उत्तर प्रदेश में लोकायुक्त की कुर्सी महीनों से खाली पड़ी है क्योंकि विरोधी दलों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक की नाराजगी के बावजूद सपा सरकार इस पद के लिए एक ही नाम पर अड़ी है.
महाकवि सूरदास की कविता ‘मैया मैं तो चन्द खिलौना लेहों’ में बाल कृष्ण चांद लेने की जिद करते हैं. कुछ इसी तर्ज पर उत्तर प्रदेश की समाजवादी सरकार ने भी एक जिद पकड़ ली है. उत्तर प्रदेश सरकार यह बाल हठ लोकायुक्त के नाम पर दिखा रही है. उत्तर प्रदेश में नए लोकायुक्त का चयन अब से लगभग 16 महीने पहले हो जाना चाहिए था. लेकिन नहीं हो पा रहा है तो इसलिए कि सरकार एक ही नाम पर अड़ी है और इसके लिए सुप्रीम कोर्ट से लेकर राज्यपाल और विरोधी दलों तक की नाराजगी मोल लेने को तैयार है.
उत्तर प्रदेश सरकार ने अड़ियल रवैया अपनाया है इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश रवीन्द्र सिंह के नाम पर. आपराधिक मामलों के विशेषज्ञ वकील रहे जस्टिस रवीन्द्र सिंह को 11  वर्षों का न्यायिक अनुभव है. उनका दावा है कि उन्होंने अपने कार्यकाल में कुल 137778 मुकदमों का निपटारा किया है जो एक रिकार्ड है. अब सरकार एक लंबे समय तक लोकायुक्त का पद खाली रखने के बाद किसी भी कीमत पर उन्हें इस पद पर नियुक्त करना चाहती है. लेकिन न तो इसके लिए इलाहाबाद हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश मान रहे हैं और न ही राज्यपाल. इसलिए पिछले 16 महीनों से राज्य में लोकायुक्त का पद खाली है.
सपा सरकार की पसंद से न तो इलाहाबाद हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सहमत हैं और न ही राज्यपाल. इसलिए पिछले 16 महीनों से राज्य में लोकायुक्त का पद खाली है.
अभी तो एक लंबे समय से प्रदेश में लोकायुक्त है ही नहीं, लेकिन वैसे भी सार्वजनिक पदों पर और राजकीय सेवा में काम करने वालों के भ्रष्टाचार की जांच करने वाले लोकायुक्त के पद का सही उपयोग उत्तर प्रदेश में अब तक हो नहीं सका है. मायावती के काल में लोकायुक्त बने एनके मेहरोत्रा ने जरूर मायावती राज के अंतिम दिनों में कई मंत्रियों को जांच के बाद दोषी पाया था. मायावती ने इनमें से कई मंत्रियों को जांच शुरू होते ही उनके पदों से हटा दिया था. बाद में यह भी चर्चा हुई थी कि मायावती खुद ही उन मंत्रियों से पीछा छुड़ाना चाहती थीं. क्योंकि नसीमुद्दीन सिद्दीकी और स्वामीप्रसाद मौर्य जैसे चहते मंत्रियों के खिलाफ उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की. यहां तक कि लोकायुक्त द्वारा नसीमुद्दीन के खिलाफ सीबीआई जांच की सिफारिश को भी मायावती ने ठंडे बस्ते में डाल दिया
जब सरकार बदली तो 16 मार्च 2012 को अपना कार्यकाल पूरा करने वाले एनके मेहरोत्रा को कार्यकाल-विस्तार दे दिया गया. तब यह कहा गया कि नयी सरकार मायावती सरकार के दागी मंत्रियों को जेल भेजने की तैयारी में है इसीलिए ऐसा किया जा रहा है. संकेत तो ये भी थे कि पूर्व मुख्यमंत्री मायावती को भी जेल भेजने का इंतजाम हो रहा है.
लोकायुक्त ने भी शुरू में ऐसे ही संकेत दिए. जेल में बंद बाबू सिंह कुशवाहा के बाद नसीमुद्दीन सिद्दीकी ही बीएसपी के सबसे बड़े धनकुबेर थे. लोकायुक्त ने जुलाई 2012 में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को अपनी जांच रिपोर्ट सौंपकर नसीमुद्दीन के खिलाफ मनी लॉड्रिंग का मामला दर्ज करने की सिफारिश की. इस पर सिद्दीकी ने मई 2012 में इलाहाबाद हाईकोर्ट में लोकायुक्त के आदेश को चुनौती देते हुए कहा कि लोकायुक्त का कार्यकाल 16 मार्च 2012 को समाप्त हो चुका है. इसलिए एनके मेहरोत्रा का हर आदेश असंवैधानिक है. लोकायुक्त को ही चुनौती मिलती देख समाजवादी पार्टी ने इस पद का कार्यकाल छह से बढ़ाकर आठ साल कर दिया. इससे एनके मेहरोत्रा का कार्यकाल 16 मार्च 2014 तक बढ़ गया.
