अब तक एनडीए में सीटों के बंटवारे के लिए अलग-अलग दल भाजपा से सीधे लड़ रहे थे. अब इसमें दो दलित दिग्गजों के बीच सीधी लड़ाई का नया अध्याय जुड़ा है
बिहार की राजनीति में रोज नई बहार आ रही है. पल-पल के इन बदलावों में सभी दलों की नींद हराम करने की क्षमता है. कल तक भाजपा वाले महागंठबंधन से सपा के निकलने पर मजा ले रहे थे. आज वे राजनीतिक गरमी से राहत के लिए आकाश देख रहे हैं. और परसों तक सपा प्रकरण पर बैकफुट पर पहुंचे गठबंधन वाले कल से अचानक जोश में भर गए हैं.
यह जोश इसलिए भी है  क्योंकि एनडीए में एक-दूसरे की औकात बताने वाले जिस खुल्लमखुला खेल की शुरुआत हुई है उसे एक ऐसे समूह ने शुरू किया है, जो यदि भाजपा से गलती से भी छिटक गया तो फिर बड़े-बड़े जानकार भी चुनाव से पहले इसके परिणामों का विश्लेषण करने से पहले 10 बार सोचेंगे.
रामविलास पासवान के बारे में मशहूर है कि वे अपने घर-परिवार और रिश्तेदारों को राजनीति और सत्ता का स्वाद चखाने के उस्ताद नेता रहे हैं और इस मामले में लालू यादव से दस कदम आगे हैं.
अब तक एनडीए में सीटों के बंटवारे के लिए अलग-अलग दल भाजपा से सीधे लड़ रहे थे, शिकायतें कर रहे थे लेकिन अब इसमें एक नया अध्याय जुड़ा है - दो दलित दिग्गजों के बीच सीधी लड़ाई का. एक छोर पर रामविलास पासवान हैं तो दूसरे पर राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी. दोनों भाजपा के नेतृत्व में एनडीए में हैं, इन दोनों के अपने साथ होने की वजह से ही भाजपा लालू के सामाजिक न्याय और मंडल-टू वाली राजनीति को हंसते हुए अनदेखा करने की स्थिति में रही है.
जीतन राम मांझी ने रामविलास पासवान को वंशवादी नेता बताते हुए कहा है कि रामविलास पासवान ने अपने दल और राजनीति में सिर्फ अपने घर-परिवार के लोगों को भरा हुआ है और वे उन्हें ही आगे बढ़ाते हैं. वे कभी दलितों के मसले पर नहीं बोलते, ना उन्हें दलितों के मसलों से ही कोई लेना-देना है. मांझी इतने पर ही चुप नहीं हुए. उन्होंने यह भी कहा कि रामविलास पासवान उन्हें चींटी समझने की भूल न करे. चींटी हाथी को भी परास्त कर देती है.
जीतन राम मांझी के अचानक आये इस बयान से रामविलास पासवान के बेटे और लोक जनशक्ति पार्टी के संसदीय दल के नेता चिराग पासवान कहते हैं कि मांझीजी बहुत आदरणीय हैं, वे ऐसा क्यों कर बोले, समझ में नहीं आ रहा. लेकिन उनकी बातों का जवाब नहीं देंगे. वैसे चाहते तो भी जवाब देने के लिए चिराग के पास कुछ खास है नहीं. क्योंकि एक तो जीतन राम मांझी ने जो बोला, उसमें गलत कुछ नहीं बोला, समय भले गलत हो. रामविलास पासवान के बारे में मशहूर है कि वे अपने घर-परिवार और रिश्तेदारों को राजनीति और सत्ता का स्वाद चखाने के उस्ताद नेता रहे हैं और इस मामले में लालू यादव से दस कदम आगे हैं. इसके अलावा चिराग और रामविलास पासवान, दोनों को ही मालूम है कि मांझी को छेड़ना मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालने जैसा है. मांझी के पास खोने के लिए कुछ नहीं है. उन्हें आने वाले समय में बिहार की राजनीति में पाना ही पाना है.
जीतन राम मांझी और रामविलास पासवान को अपने खेमे में रखकर ही भाजपा नीतीश कुमार और लालू प्रसाद के सामाजिक न्याय और मंडल टू वाले हर बयान को काट सकती है.
इन सबके बीच जो बिहार की राजनीति की थोड़ी बहुत समझ भी रखते हैं, वे मांझी के इस बयान से हैरत में नहीं हैं. कुछ समय पहले रामविलास पासवान ने सार्वजनिक तौर पर कह दिया था कि जीतन राम मांझी और उनमें तुलना नहीं है. मांझी अभी दलित राजनीति में ट्रायल पर चल रहे नेता हैं जबकि वे तपे-तपाये और आजमाये जा चुके, उत्तर भारत और संपूर्ण भारत में स्थापित दलित नेता हैं. जिस दिन पासवान ने यह कहा था, उसी दिन से यह तय माना जा रहा था कि जीतन राम मांझी इसका जवाब देंगे. अब मांझी ने करीब एक सप्ताह के बाद बिलकुल सही समय पर पासवान की बात का जवाब दिया है.
मांझी जानते हैं कि अभी जवाब देने का मतलब है कि सभी की हालत खराब हो जाना. सभी की हालत खराब न भी हो तो भाजपा की होनी स्वाभाविक है. जीतन राम मांझी और रामविलास पासवान को अपने खेमे में रखकर ही भाजपा नीतीश कुमार और लालू प्रसाद के सामाजिक न्याय और मंडल टू वाले हर बयान को काट सकती है. आज नीतीश कुमार-लालू प्रसाद यादव के ‘महागंठबंधन’ के सामने सबसे बड़ी चुनौती दलित-महादलित और अतिपिछड़े वोटों को साधने की ही है, जो ऐतिहासिक बिखराव के दौर में हैं.
राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन कहते हैं, ‘जीतन राम मांझी और रामविलास पासवान के बीच जो वाकयुद्ध शुरू हुआ है, वह स्वाभाविक है. टिकट बंटवारे के पहले इस तरह की हलचल होती है. ऐसे ही बयान देकर अधिक से अधिक सीटों की बार्गेनिंग की जाती है. रामविलास पासवान जीतन राम मांझी को अंडर ट्रायल दलित नेता बताकर एनडीए में खुद को सुप्रीम दलित नेता के तौर पर स्थापित करने की कोशिश में थे. अब पासवान को उनकी औकात और सीमा बताकर जीतन राम मांझी खुद को ज्यादा महत्वपूर्ण नेता बताते हुए अधिक सीटों के लिए दबाव की राजनीति कर रहे हैं.’ बिहार की राजनीति की समझ रखने वाले पत्रकार पुष्यमित्र इससे सहमति रखते हैं, ‘जीतन राम मांझी अधिक सीटों के लिए ही ऐसे बयान दे रहे हैं, वर्ना दोनों दलित नेता एक दूसरे की तारीफ भी खूब करते रहे हैं.’
भाजपा को यह भी पता है कि मांझी आज इधर हैं तो कल उधर भी जा सकते हैं. वे हमेशा से अच्छे दिनों का साथ देनेवाले नेता रहे हैं.
जीतनराम मांझी और रामविलास पासवान में किसको कितनी सीटें मिलेगी, यह अभी पता नहीं. जाहिर-सी बात है कि रामविलास पासवान को ज्यादा सीटें मिलेंगी, क्योंकि उनकी पार्टी पुरानी और सांसद ज्यादा हैं. लेकिन इसलिए नहीं कि वे जीतन राम मांझी की तुलना में फिलहाल भाजपा के उपयोग के हिसाब से बड़े नेता हैं. भाजपा जानती है कि पासवान बिहार में खाक हो चुके नेता थे. लोकसभा चुनाव के पहले उनकी पार्टी मात्र एक विधायक वाली पार्टी थी. अगर आज वे फिर से मोल-भाव की स्थिति में हैं तो इसमें भाजपा और नरेंद्र मोदी के पक्ष में उठी लहर की ही भूमिका है.
रामविलास पासवान की बस एक ही योग्यता और विशेषता है कि वे बिहार के ढाई प्रतिशत पासवानों के नेता माने जाते हैं और वे किसी भी हाल में इन मतों को अपने पक्ष में ट्रांसफर करवाते रहे हैं. इसी ढाई फीसदी वोट की बदौलत वे मिट-मिटकर खड़े होते रहे और बिहार में हमेशा प्रासंगिक बने रहे. वैसे भाजपा के लिए रामविलास पासवान की एक उपयोगिता और है. वह उनके जरिये अपने कोर वोट बैंक सवर्णों को टिकट दिलवा कर यह संदेश दे सकती है कि यह हमारा ही किया है और खुद कुछ पिछड़ों को वोट देकर उन्हें भी साधने की कोशिश कर सकती है. अतीत में रामविलास पासवान को सवर्णों से नजदीकी बनाने में कोई परेशानी भी नहीं रही है और वे सूरजभान जैसे बाहुबलियों से भी नाता जोड़ते रहे हैं. भाजपा ऐसे कुछ लोगों की गोटी भी रामविलास पासवान के जरिये फिट कर सकती है.
लेकिन जीतन राम मांझी का महत्व भाजपा के लिए इससे अलग है. मांझी 12 विधायकों के साथ नीतीश कुमार को चुनौती देते हुए अलग हुए थे और लगातार नीतीश कुमार के खिलाफ आक्रामक रूख अपनाये रहे हैं. वे हाल के दिनों में महादलितों की राजनीति के प्रतीक भी बन चुके हैं. मांझी के जरिये भाजपा नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव के सामाजिक न्याय के समीकरण को काट सकती है और मंडल पार्ट टू को छद्म करार दे सकती है.
मांझी और पासवान के टकराव से भाजपा के कैंप में इसलिए तो बेचैनी बढ़ी ही है, उसे यह भी पता है कि मांझी आज इधर हैं तो कल उधर भी जा सकते हैं. वे हमेशा से अच्छे दिनों का साथ देनेवाले नेता रहे हैं. वे मूल रूप से कांग्रेसी रहे हैं. जब तक बिहार में कांग्रेस के अच्छे दिन थे, मांझी कांग्रेसी थे. जब लालू प्रसाद के दिन आये, पाला बदलकर राजद का दामन थाम लिया. राजद के दिन लदने लगे तो पाला बदलकर नीतीश के साथ हो गये. अब अच्छे दिन दिखने पर भाजपा के साथ हैं. लेकिन कल को उन्हें लगेगा कि फिर जदयू-राजद के दिन अच्छे हो सकते हैं तो वे बिना किसी लागलपेट के उधर भी जा सकते हैं.
और इसके लिए उन्हें बहुत तर्क भी नहीं गढ़ने होंगे. वे सीधे कह सकते हैं कि भाजपा में सवर्णों का वर्चस्व था, सांप्रदायिकता की बू आ रही थी, दलितों की इज्जत नहीं थी, सो छोड़ दिया.