कुछ समय पहले जैन पर्यूषण पर्व के दौरान मुंबई में मांस की बिक्री पर चार दिनों का प्रतिबंध लगाया गया. इसके बाद राजस्थान, छत्तीसगढ़, हरियाणा और गुजरात के अहमदाबाद में भी इसी तरह का प्रतिबंध लगा. इसके चलते पूरे देश में एक विवाद खड़ा हो गया. बड़ी बहस इस पर थी कि क्या लोकतंत्र में सरकार लोगों के सामान्य खाने-पीने को प्रतिबंधित कर सकती है? राज्य सरकारों का तर्क था कि जैन धर्म में हिंसा वर्जित है और पर्यूषण पर्व के दौरान कुछ दिनों के लिए मांस की बिक्री और जानवरों के कत्ल पर प्रतिबंध जायज है. उधर, इसके आलोचकों का तर्क था कि प्रतिबंध के कारण राजनीतिक हैं.

कुल मिलाकर इस बहस का ज्यादातर हिस्सा प्रतिबंध समर्थक दलों और विरोधी पक्षों की राजनीति को ही समर्पित रहा. इस दौरान मांसाहार को भोजन का एक हिंसक विकल्प बताने वाले तर्कों या धार्मिक मान्यताओं पर ज्यादा बहस नहीं हुई. जबकि वैज्ञानिक प्रमाण कहते हैं कि यह गलत धारणा है. मांसाहार की तुलना में शाकाहार कहीं ज्यादा हिंसक विकल्प है.

अनाज उत्पादन के लिए पहली शर्त होती है कि खेत तैयार किए जाएं. इसके लिए स्थानीय वनस्पतियों को नष्ट किया जाता है और इस दौरान इन पर निर्भर रहने वाले जानवरों की भी मौत हो जाती है

सभी वैज्ञानिक इस राय पर एकमत हैं कि एक किलो गोश्त पैदा करने के लिए दो से दस किलो तक पौधों या वनस्पतियों की जरूरत होती है. अब चूंकि पृथ्वी पर खेती लायक जमीन सीमित है इसलिए इस तथ्य से सीधा निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि मांस की अपेक्षा यदि शाकाहार अपनाया जाए तो प्रति हेक्टेयर ज्यादा से ज्यादा इंसानों की भूख खत्म की जा सकती है. दूसरे शब्दों कहें तो शाकाहार का प्रचलन बढ़ने से कहीं कम जीव हिंसा होगी और इससे पर्यावरण भी सुरक्षित रहेगा. इस निष्कर्ष के आधार पर बहस यहीं खत्म हो जाती है.

लेकिन जब आप मांसाहार से जुड़े नैतिक (जीव हिंसा) और पर्यावरणीय पहलुओं का वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर अध्ययन करेंगे तो इसके उलट नतीजे नजर आते हैं. ऑस्ट्रेलिया में गेहूं और दूसरे अनाजों के उत्पादन से जुड़े कुछ आंकड़ों से हमें ऐसे ही दो निष्कर्ष साफ-साफ देखने को मिलते हैं.

1-इससे पर्यावरण को ज्यादा नुकसान पहुंचता है.

2- मांस उद्योग से ज्यादा हिंसा खेती में होती है. इंसानी शरीर के लिए उपयोगी एक किलोग्राम प्रोटीन के उत्पादन में 25 गुना ज्यादा जीव मारे जाते हैं.

लेकिन ये कैसे संभव है?

अनाज उत्पादन के लिए पहली शर्त होती है कि खेत तैयार किए जाएं. इसके लिए स्थानीय वनस्पतियों को नष्ट किया जाता है. इस वजह से इन पर निर्भर रहने वाले जानवरों की भी मौत हो जाती है. ऑस्ट्रेलिया का उदाहरण बताता है कि यहां यूरोपीय मूल के लोगों के पहुंचने के बाद आधी से ज्यादा मूल वनस्पतियां खत्म हो चुकी हैं. इतने सालों से लगातार एक ही किस्म की फसलों ने यहां जैव विविधता का बड़ा हिस्सा खत्म कर दिया है. अब मान लिया जाए भविष्य में शाकाहार का चलन बढ़ता है तो ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों को और उत्पादन बढ़ाना पड़ेगा. इसके लिए और जमीन साफ की जाएगी यानी और वनस्पति नष्ट होगी.

उत्पादन बढ़ाने का दूसरा तरीका है कि और सघन खेती की जाए. इसके लिए ज्यादा कीटनाशकों और उर्वरकों की जरूरत होगी जो पर्यावरण को और नुकसान पहुंचाएंगे.

चूहों के बच्चे अपने बिलों में मां के लिए ठीक वैसे ही रोते हैं जैसे इंसानों के बच्चे रोते हैं. यदि हम एक चुहिया की हत्या करते हैं तो उसके पीछे औसतन पांच या छह बच्चे भी भूख-प्यास से मारे जाते हैं

ऑस्ट्रेलिया में जिन जानवरों का मांस खाया जाता है वे सभी चारागाहों पर पलते-बढ़ते हैं. ऑस्ट्रेलिया में 70 फीसदी से ज्यादा जमीन पर चारागाह हैं. यहां जानवर मूल रूप से स्थानीय वनस्पतियों या घास पर निर्भर हैं. ये घास या वनस्पतियों को नष्ट नहीं करते बल्कि उस जगह की मूल जैव विविधता को बरकरार रखते हैं. चारागाहों में अनाज नहीं उगता इसलिए यह भी नहीं कहा जा सकता कि यहां से मिलने वाले मांस का खेती-किसानी पर कोई बुरा प्रभाव पड़ता है. यहां जानवरों के घास चरने से ज्यादा से ज्यादा भूक्षरण जैसी समस्या बढ़ सकती है, फिर भी फसलों को उगाने लिए जिस तरह से पारिस्थितिकी तंत्र के साथ खिलवाड़ किया जाता है उसकी तुलना में यह कुछ भी नहीं है.

