मुन्नार के चाय बागानों की हजारों महिला मजदूरों की हड़ताल बिना किसी ट्रेड यूनियन के सफल हुई है. अन्य जगहों पर भी मजदूर इससे प्रेरणा ले रहे हैं. क्या यह केरल के मजदूर आंदोलन में एक बड़े बदलाव का संकेत है?
केरल के बारे में एक चुटकुला प्रचलित है कि जहां चार केरलवासी जुट जाएं वहां पांच ट्रेड यूनियन खड़ी हो जाती हैं. भारत के इस दक्षिणी प्रदेश की यह ख्याति यूं ही नहीं है. आखिर केरल ने पूरी दुनिया को पहली चुनी हुई साम्यवादी सरकार दी थी जिसकी वजह से आज प्रदेश में ट्रेड यूनियनों का असर छोटी-से-छोटी जगहों पर भी दिखता है.
इसमें कोई दोराय नहीं कि मजदूरों को शोषण से बचाने में ट्रेड यूनियनों की बड़ी भूमिका रही है लेकिन हाल के दिनों में कुछ ऐसे उदाहरण सामने आए हैं जब ये सामान्य विवादों की गंभीरता समझने में नाकाम रहीं और इसके चलते इन्हें काफी आलोचना भी झेलनी पड़ी. इसका एक उदाहरण इसी साल मार्च में तब देखने को मिला था जब कोच्चि में एक अमेरिकी कलाकार वास्वो एक्स वास्वो ने ट्रेड यूनियनों का विरोध करते हुए अपनी कुछ कलाकृतियां नष्ट कर दी थीं.
वास्वो से जुड़ी और अतीत की दूसरी घटनाओं के बाद हर बार यह सवाल उठा है कि क्या ट्रेड यूनियनें केरल में अपनी प्रासंगिकता खो रही हैं? ज्यादातर बार मामला कारोबारी बनाम मजदूरों का रहा इसलिए ट्रेड यूनियनों को इस सवाल से कभी दिक्कत नहीं हुई. लेकिन एक हफ्ते पहले यहां एक ऐसी घटना हुई है जिससे केरल की तमाम ट्रेड यूनियनें सकते में हैं. इस घटना के बाद से राज्य की परंपरागत ट्रेड यूनियनों को अपने पैरों तले से जमीन खिसकती नजर आ रही है. इस बार चुनौती किसी कारोबारी या कलाकार ने नहीं बल्कि खुद मजदूरों ने दी है. वह भी उन हजारों महिला मजदूरों ने जिनके बारे में आम धारणा है कि वे संगठित होकर अपनी मांगें नहीं मनवा सकतीं.
केरल में मुन्नार के चाय बागानों की महिला मजदूर अपनी मांगों को लेकर पांच सितंबर से हड़ताल कर रही थीं. यहां चाय बागानों में पत्तियां तोड़ने वालीं सभी मजदूर महिलाएं हैं. जब हड़ताल शुरू हुई तो पहले दो-एक दिन सिर्फ कुछ सैकड़ा महिलाएं ही इसमें शामिल थीं लेकिन एक हफ्ता पूरा होते-होते सभी दस हजार महिलाएं हड़ताल में शामिल हो गईं. इसके बाद मुन्नार की सभी मुख्य सड़कों पर उन्होंने कब्जा कर लिया. इस आंदोलन की खासबात थी कि इसकी कमान किसी भी ट्रेड यूनियन के हाथों में नहीं थी. ट्रेड यूनियनों से मोलभाव की आदी केरल सरकार और चाय कंपनी के लिए यह बड़ी विचित्र स्थिति थी. आखिरकार उन्हें महिलाओं की प्रतिनिधियों से ही बात करनी पड़ी. 13 सितंबर को जब यह हड़ताल खत्म हुई तो केरल के मजदूर आंदोलन के इतिहास में यह आम दिन नहीं था. पहली बार राज्य में हजारों की संख्या में हड़तालरत मजदूरों ने बिना किसी ट्रेड यूनियन के हस्तक्षेप के अपनी मांगें मनवा ली थीं और ये सभी मजदूर महिलाएं थीं.
