भारत और दक्षिण अफ्रीका की सभी क्रिकेट श्रृखंलाओं को महात्मा गांधी और नेल्सन मंडेला का नाम दिया गया है तो यह उस खेल का सम्मान भी है जिसने कभी इन दोनों के मानवाधिकारों के संघर्ष को अपने तरीके से आगे बढ़ाया था.
दक्षिण अफ्रीका की क्रिकेट टीम इस वक्त भारत के एक बेहद लंबे 72 दिन के दौरे पर है. इस दौरान उसे तीन टी-20, पांच एकदिवसीय और चार टेस्ट मैच खेलने हैं. रविवार से शुरू हुए इस दौरे के पहले टी-20 मैच में दक्षिण अफ्रीका ने भारत को सात विकेट से हरा दिया है. लेकिन खेल से जुड़ी चीजों से हटकर कुछ और भी है जो दक्षिण अफ्रीका के इस दौरे को पिछलों से अलग बनाती है.
बीते एक सितंबर को भारत और दक्षिण अफ्रीका के क्रिकेट बोर्ड ने एक अहम घोषणा की थी - भविष्य में दोनों देशों के बीच होने वाली हर सीरीज को महात्मा गांधी- नेल्सन मंडेला सीरीज के नाम से जाना जाएगा. महात्मा गांधी के जन्मदिन से शुरू हुई यह पहली महात्मा गांधी- नेल्सन मंडेला सीरिज है. दक्षिण अफ्रीका के लिए क्रिकेट एक खेल के साथ-साथ वहां की रंगभेद की नीति के खिलाफ संघर्ष का हिस्सा भी रहा है. इसके अलावा क्रिकेट का रंगभेद के खिलाफ पूरी दुनिया में चली लडाई में भी एक महत्वपूर्ण योगदान है. इस लिहाज से भी भारत और दक्षिण अफ्रीका के क्रिकेट को दो ऐसे महान व्यक्तियों का नाम मिलना उचित है जिन्होंने तरह-तरह के भेदभावों और मानवाधिकारों के खिलाफ लंबे और निर्णायक संघर्ष किये.
इधर महात्मा गाधी की हत्या हुई और उधर, उसी साल यानी 1948 में ही दक्षिण अफ़्रीकी नेशनल पार्टी की सरकार ने काले और गोरे लोगों के अलग-अलग रहने की व्यवस्था लागू कर दी.
महात्मा गांधी ने अपने दक्षिण अफ्रीका प्रवास में भारतीय मूल के लोगों की लड़ाई लड़ी थी. उनके इस प्रयास ने अफ़्रीकी मूल के अश्वेतों के दिल में भी अपने अधिकारों की लड़ाई के बीज बो दिए. गांधी वापस भारत आये और ब्रिटिश राज के कभी न डूबने वाले सूरज को एक बड़े हिस्से - भारतीय उपमहाद्वीप - से डुबाने में सबसे बड़ी भूमिका अदा की. ये तमाम अफ़्रीकी देशों के लिए रोशनी की एक किरण थी. लेकिन इसे दुखद संयोग ही कहा जाएगा कि इधर महात्मा गांधी की हत्या हुई और उधर, 1948 में ही दक्षिण अफ़्रीकी नेशनल पार्टी की सरकार ने काले और गोरे लोगों के अलग-अलग रहने की व्यवस्था लागू कर दी. इसे ही रंगभेद नीति या अपार्थाइट कहा गया.
दक्षिण अफ्रीकी अश्वेत समाज के लिए लड़ाई अब और मुश्किल हो गई थी. अब्राहम लिंकन द्वारा दासों को मुक्त करने के लिए अभियान चलाने के 100 साल बाद भी 1950 के दशक तक अमेरिका में ही अश्वेतों की स्थिति दयनीय बनी हुई थी तो फिर दक्षिण अफ्रीका की तो बिसात ही क्या थी. नेल्सन मंडेला के जेल से बाहर आने की तारीख अभी काफी दूर थी. कई राजनैतिक और सामाजिक लड़ाइयां हारते हुए अफ़्रीकी अश्वेत समाज को अपनी पहली जीत मिली खेल के मैदान पर. जेसी ओवन्स, आर्थर ऐश से लेकर मोहम्मद अली और महान फुटबाल खिलाड़ी पेले ने अश्वेत जनमानस में एक आत्मविश्वास तो फूंका था लेकिन बतौर अश्वेत टीम, एक श्वेत खिलाड़ियों की टीम के विरुद्ध खुद को श्रेष्ठ साबित करने का मौका अब तक नहीं आया था.
यह अवसर आया 1975 में वेस्टइंडीज़ की क्रिकेट टीम के साथ. कैरेबियाई द्वीप समूह के 15 देशों की मिली-जुली इस टीम का अगले 15 सालों तक गोरे खिलाड़ियों के वर्चस्व वाले इस खेल पर मानो एकाधिकार रहा.
कई लड़ाइयां हारते हुए अफ़्रीकी समाज को अपनी पहली जीत खेल के मैदान में मिली. मोहम्मद अली और पेले ने अश्वेत जनमानस में एक आत्मविश्वास फूंका तो वेस्टइंडीज की टीम इसे एक नई ऊंचाई पर ले गई.
