संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक अमूमन एक रस्मी आयोजन होती है. इसमें मीडिया की नजर किसी राष्ट्र प्रमुख के भाषण से ज्यादा इस बात पर होती है कि उसकी किस दूसरे महत्वपूर्ण नेता से मुलाकात हुई. 2015 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बैठक में भाग लेने न्यूयॉर्क गए तो शुरुआत में यही हो रहा था. लेकिन जब उन्होंने टाउनहॉल स्थित फेसबुक मुख्यालय में कंपनी के संस्थापक और सीईओ मार्क जुकरबर्ग से मुलाकात की तो शायद भारतीय राजनीति के इतिहास में पहली बार मीडिया ने इस मुलाकात को मोदी की बाकी राष्ट्र प्रमुखों से मुलाकात से ज्यादा तवज्जो दी.

27 सितंबर, 2015 को मोदी और जुकरबर्ग के बीच हुई यह बातचीत उस दिन मीडिया में छाई रही. सोशल मीडिया में तो उससे बड़ा कोई मुद्दा था ही नहीं. उसी दिन यहां एक खबर वायरल हो रही थी कि डिजिटल इंडिया के समर्थन में जिन लोगों ने प्रोफाइल पिक्चर को तिरंगे में रंगा है उन्होंने अनजाने में ही फेसबुक के एक विवादित कार्यक्रम को समर्थन दे दिया. इस खबर के बाद लोग लगातार यह सवाल पूछ रहे थे कि क्या यह कैंपेन किसी षड्यंत्र का हिस्सा है. हालांकि बाद में जब फेसबुक ने आधिकारिक रूप से इस खबर को नकारते हुए स्पष्टीकरण दे दिया तो सभी लोगों को इस सवाल का जवाब मिल गया और यह विवाद भी खत्म हो गया.

लेकिन मोदी और जुकरबर्ग की इसी मुलाकात से जुड़ा एक सवाल ऐसा है जिस पर सोशल मीडिया में अब भी कयासबाजी चलती रहती है. मोदी से मुलाकात के दौरान मार्क जुकरबर्ग ने इस बात का जिक्र किया था कि एक समय जब फेसबुक बहुत बुरे दौर से गुजर रहा था और कंपनी के बिकने की नौबत आ गई थी तो एपल के सीईओ स्टीव जॉब्स की सलाह पर वे भारत के एक मंदिर में आए थे.

इस घटना की जानकारी देते हुए जुकरबर्ग का कहना था, ‘हमारी कंपनी के इतिहास में निजी तौर पर भारत काफी महत्वपूर्ण है. यह कहानी मैंने सार्वजनिक रूप से कभी नहीं सुनाई और बहुत कम लोगों को इस बारे में पता है... जब चीजें ठीक नहीं चल रही थीं... कई लोग फेसबुक को खरीदना चाहते थे... तब मैं अपने एक मार्गदर्शक स्टीव जॉब्स से मिलने गया. उन्होंने मुझे सलाह दी कि मेरा अपनी कंपनी के लिए जो मिशन है, उससे दोबारा जुड़ने के लिए मुझे भारत के उस मंदिर में जाना चाहिए जहां वे खुद अपने शुरुआती दिनों में गए थे....’

मार्क जुकरबर्ग ने यह पूरी घटना तो बताई लेकिन यह नहीं बताया कि वे भारत में कौन से मंदिर आए थे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी मंच पर उनसे यह नहीं पूछा, लेकिन सोशल मीडिया में तुरंत कयासबाजी शुरू हो गई. लोगों ने इस सवाल का जवाब खोजने के लिए स्टीव जॉब्स की आधिकारिक जीवनी और बीते सालों के उनके साक्षात्कारों व बयानों को खंगालना शुरू किया. कुछ ही घंटे लगे होंगे और सोशल मीडिया और कुछ एक दूसरी न्यूज वेबसाइटों ने एक तरह से घोषणा कर दी कि मार्क जुकरबर्ग उत्तराखंड के नैनीताल स्थित कैंचीधाम आश्रम आए थे. इसका आधार यह था कि स्टीव जॉब्स जब 1980 के दशक में भारत आए तो उनकी मंजिल भी नैनीताल स्थित नीब करौरी बाबा (प्रचलित नाम - नीम करौली बाबा) का यही आश्रम था.

फेसबुक के सीईओ की बात को यदि स्टीव जॉब्स की भारत यात्रा से सीधे-सीधे जोड़ें तो यह निष्कर्ष निकालना गलत नहीं है. लेकिन यदि आप स्टीव जॉब्स की भारत यात्रा में बारे में उनके साक्षात्कारों, बयानों और उनके ऊपर लिखी गई किताबों व आलेखों को पढ़ेंगे तो इस बात पर पर्याप्त संदेह उभरते हैं कि उन्होंने जुकरबर्ग को कैंचीधाम आने की सलाह दी होगी.

