बलात्कार पर सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के विवादित बयानों के बाद कानून की अदालत में भले ही बात दब जाए, लेकिन जनता की अदालत में तो इस पर कुछ न कुछ फैसला होगा ही.
हाल में धरती पुत्र मुलायम सिंह यादव का एक और बयान समाजवादी पार्टी के लिए शर्मिंदगी और परेशानी का सबब बन गया. बलात्कार पर मुलायम के इस बयान का संज्ञान लेते हुए महोबा जिले में कुलपहाड़ तहसील के एक न्यायिक मजिस्ट्रेट ने उन्हें 16 सितंबर को अदालत में पेश होने के लिए तलब किया. फिलहाल इस आदेश को एक दूसरी अदालत ने अपनी अगली सुनवाई तक के लिए स्थगित कर दिया है. यह सुनवाई 26 सितंबर को होनी है.
आम तौर पर मुलायम को भाषा और बोलचाल के मामले में भद्र राजनेता माना जाता है. अपने विरोधियों के प्रति आक्रामक होते समय भी उन्हें अभद्र और गैर जिम्मेदाराना ढंग से बोलते कम ही सुना गया है. लेकिन इधर कुछ समय के दौरान उनकी जुबान से निकले कुछ बोलों ने उनकी परंपरागत छवि को उलट सा दिया है. अब तक जब वे सार्वजनिक मंचों से अपनी सरकार और पुत्र यानी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की कड़ी आलोचना करते थे तो सपा बहुत आसानी से अपने हाथ झाड़ लेती थी. तर्क यह होता था कि भला कौन पिता अपने पुत्र को और कौन नेता अपने कार्यकर्ताओं को डांटता नहीं. लेकिन ताजा मामलों में मुलायम के बोलों पर पार्टी के लिए भी उनका बचाव कर पाना मुश्किल हो रहा है.
अब तक मुलायम अपनी सरकार या मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की कड़ी आलोचना करते थे तो सपा तर्क देती थी कि भला कौन पिता अपने पुत्र और कौन नेता अपने कार्यकर्ताओं को डांटता नहीं. लेकिन अब उनके बोलों पर पार्टी के लिए भी कोई बचाव कर पाना मुश्किल हो रहा है.
पिछले महीने जब मुलायम ने फोन पर आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर को धमकाया था तब भी उस मामले ने बहुत तूल पकड़ा था. लेकिन 18 अगस्त को उन्होंने एक कार्यक्रम में ‘एक महिला के साथ चार लोग रेप कर ही नहीं सकते.’ कह कर सार्वजनिक व्यवहार की भी सारी हदें पार कर दीं. बेमौके उनके मुंह से निकले इस बोल ने वहीं मौजूद अखिलेश यादव को भी निगाहें नीची कर लेने पर मजबूर कर दिया था.
बलात्कार पर मुलायम के इस बयान की राजनीतिक दलों के बीच कड़ी प्रतिक्रिया हुई. महिला अधिकार के लिए लड़ने वाले संगठनों ने तो इस बयान को बलात्कार की प्रवृत्ति को बढ़ाने वाला कह कर मुलायम से माफी मांगने को भी कहा. मगर महोबा जिले में कुलपहाड़ तहसील की सिविल जज, जूनियर डिविजन की अदालत के न्यायिक मजिस्ट्रेट अंकित गोयल को मुलायम के यह बोल इतने नागवार गुजरे कि उन्होंने आईपीसी की धारा 504, 505, 509 व 116 और इंडीसेंट रिप्रजेंटेशन ऑफ वीमेन प्रोहिबिशन एक्ट 1986 की धारा 3 और 4 के तहत समन जारी कर मुलायम सिंह को अदालत में हाजिर होने का आदेश दे डाला.
