बिहार में दोनों गठबंधन सीटों का बंटवारा कर चुके हैं. इनकी लड़ाई में ओवैसी सरीखे दिलचस्प कोण भी साफ नजर आने लगे हैं. तो ऐसे में जीत-हार का न सही पर इनमें 19-21 कौन है, इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है?
करीब दो सालों से जिस चुनाव की पटकथा लिखी जा रही थी, जिसका रिहर्सल चल रहा था, वह अब सामने है. बिहार में यह पहला चुनाव होगा, जिसका रिहर्सल इतना लंबा चला होगा. यह पहला चुनाव होगा, जिसमें भिड़ने वाले प्रायः सभी दल (जदयू को छोड़कर) पांच साल के सफर में सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों का आनंद ले चुके हैं.
अब यह तय हो चुका है कि मुख्य लड़ाई दो बड़े गठबंधनों के बीच होनी है. दोनों ओर दो जिगरी, जानी दुश्मन की तरह एक दूसरे पर प्रहार करेंगे. एक ओर नीतीश होंगे, दूसरी ओर भाजपा. यह भी मजेदार होगा कि दोनों सेनापति एक समय के अपने जानी दुश्मनों के सहारे यह लड़ाई लड़ेंगे. लालू-नीतीश की दुश्मनी दुनिया जानती है और रामविलास पासवान ने गुजरात दंगों के बाद वाजपेयी सरकार से इस्तीफा दे दिया था. और इन दोनों गठबंधनों की लड़ाई के बीच वामदलों का गठजोड़, पप्पू यादव का बगावती अभियान, असदुद्दीन ओवैसी, एनसीपी आदि कैटेलिस्ट का काम करेंगे.
किसी चौपाल में सवाल उछालिए कि कौन किस पर भारी है तो महागठबंधन के समर्थक महागठबंधन के पक्ष में दर्जनो तर्क सुना देते हैं, एनडीए के समर्थक एनडीए के पक्ष में.
ज्यों-ज्यों चुनाव आ रहा है, बहस बस एक ही बिंदु पर सिमटती जा रही है कि अब कौन 19 है और कौन 20. महज एक वाक्य का सवाल, जवाब में ढेरों पन्ने भरे जा सकते हैं. लेकिन वह जवाब भी इतने किंतु-परंतु के साथ होता है कि तमाम और सवालों को जन्म दे देता है. राजनीतिक पंडित और विश्लेषक कोई ठोस बात नहीं बता पा रहे तो उसकी वजह भी ठोस है. अरसे बाद बिहार में एक ऐसा चुनाव हो रहा है, जिसमें सिर्फ बयानों भर में नहीं बल्कि जमीनी तौर पर भी गलाकाट प्रतिस्पर्धा है, कांटे का मुकाबला है.
किसी चौपाल में सवाल उछालिए कि कौन किस पर भारी पड़ रहा है तो महागठबंधन के समर्थक महागठबंधन के पक्ष में दर्जनों तर्क सुना देते हैं, एनडीए के समर्थक एनडीए के पक्ष में. दोनों के पास कुछ पॉपुलर पक्ष भी हैं. मसलन नीतीश कुमार-लालू प्रसाद यादव के समर्थकों के कुछ रटे-रटाये वाक्य हैं - भाजपा और एनडीए के पास मुख्यमंत्री का उम्मीदवार तक नहीं है तो उनकी हार तो ऐसे ही हो गयी, क्योंकि बिहार में 1990 से चुनाव पार्टी, संगठन या एजेंडे के आधार पर नहीं सीधे-सीधे व्यक्तित्व को केंद्र में रखकर लड़ने का चलन है. अगला तर्क देंगे कि 16.5 प्रतिशत मुसलमान, 14-15 प्रतिशत यादव, ढाई-तीन प्रतिशत कुर्मी, इन तीनों के साथ कुछ अतिपिछड़ों और महादलितों के वोट मिला दीजिए तो यह महागठबंधन भारी पड़ता है. उनका अगला तर्क होता है कि भाजपा गठबंधन में आपसी खींचतान कितनी है यह बताने की जरूरत नहीं. टिकट बंटवारे में उनके यहां रगड़ा-झगड़ा हुआ, पासवान और मांझी आपस में टकरा रहे हैं, जो नुकसान ही करेंगे, उपेंद्र कुशवाहा मुंह फुलाये हुए हैं, भितरघात करेंगे और रही बात भाजपा की तो उसमें सवर्णों का दबदबा है तो वोट ऐसे ही छिटकेंगे, फिर कैसे होगी उसकी जीत?
