पटना में राजद-जदयू-कांग्रेस की मिली-जुली स्वाभिमान रैली हुई तो नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाने के लिए थी लेकिन इसके असली नायक लालू प्रसाद थे.
पटना के गांधी मैदान को ऐतिहासिक बताते समय इस प्रसंग को जरूर याद किया जाता है कि यही वह मैदान है, जहां से जयप्रकाश नारायण ने 70 के दशक में रैली का आयोजन कर इंदिरा सरकार की चूलें हिला दी थीं. इसके बाद कांग्रेस के मुकाबले समाजवादी राजनीति के एक नये अध्याय की शुरुआत हुई थी. उसी गांधी मैदान में 30 अगस्त 2015 को इतिहास ने एक और मोड़ लिया. इस दिन गांधी मैदान में कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी मंच पर मौजूद थीं और जेपी आंदोलन से ही निकले दो प्रमुख समाजवादी पृष्ठभूमि वाले नेता हजारों की भीड़ के सामने कांग्रेस की राजनीति के गुण गा रहे थे.
यह एक और लिहाज से भी एक ऐतिहासिक रैली थी. वर्षों तक एक दूसरे के राजनीतिक दुश्मन रहे नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव इस रैली में एक साथ मंच पर आकर एकता का प्रदर्शन कर रहे थे. यह एकता पहले ही कायम हो गयी थी लेकिन भ्रम का एक भंवरजाल बना हुआ था. यह जाल कितना टूटा यह तो बाद में साफ होगा लेकिन नरेंद्र मोदी के खिलाफ और बिहार के स्वाभिमान की रक्षा के नाम पर हुई स्वाभिमान रैली में कुछ चीजें शीशे की तरह साफ दिखीं. पहली तो यह कि कांग्रेस, जो भागलपुर दंगे के बाद से ही (लगभग ढाई दशक से अधिक समय से) हाशिये पर थी, उसे भी इतनी बड़ी भीड़ के बीच अपनी बात रखने, अपने झंडा-बैनर दिखाने का अवसर मिला.
लालू प्रसाद ने अपने भाषण के जरिये नरेंद्र मोदी और भाजपा को जो कहना था, वह तो कहा ही, लगे हाथ सोनिया और नीतीश से भी कई बातें कह डालीं.
दूसरी, यह रैली नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाने के लिए जरूर हुई लेकिन इसके नायक लालू प्रसाद रहे. लालू प्रसाद ने अपने भाषण के जरिये नरेंद्र मोदी और भाजपा को जो कहना था, वह तो कहा ही, लगे हाथ सोनिया और नीतीश से भी कई बातें कह डालीं. उन्होंने सोनिया गांधी को बताया कि उनसे उनका झगड़ा रहता है, वे उन्हें कम महत्व देती हैं, जो ठीक नहीं. उन्होंने नीतीश कुमार को सार्वजनिक तौर पर डरपोक की संज्ञा देने के बाद आश्वासन दिया कि डरने की जरूरत नहीं, चुनाव बाद भी वे ही सीएम बनेंगे. यह सब कहकर लालू प्रसाद ने नीतीश कुमार को दिखाया कि चुनाव भले ही नीतीश के नाम पर करने-करवाने की सहमति लालू ने दे दी हो लेकिन बड़े नेता वे ही हैं. लालू प्रसाद ने रैली में मंच का जितना इस्तेमाल करना था किया.
अपनी ही पार्टी के सम्मेलनो में जाने से बचने वाली बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी भी वर्षां बाद इस रैली में मंच पर दिखीं और जमकर बोलीं. राबड़ी नये अवतार में थी और जिस तरह से उन्होंने उनके और लालू प्रसाद के शासनकाल को जंगलराज की संज्ञा दिये जाने के खिलाफ तथ्यों और तर्कों के साथ बोला, उससे यह साफ संकेत मिले कि राबड़ी की भी इस चुनाव में अहम भूमिका होने वाली है. यह भी कि वे पहले वाली राबड़ी नहीं है बल्कि खुद को राजनीतिक तौर पर लगातार प्रशिक्षित कर रही हैं.
लालू प्रसाद मंच पर बोलने आये तो उन्होंने कुछ संकेत साफ दिये. उन्होंने जंगलराज टू को खारिज कर इसे मंडलराज पार्ट टू कहा. जातीय जनगणना के बहाने पिछड़ी राजनीति को जिंदा करने की कोशिश की. उन्होंने बार-बार याद दिलाया कि यह 1990 के पहले वाला बिहार नहीं है, जिसमें सामंतों और ऊंची जातियों की चलती चलेगी. लालू प्रसाद ने यह सब कहकर पिछड़ा कार्ड खेलने की पूरी कोशिश की लेकिन फिर तुरंत ही यादवों में सिमट गये. वे लगातार यादवों की राजनीति के बारे में ही बोलते गये.
