कुछ समय पहले तक पंजाब में विरोधी दल भी मानते थे कि अगले चुनाव में आप उन्हें बड़ी चुनौती दे सकती है. लेकिन इसके बाद से वह संभावित चुनौती बड़ी तेजी से कमजोर पड़ती जा रही है.
दिल्ली विधानसभा चुनाव में अभूतपूर्व जीत हासिल करने के बाद आम आदमी पार्टी (आप) पंजाब को अपने अगले पड़ाव के तौर पर देख रही है. यही एकमात्र ऐसा राज्य भी है जहां से पार्टी लोकसभा तक पहुंचने में सफल हुई थी. पार्टी को यहां की कुल 13 में से चार सीटों पर विजय मिली थी. यही कारण है कि 2017 में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए आम आदमी पार्टी ने तैयारियां भी शुरू कर दी हैं. हाल ही में पार्टी ने यहां 'पंजाब जोड़ो अभियान' की शुरुआत की है. इस अभियान के तहत कुल 40 रैलियां होनी हैं जिनकी शुरुआत संगरूर में हुई हालिया रैली से हो भी चुकी है.
लेकिन पंजाब जोड़ने के अभियान पर निकली आम आदमी पार्टी यहां खुद ही टूटती नज़र भी आ रही है. हाल ही में पार्टी ने अपने कुल चार में से दो सांसदों को निलंबित कर दिया है. इससे पहले प्रदेश अनुशासन समिति के अध्यक्ष डॉक्टर दलजीत सिंह को भी पार्टी बाहर का रास्ता दिखा चुकी है. प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव के निलंबन के बाद से आम आदमी पार्टी में हुई यह सबसे बड़ी टूट है. इसके अलावा उसके बचे हुए दो सासंदों में से एक भगवंत मान का एक कथित ऑडियो भी सार्वजनिक हुआ है. इसमें वे पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की अपने खिलाफ साजिश करने के लिए आलोचना कर रहे हैं और पार्टी के पंजाब में प्रदर्शन को लेकर संदेह जता रहे हैं.
पार्टी की कमजोर होती स्थिति का एक कारण यह भी है कि योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण जिन लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं वे वही हैं जो कभी आप से उम्मीदें लगाए हुए थे.
सांसद धर्मवीर गांधी और हरिंदर सिंह खालसा को पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में निलंबित किया गया है. आरोप हैं कि ये दोनों लंबे समय से पार्टी नेतृत्व के खिलाफ मुखर होकर बयान दे रहे थे. प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव को पार्टी से निलंबित किये जाने का भी इन दोनों सांसदों ने जमकर विरोध किया था. 29 अगस्त को अमृतसर में एक पार्टी सम्मलेन का आयोजन किया गया था. लेकिन सांसद धर्मवीर गांधी और हरिंदर सिंह खालसा इस सम्मलेन में शामिल होने की बजाय एक समांतर कार्यक्रम में शामिल हुए. इसके बाद ही दोनों पर कार्रवाई करने का फैसला किया गया.
हरिंदर सिंह खालसा ने इस कार्रवाई के लिए पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल और उनके सहयोगी संजय सिंह की तानाशाही को जिम्मेदार ठहराया है. उनके अनुसार पार्टी दिल्ली से लोगों को भेज कर राज्य में संगठन चलाना चाह रही है. स्थानीय नेतृत्व की उपेक्षा किये जाने की शिकायत भी वे लंबे समय से करते आ रहे हैं. खालसा ने पार्टी की राज्य इकाई के मुखिया सुच्चा सिंह के बारे में भी कहा है कि राज्य कार्यकारिणी के आठ में से सात सदस्यों ने उन्हें हटाने का प्रस्ताव पारित कर दिया था मगर फिर भी उन्हें हटाया नहीं गया.
पंजाब में आम आदमी पार्टी के बिखराव की जो स्थिति आज है उसकी नींव तभी पड़ गई थी जब योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण को पार्टी से निलंबित किया गया था. तब भी प्रदेश के कई दिग्गज नेताओं ने इस फैसले का जमकर विरोध किया था. साथ ही पार्टी से जुड़े वामपंथी विचारधारा के लोगों का भी पार्टी से मोहभंग होने लगा था. लेकिन लाख विरोध के बावजूद भी पार्टी ने इन दोनों नेताओं के निलंबन के अपने फैसले को वापस नहीं लिया था. अब पार्टी की कमजोर होती स्थिति का एक कारण यह भी है कि योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण अपने स्वराज अभियान के जरिये पंजाब में खासे सक्रिय हैं. ये अभियान जिन लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है वे वही लोग हैं जो कभी आप से उम्मीदें लगाए हुए थे.
'उन्होंने हमें एक ऐसी पार्टी देने का वादा किया था जो कार्यकर्ताओं की होगी. लेकिन हमें कभी पूछा ही नहीं जाता. डॉक्टर दलजीत सिंह और धर्मवीर गांधी जैसे लोगों के साथ ऐसा बर्ताव किया जा रहा है.'
