सेक्स के मामले में स्त्री की सामान्य इच्छा को भी नकारात्मक जबकि पुरुष की अति इच्छा को भी सम्माजनक मानने वाले हमारे समाज के लिए फीमेल वायग्रा में एक जरूरी सबक छिपा है.
हाल में अमेरिका के खाद्य एवं दवा प्रशासन (एफडीए) ने 'फीमेल वायग्रा' बनाने की इजाजत दी है. फ्लिबेनसेरिन रासायनिक नाम वाली यह दवा एड्डी नाम से बिकेगी. अमेरिका के राष्ट्रीय उपभोक्ता संघ का कहना है कि स्त्रियों के यौन स्वास्थ्य के लिए यह बहुत बड़ी पहल है. उसके मुताबिक इस दवा के आने का मतलब है कि समाज स्त्रियों की सेक्सुएलिटी को उनके स्वास्थ्य का एक बहुत अहम हिस्सा मान रहा है. अब जल्द ही इसके भारत में आने की भी चर्चा है.
जैसा कि अमूमन होता है, इस मुद्दे पर भी राय दो धड़ों में बंट गई है. एक तबका इस दवा के आने को बहुत सकारात्मक तरीके से ले रहा है. उधर 'पब्लिक सिटिजन' जैसे वाचडॉग ग्रुप भी हैं जिनका कहना है कि यह दवा अपनी बिक्री शुरू होने के कुछ सालों बाद ही बाजार से गायब हो जाएगी. इसकी वजह वे यह बता रहे हैं कि फीमेल वायग्रा स्त्रियों की सेहत के लिए फायदेमंद कम और नुकसानदेह ज्यादा साबित होगी.
जाहिर है सारी एलौपैथी दवाओं की तरह एड्डी के भी कुछ फायदे और कुछ दुष्प्रभाव यानी साइडइफेक्ट्स होंगे ही. लेकिन इस फायदे और नुकसान से परे एक और चीज भी है जो उतनी ही अहम है. फीमेल वायग्रा अपने आप में बहुत कुछ कहती है. सबसे पहले तो यह कि अमेरिकी समाज ने स्त्रियों की यौनिकता को स्वीकार किया है. उसने माना है कि सेक्स के मामले में स्त्रियों की भी कोई इच्छा होती है या होनी चाहिए जो कई स्त्रियों में अलग-अलग वजहों के चलते पुरुषों की अपेक्षा कम होती है.
हमारे यहां एक तरफ पुरुषों की यौनिकता को जरूरत से ज्यादा महत्व दिया जाता है तो दूसरी ओर स्त्रियों की यौनेच्छा को बहुत ही नकारात्मक तरीके से देखा जाता है.
फीमेल वायग्रा को बनाए जाने की यह सोच असल में इस दवा से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है. यह दवा स्त्रियों की यौनेच्छा का सम्मान करने का नतीजा है. भारतीय समाज में भी इस दवा की बिक्री से ज्यादा इस दवा के पीछे की सोच को फैलाए जाने की जरूरत है.
'फीमेल वायग्रा' की खोज इस तरफ साफ इशारा करती है कि पूरी दुनिया के समाजों में स्त्री-पुरुष की यौनेच्छा में बेहद ज्यादा फर्क है और इसे एक स्तर पर लाए जाने की जरूरत है. जब अमेरिका जैसे खुले समाज में यह बात मान ली गई है कि स्त्रियों में पुरुषों की अपेक्षा यौनेच्छा कम होती है तो हम सहज ही अनुमान लगा सकते हैं कि भारतीय समाज में स्त्रियों की यौनेच्छा का प्रतिशत क्या होगा. यहां तो स्त्री-पुरुष की यौनेच्छा के फर्क की तस्वीर और भी ज्यादा भयंकर है.
