भारत में पुडुचेरी की दो बड़ी ही विरोधाभाषी लेकिन खुशनुमा पहचानें हैं. पहले पॉन्डिचेरी कही जाने वाली इस पूर्व फ्रांसीसी कॉलोनी को जितना अपनी यूरोपीय पहचान के लिए जाना जाता है उतनी ही मशहूर ये अरबिंदो आश्रम की वजह से भी है जो प्राचीन भारतीय दर्शन और अध्यात्म प्रेमियों का तीर्थ सरीखा है. लेकिन अब दक्षिण भारत का यही पर्यटन स्थल अपनी नई लेकिन नकारात्मक पहचान के चलते चर्चा की वजह बन रहा है. पिछले हफ्ते ही राष्ट्रीय क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) ने अपनी एक रिपोर्ट जारी की है. इसके मुताबिक 2011 से 2014 तक लगातार चौथे साल पुडुचेरी देश में आत्महत्या के मामलों में अव्वल रहा है. पिछले साल प्रति एक लाख लोगों पर आत्महत्या का राष्ट्रीय औसत 10.6 था तो पुडुचेरी में यह चार गुना ज्यादा यानी 40.4 रहा. विडंबना ये है कि यहां ऐसे मामले लगातार बढ़ रहे हैं. 2013 में इस केंद्र शासित प्रदेश में आत्महत्या के कुल 546 मामले दर्ज किए गए थे तो पिछले साल यह आंकड़ा बढ़कर 644 पर पहुंच गया.
पुडुचेरी में ब्लैक टाउन के ज्यादातर छात्रों और युवाओं को लगता है कि यहां उनका भविष्य सुरक्षित नहीं है. इसके चलते इनमें नकारात्मकता घर कर गई है

 कई अध्ययन बताते हैं कि दक्षिण भारत में आत्महत्या के मामले उत्तर भारत की तुलना में ज्यादा हैं. एनसीआरबी हालिया रिपोर्ट से भी जाहिर होता है कि तमिलनाडु और केरल में आत्महत्या की दर राष्ट्रीय औसत से दो गुनी से ज्यादा है. लेकिन यहां भी जब आप पुडुचेरी की बात करेंगे तो ऐसा लगता है जैसे यह केंद्र प्रशासित प्रदेश भारत में आत्महत्या की राजधानी बन गया हो.
इस इलाके की जिन दो खुशनुमा पहचानों की बात हमने रिपोर्ट के शुरू में की थी उनको ध्यान में रखते हुए यह सवाल अपने आप ही उठता है कि आखिर ऐसा क्यों है कि इस तटवर्ती पर्यटन स्थल में आत्महत्या महामारी की तरह फैल रही है. एनसीआरबी की रिपोर्ट से इस सवाल का सीधा-सीधा जवाब नहीं मिलता. इसके मुताबिक पिछले साल हुई आत्महत्याओं की बात करें तो यहां तकरीबन 34 फीसदी मामले पारिवारिक समस्याओं से जुड़े रहे हैं. हालांकि इससे भी ज्यादा संख्या उन मामलों की है जिनमें आत्महत्या का कारण  ‘अन्य वजह’ लिखा हुआ है.

पूरे देश में आत्महत्या के पीछे मुख्यरूप से पारिवारिक कलह, संपत्ति विवाद, प्रेम प्रसंग, परीक्षा में असफलता, नशा और मानसिक बीमारियां आदि जैसी वजहें होती हैं और पुडुचेरी में भी यही है. लेकिन यहां ऐसा क्या है कि लोग इन समस्याओं के आगे जल्दी हार मान जाते हैं? कुछ लोग इसके लिए प्रदेश की सामाजिक-आर्थिक विरासत से पैदा हुई खाई को जिम्मेदार मानते हैं.
ब्लैक टाउन और व्हाइट टाउन का विभाजन
पुडुचेरी चेन्नई से तकरीबन 270 किमी दूर है. तमिलनाडु से सटे होने की वजह से यहां एक तरफ निम्न-मध्यमवर्गीय तमिल आबादी बहुतायत में है. वहीं फ्रांस का उपनिवेश होने के कारण उस दौर के आवासीय क्षेत्र में एक अलग तरह की आबादी निवास करती है. यह हिस्सा व्हाइट टाउन कहलाता है. फ्रांसीसी मूल के कुछ परिवारों से साथ-साथ केंद्र शासित प्रदेश का सबसे कुलीन तबका इसी व्हाइट टाउन में रहता है. अरबिंदो आश्रम भी यहीं पर है और पर्यटकों की भी यहां खासी हलचल रहती है. वहीं दूसरी तरफ तमिल आबादी वाला इलाका- ब्लैक टाउन- झुग्गी झोपड़ियों से अटा पड़ा है. कई अध्ययन बताते हैं कि एक ही जमीन के दो हिस्सों में रहन-सहन और आचार-व्यवहार के अंतर की वजह से ब्लैक टाउन के लोगों में भारी हीनता की भावना है. किंग्स कॉलेज लंदन में मनोचिकित्सा विभाग के प्रोफेसर दिनेश भुगरा एक रिपोर्ट में बताते हैं, ‘यदि आप परंपरागत मूल्यों पर चलने वाले हैं लेकिन आधुनिक माहौल में रह रहे हैं तो आपकी अपेक्षाओं और उपलब्धियों में काफी अंतर पैदा हो जाता है. यह बात आपके स्वाभिमान को बहुत ठेस पहुंचाती है.’

