शरणार्थी बनाना, यूरोपीय देशों में उनकी घुसपैठ कराना और वहां उनके रहने-खाने की सुविधाएं जुटाना अरबों डॉलर के धंधे का सबब बन गया है.
सर्बिया के साथ लगती अपनी सीमा सील करके हंगरी ने इमरजेंसी का ऐलान भी कर दिया है. यह कदम उसने इसलिए उठाया है कि वह दिन ब दिन बड़े होते जा रहे शरणार्थियों के रेले को अपने यहां घुसने से रोक सके. उसने अवैध तरीके से सीमा पार करने की कोशिश करते हजारों लोगों को गिरफ्तार भी कर लिया है. अलग-अलग रिपोर्टों के मुताबिक इस साल अब तक करीब दो लाख शरणार्थी सर्बिया से होकर हंगरी में दाखिल हो चुके हैं. इनमें एक बड़ी तादाद गृहयुद्ध के चलते देश छोड़कर भाग रहे सीरियाई लोगों की है.
दरअसल हंगरी ही, नहीं पूरा यूरोप इस वक्त शरणार्थियों की इतनी बड़ी संख्या से आतंकित है. वहां का समाज इस मुद्दे पर दो धड़ों में बंट गया है. जर्मनी और फ्रांस जैसे देश शरणार्थियों को शरण देने के पक्ष में हैं तो हंगरी और पोलैंड जैसे देश इसके विरोध में हैं. जनता का एक वर्ग शरणार्थियों का स्वागत करता हुआ नज़र आता है, तो दूसरा उनके रहने-ठहरने की जगहों को आग की भेंट चढ़ाता हुआ.
यूरोप की जनता का एक वर्ग शरणार्थियों का स्वागत करता हुआ नज़र आता है, तो दूसरा उनके रहने-ठहरने की जगहों को आग की भेंट चढ़ाता हुआ.
नैतिकता से जुड़े सवालों के परे इस शरणार्थी समस्या का एक ऐसा पहलू भी है जिस पर ज्यादा बात नहीं हो रही. यह पहलू उस कारोबार का है जो इस संकट की आड़ में हो रहा है. दरअसल लोगों को शरणार्थी बनाना, यूरोपीय देशों में उनकी घुसपैठ कराना और इन देशों में उनके रहने-खाने की सुविधाएं जुटाना भी अरबों डॉलर के धंधे का सबब बन गया है.
उदाहरण के लिए गृहयुद्ध से खंडहर बन गए सीरिया से जर्मनी जाने वाले ज्यादातर लोग वे हैं जिनके पास ठीक-ठाक पैसा है. ये लोग जर्मनी पहुंचने के लिए पहले किसी सामान्य ट्रैवल एजेंट से 300 से 400 डॉलर में तुर्की जाने का टिकट ख़रीदते हैं. एजेंट उन्हें बस से लेबनान के बेरूत या लीबिया के त्रिपोली तक पहुंचाता है. वहां से वे विमान या पानी के जहाज़ से तुर्की पहुंचते हैं. सीरिया वालों को तुर्की के लिए कोई वीसा नहीं लगता. तुर्की में सैकड़ों ऐसे एजेंट बैठे हुए हैं जो छह से 10 हजार डॉलर लेकर उन्हें चोरी-छिपे जर्मनी तक पहुंचाते हैं. जो लोग इतना पैसा नहीं दे सकते, वे या तो सीरिया में ही रह जाते हैं या जॉर्डन, लेबनान अथवा इराक़ के शरणार्थी शिविरों में पहुंच कर अपने भाग्य को कोसते हैं.
मानव-तस्करों के गोरखधंधों पर लिखी अपनी एक पुस्तक में इटली के ज्याम्पोलो मुसुमेची का कहना है कि भूमध्य सागर क्षेत्र में ये तस्कर हर साल 50 करोड़ डॉलर की कमाई कर रहे हैं. हालांकि ये धंधा सिर्फ तुर्की, सीरिया, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान या अफ्रीकी देशों में ही नहीं चल रहा. खुद यूरोपीय संघ के छोटे-बड़े देशों में भी ऐसी दर्जनों ट्रैवल एजेंसियां, संदिग्ध किस्म की ग़ैर-सरकारी संस्थाएं (एनजीओ) या मानव-तस्कर काम कर रहे हैं, जो मोटी रकम ऐंठकर लोगों को अकेले या उनके पूरे परिवार सहित यूरोप में घुसा रहे हैं. लंबे समय तक रहने या काम करने के लिए यूरोपीय देशों का वीजा पाना बहुत मुश्किल होता है. इसलिए ज्यादातर विदेशी नागरिक शरणार्थी बन कर ही इन देशों में आ और पैर जमा पाते हैं. सामान्य समय में मुसुमेची के अनुसार करीब 50 करोड़ डॉलर हर साल का रहा यह धंधा इस आपात समय में अरबों डॉलर का हो गया है.
