कि हम अपने सिद्धांतों पर अडिग रहे हैं. यह इस बात का सबसे बड़ा सबूत भी है कि ब्रेविक हमारे समाज को नहीं बदल सका.' कई लोगों ने यह भी कहा कि अगर ब्रेविक मानसिक रूप से सामान्य है तो जीवन भर जेल में रहना ही उसके लिए सबसे बड़ी सजा होने जा रही है.
लेकिन दंडात्मक की जगह सुधारात्मक न्याय की इस असाधारण मिसाल के साथ नॉर्वे ने यह भी दिखाया कि अपराध को रोकने में कानूनी एजेंसियों की ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जा सकती. ब्रेविक कांड में पुलिस और खुफिया एजेंसियां भी आलोचना के घेरे में रहीं. पुलिस पर यह आरोप लगा कि बम विस्फोट के बाद ही उसे हरकत में आ जाना चाहिए था और अगर ऐसा होता तो ब्रेविक दूसरी घटना को अंजाम नहीं दे पाता. खुफिया विभाग की इसलिए आलोचना हुई कि उसे सालों से बनाई जा रही ब्रेविक की रणनीति की भनक नहीं लग पाई. इसकी प्रतिक्रिया में वहां के न्याय मंत्री, पुलिस के दो शीर्ष अधिकारियों और खुफिया सेवा के मुखिया को इस्तीफा देना पड़ा. भारत के उलट वहां मुकदमा तेजी से चला और सिर्फ चार महीनों में ही इस पर फैसला सुना दिया गया.
दंडात्मक की जगह सुधारात्मक न्याय की इस असाधारण मिसाल के साथ नॉर्वे ने यह भी दिखाया कि अपराध को रोकने में कानूनी एजेंसियों की ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जा सकती.
हालांकि ऐसा नहीं है कि ब्रेविक को मिली सजा से नॉर्वे में सभी संतुष्ट हैं. इस देश में करीब 16 फीसदी लोग ऐसे भी हैं जो ऐसे अपराधों के लिए मौत की सजा के पैरोकार हैं. इनमें से ज्यादातर लोग वहां की दक्षिणपंथी रूझान वाली प्रोग्रेस पार्टी से ताल्लुक रखते हैं. कुछ समय पहले हुए एक सर्वे में नॉर्वे की इस दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के 51 फीसदी वोटरों का मानना था कि बलात्कार और हत्या के दुर्लभतम मामलों में तो मौत की सजा का प्रावधान होना ही चाहिए.
नॉर्वे में मौत की सजा पर 1990 के दशक में भी तीखी बहस चली थी. तब एक बड़ा वर्ग था जिसे संविधान में संशोधन के जरिये मौत की सजा को हमेशा के लिए खत्म करने पर ऐतराज था. उसका तर्क था कि युद्ध के दौरान किए गए अपराधों के लिए न्याय व्यवस्था में अगर मौत की सजा का प्रावधान नहीं होगा तो युद्ध खत्म होने के बाद असंतुष्ट समाज में खुद ही गद्दारों या दुश्मनों के मददगारों से बदला लेने की प्रवृत्ति बेकाबू हो सकती है. ऐसे में कानून-व्यवस्था खतरे में पड़ सकती है. मौत की सजा के पैरोकारों का तर्क यह भी था कि अगर कोई देश उन जासूसों या गद्दारों को मौत की सजा नहीं दे सकता जिनके चलते उसके सैनिकों की जान जाने का जोखिम रहता है तो वह किस मुंह से अपने सैनिकों को देश के लिए जान देने को कह सकता है.
करीब 50 लाख की जनसंख्या वाले नॉर्वे को पश्चिमी यूरोपीय देशों में सबसे कम अपराध दर के लिए जाना जाता है. एक तरफ दुनिया के कई हिस्सों में हिंसा और मारकाट मची है तो इसी दौरान शांति का सर्वोच्च सम्मान नोबेल पुरस्कार देने वाले इस देश ने एक नई मिसाल कायम की है. पिछले साल यानी 2014 में यहां की पुलिस ने सिर्फ दो गोलियां चलाईं. इनमें भी न तो किसी की मौत हुई और न ही कोई घायल हुआ. 2011 में जब ब्रेविक ने इस जघन्य हत्याकांड को अंजाम दिया तो तब भी पुलिस ने केवल एक गोली चलाई थी. इसके चलते ही शायद कई मानते हैं कि मौत की सजा को खत्म करने से पहले किसी देश को उस मोड़ तक पहुंच जाना चाहिए जहां आज नॉर्वे खड़ा है.