बिहार के राजनेताओं में मांझी: द माउंटेन मैन’ को लेकर जितना उत्साह है उतना यहां की जनता में क्यों नहीं दिखता?
आज से मांझी— द माउंटेनमैन सिनेमाघरों में है. देश भर के 500 सिनेमाघरों में. फिल्म आने से पहले ही काफी चर्चा में थी. केतन मेहता के साहस की वजह से कि उन्होंने बिहार के एक मामूली दलित मजदूर के उद्यम और प्रेम को फिल्म के जरिये पूरी दुनिया के सामने लाने का साहस जुटाया.
देखा जाए तो गुजरात के केतन मेहता का यह साहस सलाम करने लायक है. बिहार पर ऐसी फिल्मों का अभाव रहा है. बिहार के सबसे बड़े फिल्म निर्माता प्रकाश झा ने न जाने अब तक गंगाजल, अपहरण जैसी कई फिल्में बिहार पर बनाई हैं लेकिन उनमें बिहार के बदनामी वाले पक्ष ही ज्यादा थे. दशरथ पर प्रकाश झा जैसे फिल्मकारों की नजर कभी गई ही नहीं. गयी भी होगी तो शायद उन्हें सूट नहीं किया होगा.
जीतन राम मांझी इस फिल्म को टैक्स फ्री करने की मांग करने ही वाले थे कि नीतीश कुमार ने उनसे यह मौका छीन लिया. एक बार भी बिना फिल्म देखे, फिल्म का कथानक समझे ऐसा किया गया.
दशरथ मांझी ​पर बनी यह फिल्म रिलीज होने से पहले और भी कई वजहों से चर्चा में रही. एक तो यही कि फिल्म रिलीज होने के पहले ही टोरेंट के माध्यम से देश में चुपकउआ रास्ते से, चोरी—चोरी देखी गयी. दूसरी, इस फिल्म को लेकर बिहार के राजनीतिक गलियारे में भी सनसनाहट महसूस की जा सकती थी. चुनावी मौसम में नेताओं को इस फिल्म में अपने लिए संभावनाओं के बिंदु दिख रहे थे.
दशरथ मांझी जिस गया इलाके के थे, उसी इलाके के बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री व फिलवक्त दलितों के चर्चित नेता जीतन राम मांझी भी हैं. जीतन राम मांझी इस फिल्म को टैक्स फ्री करने की मांग करने ही वाले थे कि नीतीश कुमार ने उनसे यह मौका छीन लिया. उन्होंने बिहार में इस सिनेमा को टैक्स फ्री घोषित कर दिया. बताने वाले बताते हैं कि एक बार भी बिना फिल्म देखे, फिल्म का कथानक समझे ऐसा किया गया.
जीतन राम मांझी के अलावा नीतीश कुमार की हड़बड़ी की दूसरी खास वजह यह थी कि भाजपा बिहार चुनाव के ठीक पहले गवर्नर के रूप में रामनाथ कोविंद को लाकर, उन्हें दलित बताकर नया दलित कार्ड खेल रही थी. इसकी काट और भरपाई भी नीतीश कुमार दशरथ मांझी के जरिये करने की कोशिश कर रहे हैं. इसलिए टैक्स फ्री का ऐलान आनन—फानन में हुआ.
दशरथ मांझी आम आदमी के नायक थे. मजदूरों के नायक. सामान्य बिहारियों में उन्होंने गौरव का भाव भरा था. लेकिन से लोग पहले दिन उनका सिनेमा देखने से वंचित रह गये.
यह तो रही राजनीति की बात. अगर बिहार के आमजन की बात करें तो फिल्म की रिलीज वाले दिन बिहार के आम लोगों को निराशा ही हुई है. निराशा का पहला माहौल पटना में बना जहां सबसे ज्यादा दर्शक रहते हैं. बिहार की राजधानी पटना में यह फिल्म एक ही जगह पर लगी. सिनेपॉलिस थियेटर में. जो पटना वाले हैं वे जानते हैं कि राजधानी में सबसे मुख्य जगह पर तीन थियेटर - मोना सिनेमा, एलिफिंस्टन सिनेमा और रीजेंट सिनेमा – हैं. तीनों पटना के केंद्र गांधी मैदान के पास हैं. इन्हीं तीनों थियेटरों को सबसे ज्यादा दर्शक मिलते हैं. सामान्य आदमी से लेकर मध्यवर्ग और इलीट क्लास तक. सिनेपोलिस पटना के दूसरे हिस्से में है और वहां ज्यादातर सिर्फ इलीट क्लास के लोग ही जा पाते हैं.
