पांच हज़ार करोड़ रुपए और पांच साल खर्च करके 80 करोड़ भारतीयों को खुद से जोड़ चुकी आधार योजना इस बार और भी गंभीर चुनौतियों से दो-चार है.
आधार योजना आज जिस तरह के सवालों के घेरे में है वे ऐसे हैं जो इस योजना के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं. कहा जा रहा है कि यह योजना लोगों के मौलिक अधिकार का हनन करती है. यह भी कि इस योजना को जिस कानून के तहत शुरू होना था वह आज तक बना ही नहीं है. लिहाजा कुछ लोगों ने इस योजना के आधार को ही गलत बताते हुए इसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी है.
आधार योजना से जुड़े हालिया विवाद को समझने से पहले यह जानते हैं कि इसकी शुरुआत कैसे हुई. 1999 में हुए कारगिल युद्ध के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा के अवलोकन के लिए एक समिति का गठन किया गया था. इस समिति ने जनवरी 2000 में अपनी रिपोर्ट तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को सौंपी. इस रिपोर्ट में सीमान्त क्षेत्रों में रहने वाले लोगों से शुरुआत करते हुए सभी नागरिकों को एक पहचान पत्र जारी करने की बात कही गई थी. इन सिफारिशों को स्वीकार करते हुए सरकार ने सभी नागरिकों के पंजीकरण की व्यवस्था शुरू की. 2004 में आई यूपीए सरकार ने भी इस योजना को जारी रखा और 1955 के नागरिकता अधिनियम में संशोधन करते हुए उसमें धारा 14 ए को जोड़ दिया. इस धारा ने केंद्र सरकार को यह अधिकार दे दिया कि वह अनिवार्य रूप से प्रत्येक नागरिक का पंजीकरण करे और उन्हें एक राष्ट्रीय पहचान पत्र जारी करे.
आधार योजना अपने शुरूआती दौर से ही विवादों में घिरती रही है. इसका एक कारण यह था कि इस योजना का कानूनी आधार बहुत कमजोर था.
2006 में यूपीए सरकार ने 'विशिष्ट पहचान परियोजना' (यूआईडी) की भी शुरुआत की. इस परियोजना का उद्देश्य राष्ट्रीय पंजीकरण की तरह सुरक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करना नहीं बल्कि लोगों तक विभिन्न वित्तीय योजनाओं का लाभ पहुंचाना था. कुछ ही समय बाद इन दोनों योजनाओं को एक साथ जोड़ दिया गया. इसके साथ ही साल 2009 में 'भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण' की स्थापना हुई और यूआईडी को 'आधार' नाम दे दिया गया.
आधार अपने शुरूआती दौर से ही विवादों में घिरता रहा. इसका एक कारण यह था कि इस योजना का कानूनी आधार बहुत कमजोर था. साल 2004 में नागरिकता अधिनियम में हुए संशोधन ने राष्ट्रीय पंजीकरण को तो कानूनी मान्यता दे दी थी लेकिन आधार योजना के लिए संसद ने कोई कानून पारित नहीं किया था. इस संबंध में एक बिल संसद में पेश जरूर किया गया था लेकिन वह आज तक भी लंबित है. भाजपा ने भी शुरुआत से ही आधार योजना का विरोध किया था. भाजपा का मानना था कि यह योजना लोगों की निजता का उल्लंघन करने के साथ ही कई अवैध अप्रवासियों को भी फायदा पहुंचा सकती है. 2014 में हुए लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव अनंत कुमार का कहना था, 'यदि भाजपा की सरकार केंद्र में बनती है तो हम आधार योजना को पूरी तरह से समाप्त कर देंगे. साथ ही इस योजना पर जनता का पैसा बर्बाद करने वालों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई भी करेंगे.'
सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल याचिका में इस योजना को इस आधार पर चुनौती दी गई है कि यह लोगों के 'निजता के अधिकार' का हनन करती है.
लेकिन आज भाजपा सरकार ही इस योजना का बचाव कर रही है. सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल याचिका में इस योजना को इस आधार पर चुनौती दी गई है कि यह लोगों के 'निजता के अधिकार' का हनन करती है. याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि आधार योजना के लिए लोगों की निजी जानकारी जुटाने का काम निजी कंपनियों को सौंपा गया है लिहाजा यह जानकारी गलत हाथों में भी जा सकती है. इस तर्क के खिलाफ 'आधार योजना' का बचाव करते हुए अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने न्यायालय में तर्क दिया है कि 'निजता का अधिकार' भारतीय नागरिकों को प्राप्त मौलिक अधिकारों में शामिल ही नहीं है.
रोहतगी के इस तर्क ने आधार पर चल रही बहस को एक अलग ही दिशा में मोड़ दिया है. रोहतगी का कहना है कि 1954 में आठ जजों की पीठ ने यह फैसला दिया था कि 'निजता का अधिकार' कोई मौलिक अधिकार नहीं है. इसके बाद से कभी भी इस फैसले को इससे बड़ी पीठ ने ख़ारिज नहीं किया है. इसीलिए उन्होंने इस मामले की सुनवाई कर रही तीन जजों की पीठ से मांग की है कि वे इस मामले को कम से कम पांच जजों की संवैधानिक पीठ को सौंप दें.
अब सर्वोच्च न्यायलय आने वाले दिनों में यह फैसला करेगा कि इस मामले को संवैधानिक पीठ को सौंपा जाए या नहीं. यदि ऐसा होता है तो पहले चर्चा इस मुद्दे पर होगी कि 'निजता का अधिकार' एक मौलिक अधिकार है भी या नहीं. हालांकि इस मामले की सुनवाई कर रही पीठ ने अटॉर्नी जनरल रोहतगी के तर्कों से असहमत होते हुए उनसे सवाल किया है कि 'भारतीय संविधान के अनुछेद 21 में दिए गए 'जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार' में से यदि 'निजता के अधिकार' को पूरी तरह से हटा दिया जाए तो इस अधिकार का औचित्य ही क्या बचता है?'
यह भी माना जा रहा है कि इस मामले में 'निजता के अधिकार' को लेकर जो रुख सर्वोच्च न्यायालय अपनाता है उसका असर आने वाले समय में अन्य कानूनों पर भी हो सकता है.
सितंबर 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने यह कहा था कि आधार कार्ड अनिवार्य नहीं है और किसी भी नागरिक को आधार कार्ड न होने की वजह से किसी योजना या लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता. लेकिन दूसरी तरफ सरकार ने गैस सब्सिडी से लेकर जन-धन योजना तक में आधार कार्ड को जोड़ दिया है. ऐसे में अब यदि सर्वोच्च न्यायालय आधार योजना को ही गलत करार देता है तो यह सरकार के लिए बड़ी मुसीबत का कारण बन सकता है.
यह भी माना जा रहा है कि इस मामले में 'निजता के अधिकार' को लेकर जो रुख सर्वोच्च न्यायालय अपनाता है उसका असर आने वाले समय में अन्य कानूनों पर भी हो सकता है. इनमें सबसे महत्वपूर्ण 'ह्यूमन डीएनए प्रोफाइलिंग बिल' है. आपराधिक मामलों की बेहतर जांच के उद्देश्य वाले इस विधेयक को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व्यक्तिगत तौर पर भी कानून की शक्ल देना चाहते हैं. लेकिन यह बिल जिन कई कारणों से विवादों में घिरा है उनमें से 'निजता का हनन' भी एक महत्वपूर्ण बिंदु है. ऐसे में आधार मामले में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला इसे भी प्रभावित कर सकता है.