स्वच्छ भारत अभियान के एक साल पूरा होने के मौके पर हिंदुस्तान टाइम्स की संपादकीय टिप्पणी
दो अक्टूबर 2014 को शुरू किया गया स्वच्छ भारत अभियान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी परियोजनाओं में से एक है. इसका मकसद है कि 2019 में जब देश महात्मा गांधी की 150 जयंती मना रहा हो तो खुले में शौच की समस्या पूरी तरह खत्म हो चुकी हो. यह एक प्रशंसनीय मगर चुनौती भरा लक्ष्य है, खासकर यह देखते हुए कि देश में 53 फीसदी से ज्यादा घरों में अब भी शौचालय नहीं हैं. ग्रामीण क्षेत्रों के लिए यह आंकड़ा 70 फीसदी है.
शौचालय बनाना जरूरी है, लेकिन इन्हें बनाने से जुड़े लक्ष्यों को हासिल करने की जल्दी में हम इस तथ्य को नजरअंदाज कर रहे हैं कि शौचालयों का निर्माण इस चुनौती का महज एक हिस्सा है. स्वच्छ भारत अभियान के और भी कई मकसद हैं. हाथ से मैला साफ करने की व्यवस्था का अंत, कूड़े के प्रबंधन की एक वैज्ञानिक व्यवस्था पर अमल, लोगों की आदतों में बदलाव, सफाई और स्वास्थ्य के बीच आपसी संबंध के बारे में जागरूकता बढ़ाना और शहरी निकायों की क्षमताओं में सुधार करना भी उतना ही अहम है. भारत को अगर 2019 का लक्ष्य हासिल करना है तो इन पर भी उतना ही ध्यान देना होगा.
पानी की आपूर्ति और मल की सुरक्षित निकासी वाली व्यवस्था के बिना शौचालय बेकार हो जाएंगे. खबरें आ ही रही हैं कि कई शौचालयों को अनाज या फिर पशुओं को रखने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है.
पानी की आपूर्ति और मल की सुरक्षित निकासी वाली व्यवस्था के बिना शौचालय बेकार हो जाएंगे. खबरें आ ही रही हैं कि इनमें से कई शौचालयों को अनाज या फिर पशुओं को रखने जैसे कामों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है. सफाई सिर्फ ग्रामीण भारत की समस्या नहीं है. बड़े शहरों में भी सिर्फ 30 फीसदी सीवेज का ट्रीटमेंट हो पाता है. यह देखते हुए हैरत की बात नहीं है कि बीते साल जो छह करोड़ शौचालय बने उनमें से करीब 1.3 करोड़ बेकार हो गए हैं. लोग खुले में शौच करने की अपनी आदत छोड़ें, इसके लिए और भी ज्यादा समय और पैसे के निवेश की जरूरत होगी.
रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर कंपैशियोनेट इकॉनॉमिक्स द्वारा किया गया एक अध्ययन बताता है कि खुले में शौच करने वाले आधे से ज्यादा लोगों का कहना है कि वे ऐसा इसलिए करते हैं कि ऐसा करना उन्हें आनंददायक और सुविधाजनक लगता है. अध्ययन के मुताबिक इन सभी लोगों का यह पता नहीं था कि उनकी इस आदत का नवजात मृत्यु दर, कुपोषण और आर्थिक उत्पादकता जैसी चीजों से संबंध है. लेकिन दुर्भाग्य से स्वच्छता को लेकर भारत की नीतियां ऐतिहासिक रूप से शौचालय बनाने पर ही केंद्रित रही हैं. अब भी यह प्रक्रिया जारी है. हमें अपनी पुरानी गलतियों से सबक लेना होगा.
साफ है कि इस अभियान को सभी पहलुओं पर ध्यान देने की जरूरत है. नहीं तो यह अपने मकसद तक नहीं पहुंच सकेगा. और अगर ऐसा हुआ तो यह देश का एक बड़ा नुकसान होगा.