बेसिल डी’ ओलिवेरा
बेसिल डी’ ओलिवेरा
लेकिन इस महान टीम के विजय अभियान से 25 साल पीछे जाएं तो दक्षिण अफ्रीका में हालात काफी दयनीय थे. 1948 में केपटाउन में जन्मे भारतीय और पुर्तगाली मूल के बेसिल डी’ ओलिवेरा को प्रतिभाशाली क्रिकेट खिलाड़ी होने के बावजूद प्रथम श्रेणी क्रिकेट खेलने से रोक दिया गया. बेसिल ने इंग्लैंड के पत्रकार और क्रिकेट कमेंटेटर जॉन आर्लोट को ख़त लिखा. आर्लोट उस वक़्त रंगभेद नीति के कट्टर विरोधी माने जाते थे. वे अगले साल दक्षिण अफ्रीका आये तो उन्होंने बेसिल को इंग्लैंड ले जाने का फैसला किया. वापसी की यात्रा में आर्लोट ने बेसिल के इमिग्रेशन फॉर्म में रेस यानी नस्ल के कालम में लिखा-ह्यूमन. आगे चलकर बेसिल ने इंग्लैंड के लिए 1966 में टेस्ट मैच खेला. लेकिन दो साल बाद जब बेसिल को दक्षिण अफ्रीका दौरे के लिए जाने वाली इंग्लैंड की टीम में चुना गया तो एक अश्वेत खिलाड़ी वाली टीम से भिड़ने की बजाय दक्षिण अफ्रीका ने उस दौरे को ही रद्द कर दिया.
अब तक दक्षिण अफ्रीका की रंगभेद नीति सारी दुनिया के लिए चिंता का विषय बन चुकी थी. उसे 1964 के ओलंपिक में हिस्सा लेने से रोक दिया गया था. 1971 में उसके अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट खेलने पर भी पाबंदी लगा दी गई. उस वक़्त दक्षिण अफ्रीका दुनिया की सर्वश्रेष्ठ क्रिकेट टीम थी. लेकिन अब उसके विश्वस्तरीय खिलाड़ियों के साथ खेलने वाला कोई नहीं था. बावजूद इसके कि हर क्रिकेट प्रेमी उन्हें खेलते देखना चाहता था. 1971 में इंग्लैंड और वेस्टइंडीज़ को हराने वाली भारतीय टीम के कप्तान अजीत वाडेकर ने तब कहा भी था, 'अफ़सोस हम अपने विजय अभियान को दक्षिण अफ्रीका नहीं ले जा सके.'
1975 के इंग्लैंड में हुए विश्वकप फाइनल में ऑस्ट्रेलिया को हराने के साथ पूरे विश्व में अश्वेतों का आत्मविश्वास एक अलग ही स्तर पर पहुंच गया. ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड को उनके ही देश में धूल चटाने और इंग्लैंड में मिली विश्वकप की जीत के बाद अश्वेत समुदाय के लोग लंदन की सड़कों पर जमकर झूमे. उस वक्त बॉब मारले का संगीत अपने अधिकारों के लिए खड़े होने की आवाज़ लगा रहा था. माइकल होल्डिंग, विवियन रिचर्ड्स जैसे तमाम खिलाड़ी इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया में खुल कर अपने रंग पर अभिमान कर रहे थे. क्रिकेट सदियों से दबे लोगों को आवाज़ दे रहा था.
दुनिया भर में तहलका मचा रही वेस्टइंडीज़ के खिलाड़ियों और बोर्ड के पास पैसा नहीं था. दूसरी तरफ दक्षिण अफ्रीका के पास भरपूर पैसा था, लेकिन क्रिकेट नहीं था.
उधर, दक्षिण अफ्रीका के कई प्रतिभाशाली श्वेत खिलाड़ियों को उच्चस्तरीय क्रिकेट प्रतिद्वंदियों के अभाव में अपने और दक्षिण अफ्रीका के क्रिकेट को बचाना मुश्किल हो रहा था. ऐसे में जरूरी था कि विदेशी टीमों के साथ मैच खेले जाएं और वह भी दुनिया के सबसे बेहतरीन खिलाड़ियों और टीम के खिलाफ. लेकिन रंगभेद के विरुद्ध आवाज़ बनी अश्वेत वेस्टइंडीज़ टीम को दक्षिण अफ्रीका में लाना तकरीबन नामुमकिन था.
दक्षिण अफ्रीका के क्रिकेट अधिकारी लगातार विदेशी टीमों को बुलाने की कोशिशों में लगे रहे और उम्मीद के मुताबिक़ इंग्लैंड, दक्षिण अफ्रीका पहुंचने वाली पहली क्रिकेट टीम बनी. ग्राहम गूच की कप्तानी में आई इस टीम को एक मोटी रकम दी गयी थी. इस टीम को 'विद्रोही टीम' कहा गया और इंग्लैंड ने इन खिलाड़ियों पर तीन साल का प्रतिबंध लगा दिया. एक साल बाद श्रीलंका की भी एक 'विद्रोही टीम' दक्षिण अफ्रीका आने को राजी हुई. इन खिलाड़ियों पर श्रीलंका सरकार ने 25 साल का प्रतिबंध लगाया.