'कड़ा मुकाबला है, इस बार माइक्रो मैनेजमेंट पर चुनाव होने वाला है. सूक्ष्म स्तर पर जिसकी तैयारी होगी, उसी का बेड़ा पार होगा.'
दूसरी ओर भाजपा समर्थकों के पास अपने तर्क हैं. वे सीधे कहेंगे कि लालू-नीतीश सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं और मंडल पार्ट टू की शुरुआत करने का ऐलान कर रहे हैं. लेकिन उनका यह सामाजिक न्याय जनता को समझ में नहीं आएगा कि 25 वर्षों तक जिन दो नेताओं ने शासन किया, दुबारा मंडल टू में भी वही खुद को नेता बनाने के लिए वोट मांग रहे हैं. न उनके पास कोई अतिपिछड़ा है, न दलित-महादलित, जिसे मंच पर उतार सकें. और तो और किसी मुस्लिम चेहरे को भी सामने नहीं रख पा रहे हैं. भाजपा गठबंधन के समर्थक यह भी कहते हैं कि मोदी ने पहली बार बिहार के लिए इतना बड़ा पैकेज दिया है तो उसके कारण नीतीश को भी पैकेज घोषित करना पड़ा, तो इसका श्रेय भी भाजपा गठबंधन को मिलेगा. इसी तरह के ढेरों और तर्क.
दोनो पक्षों के तर्क और तथ्य में कुछ दम तो है लेकिन इस बार का चुनाव बस इतने ही तर्कों और तथ्यों से पार नहीं होनेवाला. राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन कहते हैं, 'कड़ा मुकाबला है, इस बार माइक्रो मैनेजमेंट पर चुनाव होने वाला है. सूक्ष्म स्तर पर जिसकी तैयारी होगी, उसी का बेड़ा पार होगा. माइक्रो मैनेजमेंट की बात करें तो उसमें बूथ प्रबंधन, मतदाताओं के ध्रुवीकरण से लेकर टिकट बंटवारे तक का मामला शामिल है.' टिकटों का बंटवारा अभी शुरू ही हुआ है, उसका स्वरूप कुछ दिनों में पता चलेगा. लेकिन इसके दूसरे पक्षों पर गौर करें तो तैयारियों व अभ्यास के हिसाब से भाजपा गठबंधन थोड़ा भारी दिखता है.
भाजपा का इस बार का मुख्य एजेंडा अपने लिए वोट जुटाने से ज्यादा लालू यादव और नीतीश कुमार के वोटों का बिखराव कराना था.
एक तो भाजपा का इस बार का मुख्य एजेंडा अपने लिए वोट जुटाने से ज्यादा लालू यादव और नीतीश कुमार के वोटों का बिखराव कराना था. लालू प्रसाद-नीतीश के कोर मतदाताओं में भाजपा बिखराव के लिए सेंधमारी कर चुकी है. उपेंद्र कुशवाहा को नेता बनाकर, अपने साथ रखकर भाजपा नीतीश कुमार के सबसे प्रिय लव-कुश समीकरण यानी कोइरी-कुर्मी का बंटवारा कर चुकी है. बिहार में दलितों की राजनीति उत्तरप्रदेश की तर्ज पर करवट ले रही है. जिस तरह से उत्तरप्रदेश की राजनीति पिछड़ा बनाम दलित में मायावती और कांशीराम के सौजन्य से बंट चुकी है, उसी तरह की स्थिति इस बार बिहार में है. दलितों को एजेंडे से ज्यादा अपने चेहरे चाहिए और बिहार की राजनीति के दो बड़े दलित चेहरे रामविलास पासवान और जीतन राम मांझी फिलहाल भाजपा के खेमे में हैं. यह अलग बात है कि दोनों के बीच आपसी वर्चस्व की लड़ाई नुकसान के रास्ते भी खोल रही है.
