यूरोप में आ रहे शरणार्थियों में एक बड़ी संख्या ऐसे पाकिस्तानियों की भी है जो खुद को सीरियाई बताकर शरण मांग रहे हैं. इन्हें या तो इस्लामी संस्थाएं वहां भेज रही हैं या पाकिस्तान के मुश्किल हालात.
अगस्त के आखिर की बात है. ऑस्ट्रिया में वियेना के पास के एक हाईवे पर लावारिस खड़े एक ट्रक को देखकर पुलिस का माथा ठनका. इस फ्रीजर ट्रक को खोला गया तो सबके होश होड़ गए. भीतर 71 लाशें थीं जो सड़ने लगी थीं. बाद में पता चला कि ये लाशें उन शरणार्थियों की थीं जो भूख-प्यास और दमघुटने से मर गए थे. चार सितंबर को फिर हंगरी से लगती ऑस्ट्रियाई सीमा पर एक लावारिस फ्रीज़र ट्रक खड़ा मिला. इस बार उसमें अलग-अलग देशों के 81 शरणार्थी ठुंसे हुए थे. उन्हें लगभग अंतिम क्षणों में मरने से बचा लिया गया.
एशिया और अफ्रीका के कई देशों में उथल-पुथल मची हुई है. इस्लामिक स्टेट या दूसरे आतंकी गुटों और स्थानीय सरकारों के बीच हो रहे टकराव के बीच जान बचाने की मजबूरी में लाखों लोग यूरोप की तरफ भाग रहे हैं. वे टूटी-फूटी नावों में भेड़-बकरियों की तरह ठुंसकर भूमध्यसागर की लंबी और खतरनाक यात्राएं कर रहे हैं. इस दौरान इटली, ग्रीस या माल्टा पहुंचने की कोशिश में कितने शरणार्थियों की मौत हो चुकी है इसका ठीक-ठीक आंकड़ा कोई नहीं जानता. अलग-अलग अनुमानों के मुताबिक 2015 के अगस्त माह तक ऐसी मौतों की संख्या तीन हज़ार का आंकड़ा पार कर चुकी है. इसी अवधि में कुल 3.32 लाख शरणार्थी भूमध्य सागर के रास्ते से यूरोपीय संघ के देशों में पहुंचे हैं. यह संख्या आने वाले महीनों में कई गुना बढ़ने वाली है.
पाकिस्तानी यूरोप में शरण मांगने वाला पांचवां सबसे बड़ा समुदाय बन गए हैं. नॉर्वे, स्वीडन और डेनमार्क जैसे देशों की जनसंख्या में पाकिस्तानियों का अनुपात अन्य विदेशियों की तुलना में चौंकाने वाला है.
2014 में पूरे यूरोपीय संघ में नए शरणार्थियों की पंजीकृत संख्या लगभग 6.25 लाख थी. 2015 में अकेले जर्मनी में यह आंकड़ा आठ लाख हो जाने की संभावना है. जर्मनी और फ्रांस मिल कर दबाव डाल रहे हैं कि एक कोटा-प्रणाली के अंतर्गत इन शरणार्थियों को यूरोपीय संघ के सभी 28 देशों में बांटा जाय. पूर्वी यूरोप के चार देश – हंगरी, पोलैंड, चेक गणराज्य और स्लोवाकिया – अपना एक अलग गुट बना कर इसका प्रबल विरोध कर रहे हैं. इसके अवाला पूर्वी यूरोप के ही रोमानिया, बुल्गारिया, स्लोवेनिया, क्रोएशिया और तीन बाल्टिक देशों का भी यही सोचना है.
मुश्किल से एक करोड़ की जनसंख्या वाले ग्रीस या हंगरी जैसे छोटे देशों को डर है कि वे शरणार्थियों की इस विशाल तादाद के पैरों तले खुद ही न कुचले जाएं. इटली, ग्रीस या हंगरी में इन शरणार्थियों के साथ बीते दिनों जो अमानवीयता देखने में आई और जो मीडिया में सनसनी बनी, उसके पीछे यही मुख्य कारण है. लेकिन इस डर की और भी वजहें हैं. उदाहरण के लिए शरण मांग रहे शरणार्थियों में एक बड़ी संख्या उन लोगों की भी है जो असल में हैं तो पाकिस्तानी, लेकिन खुद को गृहयुद्ध की विभीषिका से जूझ रहे सीरिया का नागरिक बता रहे हैं.
खबरों मे आ रहा है कि पाकिस्तान की कुछ इस्लामवादी संस्थाएं वहां के लोगों को शरणार्थी बन कर यूरोप जाने के लिए प्रेरित और प्रायोजित कर रही हैं. अगस्त के अंतिम दिनों में हंगरी में जो शरणार्थी फंसे हुए थे, उनके बीच पाकिस्तानियों का विश्वास अर्जित कर उनसे बात करने वाले हिंदी भाषा के एक हंगेरियाई छात्र ने इसकी पुष्टि की है. इस छात्र ने एक टीवी चैनल को बताया कि कई पाकिस्तानियों ने उससे कहा कि उन्हें यूरोप में इस्लाम का प्रचार करने के लिए भेजा गया है. उनकी यात्रा का सारा ख़र्च उनकी प्रायोजक संस्थाएं उठा रही हैं. इन संस्थाओं से जुड़े और यूरोप में पहले से रह रहे कुछ पाकिस्तानी उनका मार्गदर्शन कर रहे हैं. उन्हें आसानी से वीसा नहीं मिल सकता था, इसलिए वे शरणार्थी बन कर आए हैं और दूसरे देशों के शरणार्थियों के बीच रह रहे हैं.