पिछले लोकायुक्त का कार्यकाल बढ़ाने के पीछे पिछली सरकार के दागी मंत्रियों को सजा दिलाने की इच्छा के साथ-साथ सपा सरकार की एक और सोच भी थी.
जानकार मानते हैं कि लोकायुक्त का कार्यकाल बढ़ाने के पीछे पिछली सरकार के दागी मंत्रियों को सजा दिलाने की इच्छा के साथ-साथ सपा सरकार की एक और सोच भी थी - अगर राजनीतिक परिस्थितियां सपा के अनुकूल नहीं हुईं तो भी नई सरकार के आने के बाद दो-ढाई साल यही लोकायुक्त रहेगा. शायद इसी सोच से बढ़ा कार्यकाल पूरा होने के बाद भी नया लोकायुक्त लाने में सपा सरकार ने जानबूझ कर देरी की. और अब उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में उसे लोकायुक्त पद के लिए कोई नाम मिला भी तो सिर्फ जस्टिस रवीन्द्र सिंह यादव का.
वैसे नए लोकायुक्त के लिए भी सरकार स्वयं सक्रिय नहीं हुई. एनके मेहरोत्रा का बढ़ा हुआ कार्यकाल पूरा हो जाने के बाद भी जब नया लोकायुक्त नहीं नियुक्त हुआ तो मेहरोत्रा को हटा कर नया लोकायुक्त नियुक्त करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर हुई. इस याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने छह महीने में उत्तर प्रदेश सरकार को नया लोकायुक्त नियुक्त करने का निर्देश दिया था.
इसके बाद सरकार ने लोकायुक्त की चयन प्रक्रिया शुरू की तो इलाहाबाद हाईकोर्ट के सिटिंग जज रवीन्द्र सिंह का नाम तय किया गया. लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने इस पर असहमति जताई. चूंकि चयन प्रक्रिया में मुख्य न्यायाधीश भी शामिल होते हैं इसलिए उनकी असहमति से सरकार की पसंद खटाई में पड़ गई. माना जाता है कि मुख्य न्यायाधीश की असहमति इस वजह से भी थी कि न्यायाधीश रहते हुए रवीन्द्र सिंह के भाई और पुत्रों की नियुक्तियां इलाहाबाद हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और अन्य सरकारी संस्थानों के न्यायिक पदों पर हुई थीं. जबकि जानकारी के मुताबिक जस्टिस रवीन्द्र सिंह के पुत्रों का अनुभव उनकी नियुक्ति के मुताबिक नहीं था.
मेहरोत्रा का बढ़ा हुआ कार्यकाल पूरा होने के बाद भी जब नया लोकायुक्त नियुक्त नहीं हुआ तो इसके लिए सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर हुई.
इस बीच जुलाई में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जब उत्तर प्रदेश सरकार को फिर से लताड़ लगाई गई तो राज्य सरकार ने मुख्य न्यायाधीश को ही चयन प्रक्रिया से बाहर कर देने का फैसला कर लिया. उसने आनन-फानन में कैबिनेट से रवीन्द्र सिंह के नाम पर मुहर लगवा कर फाइल राज्यपाल के पास भेज दी.
लेकिन राज्यपाल ने फाइल यह कह कर तत्काल वापस कर दी कि पूर्ण पत्राचार और चयन प्रक्रिया के मिनिट्स के साथ उन्हें फाइल फिर से भेजी जाए. राज्य सरकार ने उनसे भी ज्यादा तेजी से फाइल अगले ही दिन फिर वापस भेज दी तो राज्यपाल ने चार घंटे में ही यह कहकर फाइल फिर वापस कर दी कि लोकायुक्त अधिनियम 1975 के तहत चयन प्रक्रिया पूरी नहीं है. राज्यपाल ने यह भी कहा है कि प्रावधानों के अनुसार मुख्य न्यायाधीश व नेता प्रतिपक्ष के साथ परामर्श करके नए लोकायुक्त के नाम की संस्तुति करते हुए फाइल जल्द से जल्द भेजी जाए.
यानी गेंद फिर राज्य सरकार के पाले में है. लेकिन राज्य सरकार ने जिद पकड़ी है कि उसकी पसंद तो बस यही चांद है. ऐसे में बार-बार अदालतों से मुंह की खा चुकी समाजवादी पार्टी का अगला कदम क्या होता है, यह देखना दिलचस्प होगा.