तीन बड़ी ट्रेड यूनियनों में शामिल कांग्रेस से जुड़ी इनटक और सीपीआई से संबंधित एटक के नेताओं ने बाद में खुद भी इस पूरे आंदोलन से दूरी बना ली थी. सीपीएम से संबंद्धित सीटू के स्थानीय अध्यक्ष वी मरियप्पन कहते हैं कि उनकी ट्रेड यूनियन के लोगों ने कंपनी से कुछ नहीं लिया है. इसके साथ वे यह भी दावा करते हैं कि ट्रेड यूनियनें पहले ही कंपनी प्रबंधन से बोनस बढ़ाने की मांग को लेकर तीन बार बैठक कर चुकी थीं लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकला.
इस सफलता को केरल की ज्यादातर ट्रेड यूनियनें भी मान रही हैं. वे इस बात को भी स्वीकार कर रही हैं कि वे महिलाओं में पनप रहे असंतोष को भांपने में असफल रहीं. सीटू के प्रदेश अध्यक्ष ए आनंदन एक रिपोर्ट में कहते हैं, ‘हम प्रबंधन के इस तर्क से सहमत हो गए थे कि यदि हमने ज्यादा अड़ियल रुख अपनाया तो फैक्टरियां बंद हो जाएंगी. लेकिन हमें इसकी परवाह नहीं करनी चाहिए थी.’ एटक के राज्य महासचिव और सीपीआई के राज्य सचिव कनम राजेंद्रन भी आनंदन की बात का समर्थन करते हुए बताते हैं, ‘सभी ट्रेड यूनियनों ने दिहाड़ी 500 रुपये करने और 20 प्रतिशत बोनस की मांग की थी लेकिन हम प्रबंधन को इसके लिए मजबूर नहीं कर पाए.’ ट्रेड यूनियनों के दूसरे नेता भी कुछ ऐसा ही तर्क देते हैं. लेकिन महिला आंदोलनकारियों के मुताबिक यूनियन नेताओं को पहले ही कंपनी ने उपकृत कर दिया था तो वे मजदूरों की मांग मनवाने के लिए प्रबंधन के सामने क्यों अड़ते.
ट्रेड यूनियनों की इसी असफलता ने मुन्नार में महिलाओं का इतना बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिया था. दिलचस्प बात है कि केरल में इसी तर्ज पर इदुक्की और वायनाड़ जिलों के चाय बागानों में भी कामगारों ने हड़ताल शुरू की है और इनमें भी ट्रेड यूनियनों को दूर रखा गया है. यदि ये आंदोलन भी सफल होते हैं तो आने वाले समय में केरल की ट्रेड यूनियनों के लिए खुद को प्रासंगिक बनाए रखने की चुनौती और बढ़ जाएगी. हालांकि इस स्थिति को खुद से ज्यादा मजदूरों के लिए खतरनाक बताते हुए इनटक के प्रदेश अध्यक्ष आर चंद्रशेखरन एक रिपोर्ट में कहते हैं, ‘मुन्नार आंदोलन के आधार पर यदि आप ये कहें कि ट्रेड यूनियनों की जरूरत खत्म हो गई है तो आप इस तरह से एक अराजकता को न्योता दे देंगे.’
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इसमें कोई दोराय नहीं कि मजदूरों को शोषण से बचाने में ट्रेड यूनियनों की बड़ी भूमिका रही है लेकिन हाल के दिनों में कुछ ऐसे उदाहरण सामने आए हैं जब ये सामान्य विवादों की गंभीरता समझने में नाकाम रहीं और इसके चलते इन्हें काफी आलोचना भी झेलनी पड़ी. इसका एक उदाहरण इसी साल मार्च में तब देखने को मिला था जब कोच्चि में एक अमेरिकी कलाकार वास्वो एक्स वास्वो ने ट्रेड यूनियनों का विरोध करते हुए अपनी कुछ कलाकृतियां नष्ट कर दी थीं.