इन सबके अलावा महागठबंधन लालू प्रसाद यादव के जिस पॉपुलर माई यानी मुस्लिम यादव समीकरण के ठोस आधार पर टिका है. यह समीकरण भी बिखराव के रास्ते पर है. असदुद्दीन ओवैसी के सीमांचल इलाके में आने से चार जिलों की करीब दो दर्जन सीटों पर इसका सीधा असर पड़ सकता है. कुछ लोगों का विचार है कि इसकी दस्तक पूरे बिहार के मुसलमानों के बीच भी सुनायी पड़ सकती है. ओवैसी की पार्टी भले बिहार के चुनाव में कुछ नहीं कर पाए लेकिन उनके आने से भाजपा के पक्ष में ध्रुवीकरण की लहर चल सकती है. लालू प्रसाद इस खतरे को जान-समझ रहे हैं, इसलिए वे बार-बार कह रहे हैं कि ओवैसी से सावधान रहिए. राजद नेता रघुवंश प्रसाद भी जानते हैं कि ओवैसी कितने खतरनाक साबित हो सकते हैं, इसलिए वे आखिरी समय तक ओवैसी को किसी तरह राजद-जदयू महागठबंधन में मिलाने की वकालत कर रहे हैं.
यदि हिंदू-मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण का खेल होगा तो बिहार का राजनीतिक इतिहास बताता है कि सबसे पहले यादव मतदाता ही जाति के खोल से बाहर निकलकर हिंदू बन सकते हैं.
यह तो मुस्लिम वोटों की बात हुई, जो ओवैसी के आने के पहले विकल्पहीनता की स्थिति में था और आंख बंदकर नीतीश-लालू के समर्थन में जानेवाला था. इसके बाद अगर लालू प्रसाद के ही कोर वोटर यादवों की बात करें तो कई यादव नेता लालू-नीतीश के विपरीत ध्रुव पर खड़े हैं. ओवैसी या किसी अन्य वजह से यदि हिंदू-मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण का खेल होगा तो बिहार का राजनीतिक इतिहास बताता है कि सबसे पहले यादव मतदाता ही जाति के खोल से बाहर निकलकर हिंदू बन सकते हैं.
इन समीकरणों की बात छोड़ भी दे तो भाजपा गठबंधन की तैयारी नीतीश-लालू प्रसाद की तैयारी पर 20 पड़ती हुई दिख रही है. भाजपा 170 से ज्यादा रथों को गांव-गांव में घुमाकर प्रचार कर रही है. जबकि नीतीश कुमार ने अपने सलाहकार प्रशांत किशोर की सलाह से, जो सरकार के सौजन्य से रथ निकालने की कोशिश की, उस पर हाईकोर्ट ने फटकार लगाकर पहले ही किरकिरी करवा दी है. लालू प्रसाद-नीतीश और कांग्रेस ने कुल मिलाकर अब तक एक बड़ी सभा की है, भाजपा और उसके साथी दल चार बड़ी सभाएं, अलग-अलग क्षेत्रों में कर चुके हैं और उसमें नरेंद्र मोदी भी आ चुके हैं. भाजपा और उसके सहयोगी दलों के लिए प्रचार में राजनीतिक कार्यकर्ताओं के अलावा संघ परिवार भी खामोशी से लगा हुआ है. मल्लाह जैसी बड़ी जातियां अब अतिपिछड़ा के साथ-साथ हिंदू जैसी बनते हुए दिखने लगी हैं, जिसका असर वोटों के समय पड़ सकता है.
