2011 से अब तक 40 लाख से भी ज्यादा सीरियाई देश छोड़कर भाग चुके हैं, लेकिन छह अमीर अरब देशों ने इन चार सालों में सिर्फ 33 सीरियाई शरणार्थी स्वीकार किये हैं, वह भी मजबूरी में.
सितंबर के पहले हफ्ते में अयलान कुर्दी की तस्वीरों ने सारी दुनिया को विचलित कर दिया. तीन साल का यह मासूम तब अपनी जान गंवा बैठा जब वह नाव उलट गई जिसमें बैठकर उसका परिवार सीरिया से भागकर ग्रीस जाने की कोशिश में था. तुर्की के एक मशहूर बीच पर बहकर आए अयलान के शव की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो गईं. सारी दुनिया यूरोप को धिक्कारने लगी कि वह शरणार्थी संकट पर पर्याप्त संवेदनशीलता नहीं दिखा रहा. बढ़ते नैतिक दबाव के बीच ऑस्ट्रिया और जर्मनी का बयान आया कि वे सीरियाई शरणार्थियों के लिए अपने दरवाजे खोल रहे हैं. उन्होंने यूरोप के बाकी देशों से भी कहा कि वे भी आगे आएं और शरणार्थियों को अपने यहां शरण दें.
लेकिन यूरोप में एक वर्ग ऐसा भी है जिसकी राय इससे उलट है. वह पूछ रहा है कि इस्लामी देशों के शरणार्थियों को शरण देना ईसाई यूरोप का ही कर्तव्य क्यों होना चाहिये. कई लोग हैं जो सवाल कर रहे हैं कि पेट्रो डॉलर के भंडार पर बैठे अरब देशों या 'इस्लामी क्रांति' के जन्मदाता रहे ईरान को अपने इन मुसलमान भाइयों के भले की चिंता क्यों नहीं सताती. इस्लामी जगत के जो लोग यह कहते नहीं थकते कि यूरोप-अमेरिका इस्लाम के दुश्मन हैं और उसे मिटा देना चाहते हैं, वे अपनी जान बचाने के लिए उसी यूरोप-अमेरिका की तरफ भला क्यों भागते हैं? यूरोप-अमेरिका में पैर रखना तो उनके लिए पाप होना चाहिये!
'यह बहुत दुखद बात है कि अमीर खाड़ी देशों की ओर से अब तक इस संकट पर कोई बयान तक जारी नहीं हुआ है. उन शरणार्थियों की मदद के लिए रणनीति तैयार करना तो दूर की बात है.'
मदद करना तो दूर की बात है, सऊदी अरब और खाड़ी के देश मिल कर अपने ही अरबी बिरादर यमन पर धुंआधार बमबारी करते हुए नए शरणार्थी पैदा कर रहे हैं. जिस दिन अयलान कुर्दी को दफनाया गया उसी दिन अपने ही देशवासी कुर्द मुस्लिमों पर तीन हफ्तों से बम बरसा रहे तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैय्यब एर्दोआन ने मरगमच्छी आंसू बहाते हुए कहा, 'वे यूरोपीय देश, जिन्होंने भूमध्यसागर को शरणार्थियों की कब्र बन जाने दिया है, उनकी अंतरात्मा हर उस शरणार्थी के लिए उन्हें कचोटेगी जिसे अपनी जान गंवानी पड़ी है.'
अयलान भी कुर्द था. उसे सीरिया के उसी कोबानी शहर में दफ़नाया गया, जहां बीते साल अक्टूबर में इस्लामिक स्टेट द्वारा कुर्दों के नरसंहार को एर्दोआन के टैंक-सवार सैनिक सिर्फ कुछ सौ मीटर दूर से हफ्तों तक चुपचाप देखते रहे. तब एर्दोआन की अंतरात्मा ने उन्हें जरा भी क्यों नहीं कचोटा.
अगस्त के आखिर तक के आंकड़े बता रहे हैं कि 2011 में गृहयुद्ध छिड़ने के बाद से, 40 लाख से भी अधिक सीरियाई अपना देश छोड़ कर भाग चुके हैं. लेकिन, उनके देश के कहीं नजदीक स्थित 'खाड़ी सहयोग परिषद' के छह देशों ने इन चार सालों में सिर्फ 33 सीरियाइयों को ही अपने यहां शरण दी है. वह भी अपनी मर्जी से नहीं बल्कि संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायोग के एक पुनर्वास कार्यक्रम के तहत. बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने इस्लाम को ही मानने और अरबी ही बोलने वाले सीरियाइयों की पीड़ा से मुंह मोड़ रखा है.
शरणार्थियों के नाम पर खाड़ी के अमीर देश सिर्फ फिलस्तीनी शरणार्थियों के नाम की ही माला जपते हैं, क्योंकि इससे इसराइल को धिक्कारने का सुख मिलता है.
जॉर्डन में शरण लेने वाले सीरियाई शरणार्थी और 30 साल के अबू मोहम्मद का एक समाचार एजेंसी से बात करते हुए कहना था, 'खाड़ी देशों को यह देखकर शर्म आनी चाहिए कि कैसे यूरोप ने शरणार्थियों के लिए अपने द्वार खोल दिए हैं, जबकि हमारे लिए उनके दरवाज़े़ बंद हैं.' कतर के एक प्रमुख अखबार गल्फ टाइम्स ने अपने एक संपादकीय में लिखा, 'यह बहुत दुख की बात है कि अमीर खाड़ी देशों की ओर से अब तक इस संकट पर कोई बयान तक जारी नहीं हुआ है. उन शरणार्थियों की मदद के लिए रणनीति तैयार करना तो दूर की बात है जो ज्यादातर मुसलमान है.'
इन देशों की आम जनता को भी अपने नेतृत्व का यह रुख नहीं सुहा रहा. एक अमीराती ब्लॉगर सुल्तान अल कासमी ने लिखा कि खाड़ी देशों के सामने अपनी शरणार्थी नीतियों को बदलने का यह एक 'आदर्श, नीतिपरक और अपनी जि़म्मेदारी दिखाने का' मौका था. अयलान को दफनाते समय उसके पिता का कहना था, 'मैं चाहूंगा कि यूरोपीय देश ही नहीं, बल्कि अरब सरकारें भी देखें कि मेरे बच्चों का क्या हुआ. इसे देख कर वे दूसरों की मदद करें. '
लेकिन लगता नहीं कि ऐसा होगा. दरअसल इन देशों के नेतृत्व को डर है कि अगर उन्होंने राजनीतिक रूप से मुखर इन शरणार्थियों की बड़ी संख्या को पनाह दी तो कहीं इस मोर्चे पर निष्क्रिय उनके अपने समाज के समीकरण न बदल जाएं. कतर और यूएई जैसे देशों में तो अभी ही विदेशियों की संख्या उनके अपने नागरिकों से कहीं ज्यादा हो गई है.
ऐसा नहीं कि शरणार्थियों को लेकर यह बेरुखी सिर्फ खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) ही दिखा रही हो. दुनिया के लगभग सभी 58 अरब-इस्लामी देशों ने 1951 के जेनेवा शरणार्थी समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं. शरणार्थियों के नाम पर अब तक वे फिलस्तीनी शरणार्थियों का ही राग अलापते रहे हैं, क्योंकि इससे उन्हें इसराइल को धिक्कारने का सुख मिलता है.