फिल्म : कट्टी बट्टी
निर्देशक : निखिल आडवाणी
लेखक : अंशुल सिंघल, निखिल आडवाणी
कलाकार : इमरान खान, कंगना रनोट, मिथिला पालकर
रेटिंग : 1.5 / 5
‘कट्टी बट्टी’ आधी ‘500 डेज आफ समर’ की नकल है, जैसाकि ट्रेलर बता रहे थे लेकिन निर्देशक निखिल आडवाणी नकार रहे थे. आधी यह उन सैकड़ों बॉलीवुड प्रेम कहानियों का घालमेल है जिनमें अक्सर हीरो उस नायिका को वापस पाने निकल पड़ता है जो उसे कुछ वक्त पहले छोड़ गई थी और जिसे वापस पाने के फेर में वह तमाम ऐसी ऊलजलूल हरकतें करता है जिनके बाद उसकी पागलखाने तक में पिटाई जरूरी हो जाती है.
इस नकल की और उधार की कहानी के बोझ तले दबी ‘कट्टी बट्टी’ सिर्फ अंत में दिलचस्प होती है जब वो यू-टर्न लेकर खुद को पूरी तरह बदल लेती है. तब कंगना आज वाली बेहतर अदाकारा कंगना रनोट लगती हैं. हालांकि इस हिस्से में भी हमें ऐन हैथवे की एक हालीवुड फिल्म याद आती है, लेकिन उसका जिक्र फिलहाल हम रहने देते हैं. फिल्म का ये हिस्सा मेनिपुलेटिव है और इस हिस्से में जो होता है वो लॉजिकल भी कम है. लेकिन पूरी फिल्म में बोरियत को तकिया बनाकर थियेटर में आधे लेटे, आधे बैठे आप इस हिस्से की वजह से कम से कम सीधा तो बैठ सकते हैं. लेकिन क्या खत्म हो चुकी उम्मीद से बेहतर अंत का मिलना ही फिल्म की ढेर सारी खामियों को छुपा सकता है?
नकल और उधार की कहानी के बोझ तले दबी ‘कट्टी बट्टी’ सिर्फ अंत में दिलचस्प होती है जब वो यू-टर्न लेकर खुद को पूरी तरह बदल लेती है
बिलकुल नहीं. खराब फिल्म को अपने पीछे सिर्फ सलमान खान छुपा सकते हैं. निखिल आडवाणी नहीं. इसीलिए फिल्म में वे जब यह छुपाना चाहते हैं कि उनकी ‘कट्टी बट्टी’ ‘500 डेज...' की आधी नकल है, तो वे उस प्यारी फिल्म द्वारा फ्लैशबैक में जाने के लिए प्रयोग किए गए एक शानदार तरीके की नकल ही नहीं करते. ऐसा करके आडवाणी सैंकड़ों बार फ्लैशबैक में जाने वाली ‘कट्टी बट्टी’ को खूब उलझाते हैं. वे फिल्म को अलग दिखाने के फेर में मूल फिल्म से प्रेरणा लेकर किसी भी किरदार को ठीक से परिभाषित नहीं करते. न वे रिश्तों की गहराई में उतरने की कोशिश करते हैं और न ही शहरी युवाओं की नब्ज ठीक से पकड़ने का जज्बा ही दिखाते हैं.
आधी नकल के बाद ‘कट्टी बट्टी’ खुद की कहानी बदलती है तो शायद इसलिए कि अगर वो ऐसा नहीं करती तो अंत में इमरान खान की ही एक पुरानी फिल्म ‘एक मैं और एक तू’ जैसी हो जाती. इस फिल्म के अंत में नायिका करीना कपूर नायक के प्रेम को ठुकराकर उसकी दोस्त बनी रहती हैं. इसलिए आर्गेनिक तरीके से आगे बढ़ती कहानी को बीच में छोड़कर निखिल आडवाणी फिल्म को एक दूसरे ही रास्ते पर ले जाते हैं. इस रास्ते पर स्टैंडर्ड प्रेम कहानियों की ‘कुंजी’ में से सीक्वेंस और घटनाएं लेकर फिल्म को उसकी मंजिल तक पहुंचाया जाता है.
इसलिए इतनी नकल को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने के बाद भी फिल्म बदहाल ही रहती है. एक रोमांटिक कॉमेडी होने के बावजूद फिल्म में न दिल को छू सकने वाला रोमांस है, न ही सलीके की कॉमेडी और न ही नायक-नायिका के बीच किसी तरह की केमिस्ट्री. इमरान और कंगना दोनों के ही किरदार सतही लिखे गए हैं, और जब ऐसे खोखले लिखे किरदार काबिल अभिनेता निभाते हैं तो वे भी नाकाबिले-बर्दाश्त ही लगते हैं.
फिल्म के आखिर का हिस्सा छोड़ दें, जिसमें कंगना परिपक्व अभिनय कर थोड़ी राहत देती हैं, तो बाकी पूरी फिल्म में वे ‘आउट आफ प्लेस’ लगती हैं
अगर फिल्म के आखिर का हिस्सा छोड़ दें, जिसमें कंगना परिपक्व अभिनय कर थोड़ी राहत देती हैं, तो बाकी पूरी फिल्म में वे ‘आउट आफ प्लेस’ लगती हैं. प्रभावहीन. उनके अंग्रेजी शब्दों का उच्चारण खराब रहता है, जैसा ‘क्वीन’ से पहली वाली कंगना का रहा करता था, और पूरी फिल्म में उनका अभिनय लापरवाह लगता है. अगर वे ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न’ वाली तनु का बिंदास अंदाज ही यहां दोहरा देतीं तो मजा आ जाता क्योंकि यह फिल्म भी उसी किरदार जैसा स्पार्क मांगती थी.
फिल्म में कंगना से काफी ज्यादा स्पेस इमरान खान को मिला है लेकिन फिल्म में वे वैसे ही हैं जैसे रोमांटिक कामेडी के जॉनर वाली फिल्मों में वे हमेशा से रहे हैं. वे मेहनत करते हैं लेकिन चूंकि स्क्रिप्ट उन्हें चतुर संवाद नहीं देती और लेखक उनके किरदार को गहराई नहीं देता, वे नया कुछ नहीं कर पाते.
फिल्म अजीब तरह की सिरफिरी हरकतें भी करती है. किस को लेकर एक पूरा गाना लिखती और रखती है - लिप टू लिप किसियां. लेकिन पूरी फिल्म में लिव-इन में रहने वाले, सड़कों पर रोमांस करने वाले हीरो-हीरोइन एक दूसरे को सलीके का एक किस तक नहीं करते. ऐसा भी क्या स्टार होना कि आप किरदार नहीं हो पाते? फिल्म नायक-नायिका की प्रेम कहानी में एक कछुआ भी रखती है, जिसको लेकर फिल्म में इतना बवाल है कि बेचारे प्राणी पर दया आती है. कुत्ते-बिल्लियां तक तो ठीक है, लेकिन जब हमारा बॉलीवुड उनका रिप्लेस्मेंट चील-कछुओं से करता है, भोंदू लगता है.
‘कट्टी बट्टी’ भी निखिल आडवाणी के उसी सिनेमाई संसार की फिल्म है जिसकी विस्तार से आलोचना हम ‘हीरो’ की समीक्षा में कर चुके हैं. अगर उनका खुद का कोई खास अंदाजे-बयां होता, तो बावजूद नकल और उधार के, वे इस फिल्म को मनोरंजक बना सकते थे. अभी जो वे बना चुके हैं, उससे कट्टी करना ही बेहतर है.