आज से दस साल पहले तक यह केंद्र शासित प्रदेश टैक्स फायदों की वजह से उद्योगों के लिए एक आकर्षक जगह हुआ करती थी लेकिन 2007 में यहां वैट लागू हो गया और धीरे-धीरे यहां उद्योग धंधे सिमटने लगे

 अपेक्षाओं की सबसे ज्यादा मार यहां के युवाओं पर पड़ रही है. पिछले चार सालों की एनसीआरबी की रिपोर्ट बताती है कि पुडुचेरी में 15-29 साल और 30-44 साल के लोगों में आत्महत्या की दर सबसे ज्यादा है. स्थानीय स्वयंसेवी संगठनों के अनुसार यहां किशोरवय में होने वाली ज्यादातर आत्महत्याओं की वजह असफल प्रेम संबंध हैं. 19-26 साल के बीच के ज्यादातर छात्र-छात्रा एजुकेशन लोन के दबाव या पढ़ाई में खराब प्रदर्शन के चलते आत्महत्या करते हैं. 26 साल से ज्यादा उम्र के लोगों में विवाहेत्तर प्रेम संबंध और शराबखोरी आत्महत्या की बड़ी वजह है.

ब्लैक टाउन के ज्यादातर छात्रों और युवाओं को लगता है कि यहां उनका भविष्य सुरक्षित नहीं है. इसके चलते इनमें नकारात्मकता घर कर गई है. ऐसा सोचने की उनके पास वजह भी है. आज से दस साल पहले तक यह केंद्र शासित प्रदेश टैक्स फायदों की वजह से उद्योगों के लिए एक आकर्षक जगह हुआ करता था. लेकिन 2007 में यहां वैट लागू हो गया और धीरे-धीरे उद्योग धंधे यहां से सिमटने लगे. सीआईआई पुडुचेरी के अध्यक्ष सैय्यद सज्जाद एक अखबार से बात करते हुए कहते हैं कि उद्योगों के लिए फायदेमंद टैक्स सिस्टम खत्म होने के बाद ऐसा होता ही है. वे अपनी बात आगे बढ़ाते हैं, ‘पुडुचेरी और चेन्नई में अब हर साल हजारों छात्र इंजीनियरिंग करके निकलते हैं. इनमें से हर एक के लिए यहां नौकरी नहीं है.’

पुडुचेरी विश्वविद्यालय के स्वास्थ्य केंद्र की सीनियर मेडिकल ऑफिसर एस महालक्ष्मी के मुताबिक इस केंद्र शासित प्रदेश में छात्र बहुत असुरक्षित महसूस करते हैं क्योंकि उनके सामने यहां पीएचडी डिग्रीधारी भी बेरोजगार घूम रहे हैं.
शराब का नशा आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ा रहा है
अभी तक अलग से कोई ऐसा अध्य्यन नहीं हुआ है जो इस बात को साफ-साफ साबित कर दे कि पुडुचेरी में सामाजिक-आर्थिक स्थितियों में दिखने वाला स्पष्ट अंतर यहां आत्महत्या की दर बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है लेकिन इसकी एक वजह यहां काफी साफ है. कुछ विशेषज्ञ इसके लिए प्रदेश में फैली शराब की लत को जिम्मेदार मानते हैं. इंदिरा गांधी शासकीय अस्पताल में मनोचिकित्सा विभाग के प्रमुख बालन स्टीफन एक रिपोर्ट में कहते हैं, ‘आत्महत्या हमेशा मानसिक उथल-पुथल का नतीजा होती है और इसकी वजहें असंख्य हो सकती हैं. लेकिन किसी भी तरह का नशा यह मानसिक उथल-पुथल बढ़ाने का ही काम करता है.’

मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम कर रहे डॉक्टर बताते हैं कि पुडुचेरी में सिर्फ 50 प्रशिक्षित मनोरोग विशेषज्ञ हैं. जो तकरीबन सात लाख की आबादी वाले इस केंद्र शासित प्रदेश के हिसाब से काफी कम हैं

 पर्यटक स्थल होने की वजह से यहां शराब बहुत आसानी से उपलब्ध है. पुडुचेरी में स्थित जवाहरलाल नेहरू इंस्टिट्यूट ऑफ पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल ऐजुकेशन एंड रिसर्च (जिपमेर) के मनोचिकित्सक शराब के नशे को इस तटवर्ती क्षेत्र में बड़ा खतरा बताते हुए कहते हैं, ‘आत्महत्या की प्रवृत्ति वाले लोगों के लिए शराब बहुत खतरनाक है.’ इस साल की एनसीआरबी की रिपोर्ट भी इस बात की पुष्टि करती है कि 2013 की अपेक्षा यदि 2014 में यहां आत्महत्या के ज्यादा मामले सामने आए हैं तो इसकी पहली वजह शराबखोरी है.
आत्महत्या की मनोदशा में फंसे व्यक्ति को इससे उबारने का कोई तंत्र यहां नहीं है.
पुडुचेरी में आत्महत्या की बढ़ी दर भी कुछ हद तक इस समस्या को और बढ़ाने के लिए जिम्मेदार है. जिपमेर का एक अध्य्यन बताता है कि पुडुचेरी में डॉक्टरों के बीच आत्महत्या की घटनाएं देश के बाकी हिस्सों में तैनात डॉक्टरों की अपेक्षा एक बहुत सामान्य बात हैं. संगठन की समाज कल्याण अधिकारी वी चित्रलेखा एक अखबार से बात करते हुए कहती हैं, ‘उन्हें यह सामान्य लगता है क्योंकि उनकी जानपहचान में ही कई लोग आत्महत्या कर चुके होते हैं.’ शायद यही वजह है कि प्रदेश में प्रशासनिक या स्वयंसेवी संगठनों के स्तर पर कोई इस समस्या को इतनी गंभीरता से नहीं लेता कि यदि कोई व्यक्ति आत्मघाती प्रवृत्तियों से जूझ रहा हो तो उसे इनसे उबरने में कोई मदद मिल सके.

एनसीआरबी के पिछले चार साल के आंकड़ों को देखते हुए इस बात पर हैरत जताई जा सकती है कि पुडुचेरी में ऐसे लोगों की मदद के लिए सिर्फ एक हेल्पलाइन – मैत्रेयी है. इसे मैत्रेयी नाम का ही एक स्वयंसेवी संगठन चलाता है. हैरानी इस बात पर और बढ़ सकती है कि मैत्रेयी के साथ पिछले साल तक 20 स्वयंसेवी काम कर रहे थे लेकिन अब इनकी संख्या आठ रह गई है. इस संगठन के अधिकारी बताते हैं कि हेल्पलाइन सप्ताह में पांच दिन दो बजे से रात आठ बजे तक ही चलती है. हालांकि जरूरत के हिसाब से इस चौबीसों घंटे चलना चाहिए. मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम कर रहे डॉक्टर बताते हैं कि पुडुचेरी में सिर्फ 50 प्रशिक्षित मनोरोग विशेषज्ञ हैं. जो तकरीबन सात लाख की आबादी वाले इस केंद्र शासित प्रदेश के हिसाब से काफी कम हैं.

मैत्रेयी के निदेशक सी राजावेलू एक रिपोर्ट में कहते हैं, ‘यहां आत्महत्या की दर को कम करने के लिए बड़े स्तर पर जागरूकता अभियान की जरूरत है. पहले महिला आयोग में मानसिक रूप से परेशान महिलाओं की काउंसलिंग की व्यवस्था थी लेकिन अब वह भी नहीं है.’ यानी मर्ज बढ़ता जा रहा है लेकिन दवा की किसी को फिक्र नहीं है.
फ्रांसीसी भाषा की एक लोकप्रिय कहावत है –मियू वो प्रिविनिया क्व गीरियर. इसका हिंदी अनुवाद होता है - इलाज से बचाव अच्छा. किसी समय फ्रांस का उपनिवेश रहे इस क्षेत्र में आत्महत्या के लगातार बढ़ते मामले और उन्हें रोकने की दिशा में उदासीनता देखकर लगता है यह केंद्र शासित प्रदेश अपनी फ्रांसीसी विरासत को तो बचाए रखना चाहता है लेकिन इस कहावत का अर्थ भुला बैठा है.