कई पाकिस्तानियों ने उससे कहा कि उन्हें यूरोप में इस्लाम का प्रचार करने के लिए भेजा गया है. उनकी यात्रा का सारा ख़र्च उनकी प्रायोजक संस्थाएं उठा रही हैं.
कुछ दूसरे पाकिस्तानी ऐसे भी हैं जो इस शरणार्थी संकट की आड़ में यूरोप के किसी समृद्ध देश में एक नई जिंदगी शुरू करना चाहते हैं. इन्हीं में एक रफीक भी हैं. सीमा पर लगी बाड़ को पार करते वक्त एक समाचार एजेंसी से बातचीत में वे कहते हैं, 'मैं अपनी पुरानी जिंदगी पीछे छोड़ रहा हूं और एक नई शुरू कर रहा हूं. अपनी पहचान साबित करने के लिए मेरे पास न कोई पासपोर्ट है और न कोई दूसरा दस्तावेज. देखते हैं वे मुझे कहां भेजते हैं.' समाचार एजेंसी के मुताबिक ऐसे कई पाकिस्तानी हैं जो अपना पासपोर्ट या कोई दूसरा पहचान पत्र फाड़कर फेंक चुके हैं ताकि उन्हें पहचाना न जा सके.
खुद को सीरियाई बताने वाले पाकिस्तानियों की बड़ी संख्या से सीरिया के शरणार्थी भी हैरान हैं. फिलहाल सर्बिया के बेलग्रेड पार्क में डेरा डाले सीरिया के कमाल सालेह कहते हैं, 'हर कोई कह रहा है कि वह सीरिया से है. यह हम सीरियाई लोगों के लिए ठीक नहीं है क्योंकि हमें एक निश्चित संख्या में ही शरण मिलनी है.'
संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायोग (यूएनएचसीआर) के अनुसार यूरोपीय संघ में सिर्फ तीन देशों के शरणार्थियों की संख्या - सीरिया (38 फीसदी), अफ़ग़ानिस्तान (12 फीसदी) और पाकिस्तान (9 फीसदी) - ग़रीबी, अराजकता और कबीलाई कलह के लिए बदनाम अफ्रीकी देशों के शरणार्थियों से कहीं ज्यादा है. यूरोपीय संघ के आंकड़े दिखाते हैं कि उसके सदस्य देशों में 2014 में जिन 10 देशों से सबसे ज्यादा शरणार्थी आये, उनमें से आठ देश अरब या पाकिस्तान जैसे गैर-अरब इस्लामी देश हैं. कुल 6.25 लाख शरणार्थियों में से इन इस्लामिक देशों से आये शरणार्थियों की ही संख्या 5.76 लाख यानी 92 फीसदी से अधिक थी. इनमें से सबसे अधिक सीरिया से आये थे. दूसरे नंबर पर अफ़ग़ानिस्तान था और तीसरे पर पाकिस्तान.
'हर कोई कह रहा है कि वह सीरिया से है. यह हम सीरियाई लोगों के लिए ठीक नहीं है क्योंकि हमें एक निश्चित संख्या में ही शरण मिलनी है.'
2014 में पाकिस्तान के करीब 20 हजार लोगों ने यूरोप में शरण मांगी थी. 2015 के पहले चार महीनों में पाकिस्तानी शरणार्थियों की संख्या 7,545 थी. आंकड़े बताते हैं कि पाकिस्तानी यूरोप में शरण मांगने वाला पांचवां सबसे बड़ा समुदाय बन गए हैं. नॉर्वे, स्वीडन और डेनमार्क जैसे देशों की जनसंख्या में पाकिस्तानियों का अनुपात अन्य विदेशियों की तुलना में चौंकाने वाला है. उत्तरी यूरोप के इन देशों में ऐसी कड़ाके की बर्फीली ठंड पड़ती है कि अच्छे-अच्छों की हालत खराब हो जाए. बहुत कम जनसंख्याओं वाले यूरोप के ये सबसे ठंडे देश सबसे खुशहाल देश भी हैं. इसलिए वहां पाकिस्तानियों की अधिकता अनायास ही तो नहीं हो सकती!
शरणार्थी कौन
यूरोप में शरणार्थी उसे माना जाता है, जो यूरोपीय संघ की भू-सीमा, समुद्री सीमा या अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर तैनात आव्रजन अधिकारियों से कहे कि वह साधनहीन शरणार्थी है और उसे 'राजनीतिक शरण' चाहिये. इसके साथ ही एक लंबी-चौड़ी प्रक्रिया शुरू हो जाती है. इस दौरान उसे अधिकारियों को संतुष्ट करना होता है कि अपने देश में उसे नस्ल, धर्म, राजनीतिक विचारधारा या गतिविधियों या फिर समलैंगिकता जैसे किसी विशेष सामाजिक पूर्वाग्रह के कारण गंभीर भेदभाव, उत्पीड़न या जान के ख़तरे का सामना करना पड़ रहा है. ये सभी दावे ऐसे हैं, जो विश्वसनीय लगने वाले मनगढंत वर्णनों, योजनाबद्ध तरीके से जुटाए गए सच्चे-झूठे प्रमाणों और कुशल वकीलों व दुभाषियों की सहायता से मनवाये जा सकते हैं.
शरणार्थी के तौर पर मान्यता मिल जाने के बाद हर व्यक्ति को उस देश में तब तक रहने और काम करने का अधिकार मिल जाता है, जब तक वह स्वदेश नहीं लौटना चाहता. एक निश्चित समय-सीमा के बाद वह व्यक्ति शरणदाता देश की नागरिकता भी प्राप्त कर सकता है. न सिर्फ अपने देश की परेशानियां बल्कि यूरोपीय देशों में मिलने वाली सुविधाएं और सुरक्षाएं भी लोगों को यूरोप की ओर भागने के लिए प्रेरित करती हैं.