दिल्ली से लेकर पंजाब तक आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं की मुख्य शिकायत बड़े नेताओं के तानाशाही रवैय्ये को लेकर रही है. इसके अलावा कार्यकर्ताओं की यह भी शिकायत रही है कि उन्हें लगातार नज़रंदाज़ किया जा रहा है, पार्टी के फैसलों में उनकी राय नहीं ली जा रही और न ही उन्हें किसी फैसले पर अपना विरोध दर्ज करने की स्वतंत्रता है. कार्यकर्ताओं की यह नाराजगी आम आदमी पार्टी को पंजाब में वैसा कुछ भी करने से रोक सकती है जो वह यहां करने की सोच रही है.
कुछ समय पहले तक पंजाब में आम आदमी पार्टी की पकड़ लगातार मजबूत हो रही थी और कांग्रेस समेत भाजपा एवं अकाली दल भी यह खुले तौर से स्वीकारने लगे थे कि 2017 में होने वाले विधानसभा चुनावों में आप उन्हें सबसे बड़ी चुनौती दे सकती है. लेकिन अपने दो सासंदों और अन्य महत्वपूर्ण नेताओं को बाहर का रास्ता दिखाने के बाद प्रदेश में पार्टी की पकड़ लगातार कमजोर हुई है. पार्टी से निलंबित हुए सांसद खालसा ने भरे मंच से यह आरोप लगाया है कि 'पार्टी में थैली कल्चर चल रहा है. जिसकी थैली बड़ी होती है, उसे शामिल कर लिया जाता है. पार्टी राह से भटक चुकी है और इसके नेताओं पर व्यक्तिवाद हावी हो रहा है.'
खालसा के इस बयान को पंजाब में पार्टी कार्यकर्ताओं द्वारा भारी समर्थन भी मिल रहा है. इससे उस असंतोष को भी समझा जा सकता है जो पार्टी के आम कार्यकर्ताओं में व्याप्त है. पंजाब के कई युवा अपना भविष्य दांव पर लगाकर इस पार्टी के लिए काम कर रहे हैं. लेकिन बीते कुछ समय में जिस तरह से आम आदमी पार्टी के नेताओं में बिखराव हुए हैं उनके कारण इन युवाओं की उमीदें टूटी हैं. ऐसे ही एक युवा समीत सिंह भुल्लर एक साक्षात्कार में बताते हैं कि कुछ साल पहले वे ऑस्ट्रेलिया जाने की पूरी तैयारी कर चुके थे. तभी अन्ना आन्दोलन शुरू हुआ और वे एक नयी उम्मीद लिए यहीं रुक गए. उन्होंने इस आन्दोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. बाद में जब आम आदमी पार्टी बनी तो वे भी इसके सदस्य और कार्यकर्ता बन गए. आज समीत को अपने उस फैसले पर अफ़सोस होता है. एक साल पहले तक पंजाब में गांव-गांव घूमकर पार्टी का प्रचार करने वाले समीत आज खुद को ठगा हुआ सा महसूस कर रहे हैं. वे बताते हैं, 'उन्होंने हमें एक ऐसी पार्टी देने का वादा किया था जो नेताओं की नहीं बल्कि कार्यकर्ताओं की होगी. लेकिन हमें कभी पूछा ही नहीं जाता. डॉक्टर दलजीत सिंह और धर्मवीर गांधी जैसे लोगों के साथ ऐसा बर्ताव किया जा रहा है.'
'पार्टी में थैली कल्चर चल रहा है. जिसकी थैली बड़ी होती है, उसे शामिल कर लिया जाता है. पार्टी राह से भटक चुकी है और इसके नेताओं पर व्यक्तिवाद हावी हो रहा है.'
समीत और उन जैसे कई कार्यकार्ताओं द्वारा दो सांसदों के निलंबन पर सवाल उठाए जाने के जवाब में पंजाब के राज्य संयोजक सुच्चा सिंह कहते हैं 'पार्टी से बड़ा कोई नहीं है. जसवंत सिंह, उमा भारती, नटवर सिंह और कल्याण सिंह जैसे अन्य पार्टियों के उदाहरण हमारे सामने हैं.' साथ ही वे यह भी कहते हैं कि, 'अनुशासन बिगाड़ने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने से कोई गलत संदेश नहीं जाता. कोई भी सबको साथ लेकर नहीं चल सकता. मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल तो अपने भाई को भी अपने साथ नहीं रख सके. क्या इससे उन्हें कोई फर्क पड़ा?
लेकिन आम आदमी पार्टी पर ऐसे फैसलों का क्या प्रभाव हो सकता है, इसका अंदाजा समीत के ही एक जवाब से लगाया जा सकता है. वे कहते हैं, 'मैं इस पार्टी में सिर्फ इसलिए शामिल हुआ था क्योंकि मुझे लगा था कि यह अन्य पार्टियों से अलग है.' यानी कि समीत जैसे कार्यकर्ताओं की नजर में अब पार्टी की छवि अन्य दलों से अलग नहीं है. ऐसे में 2017 के विधानसभा चुनाव में अकाली-भाजपा गठजोड़ या कांग्रेस को छोड़कर अगर मतदाता आम आदमी पार्टी को वोट देगा तो आखिर क्यों देगा!