जम्मू-कशमीर में गठबंधन के लिए भाजपा को धारा 370, अफस्पा और सांप्रदायिकता के मसले पर पीडीपी को कुछ आश्वासन देने होंगे. दूसरी ओर पीडीपी को पाकिस्तान का राग छेड़ना कम करना होगा, अलगाववादियों के प्रति अपना रवैया बदलना होगा और अपने स्वशासन के नारे को थोड़ा 'तर्कसंगत' बनाना होगा.
भाजपा और पीडीपी के नेताओं के बयानों से अब साफ हो गया है कि पीडीपी और भाजपा का अब गठबंधन बस होने ही वाला है. हालांकि वे बहुत स्पष्ट तौर पर ये नहीं बताते कि असल में इस गठबंधन और उससे बनने वाली सरकार का स्वरूप क्या होगा लेकिन विभिन्न अखबारी रिपोर्टें अपने-अपने सूत्रों के हवाले से बताती हैं कि राज्य के और गठबंधन सरकार के मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद होंगे और भाजपा को - या कहें कि उसके राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य और जम्मू क्षेत्र के बिलावर से विधायक निर्मल सिंह को - उप मुख्यमंत्री का पद मिलेगा. यानी कि भाजपा ने कितना भी चाहा हो कि विधानसभा के कुल कार्यकाल छह साल में से तीन साल उसका मुख्यमंत्री हो, पर पीडीपी इस बात पर तैयार नहीं हुई. यह पहले से भी साफ था, मुफ्ती मोहम्मद सईद को और भी रहा होगा कि जम्मू-कश्मीर की सत्ता में भागीदारी के लिए यह बहुत छोटी सी कीमत है, जिसे चुकाने के लिए भाजपा बड़ी आसानी से तैयार हो जाएगी. मुश्किल बस इस बात की थी कि भाजपा उनकी बाकी मांगो को किस तरह से लेती है.
यह पहले से भी साफ था कि जम्मू-कश्मीर की सत्ता में भागीदारी के लिए यह बहुत छोटी सी कीमत है जिसे चुकाने के लिए भाजपा बड़ी आसानी से तैयार हो जाएगी
इस बारे में अंदाजा तो 25 जनवरी को भी लग ही गया था जब मुफ्ती मोहम्मद सईद ने अपने एक बयान में माना था कि जम्मू-कश्मीर में सरकार बंनाने के लिए उनकी पार्टी भाजपा से बात कर रही है. ऐसा उन्हें इसलिए भी कहना पड़ा था क्योंकि जम्मू-कश्मीर में सात फरवरी को होने वाले राज्यसभा चुनाव की सिर्फ दो सीटों पर ही उन्होंने अपने उम्मीदवार खड़े किए थे. बाकी दो सीटों पर भाजपा ने अपने उम्मीदवार खड़े किए थे. इससे भी पहले की बात करें तो इसके संकेत करीब एक महीने पहले तब भी मिले थे जब मुफ्ती को अचानक यह एहसास हो गया था कि चूंकि भाजपा को जम्मू, पीडीपी को कश्मीर और कांग्रेस को लद्दाख में बहुमत मिला है इसलिए कांग्रेस को भी सरकार में शामिल होना चाहिए. मुफ्ती सियासत के पुराने खिलाड़ी हैं. वे बखूबी जानते थे कि भाजपा और कांग्रेस एक नाव में कभी सवार नहीं होंगे और आखिर में उन्हें भाजपा के साथ मिलकर ही सरकार बनानी होगी. लेकिन ऐसा कहकर वे भाजपा के साथ अपने गठबंधन की स्वीकार्यता बढ़ाने का प्रयास कर रहे थे.
भाजपा के बड़े नेताओं के मुताबिक अब सईद की चाल बदली नजर आएगी. उनकी जुबान भी बदलेगी. पीडीपी और बीजेपी के बीच एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम बनाने की तैयारी चल रही है. बहुत जल्द इस पर सहमति बन जाएगी.
भाजपा के बड़े नेताओं के मुताबिक अब सईद की चाल बदली नजर आएगी. उनकी जुबान भी बदलेगी. पीडीपी और बीजेपी के बीच एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम बनाने की तैयारी चल रही है. बहुत जल्द इस पर सहमति बन जाएगी. अखबार की रिपोर्टें बताती है इसके लिए भाजपा को धारा 370, अफस्पा और सांप्रदायिकता के मसले पर पीडीपी को कुछ आश्वासन देने होंगे और पीडीपी एनडीए और केंद्र सरकार का हिस्सा नहीं बनेगी. दरअसल मुफ्ती अपनी सरकार को बिहार की एनडीए सरकार की तर्ज पर चलाना चाहते हैं जहां का सारा हिसाब-किताब पिछले साल तक बिना किसी 'बाहरी' हस्तक्षेप के नीतीश कुमार और सुशील मोदी के जिम्मे था. लेकिन इसके लिए मुफ्ती और उनकी पीडीपी को भी कई काम करने होंगे. मसलन उन्हें पाकिस्तान का राग छेड़ना कम करना होगा, अलगाववादियों के प्रति अपना रवैया बदलना होगा और अपने स्वशासन के नारे को थोड़ा 'तर्कसंगत' बनाना होगा. आसान शब्दों में कहें तो अब मुफ्ती थोड़ा 'सॉफ्ट' नजर आएंगे. वैसे बोल तो थोड़ा पहले से ही महबूबा मुफ्ती के भी बदल चुके हैं. पिछले दिनों वे कहने लगी थीं कि कुर्सी उनके लिए छोटी बात है. अगर कोई बड़े दिल से उनके कौम की भावनाओ का ख्याल रखे तो वे हर बात के लिए तयार हैं.
भाजपा और पीडीपी के बीच दोस्ती की ऑपचारिक शुरुआत राज्यसभा के चुनाव से होगी और इसका चरम नई सरकार का शपथ ग्रहण समारोह होगा. इसके बाद दोनों के लिए संतुलन साधने का वक्त होगा. अगर सईद भाजपा को ज्यादा ढील देते दिखे तो घाटी में उनकी पार्टी का भविष्य खतरे में पड़ जाएगा. उधर यदि भाजपा समझौता करती या अपने गठबंधन सहयोगी से अनावश्यक समझौते करवाने के प्रयास करती दिखी तो या तो उसके जम्मू के समर्थकों से अलगाव का खतरा पैदा हो जाएगा या फिर जम्मू कश्मीर की सत्ता में दुबारा आने का. सरकार बनने के बाद भाजपा की असली मुसीबत जम्मू और कश्मीर के बीच की खाई के ऊपर राजनीतिक संतुलन साधने की ही है.