पहले दो-एक दिन सिर्फ कुछ सैकड़ा महिलाएं ही हड़ताल में शामिल थीं लेकिन एक हफ्ता पूरा होते-होते सभी दस हजार महिलाएं हड़ताल में शामिल हो गईं. अब मुन्नार की सभी मुख्य सड़कों पर उनका कब्जा थावास्वो अपनी कलाकृतियों से भरे छह बॉक्स एक ट्रक में लोड करवाना चाहते थे. इस काम के लिए स्थानीय मजदूरों ने उनसे दस हजार रुपये मांग लिए. वास्वो ने जब इतने छोटे से काम के लिए इतनी बड़ी रकम पर कुछ मोलभाव किया तो कोच्चि की स्थानीय ट्रेड यूनियन से जुड़े लोगों ने वास्वो के काम का बहिष्कार कर दिया. इसी के विरोध स्वरूप वास्वो ने अपनी कुछ कलाकृतियों को सार्वजनिक रूप से नष्ट किया था जो राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में सुर्खियां बना था.
वास्वो से जुड़ी और अतीत की दूसरी घटनाओं के बाद हर बार यह सवाल उठा है कि क्या ट्रेड यूनियनें केरल में अपनी प्रासंगिकता खो रही हैं? ज्यादातर बार मामला कारोबारी बनाम मजदूरों का रहा इसलिए ट्रेड यूनियनों को इस सवाल से कभी दिक्कत नहीं हुई. लेकिन एक हफ्ते पहले यहां एक ऐसी घटना हुई है जिससे केरल की तमाम ट्रेड यूनियनें सकते में हैं. इस घटना के बाद से राज्य की परंपरागत ट्रेड यूनियनों को अपने पैरों तले से जमीन खिसकती नजर आ रही है. इस बार चुनौती किसी कारोबारी या कलाकार ने नहीं बल्कि खुद मजदूरों ने दी है. वह भी उन हजारों महिला मजदूरों ने जिनके बारे में आम धारणा है कि वे संगठित होकर अपनी मांगें नहीं मनवा सकतीं.
केरल में मुन्नार के चाय बागानों की महिला मजदूर अपनी मांगों को लेकर पांच सितंबर से हड़ताल कर रही थीं. यहां चाय बागानों में पत्तियां तोड़ने वालीं सभी मजदूर महिलाएं हैं. जब हड़ताल शुरू हुई तो पहले दो-एक दिन सिर्फ कुछ सैकड़ा महिलाएं ही इसमें शामिल थीं लेकिन एक हफ्ता पूरा होते-होते सभी दस हजार महिलाएं हड़ताल में शामिल हो गईं. इसके बाद मुन्नार की सभी मुख्य सड़कों पर उन्होंने कब्जा कर लिया. इस आंदोलन की खासबात थी कि इसकी कमान किसी भी ट्रेड यूनियन के हाथों में नहीं थी. ट्रेड यूनियनों से मोलभाव की आदी केरल सरकार और चाय कंपनी के लिए यह बड़ी विचित्र स्थिति थी. आखिरकार उन्हें महिलाओं की प्रतिनिधियों से ही बात करनी पड़ी. 13 सितंबर को जब यह हड़ताल खत्म हुई तो केरल के मजदूर आंदोलन के इतिहास में यह आम दिन नहीं था. पहली बार राज्य में हजारों की संख्या में हड़तालरत मजदूरों ने बिना किसी ट्रेड यूनियन के हस्तक्षेप के अपनी मांगें मनवा ली थीं और ये सभी मजदूर महिलाएं थीं.
