अपनी बेहतरीन कारों के लिए मशहूर जर्मन कंपनी फॉक्सवैगन के सीईओ मार्टिन विंटरकॉर्न ने इस्तीफा दे दिया है. उन्होंने प्रदूषण की मात्रा छिपाने के लिए कंपनी की डीजल कारों में हुए फर्जीवाड़े की जिम्मेदारी ली है. कंपनी के 78 साल के इतिहास में यह सबसे बड़ा स्कैंडल है. विंटरकॉर्न ने एक बयान में कहा कि कंपनी को अब एक नई शुरुआत की जरूरत है और अपने इस्तीफे के साथ वे इसके लिए जगह खाली कर रहे हैं. उनका यह भी कहना था कि पिछले कुछ दिनों की घटनाओं से वे सदमे में हैं और सबसे ज्यादा धक्का उन्हें इस बात से लगा है कि कंपनी में इतने बड़े स्तर पर गड़बड़ी हुई.
दरअसल इस मामले में फॉक्सवैगन पर कोई बड़ी कार्रवाई करने का जबर्दस्त दबाव है. खबरों के मुताबिक जल्द ही कंपनी के कुछ और बड़े अधिकारियों पर भी गाज गिर सकती है. कुछ दिन पहले अमेरिकी एजेंसियों ने जांच में पाया था कि कंपनी ने एक विशेष डिवाइस का इस्तेमाल करके टेस्टिंग में प्रदूषण की मात्रा को कम दिखाया, जबकि सड़क पर चल रही उसकी कारें ज्यादा प्रदूषण कर रही थीं. इसके बाद कंपनी ने भी माना कि उसने करीब एक करोड़ दस लाख कारों में यह डिवाइस लगाई है. इस प्रकरण के सामने आने के बाद फॉक्सवैगन के शेयरों की कीमतों में 30 फीसदी से भी ज्यादा की गिरावट आ गई है. अमेरिका में उस पर 18 अरब डॉलर तक का जुर्माना भी हो सकता है.


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एड्स की दवा के दामों में हुई असाधारण बढ़ोतरी कम होगी
ट्यूरिंग फार्मा ने कहा है कि वह एड्स रोगियों के लिए अहम दवा डाराप्रिम के दाम में हुई बढ़ोतरी को कम करेगी. भारी विरोध के चलते कंपनी ने यह फैसला लिया. एड्स के इलाज में पिछले 62 सालों से इस्तेमाल की जाने वाली इस दवा की कीमत कंपनी ने अचानक करीब 890 रुपए प्रति खुराक से सीधे लगभग 49.5 हजार रुपए कर दी थी. कंपनी के सीईओ माइकल शकरेली ने इस असाधारण बढ़ोतरी का बचाव करते हुए कहा था कि इससे मिलने वाले पैसे का इस्तेमाल शोध में किया जाएगा. लेकिन सोशल मीडिया में उनकी भद पिट गई. हिलेरी क्लिंटन सहित कई बड़ी हस्तियों ने भी कंपनी के इस कदम की आलोचना की थी. इस दवा की एक ख़ुराक को बनाने में क़रीब एक डॉलर का ख़र्च आता है.
शरणार्थियों के मुद्दे पर यूरोप में दोफाड़ गंभीर
शरणार्थियों के मुद्दे पर यूरोपीय संघ में दोफाड़ और भी गंभीर हो गया है. एक लाख 20 हज़ार शरणार्थियों को यूरोपीय संघ के देशों में जगह देने की योजना पर मध्य यूरोपीय देशों ने खुली नाराज़गी जताई है. मंगलवार को ब्रसेल्स में यूरोपीय संघ के गृह मंत्रियों की बैठक में इस कोटा व्यवस्था को मंज़ूरी दी गई थी. लेकिन रोमानिया, चेक गणराज्य, स्लोवाकिया और हंगरी ने शरणार्थियों को लेने की अनिवार्यता वाले इस प्रस्ताव के विरोध में मतदान किया. चेक राष्ट्रपति मिलोस जमान के मुताबिक भविष्य ही बताएगा कि ये कितनी बड़ी ग़लती है. जर्मनी और फ्रांस समेत यूरोपीय संघ के कई अहम देश इस कोटा व्यवस्था का समर्थन कर रहे हैं. इसके तहत ग्रीस, इटली और हंगरी पहुंच रहे शरणार्थियों को अन्य यूरोपीय देशों में बसाया जाना है. नए प्रस्ताव के मुताबिक़ जो देश प्रवासियों को लेने से इनकार करेंगे, उन पर जुर्माना लगाए जाने का प्रावधान है.