शोले से क़ानून को हाथ में लेने का महिमामंडन जो शुरू हुआ तो आज किक और जय हो जैसी फिल्मों में उसे जेब में रखकर घूमने के दिन आ गए
‘ठाकुर साहब क्या आज आपके जज़्बात, फर्ज और उसूलों से ज़्यादा कीमती हो गए?’
‘क्या आपकी नज़रों में क़ानून और इन्साफ का वो दर्ज़ा नहीं रहा?’
ये फिल्म शोले के, आखिरी दृश्य में पुलिस आफिसर द्वारा ठाकुर साहब (संजीव कुमार) को क़ानून हाथ में न लेने की सलाह देते वक़्त कहे गए थे. शोले को 15 अगस्त 2015 को रिलीज हुए 40 साल पूरे हो गए. यह ऐसा वक़्त था जब कानून को हाथ में लेना हर नजरिये से जुर्म ही था. शोले, सलीम-जावेद की लिखी फ़िल्म थी. इसी जोड़ी की 2 साल पहले 1973 में एक और फिल्म जंजीर आई थी. इससे अमिताभ बच्चन को एंग्री यंग मैन वाली छवि मिली. तब फिल्मों में पुलिस अमूमन सही वक़्त पर पहुंच जाया करती थी. ‘ज़ंजीर’ में भी पहुंचती है. इसके बावजूद अगर नायक अमिताभ बच्चन खलनायक को गोली मारता है तो लेखक उसे ऐसा बिना वजह नहीं करने देता. वह दर्शकों का दिल रखने के लिए नायक को क़ानून हाथ में लेने की एक उचित वजह देता है. शोले से ही पहले प्रदर्शित हुयी एक और फिल्म दीवार में भी नायक अगर गैर-कानूनी काम करता है तो अपने तमाम नायकत्व के बावजूद कानून के हाथों हर मोर्चे पर शिकस्त खाता है. और तो और उसके साथ मां भी नहीं होती. वजह वही, कानून को अपने हाथ में लेना.
शोले से ही पहले प्रदर्शित हुयी एक और फिल्म दीवार में भी नायक अगर गैर-कानूनी काम करता है तो अपने तमाम नायकत्व के बावजूद कानून के हाथों हर मोर्चे पर शिकस्त खाता है
वैसे क़ानून को हमेशा अपने हाथ में लिया जा सकता था. जैसा गांधी जी ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ करते रहे. लेकिन गांधी जी ने हमें जिस सविनय अवज्ञा और कानून को हाथ में लेने की शिक्षा दी थी उसमें कानून को हाथ में लेने के बाद अपने हाथ क़ानून के हाथ में ही दे दिए जाते हैं. परिणाम भुगतने के लिए.
लेकिन ज़ंजीर के दो साल बाद आने वाली शोले में सलीम-जावेद सत्य की असत्य पर जीत के तहत सीधे ठाकुर के हाथों खलनायक को मरवा देते हैं. सेंसर बोर्ड हस्तक्षेप करता है और खलनायक को क़ानून के हवाले करने को कहता है. निर्देशक रमेश सिप्पी के अनुसार उनके लाख समझाने के बाद भी सेंसर बोर्ड न सिर्फ अपनी बात पर अड़ा रहा बल्कि निर्देशक को निर्देशित भी किया गया कि कैसे पुलिस आखिरी सीन में आकर ठाकुर को कानून हाथ में लेने से रोकेगी. आखिरकार संजीव कुमार को रूस से वापस बुलाकर (जहां वे एक शूटिंग के लिए गए हुए थे) फिल्म के अंत को फिर से शूट किया गया.
अगर फिल्म की कहानी को देखा जाए तो ठाकुर बलदेव सिंह एक ईमानदार पुलिस ऑफिसर होने के बावजूद दो चोरों की टीम बनाकर डाकू से बदला लेने की योजना बनाता है. और यहां से शुरू होती है फ़िल्मी नायकों के पौरुष की गाथा जिसका सबसे बड़ा पराक्रम होता है जीत और वीरता के लिए बेहिचक कानून को भी अपने हाथों में ले लेना. शोले के संदर्भ में एक मजेदार बात यह है कि दोनों नायकों के नाम भी जय (विजय) और वीरू (वीरता) ही थे.
निर्देशक रमेश सिप्पी के  लाख समझाने के बाद भी, सेंसर बोर्ड न सिर्फ अपनी बात पर अड़ा रहा बल्कि निर्देशक को निर्देशित भी किया गया कि कैसे पुलिस आखिरी सीन में आकर ठाकुर को कानून हाथ में लेने से रोकेगी
इसके बाद से समय धीरे-धीरे निकलता गया और हीरो का पराक्रम कानून से बड़ा होता गया. शोले से क़ानून हाथ में लेने का महिमामंडन जो शुरू हुआ तो आज ‘किक’ और ‘जय हो’ जैसी फिल्मों में कानून को हाथ में क्या जेब में रख कर घूमने के दिन आ गए. जिस तरह 'सिंघम' और 'दबंग' पुलिस अधिकारी और कानून के रखवाले होकर भी बिना अदालतों के सड़क पर फैसले करने लगे उसी तरह कई राउड़ी राठौरों को भी कानून की जरूरत नहीं रही.
शोले से जिस बदलाव की शुरुआत हो रही थी उसी बदलाव ने बाद में शोले को भी बदला और 1990 में आई डीवीडी में फिल्म के अंत को वही कर दिया गया जिसे 15 साल पहले फिल्म से निकलवाया गया था. मतलब ठाकुर दो चोरों की मदद से गब्बर को मारकर आखिर खुद ही अपना बदला ले लेता है.