पटना की बात छोड़ यदि दशरथ मांझी के इलाके गया की ही बात करें तो यह फिल्म गया शहर में भी एक ही थियेटर में रिलीज हुई है. गया में पांच थियेटर हैं शहर में. लेकिन यहां भी फिल्म एक मॉल में ही रिलीज हुई है जहां शहर का इलीट क्लास ही ज्यादा जाता है.
मांझी, जिन पर यह फिल्म बनी है, वे न तो इलीट क्लास के प्रतिनिधि थे और न ही कभी इलीट क्लास के बीच लोकप्रिय ही रहे. बल्कि जीते—जी इलीट क्लास ने कभी उन्हें तवज्जो ही नहीं दी. पहाड़ काट लेने के बाद भी सभ्रांत वर्ग का एक बड़ा खेमा कहता था कि ‘मांझी नौटंकी ​बतिया रहा है, पहाड़ काटा तो उसका पत्थर कहां गया, बताना चाहिए. क्या बेच दिया?’ इनमें से कुछ लोग यह सवाल उठाते थे कि क्या मांझी ने पहाड़ काटने से पहले वन विभाग की अनुमति ली थी? दशरथ मांझी आम आदमी के नायक थे. मजदूरों के नायक. सामान्य बिहारियों में उन्होंने गौरव का भाव भरा था. लेकिन आम आदमी, मजदूर और सामान्य बिहारी ही पहले दिन उनका सिनेमा देखने से वंचित रह गये. फिल्म के टैक्स फ्री होने के बाद भी.
मगध सहित बिहार के एक बडे हिस्से में कोई विश्वास नहीं कर सकता कि फगुनिया की मृत्यु वैसे हुई थी, जैसे केतन मेहता ने फिल्म में दिखाया है.
हालांकि बिहार में मांझी— द माउंटेनमैन के प्रति उत्साह नीचे उतरा है तो उसकी कुछ और वजहें भी हैं. निस्संदेह इस फिल्म में नवाजुद्दीन ने बेहतरीन अभिनय किया है. लेकिन दशरथ मांझी को लेकर रिसर्च करने में निर्देशक केतन मेहता से चूक हो गई लगती है. फिल्म में दशरथ मांझी अपनी पत्नी सह प्रेमिका फगुनिया को प्रेम के उपहार स्वरूप ताजमहल देते हैं. इस दृश्य से बिहारी तारतम्य नहीं बिठा पा रहे हैं. जिस दौर में फिल्म को ले जाकर मुसहर समाज के परिवार को केंद्र में रखकर यह फिल्म बनायी गयी है, उसमें ताजमहल जैसी चीजों का उपहार थोड़ा अटपटा है. दशरथ को तो खुद भी पता नहीं होगा कि वे खुद प्रेम की जिस निशानी को रास्ते के रूप में स्थापित कर रहे हैं, वह किसी ताजमहल को बौना साबित कर देगी.
मांझी को फगुनिया के साथ प्रेमालाप के वक्त तकिया—तकिया खेलते हुए भी दिखाया है केतन ने. यह दृश्य मांझी समुदाय के प्रेम और व्यवहार के तरीके से बिलकुल मेल नहीं खाता. इस फिल्म में मांझी के पहाड़ तोड़ते वक्त ही नक्सल आंदोलन का भी प्रवेश होता है. जबकि बिहार के गया जिले में नक्सल आंदोलन का प्रवेश मांझी के पहाड़ तोड़ लेने के बाद होता है. करीब 1984 में.
लेकिन इन सबसे खास बात यह है कि इस फिल्म में दशरथ मांझी की पत्नी फगुनिया की मौत का दृश्य भी भ्रम पैदा करने वाला है. मगध सहित बिहार के एक बडे हिस्से में कोई विश्वास नहीं कर सकता कि फगुनिया की मृत्यु वैसे हुई थी, जैसे केतन मेहता ने फिल्म में दिखाया है. उनकी मौत दशरथ मांझी के लिए खाना-पानी लेकर जाते वक्त पहाड़ के संकरे रास्ते में फंसकर गिर जाने से नहीं हुई थी. वे बाद में दुनिया से विदा हुई थीं. दूसरी बीमारी से. कई दिनों तक यह देखने के बाद कि दशरथ दिन भर पेट की मजदूरी करने के बाद अपनी फगुनिया और उनके जैसी और औरतों की जिंदगी को आसान बनाने के लिए रोज पहाड़ काटते हैं.