कुलपहाड़ की अदालत
कुलपहाड़ की अदालत

अपने छह पन्ने के आदेश में मजिस्ट्रेट ने कहा कि, ‘भारतीय कानून और संविधान में महिला की गरिमा को जो स्थान व सम्मान दिया गया है, श्री मुलायम सिंह यादव का उक्त कृत्य उसके भी प्रतिकूल प्रतीत होता है. रेप जैसे जघन्य अपराध की पीड़िताओं (निर्भया) व उनके परिवार जनों आदि को उक्त प्रकार के आपत्तिजनक कथन कितनी असुरक्षा और पीड़ा उत्पन्न करते हैं,  इसका अनुमान लगाना भी असम्भव है. तथा साथ ही उक्त प्रकार के आपत्तिजनक शब्द समाज में रेप जैसी आपराधिक घटनाओं को और बढ़ाने में भी सहायक प्रतीत होते हैं. श्री मुलायम सिंह यादव के विरूद्ध उनके उक्त तथ्यों के कारण विधिनुसार कार्यवाही करना न्यायोचित प्रतीत होता है.’ न्यायिक मजिस्ट्रेट ने बलात्कार के बारे में मुलायम सिंह यादव के 2014 के मुरादाबाद और अगस्त 2015 के लखनऊ के दोनों बयानों का संज्ञान लेते हुए सीआरपीसी की धारा 191 (1) सी के आधार पर कार्यवाही की. लोकसभा चुनाव के दौरान अप्रैल 2014 में मुरादाबाद की एक रैली में मुलायम सिंह ने बलात्कारियों की पैरवी करते हुए कहा था कि बलात्कार के मामलों में फांसी की सजा गलत है. लड़के हैं, लड़कों से गलती हो जाती है.
इस मामले ने आम आदमी के मन में न्यायपालिका का सम्मान भी बढ़ाया है क्योंकि पहली बार प्रदेश की एक छोटी अदालत ने प्रदेश के सबसे बड़े नेता को टोका है और साबित किया है कि कानून की नजर में सब बराबर हैं.
हालांकि मजिस्ट्रेट अदालत की कार्रवाई के फौरन बाद ही उसके इस अधिकार को लेकर सवाल खड़े होने शुरू हो गए थे. विधि जानकारों का मानना था कि मजिस्ट्रेट अदालत को इस तरह सुओमोटो यानी स्वतः संज्ञान लेने का अधिकार नहीं है. वरिष्ठ कानूनविद आईबी सिंह के मुताबिक मजिस्ट्रेट अदालत किसी शिकायत पर तो ऐसा संज्ञान ले सकती है लेकिन, स्वतः संज्ञान का अधिकार सिर्फ आईपीसी की धारा 226 या 482 के तहत हाईकोर्ट को और धारा 32 या 131 के तहत सुप्रीम कोर्ट को ही है. उनका कहना था कि ऐसी स्थिति में आरोपी द्वारा जिला जज या किसी अन्य अदालत में जाने पर यह मामला समाप्त हो जाएगा.
कुछ ऐसा ही होता भी लग रहा है. इस कार्रवाई के अगले ही दिन यानी 22 अगस्त को मुलायम सिंह की ओर से उनके अधिवक्ता राज कुमार सिंह ने जिला जज की अदालत में इस आदेश के पुनर्निरीक्षण के लिए याचिका दाखिल की. उनका तर्क था कि अदालत ने क्षेत्राधिकार के परे जाकर आदेश किया है इसलिए इसे निरस्त किया जाना चाहिए अदालत के पीठासीन अधिकारी चैतन्य कुलश्रेष्ठ ने बहस सुनने के बाद सिविल जज कुलपहाड़ के आदेश का क्रियान्वयन स्थगित कर दिया और अगली सुनवाई के लिए 26 सितंबर की तारीख तय की है.
बहरहाल चाहे कुलपहाड़ की यह चेतावनी आगे की कानूनी लड़ाई में ज्यादा टिक न पाए लेकिन इस चेतावनी ने सपा के लिए तो असहजता बढ़ा ही दी है. क्योंकि कानून की अदालत में भले ही बात दब जाए मगर जनता की अदालत में तो इस पर कुछ न कुछ फैसला होगा ही. वैसे इस मामले ने आम आदमी के मन में न्यायपालिका के प्रति सम्मान को भी बढ़ाया है क्योंकि पहली बार प्रदेश की एक छोटी अदालत ने प्रदेश के सबसे बड़े नेता को टोका है और साबित किया है कि कानून की नजर में सब बराबर हैं.
इस मामले में संज्ञान लेने वाले न्यायिक मजिस्ट्रेट अंकित गोयल की छवि एक ईमानदार न्यायिक अधिकारी की है. कुलपहाड़ के लोग उनकी और उनके परिवार की सादगी के कायल हैं. उनका पिछला रिकार्ड भी इसी तरह का रहा है. इसलिए भी मुलायम सिंह यादव के खिलाफ उनकी कलम से जारी ‘सम्मन’ का खास महत्व है.