वे दिन बीते अभी ज्यादा वक़्त नहीं हुआ जब कम से कम छोटे शहरों के सक्षम परिवारों में गाय पाली जाती थी और वह उनकी सामाजिक हैसियत का प्रतीक यानी स्टेटस सिंबल भी हुआ करती थी. लोग ‘इसी बहाने गौ-सेवा के सिद्धांत को भी साध लिया करते थे. गाय का एक दूध देने वाले पशु से ज्यादा महत्व पुरखों और समाज से रिस कर आया था, किसी राजनैतिक पार्टी से नहीं. शायद इसीलिए तब गाय तो ज़्यादा थीं, लेकिन शोर-शराबा कम था. हालांकि गाय मारी तब भी जा रही थी और गौ-रक्षक दल भी थे ही.

ज्यादातर खेती पर पलने वाले समाज में गाय का महत्व और देवत्व उसकी उपयोगिता से ही निकला होगा जो शहरी समाज में भी रिस आया था. गाय दूध देती थी और उसकी संतति, जमीन से पानी निकालती, खेत जोतती, खेत से निकले गन्ने से जीवन को मीठा करती. औऱ हमें कहीं लाने ले जाने के लिए भी बैलगाड़ियां ही तो थीं.

गाय का एक दूध देने वाले पशु से ज्यादा महत्व पुरखों और समाज से रिस कर आया था, किसी राजनैतिक पार्टी से नहीं. शायद इसीलिए तब गाय तो ज़्यादा थीं, लेकिन शोर-शराबा कम था

उस समय यदाकदा बाज़ार के किसी कोने में एक अधेड़ साधु पांच पैरों की गाय (एक पैर पीठ पर) को एक चमकीला कपड़ा पहना कर, हाथ में त्रिशूल लिए चंदा मांगते दिख जाता था. कुछ गाय चार पैरों की ही होती थीं लेकिन पीठ पर त्रिशूल बना होता था. पांच पैर या त्रिशूल का निशान या हाथ में त्रिशूल धन मिलने का निश्चित आधार था.

फिर स्टेटस सिंबल और ‘इसी बहाने’ वाला सेवाभाव बदलने लगा. सिंबल स्कूटर-कार होने लगे और सेवा भाव ‘कौन करे’ में बदल गया. गांव-देहात में भी ट्रैक्टर, इंजन, सड़क और बस आ गए. अब गाय घर से और सेवा भाव से निकलने लगी थी. पांच पैरों या त्रिशूल वाली गायें भी स्मृतियों की चीज होने लगीं. बड़े शहरों में सड़क के किनारे कुछ लोग गाय, चारे और लड्डू को लेकर बैठ गए. सेवा के लिए उन्हीं से चारा-लड्डू खरीद कर उन्हीं की गाय को खिला दो, दूध भी गाय वाला ही पिएगा. ये नई तरह की सेवा हुई. बिलकुल स्वार्थरहित. सब कुछ पटरी पर. रुके, दिया-लिया, आगे बढ़ गए.

अचानक गाय फिर लौटी. घरों में नहीं, भाषणों में, कानूनों में, अखबारों में, मंदिरों के लाउडस्पीकरों में. कहीं-कहीं त्रिशूल के साथ. गाय-गाय का कर्णभेदी गुंजान.

‘भारत में गाय मनुष्य की सबसे अच्छी मित्र है. उसे कामधेनु कहा गया है. वह केवल दूध ही नहीं देती बल्कि उसकी वजह से ही कृषि संभव हो सकी है.’

बिना शोर-शराबे के जिस व्यक्ति ने बिलकुल तथ्यों के आधार पर गौ-रक्षा की बात उठायी आज उसका जन्मदिन है. क्यूं न दुनिया के उस सबसे निराले फकीर की ही बातें सुनें कि विभिन्न मौकों पर उसने गाय के लिए क्या कहा.

महात्मा गांधी ने सर्वप्रथम गौ रक्षा की बात सार्वजनिक तौर पर करते हुए 1921 में यंग इंडिया में लिखा ‘गाय करुणा का काव्य है. यह सौम्य पशु मूर्तिवान करुणा है. यह करोड़ों भारतीयों की मां है. गाय के माध्यम से मनुष्य समस्त जीवजगत से अपना तारतम्य स्थापित करता है. गाय को हमने पूजनीय क्यों माना इसका कारण स्पष्ट है. भारत में गाय मनुष्य की सबसे अच्छी मित्र है. उसे कामधेनु कहा गया है. वह केवल दूध ही नहीं देती बल्कि उसकी वजह से ही कृषि संभव हो सकी है.

गांधी जी ने गौमाता की महत्ता को, जन्म देने वाली माता से भी बड़ा माना. उन्होंने कहा कि गौमाता अनेक अर्थों में जन्म देने वाली माता से श्रेष्ठ है और यह समझाने की कोशिश की कि कैसे गाय हमें जीवन भर कुछ न कुछ देती ही रहती है और मरने के बाद भी हमारे काम आ सकती है जबकि एक मां के लिए यह संभव नहीं है.

गौ-रक्षा के कट्टर समर्थक और गौवध को रोकने के लिए एक क़ानून की मांग करते रहे गांधी जी ने तमाम विषयों की तरह ही इस विषय पर भी अपने विचारों का पुनरावलोकन किया.

गांधी जी ने 1947 में मजदूरों को अपने मालिकों से श्रम के बदले पैसे के साथ खाने, पीने और रहने की जगह देने की मांग करने के लिए कहा तो यह भी कहा कि जो मांस खाते हैं वे मांस-मछली की मांग करे.

1925 में गांधी जी कहते है कि ‘मेरा धर्म मुझे सिखाता है कि मुझे अपने आचरण से उन लोगों के मन में, जिनका मत मुझसे भिन्न है, यह विश्वास पैदा करना चाहिए कि गौवध पाप है और इसे बंद करना चाहिए’ तथा ‘गौरक्षा का अर्थ केवल गाय की रक्षा ही नहीं बल्कि उन सभी जीवों की रक्षा है जो असहाय और दुर्बल हैं.’

वहीं 1946 में हरिजन में गांधी जी लिखते हैं कि ‘गौवध क़ानून से कभी नहीं बंद किया जा सकता. ज्ञान शिक्षा और गाय के प्रति दया भाव से ही बंद किया जा सकता है.’

मांसाहार के खिलाफ रहे गांधी जी ने 1947 की एक प्रार्थना सभा में मजदूरों को अपने मालिकों से श्रम के बदले पैसे के साथ खाने, पीने और रहने की जगह देने की मांग करने के लिए कहा तो यह भी कहा कि जो मांस खाते हैं वे मांस-मछली की मांग करें.

गौरक्षा के लिए एक बात जो गांधी जी ने 1924 में ही कह दी थी वह आज समझी जानी बेहद जरूरी है.

‘गौरक्षा हिन्दुओं का धर्म है, लेकिन अहिंदू के विरुद्ध बल प्रयोग करके गाय की रक्षा करना उसका धर्म कदापि नहीं हो सकता... हिन्दू बहुसंख्यकों के लिए यह मूर्खतापूर्ण और अनुचित होगा यदि वे अल्पसंख्यक मुसलमानों पर, गौहत्या के क़ानूनन निषेध को मानने के लिए बल का प्रयोग करते हैं.’