स्टीव जॉब्स के भारत आने की बात तो सभी मानते हैं कि लेकिन खुद उन्होंने कहीं इसका जिक्र नहीं किया कि वे किस साल भारत आए थे. इंटरनेट पर मौजूद सामग्री से पता चलता है कि 1974 से 1976 के बीच कुछ महीनों के लिए वे भारत आए थे. उनके भारत आने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है. जिस तरह जुकरबर्ग कहते हैं कि उन्हें स्टीव जॉब्स ने भारत आने की सलाह दी थी उसी तरह जॉब्स को भी उनके एक दोस्त और मार्गदर्शक रॉबर्ट फ्रीडलैंड ने यही सलाह दी थी. 2011 में आई किताब ‘स्टीव जॉब्स’ में वॉल्टर आईजेक्सन लिखते हैं कि रॉबर्ट 1973 में भारत आए थे और नीम करौली बाबा के भक्त बन गए थे. उन्होंने ही स्टीव को सलाह दी थी कि उन्हें बाबा से मिलना चाहिए. रॉबर्ट इस समय खनन क्षेत्र की कंपनी इवान्हो माइन्स के सीईओ हैं और फोर्ब्स पत्रिका के अनुसार तकरीबन करीब एक से डेढ़ अरब डॉलर के मालिक हैं.

स्टीव जॉब्स एपल कंपनी शुरू करने के पहले वीडियो गेम बनाने वाली कंपनी एटारी में काम करते थे. कॉलेज की पढ़ाई छोड़कर उन्हें यहां नौकरी करते हुए कुछ वक्त ही बीता था कि रॉबर्ट से उनकी मुलाकात हो गई. फिर उन्होंने भारत घूमने की चाह में नौकरी छोड़ दी. ‘स्टीव जॉब्स’ में जिक्र है कि उनके लिए भारत की यात्रा एडवेंचर नहीं थी. उन्हें अपने लिए गुरू की तलाश थी और वे यहां आध्यात्मिक यात्रा पर आना चाहते थे.

स्टीव जॉब्स ने भारत की यात्रा शुरू की तो उनका पहला पड़ाव दिल्ली थी. यहां वे पहाड़गंज के एक होटल में रुके और तुरंत ही खादी का कुर्ता और लुंगी पहनकर साधारण भारतीय लिबास में आ गए. स्टीव जॉब्स पहले से ही भारत और भारतीय दर्शन से काफी प्रभावित थे, लेकिन ‘गुरू’ की खोज के क्रम में जब वे यहां रहे तो भारत से जुड़ी उनकी कई धारणाएं टूटीं. इनमें से पहली तो भारतीयों के बहुत सज्जन होने से जुड़ी थीं. इसका पहला अनुभव उन्हें तब हुआ जब होटल वाले ने उनसे वादा किया कि वे जब तक यहां रुकेंगे उन्हें पीने के लिए फिल्टर्ड पानी मिलेगा, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया. इससे स्टीव की तबीयत काफी खराब हो गई.

स्टीव की सेहत जब ठीक हुई तो वे पहले हरिद्वार पहुंचे. यहां कुछ दिन रुकने के बाद वे कैंचीधाम आ गए. हालांकि जब वे नीम करौली बाबा के आश्रम में आए तब उन्हें पता चला कि बाबा का देहांत तो कई दिन पहले हो चुका है. स्टीव जॉब्स के दोस्त डेनियल कोट्टके जो बाद में एपल के पहले कर्मचारी भी बने, ने इस यात्रा में कुछ वक्त स्टीव के साथ बिताया था. वे एक इंटरव्यू में कहते हैं, ‘जब हम नीम करौली बाबा आश्रम पहुंचे तो वह काफी सूनी-सूनी सी जगह थी. बाबा के जो हिप्पी भक्त थे अब उनका वहां जमावड़ा नहीं लगता था.’ अब स्टीव जॉब्स को ‘आत्म साक्षात्कार’ की कोई उम्मीद नहीं रही. इस आश्रम को देखकर उन्हें काफी झटका भी लगा.

स्टीव जॉब्स और डेनियल कोट्टके कुछ दिन यहीं रुके और फिर हरियाखान बाबा के आश्रम चले गए. उनकी भी ख्याति थी कि वे अवतार हैं. कोट्टके एक इंटरव्यू में कहते हैं, ‘हरियाखान बाबा अपेक्षाकृत युवा थे. हमने उनके बारे में भी कई बातें सुनी थीं लेकिन उनसे मिलकर हमें ऐसा नहीं लगा कि वे परमज्ञानी हैं.’