नीतीश कुमार और लालू यादव के बीच जब सीटों का बंटवारा हो रहा था, तब तक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के 900 से ज्यादा कार्यकर्ता और पदाधिकारी बिहार के अलग-अलग गांव में जनसंपर्क अभियान परवान चढ़ा रहे थे. ऐसी कई तैयारियां हैं, जो भाजपा और उसके सहयोगी दलों को मजबूत बनाती है. भले ही नीतीश कुमार, लालू प्रसाद या उनके पक्ष वाले भाजपा को सवर्णों-सामंतों का समूह कहें और मंडल-कमंडल का शोर करें लेकिन जमीनी सच यही है कि भाजपा ने इतने वर्षों तक नीतीश के साथ रहकर अपने सामाजिक आधार का भी विस्तार कर लिया है. उसने बिहार में कमंडल की राजनीति को अपने नाम पेटेंट जैसा कराने के साथ ही मंडल की राजनीति में भी दखल दिया है.
उनकी कोई लाख आलोचना करे लेकिन जब मुख्यमंत्री पद के लिए एक योग्य उम्मीदवार की बात आती है तो विरोधी भी नीतीश को ही बेहतर विकल्प बताते हैं
'भाजपा सामाजिक आधार पर बढ़त लेते हुए दिख रही है. वह दलित नेताओं को अपने साथ कर चुकी है, अतिपिछड़ों को लुभाना होगा तो नरेंद्र मोदी को ही अतिपिछड़ा कहकर प्रचारित करेगी.' पूर्व सांसद और बिहार की राजनीति की समझ रखनेवाले शिवानंद तिवारी कहते हैं, 'हमने लोकसभा चुनाव के समय नीतीश को कहा था कि जमीनी स्थिति से आपको आपके दल के पदाधिकारी अवगत नहीं करा रहे, जमीन खिसक चुकी है, आपके दल के कार्यकर्ता नाराज हैं, निराश हैं. इसी बात पर नीतीश को बुरा लगा था, वे हमें निकाल दिये थे. इस बार भी स्थिति कोई बहुत भिन्न नहीं.'
शिवानंद तिवारी की बातों को अगर एक विरोधी के बयान की तरह ले लें तो एक दूसरा सवाल भी नीतीश-लालू प्रसाद के लिए इस चुनाव में घातक साबित हो सकता है. पहली बार ऐसा मौका आया है, जब लालू इतनी कम सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं और नीतीश कुमार भी कम सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार रहे हैं. उनके दल के नेता ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने के अभ्यस्त रहे हैं. वे पांच-पांच साल तक अपनी सीटों पर मेहनत कर अपनी जमीन तैयार करते रहे हैं. अब अचानक ही जिन नेताओं का वे टिकट काटेंगे, वे बगावत की राह अपनायेंगे. वे एनसीपी, सपा या पप्पू यादव और मायावती आदि की पार्टी का रास्ता देखेंगे. इन सबके बीच लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार ने जो सेकुलर एजेंडा सेट किया है, सांप्रदायिक ताकतों से लड़ने का ऐलान किया है, उस लड़ाई में वामदलों को एक सिरे से अलग करने का संदेशा, छोटे दायरे में ही सही, जाएगा जरूर. वाम दल लालू और नीतीश, दोनों का साथ देते रहे हैं. उसके कैडर संघ से शिक्षित-दीक्षित कार्यकर्ताओं को जवाब देते रहे हैं. इस बार वह कड़ी भी नीतीश-लालू के विरोध में है.
लेकिन इन तमाम बातों के बीच लालू यादव और नीतीश कुमार वाले गठजोड़ के पास कुछ मजबूत औजार भी हैं. उनमें से एक मजबूत औजार या हथियार खुद नीतीश कुमार हैं. उनकी कोई लाख आलोचना करे लेकिन जब मुख्यमंत्री पद के लिए एक योग्य उम्मीदवार की बात आती है तो विरोधी भी नीतीश को ही बेहतर विकल्प बताते हैं. यही बात नीतीश कुमार के लिए जंग जीत जाने की उम्मीद भी जगा रही है.