क्या भोगियों के अलावा ऐसे जोगियों का भी आज के समाज में कोई स्थान है जिनका स्त्रियों की परछाई और सानिध्य भर से ही ब्रह्मचर्य स्खलित होने लगता है.
हाल ही में भारत रत्न कलाम की किताब ‘ट्रान्सेन्डेन्स माई स्प्रिचुअल एक्सपीरियंस विद प्रमुख स्वामीजी‘ का लेखिका श्रीदेवी एस कर्था ने मलयालम में अनुवाद किया. तिरुवनंतपुरम में इस पुस्तक के लोकार्पण समारोह में प्रतिष्ठित मलयाली लेखक एमटी वासुदेवन नायर द्वारा स्वामी नारायण आश्रम के प्रमुख स्वामी ब्रह्म विहारी दास को अनुदित पुस्तक भेंट की जानी थी. विमोचन के समय पुस्तक का अनुवाद करने वाली श्रीदेवी कर्था को मंच पर न बैठने की सलाह दी गई. वजह थी कि ‘स्वामीजी स्त्रियों के निकट नहीं जाते या बैठते‘!
श्रीदेवी का कहना है कि 'मुझे लगा था कि प्रकाशक आश्रम वालों को यह बता देगा कि वे इस तरह की स्त्री विरोधी गतिविधि नहीं कर सकते. लेकिन इसके बजाए प्रकाशक ने मुझे ही इस समारोह से दूर रखा. यह पूरी लेखक बिरादरी का अपमान है!' ऐसा किये जाने पर प्रकाशक ने सफाई दी है कि समय और स्थान के अवरोध के कारण चार वक्ताओं का नाम हटाया गया जिसमें से एक श्रीदेवी भी थीं. श्रीदेवी जिनके कारण ही प्रकाशक को यह आयोजन करने का मौका मिला, वे इस लोकार्पण समारोह की सम्माननीय अतिथियों में होनी चाहिए थीं. लेकिन एक आश्रम और उसके स्वामीजी की ऐसी शुचिता का सवाल प्रकाशक के लिए ज्यादा अहम था जो एक स्त्री के सानिध्य से भंग हो जाती है! ऐसी शुचिता की ही शुचिता पर सवाल उठाये जाने चाहिए!
यदि स्त्रियों के श्रम के उपभोग से किसी साधु, ज्ञानी या स्वामी का तप भंग नहीं होता, उनके साथ होने या ख्याल भर से होता है तो यह धर्म की नहीं उनकी कमजोरी का मामला है
श्रीदेवी ने एक विज्ञप्ति में कहा कि उन्हें बताया गया कि आश्रम के नियम स्वामी के साथ महिलाओं के साथ मंच साझा करने की अनुमति नहीं देते! इस पर श्रीदेवी ने अपने फेसबुक पेज पर एक व्यंग्यात्मक पोस्ट में लिखा 'पहली तीन पंक्तियां भी स्वामी जी के अनुयायियों के लिए आरक्षित रहनी चाहिए, ताकि वे सुनिश्चित करे सकें कि महिलाओं की अशुद्ध परछाई तक उन पर न पड़ने पाए!' इसी मुद्दे पर टिप्पणी करते हुए जानी-मानी मलयाली कवयित्री सुगतकुमारी का कहना था, ‘जिन्हें अपनी माताओं से डर लगता है उन्हें अंधकार युग की कंदराओं में चले जाना चाहिए.'
यह कोई पहला मौका नहीं है जब स्त्रियों को जताया-बताया गया कि उनका सानिध्य पाप का भागी बनाता है और वे नरक का द्वार हैं. स्त्रियों की निकटता को 'श्रेष्ठ' पुरुषों के ब्रह्मचर्य के लिए खतरा मानने वाले ऐसे तमाम संतों, ज्ञानियों-ध्यानियों को तब क्या अपने तप से कुछ ऐसा नहीं करना चाहिए कि जन्म के समय भी उनका स्पर्श उनकी मां के 'सृजन द्वार' से न हो. ऐसे लोगों को अपने या अपने जैसे 'महान' लोगों के जन्म के लिए क्या स्वयं बृह्मा को गर्भाशय धारण करने के लिए तैयार नहीं कर लेना चाहिए!
क्या ब्रह्म विहारी और उनके जैसे तमाम संत समाज के सदस्य यह नहीं जानते हैं कि जो खाना वे खाते हैं, वह इस देश की करोड़ों महिला किसानों के श्रम से उगाया जाता है. यदि वे खाना नहीं खाते सिर्फ फलाहार करते हैं तो फल भी तो बिना स्त्रियों के श्रम के उन तक नहीं पहुंचते. यदि वे सिर्फ दूध पर जिंदा हैं तो वह भी इस देश की असंख्य स्त्रियों के हाथों से दुहा गया ही होता है. क्या स्त्रियों के हाथों उगाए गए अनाज, फल, सब्जी, और दुहे गए दूध को खाने-पीने से उनका ब्रह्मचर्य खंडित नहीं होता? यदि स्त्रियों के श्रम के उपभोग से उनका तप भंग नहीं होता उनके साथ होने या ख्याल भर से होता है तो यह धर्म का नहीं कमजोरी का मामला है. और अगर यह कमजोरी उनकी ही है तो इसका सजा श्रीदेवी एस कर्था को क्यों भुगतनी चाहिए!