स्टीव जॉब्स ने उत्तराखंड की इस यात्रा में कई गांवों और कस्बों को करीब से देखा था. माइकल मोरित्ज ने उनकी एक जीवनी लिखी है. इसमें वे कहते हैं कि स्टीव के दिमाग में जो छवि थी उस हिसाब से उन्हें भारत में ज्यादा गरीबी देखने को मिली. वे देश की इस हालत और इसके ‘माहौल में पवित्रता’ के विरोधाभास से हैरान थे. अपनी आधिकारिक जीवनी ‘स्टीव जॉब्स’ में स्टीव के हवाले से कहा गया है, ‘हमें ऐसी कोई जगह नहीं मिलने वाली थी जहां हम आत्मसाक्षात्कार के लिए महीनेभर रुक सकते हों. इस समय पहली बार मैंने सोचना शुरू किया कि नीम करोली बाबा और कार्ल मार्क्स, दोनों ने दुनिया की बेहतरी के लिए शायद उतना नहीं किया जितना थॉमस अल्वा एडीसन ने किया है.’

स्टीव जॉब्स भारत में तकरीबन सात महीने तक रुके. अपनी यात्रा के अंतिम दिनों में वे बौद्ध धर्म से काफी प्रभावित हो गए थे. एपल के संस्थापकों में शामिल स्टीव वोजिनियाक एक इंटरव्यू में बताते हैं कि स्टीव जॉब्स जब भारत से लौटे तो उनका सिर मुंडा हुआ था और वे बौद्ध धर्म के अनुयायी बन चुके थे.

ऊपर लिखे उदाहरण और उद्धरण बस ये बताने के लिए हैं कि सीधे-सीधे यह मान लेना कि स्टीव जॉब्स ‘भारतीय आध्यात्म’ से बहुत प्रभावित थे, सही नहीं है. इसकी एक बानगी 2005 में स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के उस भाषण से भी मिलती है जिसमें उन्होंने कहा था कि उनकी भारत यात्रा कोई बहुत खुशनुमा यात्रा नहीं थी. अब यदि ऐसा था तो इस बात पर पूरा यकीन करना मुश्किल है कि उन्होंने मार्क जुकरबर्ग को भारत के किसी विशेष मंदिर, जिसे कई लोग कैंचीधाम कह रहे हैं, आने की सलाह दी होगी.

अपने आध्यात्मिक लक्ष्यों को पाने असफल रहे स्टीव जॉब्स यह जरूर कहते थे भारत आकर उन्होंने आत्मप्रेरणा की शक्ति को समझा. उन्होंने सार्वजनिक रूप से कई बार कहा कि अमेरिकी या पश्चिमी देशों के लोग कामों में बुद्धिमत्ता को तरजीह देते हैं लेकिन भारतीय आत्मप्रेरणा को तरजीह देते हैं और यह ज्यादा प्रभावशाली है. यह अनुभव उन्हें भारत के गांव-कस्बों में घूमते हुए मिला था. इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि यदि उन्होंने मार्क जुकरबर्ग को भारत आने की सलाह दी होगी तो वह भारतीय जनजीवन के इसी पहलू को समझने के उद्देश्य से दी होगी. इसके लिए उन्होंने शायद ही ये कहा हो कि मार्क को कैंचीधाम जाना चाहिए. जुकरबर्ग ने प्रधानमंत्री मोदी के साथ बातचीत में यह भी कहा था कि वे तकरीबन एक महीने तक भारत में घूमते रहे. भारत में स्टीव जॉब्स के अनुभव समझने के बाद मार्क जुकरबर्ग की दूसरी बात ज्यादा सही लगती है.

वैसे मार्क जुकरबर्ग के एक ‘मंदिर’ में आने की बात और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात को एक अलग नजरिए से भी देखा जा सकता है. 2015 में अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान विश्व की तमाम शीर्ष कंपनियों के सीईओ के साथ मोदी की मुलाकात हुई थी. लेकिन भारतीय मीडिया में जुकरबर्ग के पहले सिर्फ एपल के सीईओ टिम कुक ने अलग से चर्चा बटोरी. इसकी सबसे बड़ी वजह यह रही कि उन्होंने भी मोदी से बातचीत के दौरान जिक्र किया था कि एपल का भारत से पुराना नाता है क्योंकि स्टीव जॉब्स कंपनी शुरू करने के पहले भारत की यात्रा पर गए थे. टिम कुक ने सिर्फ इस एक बात से भारतीय मीडिया में बाकी सभी सीईओ को पीछे छोड़ दिया था. इसके बाद ठीक इसी से मिलती-जुलती बात यदि मार्क जुकरबर्ग कही तो बिना लाग-लपेट यह कहा जा सकता है कि तथ्यों के सही-गलत होने से अलग यह जनसंपर्क के लिहाज से बहुत ही प्रभावी बात थी.