यूरोपीय संघ के छोटे-बड़े देशों में भी ऐसी दर्जनों ट्रैवल एजेंसियां, संदिग्ध किस्म की ग़ैर-सरकारी संस्थाएं (एनजीओ) या मानव-तस्कर काम कर रहे हैं, जो मोटी रकम ऐंठकर लोगों यूरोप में घुसा रहे हैं
चार सितंबर को जर्मनी के वित्तमंत्रालय के एक बयान के मुताबिक जर्मन पुलिस ने कई ऐसे पार्सल ज़ब्त किये जिनमें बड़ी संख्या में सीरिया के असली और नकली पासपोर्ट छिपाए गए थे. पुलिस का मानना है कि ये सीरियाई पासपोर्ट मोटी रकम लेकर शायद उन लोगों को बेचे जाते, जो सीरियाई नहीं हैं पर अपने आप को सीरियाई बता कर जर्मनी में आसानी से शरण पाने की फिराक में हैं. जर्मन सरकार ने सीरियाई शरणार्थियों की दुर्दशा पर तरस खा कर जब से यह कहा है कि जर्मनी में उनका स्वागत है और उन्हें कम से कम औपचारिकता के साथ शरण दी जायेगी तब से काले बाज़ार में सीरियाई पासपोर्ट की मांग बहुत बढ़ गई है. सत्याग्रह की ही एक स्टोरी बताती है कि यूरोप में आ रहे शरणार्थियों में एक बड़ी संख्या ऐसे पाकिस्तानियों की है जो खुद को सीरियाई बताकर वहां शरण मांग रहे हैं. इन्हें या तो इस्लामी संस्थाएं वहां भेज रही हैं या पाकिस्तान के मुश्किल हालात (पढ़ें - पाक एक असफल देश यों भी है कि बड़ी संख्या में पाकिस्तानी खुद को सीरियाई बताकर यूरोप में शरण मांग रहे हैं).
आईएस और अल कायदा की भी मोटी कमाई
लीबिया के रास्ते से यूरोप पहुंचना सबसे महंगा है. वहां आईएस की लीबियाई शाखा के जिहादी अपने इलाके से होकर गुज़रने के बदले में प्रति व्यक्ति 10 हजार डॉलर तक वसूलते हैं. अल कायदा के जिहादी भी अपने प्रभुत्व वाले क्षेत्रों से गुज़र रहे शरणार्थियों से खूब पैसा ऐंठते हैं. दूसरे शब्दों में कहा जाए तो यूरोप पहुंच रहे शरणार्थी न केवल मानव-तस्करों की ज़ेबें भर रहे हैं बल्कि आईएस और अल कायदा को भी मालामाल कर रहे हैं.
जिन देशों में शरणार्थी पहुंच रहे हैं वहां भी कारोबार के नए रास्ते निकल रहे हैं. जर्मनी को ही ले लें. इस साल आठ लाख नए शरणार्थियों के रहने-खाने और दवा-दारू पर उसे 10 अरब यूरो अलग से खर्च करने पड़ सकते हैं. इस पैसे से तरह-तरह की कंपनियों को कंटेनर-आवास बनाने, पुराने मकानों की साफ-सफ़ाई, स्कूली व्यायामशालाओं या सार्वजनिक हालों को सामूहिक निवासों में बदलने और कैटरिंग सेवाओं को खाने-पीने की चीजों के ठेके दिए जायेंगे. शरणार्थियों के बच्चों की तत्काल स्कूली पढ़ाई की भी व्यवस्था की जायेगी.
कुल मिलाकर अफ्रीका और एशिया के कई देशों में उपजे हालात जहां लाखों लोगों के लिए आफत की वजह बने हैं तो कुछ ऐसे भी हैं जिनके लिए यह संकट जेब भरने के अच्छे मौके की तरह आया है.