ऐसा लगता है कि इस समाज में दो तरह के संतों की अधिकता है - एक वे जो स्त्री के भोग में लिप्त हैं या फिर वे जिनका स्त्रियों की परछाई और सानिध्य भर से ही अस्तित्व भस्म होने लगता है
ऐसा लगता है कि इस समाज में दो तरह के संतों की अधिकता है - एक वे जो स्त्री के भोग में लिप्त हैं या फिर वे जिनका स्त्रियों की परछाई और सानिध्य भर से ही अस्तित्व भस्म होने लगता है. यहां या तो आसाराम जैसे संत हैं, या बृह्म विहारी दास जैसे जिन्हें स्त्री के साथ बैठने में भी आपत्ति है. क्या भोगियों के अलावा ऐसे जोगियों की भी आज के समाज में कोई प्रासंगिकता है जिनका समाज के विकास में कोई योगदान नहीं है. जो स्वयं की मुक्ति में इतने ज्यादा लिप्त हैं कि उन्हें समाज की तरक्की से कोई मतलब ही नहीं. यह कैसा आध्यात्म है, कैसी नैतिकता है जो व्यष्टि में सिकुड़े हुए हैं, समष्टि की बात नहीं करते? यह कैसा संतत्व है जिसे सिर्फ खुद की मुक्ति की परवाह है समाज की मुक्ति की नहीं! यह कैसा ईश्वर है जो 'अपने' लोगों को अपनी ही एक महत्वपूर्ण कृति के खिलाफ भड़काता है? ऐसे लोगों को क्या अपना कोई अलग द्वीप नहीं बसा लेना चाहिए जहां न स्त्रियां हों, न समाज हो, न उनके ब्रम्हचर्य पर कोई आंच आए.
अगर वे, जो समाज के एक बेहद महत्वपूर्ण घटक के बारे में इतने ज्यादा असहज हैं, ऐसा नहीं करते, तो क्या हमें ही ऐसे तमाम साधुओं, बाबाओं, का बहिष्कार नहीं कर देना चाहिए. जो ईश्वर की इस (पुरुष की ही तरह) बेहद अनमोल कृति का अपमान करते हैं, हम खुद भी तो उनकी छाया से भी दूर रह सकती हैं. हम खुद भी तो उनकी स्वर्ग, नरक, भोग, मुक्ति की सारी परिभाषाओं को फिर से लिख सकती हैं. नहीं!
स्त्री नरक का द्वार
कह गए और कहते गए हमारे ज्ञानी-ध्यानी
और स्त्रियां खफा हैं उनसे आज तक इस बात पर
कि क्यों कहा हमें नरक का द्वार
सुनो सखी! आओ न स्वर्ग-नरक की परिभाषा बदलें
हम क्यों उनकी गढ़ी परिभाषा से चिपकी हैं
और मुंह बनाए हैं
इस पूरी कायनात में
सबसे ज्यादा उपेक्षा और अभाव में पनपती हैं लड़कियां
और नरक भी तो ऐसे ही....
देखो कितना साम्य है
लड़कियां और नरक हमजोली ही तो हैं!
जो उग आती हैं छाती पर
तमाम सावधानियों के बावजूद!
तमाम साजिशों के खिलाफ!
बददुआओं को करती बेअसर!
लेकिन जरा सोचो सखी
कितना अधूरा है उनका स्वर्ग इस नरक के बिना.
प्यार भरी एक नजर और स्पर्श के लिए
आजीवन उनका स्वर्ग
ताकता रहता है हमारे इस नरक द्वार को
विनती और याचना के भाव और स्वर में.
स्वर्ग के सारे वैभव
जिसके बिना अधूरे हैं
सृष्टि के सारे भगवान, देव और पुरूष
जिसकी आस और प्यास में जीते हैं,
जिसके बिना पूरा नहीं होता
उनका कोई भी आयोजन,
जिनकी हर चर्चा अधूरी है
हमारे स्मरण और जिक्र के बिना,
जो रोग में, भोग में, जोग में
इसी नरक के साथ की कामना करते हैं
सारी दुनिया जिस स्वर्ग के लिए बिछी है
उसी स्वर्ग को सिर पटकते और
कभी मान-मनौव्वल करते
पाया है मैंने अक्सर इसी द्वार पर!
मैं कैसे न अभिमान करूं इस नरकद्वार के होने का
उनका स्वर्ग जिसके कदमों में गिरा हो!