आंदोलनकारियों का प्रतिनिधित्व करने वाली महिलाओं ने मीडिया में उन 150 ट्रेड यूनियन नेताओं की सूची भी जारी की थी जिन्हें केडीएचपी प्रबंधन की तरफ से घर दिए गए हैं
हड़ताल क्यों शुरू हुई?
केरल का प्रसिद्ध पर्यटक स्थल मुन्नार अपने खूबसूरत चाय बागानों के लिए भी जाना जाता है. ये चाय बागान दशकों पहले कन्नन देवन हिल्स प्लांटेशन कंपनी लिमिटेड (केडीएचपी) ने लीज पर लिए थे और फिलहाल यह कंपनी टाटा समूह का हिस्सा है. केडीएचपी ने 26 अगस्त को घोषणा की थी कि इस साल मजदूरों को 10 प्रतिशत सालाना बोनस मिल पाएगा जबकि मजदूर कम से कम 20 प्रतिशत बोनस की उम्मीद कर रहे थे. इससे भी उन्हें साल के अंत में तकरीबन 8000 रुपये ही मिलते. इसी का विरोध करने के लिए महिलाएं धीरे-धीरे एकजुट हुईं. वे छोटे-छोटे समूहों के जरिए मोबाइल फोन पर एक दूसरे के संपर्क में रहीं और हड़ताल की तैयारी करने लगीं. आपसी बातचीत में यह मुद्दा भी उठा कि बोनस के साथ-साथ 231 रुपये की दिहाड़ी बढ़वाने की मांग भी की जाए. हड़ताल औपचारिक रूप से पांच सितंबर को शुरू हुई. इस दिन सुबह-सुबह 50 महिलाओं ने केडीपीएचपी मुख्यालय के सामने नारेबाजी शुरू की और शाम होते-होते यहां सैकड़ों महिलाएं जमा हो गईं. दो-तीन दिन के भीतर ही कंपनी की सभी दस हजार महिलाएं इस हड़ताल और विरोध प्रदर्शन का हिस्सा बन गईं.इस हड़ताल से ट्रेड यूनियन कैसे बाहर रहीं?
जब हड़ताल शुरू हुई तो स्थानीय मीडिया में लगातार यह सवाल उठ रहा था कि ट्रेड यूनियनें इस आंदोलन से कैसे बाहर हैं. मीडिया को लग रहा था कि वे अभी खुलकर सामने नहीं आई हैं लेकिन दो-तीन दिन में साफ हो जाएगा कि इस महिला मजदूर आंदोलन की कमान किस ट्रेड यूनियन के हाथों में हैं. लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ और पत्रकारों ने इन महिलाओं से पूछा तो पता चला कि ट्रेड यूनियनों ने तो बहुत कोशिश की लेकिन महिलाओं ने उन्हें अपने आंदोलन का हिस्सा बनने ही नहीं दिया. स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार यहां तमाम महिला कामगार आरोप लगाती हैं कि ट्रेड यूनियनों ने कंपनी प्रबंधन से तीन ब्रीफकेस भरकर पैसा लिया है. आंदोलनकारियों का प्रतिनिधित्व करने वाली महिलाओं ने मीडिया में उन 150 ट्रेड यूनियन नेताओं की सूची भी जारी की थी जिन्हें केडीएचपी प्रबंधन की तरफ से घर दिए गए हैं. इस सूची में क्षेत्र के विधायक और ट्रेड यूनियन नेता एस राजेंद्रन का नाम भी शामिल था.तीन बड़ी ट्रेड यूनियनों में शामिल कांग्रेस से जुड़ी इनटक और सीपीआई से संबंधित एटक के नेताओं ने बाद में खुद भी इस पूरे आंदोलन से दूरी बना ली थी. सीपीएम से संबंद्धित सीटू के स्थानीय अध्यक्ष वी मरियप्पन कहते हैं कि उनकी ट्रेड यूनियन के लोगों ने कंपनी से कुछ नहीं लिया है. इसके साथ वे यह भी दावा करते हैं कि ट्रेड यूनियनें पहले ही कंपनी प्रबंधन से बोनस बढ़ाने की मांग को लेकर तीन बार बैठक कर चुकी थीं लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकला.