इसके पीछे बहुत सारे कारण जिम्मेदार हैं. हमारे यहां एक तरफ पुरुषों के सेक्स की इच्छा को जरूरत से ज्यादा महत्व दिया जाता है तो स्त्रियों के मामले में इस बात को बहुत ही नकारात्मक तरीके से देखा जाता है. भारतीय समाज में पुरुषों की सेक्स ड्राइव को भड़काने वाली तमाम कवायदें बेहद शर्मनाक तरीके से चलती हैं. इसका परिणाम यह होता है कि ज्यादातर पुरुष अक्सर यौनेच्छा के दायरे में ही चक्कर लगाते रहते हैं और इसी कारण उनका व्यवहार अति कामुक हो जाता है. पुरुषों का यह अति कामुक व्यवहार सेक्स की इच्छा के प्रति स्त्रियों के मन में एक घिन सी पैदा करता है. इसके अलावा किसी भी स्तर पर पुरुषों को यह नहीं सिखाया जाता कि कैसे उन्हें स्त्रयों की यौनेच्छा सम्मान करना चाहिए. यानी जैसे वे अपने चरम सुख के प्रति हद दर्जे तक सचेत होते हैं, वैसे ही उन्हें स्त्रियों के चरम सुख के प्रति भी सचेत और समर्पित होना चाहिए.
दुनिया की किसी भी यौनविषयक वेबसाइट, किताब या फिल्म में इस बारे में बड़ी भयंकर चुप्पी है कि कैसे पुरुषों को स्त्रियों की यौनेच्छा का सम्मान करना चाहिए
दरअसल भारतीय समाज में स्त्री यौनेच्छा को लेकर भयंकर विरोधाभासी स्थिति है. एक तरफ धार्मिक किताबों यहां तक कि स्कूल की विज्ञान की किताबों में भी कहा गया है कि स्त्रियों की यौनेच्छा पुरुषों की अपेक्षा लगभग आठ गुना ज्यादा होती है. दूसरी तरफ व्यवहार में हम देखते हैं कि अधिकांश पतियों की शिकायत होती है कि उनकी पत्नियों को बेहद कम यौनेच्छा होती है. साथ ही पत्नियों से भी अक्सर सुनने में आता है कि उन्हें पतियों की अपेक्षा काफी कम यौनेच्छा होती है. मतलब स्त्री की यौनेच्छा को किताबों में तो बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है, जबकि हकीकत में वह सामान्य से भी कम है!
सवाल उठता है कि ऐसा क्यों है. असल में हमारा समाज स्त्री की यौनेच्छा के प्रति बेहद कठोर और निर्मम है. व्यवहार में हम देखते हैं कि स्त्री की सामान्य यौनेच्छा को बहुत ही नकारात्मक तरीके से देखा जाता है जबकि पुरुषों की अतियौनेच्छा को भी समाज सम्मान से देखता है. हाल ही की दो फिल्मों 'बुलेट राजा' और 'रामलीला' के नायक शादी से पहले कई स्त्रियों के साथ यौन संबंध बनाए जाने की बात कितने फक्र से कहते हैं. वे फिर भी नायक ही हैं. लेकिन नायिका के किसी एक के साथ यौन सबंध भी उसे खलनायिका बनाने के लिए बहुत हैं. यहां साफ पता चलता है कि समाज स्त्री और पुरुष की यौनेच्छा के प्रति कितना अलग व्यवहार करता है.
पूरी दुनिया के यौनविषयक व्यापार में स्त्रियों को भोग किये जाने वाली वस्तु की तरह पेश किया गया है. इसमें जोर इस पर होता है कि कैसे इस वस्तु से ज्यादा से ज्यादा आनंद लिया जा सके. लेकिन सेक्स से जुड़ी किसी भी वेबसाइट, किताब या फिल्म में इस बारे में बड़ी भयंकर चुप्पी दिखती है कि कैसे पुरुषों को स्त्रियों की यौनेच्छा का सम्मान करना चाहिए और कैसे 'सेक्स' को 'संभोग' (सम़भोग यानी बराबर भोग या आनंद की स्थिति) बनाया जाना चाहिए. अपवाद हो सकते हैं.
ज्यादातर भारतीय पति अपनी पत्नियों को स्लीपिंग पिल की तरह इस्तेमाल करते हैं. बहुत हद तक पतियों का यह व्यवहार भी पत्नियों की यौनेच्छा को कम से कम करने के लिए जिम्मेदार है.