जिस तरह से उन्होंने राजद के शासनकाल को जंगलराज की संज्ञा दिये जाने के खिलाफ तथ्यों और तर्कों के साथ बोला, उससे यह साफ संकेत मिले कि राबड़ी की भी इस चुनाव में अहम भूमिका होने वाली है
लालू प्रसाद जितने आक्रामक थे, शायद उतने ही चिंतित भी. इसलिए उन्होंने न सिर्फ बिखरते यादव मतों को समेटने के लिए अपील की बल्कि इस तरह यादवी राग में बहे, इतनी बार मुलायम सिंह यादव, शरद यादव का नाम लिया कि दलितों की उन्हें सुध तक नहीं आई. जब वे धन्यवाद कहकर जाने लगे तो किसी ने उन्हें इस बारे में याद दिलाया. इसके बाद लालू प्रसाद ने दलितों को एकजुट होने की अपील की.
एक लाइन में की हुई इस अपील का असर कितना होगा यह भविष्य के गर्भ में है लेकिन रैली में जिस तरह लालू यादव ने मंडल टू और पिछड़ा राजनीति के बहाने यादवों पर अपनी ऊर्जा लगाई उससे भाजपा के खेमे में खुशी का माहौल बना. भाजपा लगातार लालू प्रसाद को इसलिए औऱ इस तरह निशाना पर लेती है  कि वे किसी तरह अपने कोर वोट बैंक यादवों को बचाने में अपनी ऊर्जा खर्च करें ताकि इसके विरोध में गैर यादवों का ध्रुवीकरण दूसरे छोर पर भाजपा की तरफ  हो सके. जाने-अनजाने लालू प्रसाद ने यह मौका आज उसे दे दिया.
इस सबके बीच रैली के घोषित मुख्य हीरो नीतीश कुमार थे. नीतीश को ही मुख्यमंत्री बनाने के लिए यह रैली आयोजित हुई थी और नीतीश कुमार के भाषण को ही इसका मुख्य भाषण मानकर चला जा रहा था. लेकिन वे शायद इस रैली में भारी भीड़ जुटने के बावजूद वह संदेश देने में सफल नहीं हो सके, जिसकी उनसे उम्मीद की जा रही थी. वे द्वंद्व और दुविधा में फंसे हुए नेता की तरह दिखे. उन्होंने स्वाभिमान रैली में सारी पुरानी बातों को दुहराया. बिहार के डीएनए वाले मसले को उठाया. नरेंद्र मोदी की बातों का जवाब देने में समय लगाते रहे. नरेंद्र मोदी ने बिहार में बढ़ते अपराध के आंकड़ों को पेशकर नीतीश के शासनकाल कों जंगलराज की आहट वाला काल कहा था, उसके बचाव में वे आकड़े पेश करते रहे. नीतीश ने स्वाभिमान रैली में नया सिर्फ यही किया कि वे पहली बार लालू प्रसाद के पक्ष में खुलकर बोले और कहा कि जंगलराज की आहट नहीं आने वाली है, जनता निश्चिंत रहे. नीतीश ने बार-बार कहा कि शासन वे कर रहे हैं, आगे भी करना है, इसलिए लोग जंगलराज की चिंता से मुक्त रहें. इसके लिए नीतीश कुमार ने सफाई भी दी कि लालू प्रसाद उनके साथ है लेकिन कभी पैरवी नहीं कर रहे किसी अपराधी के पक्ष में.
नीतीश ने रैली में नया सिर्फ यही किया कि वे पहली बार लालू प्रसाद के पक्ष में खुलकर बोले और कहा कि जंगलराज की आहट नहीं आने वाली है, जनता निश्चिंत रहे.
नीतीश कुमार ने अपने भाषण में एक बार पिछड़ी राजनीति की बात कहने की कोशिश भी की लेकिन वे एक वाक्य तक भी उस पर टिक नहीं सके यानि मंडल टू का जो फेज लालू प्रसाद ने इस रैली से शुरू किया, वह नीतीश के एजेंडे में सेट नहीं हो सका. हो सकता है कि यह रणनीति हो कि लालू प्रसाद की भाषा दूसरी रहेगी और नीतीश कुमार की भाषा दूसरी लेकिन नीतीश कुमार एजेंडे को लेकर फंसते-अटकते हुए दिखे. हालांकि नरेंद्र मोदी के सवा लाख करोड़ वाले पैकेज के बाद अपनी बार से दिये गये पौने तीन लाख करोड़ वाले पैकेज के बारे में सफाई दी कि वे इसे पूरा करेंगे. वे इसे पूरा कैसे करेंगे और फंड कहां से आयेगा, इस पर बोलने की शुरुआत करके भी वे उससे तुरंत बचते हुए नजर आये.
कुल मिलाकर यह रैली भीड़ के हिसाब से सफल रही. नीतीश इस रैली को लालूमय होने से बचाना चाहते थे, जिसमें सफल नहीं हो सके. रैली के पूर्व जिस तरह से पटना की सड़कों पर भीड़ निकली और पटना ठप रहा, उससे रैली पर लालू प्रसाद यादव की गहरी छाप दिखी. नीतीश इस रैली के जरिये भाजपा से तो लड़े ही, खुद से और लालू की परछाईं से भी लड़ते नजर आये.