‘मुन्नार आंदोलन के आधार पर यदि आप ये कहें कि ट्रेड यूनियनों की जरूरत खत्म हो गई है तो आप इस तरह से एक अराजकता को न्योता दे देंगे’
इस आंदोलन की सफलता पर ट्रेड यूनियनों का क्या कहना है
कोच्चि में 13 सितंबर को कंपनी प्रबंधन, आंदोलन प्रतिनिधियों और सरकार के प्रतिनिधियों के बीच जो समझौता हुआ है उसके हिसाब से केडीएचपी 8.33 प्रतिशत की रकम बोनस के रूप ने देगी और बाकी 11.67 प्रतिशत का हिस्सा बोनस की तरह नहीं होगा लेकिन अलग से इसकी व्यवस्था की जाएगी. जहां तक दैनिक मजदूरी बढ़ाने का मामला है तो यह काम श्रम कल्याण आयुक्त के जिम्मे कर दिया गया है. महिला कामगारों की मांगें कंपनी और सरकार ने बिल्कुल उसी रूप में नहीं मानी जैसी वे चाहती थीं लेकिन इसके बाद भी हड़ताल को सफल तो कहा ही जा सकता है.इस सफलता को केरल की ज्यादातर ट्रेड यूनियनें भी मान रही हैं. वे इस बात को भी स्वीकार कर रही हैं कि वे महिलाओं में पनप रहे असंतोष को भांपने में असफल रहीं. सीटू के प्रदेश अध्यक्ष ए आनंदन एक रिपोर्ट में कहते हैं, ‘हम प्रबंधन के इस तर्क से सहमत हो गए थे कि यदि हमने ज्यादा अड़ियल रुख अपनाया तो फैक्टरियां बंद हो जाएंगी. लेकिन हमें इसकी परवाह नहीं करनी चाहिए थी.’ एटक के राज्य महासचिव और सीपीआई के राज्य सचिव कनम राजेंद्रन भी आनंदन की बात का समर्थन करते हुए बताते हैं, ‘सभी ट्रेड यूनियनों ने दिहाड़ी 500 रुपये करने और 20 प्रतिशत बोनस की मांग की थी लेकिन हम प्रबंधन को इसके लिए मजबूर नहीं कर पाए.’ ट्रेड यूनियनों के दूसरे नेता भी कुछ ऐसा ही तर्क देते हैं. लेकिन महिला आंदोलनकारियों के मुताबिक यूनियन नेताओं को पहले ही कंपनी ने उपकृत कर दिया था तो वे मजदूरों की मांग मनवाने के लिए प्रबंधन के सामने क्यों अड़ते.
ट्रेड यूनियनों की इसी असफलता ने मुन्नार में महिलाओं का इतना बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिया था. दिलचस्प बात है कि केरल में इसी तर्ज पर इदुक्की और वायनाड़ जिलों के चाय बागानों में भी कामगारों ने हड़ताल शुरू की है और इनमें भी ट्रेड यूनियनों को दूर रखा गया है. यदि ये आंदोलन भी सफल होते हैं तो आने वाले समय में केरल की ट्रेड यूनियनों के लिए खुद को प्रासंगिक बनाए रखने की चुनौती और बढ़ जाएगी. हालांकि इस स्थिति को खुद से ज्यादा मजदूरों के लिए खतरनाक बताते हुए इनटक के प्रदेश अध्यक्ष आर चंद्रशेखरन एक रिपोर्ट में कहते हैं, ‘मुन्नार आंदोलन के आधार पर यदि आप ये कहें कि ट्रेड यूनियनों की जरूरत खत्म हो गई है तो आप इस तरह से एक अराजकता को न्योता दे देंगे.’
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