मांसाहार के खिलाफ एक तर्क ये भी दिया जाता है कि जिन पशुओं को मांसाहार के लिए पाला जा रहा है उन्हें अनाज खिलाया जाता है जो इंसानों का मुख्य भोजन है. यानी उनसे जितना मांस मिलेगा उससे कहीं ज्यादा अनाज वे खा जाते हैं. लेकिन ऑस्ट्रेलिया का उदाहरण बताता है कि यह धारणा बिल्कुल गलत है. देश के सिर्फ दो प्रतिशत पशुओं की खुराक में अनाज शामिल होता है. बाकी के लिए चारा ही मुख्य आहार है.

अब हम इस बहस के एक दूसरे पक्ष - जीव हिंसा पर गौर करते हैं. ऑस्ट्रेलिया में एक गाय या बैल का औसतन वजन 288 किलो होता है. इसमें 68 प्रतिशत बोनलैस मीट होता है इस मीट में 23 प्रतिशत प्रोटीन होता है. यानी एक जानवर के मारे जाने पर 45 किलो प्रोटीन मिलता है. यानी 100 किलो प्रोटीन के लिए 2.2 जानवरों की हत्या होती है.

यदि शाकाहार के पक्ष में जीव हिंसा को एक ढाल बनाया जाता है तो यह कमजोर ढाल है. लेकिन इसके बाद यह सवाल जरूर उठता है कि तब खानपान में नैतिकता का पैमाना क्या हो?

शाकाहार और उसके लिए खेती में किस तरह की क्रूरता व हिंसा बरती जाती है उसका सबसे बड़ा उदाहरण चूहे हैं. ऑस्ट्रेलिया में हर साल पैदा होने वाले चूहों में से 80 प्रतिशत जहर देकर मार दिए जाते हैं. यहां प्रति फसल एक हेक्टेयर पर कम से कम 100 चूहे मारे जाते हैं. इस एक हेक्टेयर में गेहूं का औसत उत्पादन 1.4 टन होता है; इसमें 13 प्रतिशत प्रोटीन होता है. इस हिसाब से देखें तो 182 किलो प्रोटीन के लिए 100 से ज्यादा चूहे मारे जाते हैं. यानी सौ किलो प्रोटीन के लिए 55 से ज्यादा जीवों की हत्या होती है. जबकि ऊपर हमने देखा है कि सीधे मांसाहार से 100 किलो प्रोटीन पाने के लिए सिर्फ 2.2 जानवरों की हत्या की जाती है. यानी शाकाहार में 25 गुना ज्यादा जीव मारे जाते हैं.

अब एक सवाल ये उठाया जा सकता है कि कीड़े-मकौड़े या चूहों को किस हद तक एक जीव माना जाए. ज्यादातर लोग हो सकता है उन कीटों और मकड़ियां को, जो खेती के दौरान मारी जाती हैं, जीव की श्रेणी में शामिल न करें. लेकिन वे भी अपने आसपास के वातावरण के साथ उसी तरह बुनियादी क्रिया-प्रतिक्रिया करते हैं जैसे गाय या बैल करते हैं. यही बात सांप और छिपकलियों के लिए कही जा सकती है.

और चूहे तो इन सब से एक कदम आगे हैं. वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि चूहे एक दूसरे के लिए गाने गाते हैं. गायन एक दुर्लभ गुण है जो सिर्फ व्हेल मछलियों और चमगादड़ों के साथ-साथ सिर्फ इंसानों में विकसित हुआ है. चूहों के बच्चे जब अपने बिलों में होते हैं तो अपनी मां के लिए ठीक वैसे ही रोते हैं जैसे इंसानों के बच्चे रोते हैं. खेतीबाड़ी के क्रम में यदि हम एक चुहिया की हत्या करते हैं तो उसके पीछे औसतन पांच या छह बच्चे भी भूख-प्यास से मारे जाते हैं. इस तरह शाकाहारी भोजन के लिए ज्यादा हिंसक तरीके इस्तेमाल किए जाते हैं.

इस आलेख में दिए गए तर्क यह साबित करने के लिए नहीं हैं कि सभी लोगों को मांसाहारी हो जाना चाहिए या फिर जो शाकाहारी हैं वे गलत रास्ते पर हैं. इनसे बस यह बात साबित की जा सकती है कि यदि शाकाहार के पक्ष में जीव हिंसा को एक ढाल बनाया जाता है तो यह कमजोर ढाल है. लेकिन इसके बाद यह सवाल जरूर उठता है कि तब खानपान में नैतिकता का पैमाना क्या हो? इसका कोई एक सटीक जवाब नहीं हो सकता. फिलहाल तो यह लोगों की निजी पसंद-नापसंद पर ही निर्भर करेगा और जब-जब सरकारें इनमें दखल देंगी कुछ वैसी ही बहस देखने-सुनने को मिलेगी जैसी पिछले दिनों हमारे देश में चली.