ज्यादातर भारतीय पति अपनी पत्नियों को स्लीपिंग पिल यानी नींद की गोली की तरह इस्तेमाल करते हैं. बहुत हद तक पतियों का यह व्यवहार भी पत्नियों की यौनेच्छा को कम से कम करने के लिए जिम्मेदार है. हमें समझना होगा कि समाज में बढ़ रहा स्त्री-पुरुष यौनेच्छा का भयंकर असंतुलन भी कहीं न कहीं बढ़ रहे यौन हमलों के प्रति जिम्मेदार है. निश्चित ही से एक संतुष्ट दिमाग तुलनात्मक रूप से कम फिराकी और हमलावर होगा. स्त्रियों की यौनेच्छा और यौनिकता का सम्मान न सिर्फ स्त्रियों के यौनसुख का ध्यान रखेगा बल्कि पुरुषों के यौनसुख का स्तर भी बहुत ज्यादा बढ़ाएगा. इस बात को एक छोटे से उदाहरण से भी समझा जा सकता है. एक हंसता-खिलखिलाता और संतुष्ट बच्चा रोते, कलपते और चिड़चिड़े बच्चे से कहीं ज्यादा सुख, सुकून और आनंद देता है.
असल में 'फीमेल वायग्रा' से कहीं ज्यादा असरदार कुछ और चीजें हो सकती हैं. हमें यह समझना और स्वीकार करना होगा कि सामाजिक उत्पादन में प्रत्यक्ष रूप से लगीं यानी कामकाजी महिलाएं और परिवार-समाज की नींव बनाने में खुद को खपाती यानी सिर्फ घर का काम करने में लगीं महिलाएं, दोनों ही अलग-अलग तरह के दबावों से घिरी रहती हैं. दिमाग जितना ज्यादा काम और जिम्मेदारियों के दबाव में रहेगा यौनेच्छा भी उतनी ही कम होगी. कामकाजी स्त्रियों को अक्सर ही परिवार और बच्चे की पूरी जिम्मेदारी अकेले उठानी पड़ती है. इस कारण उनका दिमाग हर समय घर, ऑफिस और बच्चों को 'मैनेज' करने में लगा रहता है. पुरुष परिवार और बच्चों की जिम्मेदारी में बराबर का हाथ बांटकर स्त्रियों के दिमाग को थोड़ा सुकून दे सकते हैं. इससे पत्नियों के दिमाग में प्रेम प्रदर्शन, सेक्स और रोमांस की भी कुछ गुंजाइश बचेगी या बनी रह सकेगी.
हमें यह समझना और मानना होगा कि कामकाजी महिलाएं और परिवार-समाज की नींव बनाने में खुद को खपाती यानी सिर्फ घर के काम में लगी महिलाएं, दोनों ही अलग-अलग दबावों से घिरी रहती हैं.
इसी तरह गृहणियां जो अपने 'कुछ न करने' (घरेलू स्त्रियों के बारे में अक्सर हम यही सोचते और बोलते हैं) की सोच से घिरी होती हैं, आगे बढ़ते समाज में खुद को कहीं नहीं पातीं और व्यक्तित्वहीनता के बोध से बोझिल रहती हैं. विडंबना देखिए कि उनके जीवन में बिना कोई काम किये भी छुट्टी जैसी चीज का घोर अकाल है. वे अक्सर इस व्यक्तित्वहीनता और पहचान के संकट से झुंझलाई रहती हैं. ये महिलाएं बच्चों के पालन की एकतरफा जिम्मेदारी में पस्त रहती हैं. इन सब कारणों से ऐसी पत्नियों की यौनेच्छा भी लगभग खत्म सी ही रहती है. ऐसे में पति उनके घरेलू काम को सम्मान देकर, उसमें हाथ बंटाकर और कभी-कभी पत्नियों को घरेलू काम से छुटटी देकर उनका भी संडे मनवा दें तो निश्चित तौर पर पत्नियों के यौन व्यवहार पर इसका बेहद सकारात्मक असर पड़ेगा. बच्चों को पालने में का सहयोग करके पत्नियों की निस्तेज हो चुकी यौनेच्छा को वे पुनर्जीवन दे सकते हैं.
ये सारे उपाय निश्चित तौर पर 'फीमेल वायग्रा' से कहीं ज्यादा असरदार होंगे, और सबसे अच्छी बात यह कि इनका कोई साइड इफेक्ट भी नहीं होगा!