वेस्टइंडीज़ को बुलाने के लिए भी दक्षिण अफ्रीका के प्रयास जारी थे. स्थिति दिलचस्प थी. दुनिया भर में तहलका मचा रही वेस्टइंडीज़ के खिलाड़ियों और बोर्ड के पास पैसा नहीं था. दूसरी तरफ दक्षिण अफ्रीका के पास भरपूर पैसा था, लेकिन क्रिकेट नहीं था. इस सबके बीच अखबारों में खबरें छपने लगी थीं कि वेस्टइंडीज़ के कई खिलाड़ियों ने दक्षिण अफ्रीका के लिए हामी भर दी है. जाने वालों की सूची में तमाम खिलाड़ियों के अलावा एक मशहूर नाम  भी आ रहा था... विवियन रिचर्ड्स.
वेस्टइंडीज़ की टीम को हर जगह हाथों हाथ लिया गया. हर खिलाड़ी को तकरीबन डेढ़ लाख अमेरिकी डालर दिए गए. रिचर्ड्स ने बाद में खुलासा किया कि उन्हें ब्लैंक चैक ऑफर किया गया था जो उन्होंने तुरंत ठुकरा दिया था.
रिचर्ड्स तो नहीं लेकिन आखिरकार लारेंस रो की कप्तानी में एक विद्रोही टीम दक्षिण अफ्रीका के लिए रवाना हो ही गयी. यह 1982 की बात है. कुछ खिलाड़ी आखिरी समय में हवाई जहाज में चढ़े और और कुछ उतरे. इन अश्वेत खिलाड़ियों को दक्षिण अफ्रीका में “मानदश्वेत” (Honoray Whites) कहा गया. टीम में सिल्वेस्टर क्लार्क, 1979 के विश्वकप के हीरो कॉलिन क्राफ्ट, कॉलिस किंग और एल्विन कालीचरण जैसे बड़े नाम भी थे. इस दौरे को वेस्टइंडीज की सरकारों और जनता ने धोखा करार दिया. लेकिन इसका एक पहलू और भी था. इस दौरे के बाद ही दुनिया को पता चला कि दक्षिण अफ्रीका के खिलाड़ियों और जनता में वह रंगभेद नहीं था जो उसकी सरकार में था. वेस्टइंडीज़ की टीम को हर जगह हाथोंहाथ लिया गया. टीम के हर खिलाड़ी को तकरीबन डेढ़ लाख अमेरिकी डालर दिए गए. विवियन रिचर्ड्स ने बाद में खुलासा किया कि उन्हें ब्लैंक चैक ऑफर किया गया था जो उन्होंने तुरंत ठुकरा दिया था.
लेकिन नोटों से भरी जेबें लेकर भी खिलाड़ियों को वहीं लौटना था जहां से वे गए थे. उन्हें प्रतिबंध और बहिष्कार का अनुमान तो रहा होगा (इसी बात की उन्होंने भरपूर कीमत भी वसूली थी) लेकिन शायद ऐसी प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं रही होगी. इन सभी खिलाड़ियों पर आजीवन प्रतिबंध लगा और उनका पूरी तरह से सामाजिक बहिष्कार हुआ. जो खिलाड़ी देश छोड़कर जा सकते थे उन्होंने अमेरिका इंग्लैंड और दूसरे देशों की राह पकड़ी. कुछ हमेशा के लिए कोकीन और शराब के नशे में डूब गए. इसके बाद भी इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया की विद्रोही टीमों ने दक्षिण अफ्रीका का दौरा किया.
फिर 1990 में दक्षिण अफ्रीका का राजनैतिक माहौल बदला. नेल्सन मंडेला जेल से रिहा हुए. रंगभेद की नीति जाती रही, एक मोर्चे पर जिसकी लड़ाई क्रिकेट ने भी लड़ी थी. इसके बाद दक्षिण अफ्रीका पर लगा अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंध हटा दिया गया और 1991 में दक्षिण अफ्रीका की टीम अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में लौट आई. 2004 में इंग्लैंड और दक्षिण अफ्रीका के बीच खेली गयी टेस्ट सीरीज का नाम था - बेसिल डी’ ओलिवेरा ट्राफी. एक मायने में यह दक्षिण अफ्रीकी मूल के उस खिलाड़ी का सम्मान था जिसने इंग्लैंड के लिए 44 टेस्ट मैच खेले थे, करीब 40 के औसत से 2484 रन बनाए थे, और दक्षिण अफ्रीका की रंगभेदी नीतियों का मुकाबला किया था.
और अब भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच की हर सीरिज को महात्मा गांधी और नेल्सन मंडेला का नाम दिया गया है तो यह उस क्रिकेट का सम्मान भी है जिसने अपने तरीके से इन दोनों महात्माओं की लड़ाइयों को आगे बढ़ाने में अपना योगदान दिया था.