मलेरियारोधी जिस दवा की खोज के लिए टू यूयू को इस बार का नोबेल मिला उसकी बुनियाद में चीन की सांस्कृतिक क्रांति और वियतनाम युद्ध का अहम योगदान है
हर साल जब भी नोबेल पुरस्कारों की घोषणा होती है तो पुरस्कार पाने वाले लोग और उनकी खोज खुद ही इतिहास में गौरवशाली स्थान बना लेते हैं. इस साल जब पांच अक्टूबर को स्वीडन के करोलिन्सका इंस्टिट्यूट ने चिकित्सा के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार विजेताओं का ऐलान किया तो यह कई मायनों में ऐतिहासिक था. इसके लिए जिन तीन लोगों को चुना गया उनमें से एक चीन की टू यूयू हैं, जो विज्ञान के क्षेत्र में न सिर्फ इस देश की पहली नोबेल पुरस्कार विजेता हैं बल्कि चीन की पहली महिला भी हैं जिनके नाम यह उपलब्धि दर्ज हुई.
यूयू को मलेरियारोधी दवा आर्टिमाइसिनिन की खोज के लिए नोबेल दिया जा रहा है. आर्टिमाइसिनिन चीन में पाए जाने वाले एक पौधे स्वीट वॉर्मवुड ( हिंदी में इसे नागदौन कहा जाता है) पाई जाती है. चीन में तकरीबन 1600 साल पहले से बुखार के इलाज के लिए इस पौधे से निकले अर्क का प्रयोग किया जा रहा है. लेकिन टू यूयू ने सबसे पहले खोजा कि इसमें आर्टिमाइसिनिन नाम का तत्व पाया जाता है जो मलेरिया के परजीवियों को खत्म करने की सबसे कारगर दवा है. उन्होंने स्वीट वॉर्मवुड से इसे प्राप्त करने के तरीके की खोज की है.
अमेरिका वियतनाम युद्ध के दौरान उत्तरी वियतनाम की सरकार ने माओ से अनुरोध किया था कि वे मलेरिया से हो रही मौतें रोकने के लिए कुछ करें
यूयू की इस खोज का सबसे दिलचस्प पहलू है कि इसमें जितना विज्ञान का योगदान है उतना ही इसे इतिहास की खोज भी कहा जा सकता है. यह जड़ी-बूटी चीन की प्राचीन स्वास्थ्य पद्धति का हिस्सा तो रही है लेकिन बीते आधे दशक की कुछ महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं की वजह से ही इसे आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में पहचान मिल पाई. इन घटनाओं में सबसे महत्वपूर्ण है चीन की ‘सांस्कृतिक क्रांति’.
चीन के राजनीतिक इतिहास में माओत्से तुंग की सांस्कृतिक क्रांति एक नए युग की शुरुआत मानी जाती है. 1960 के दशक के आखिर में माओ को लगने लगा था कि उनकी कम्युनिस्ट पार्टी आदर्शों को तिलांजलि देकर गलत दिशा में जा रही है. वे इस बात से भी आहत थे कि पार्टी में उन्हें किनारे किया जा रहा है. पार्टी पर दोबारा नियंत्रण स्थापित करने और विचारधारा से ‘दूर’ जा रही पार्टी को सही रास्ते पर लाने के लिए उन्होंने 1966 में सांस्कृतिक क्रांति शुरू की थी.
माओ के आह्वान पर पार्टी के लाखों कार्यकर्ताओं और मजदूरों ने पूरे देश में एक आंदोलन छेड़ दिया था. इस दौरान तमाम धार्मिक स्थल तबाह कर दिए गए. चीन के बुद्धिजीवियों को प्रताड़ित किया गया और पश्चिमी दुनिया के प्रतीक चिह्नों को भी खत्म कर दिया गया. इसी दौरान देश के उन वैज्ञानिकों को जेल में डाल दिया गया या अपने पद हटा दिया गया जो पश्चिमी देशों में अध्ययन करके आए थे या उनकी व्यवस्थाओं को सही मानते थे.
चीन ने प्रोजेक्ट - 523 तो शुरू कर दिया लेकिन इसके लिए वहां सक्षम वैज्ञानिक नहीं थे. सांस्कृतिक क्रांति के समय मलेरिया जैसे रोगों के विशेषज्ञ प्रमुख संस्थानों से हटा दिए गए थे
सांस्कृतिक क्रांति शुरू होने के दो साल के भीतर ही चीन में भारी अराजकता फैलने लगी. इसी समय उत्तरी वियतनाम के कम्युनिस्टों और दक्षिण वियतनाम में अमेरिकी सैनिकों व अमेरिका समर्थित लड़ाकों के बीच युद्ध चल रहा था. उत्तरी वियतनाम के समर्थन में चीन के सैनिक भी युद्ध कर रहे थे. यहां दोनों पक्षों के बीच लड़ाई में तो सैनिक मारे ही जा रहे थे लेकिन भारी तादाद में आम लोगों और सैनिकों की मौत मलेरिया से हो रही थी. उस समय क्लोरोक्वीन मलेरिया के खिलाफ सबसे प्रचलित दवा थी लेकिन इसके प्रति मलेरिया के परजीवियों में प्रतिरोध पैदा हो गया था और अब वे इससे नियंत्रित नहीं हो पा रहे थे.
युद्ध के दौरान ही उत्तरी वियतनाम की सरकार ने माओ से अनुरोध किया कि वे मलेरिया से हो रही मौतें रोकने के लिए कुछ करें. वियतनाम सरकार के अनुरोध पर माओ का जवाब था, ‘यह जितनी आपकी समस्या है उतनी ही हमारी समस्या भी है.’ दरअसल इसी समय दक्षिणी चीन में भी हर साल हजारों लोग मलेरिया से मारे जा रहे थे.
माओ इस समस्या को लेकर इतने गंभीर थे कि उन्होंने जल्दी ही अपने शीर्ष सैन्य अधिकारियों को इस समस्या का हल निकालने का आदेश दे दिया. इसके बाद 23 मई, 1967 को इसके लिए एक अतिगोपनीय परियोजना शुरू हुई जिसे इस तारीख के आधार पर ‘प्रोजेक्ट 523’ नाम दिया गया.
आर्टिमाइसिनिन की खोज का एक और दिलचस्प पहलू ये है कि 1977 में पहली बार यह खोज मीडिया और मेडिकल जर्नल से सार्वजनिक हुई लेकिन इसमें कहीं भी यूयू का जिक्र नहीं था
चीन ने प्रोजेक्ट 523 तो शुरू कर दिया था लेकिन इसके लिए वहां सक्षम वैज्ञानिक नहीं थे. सांस्कृतिक क्रांति के समय मलेरिया जैसे रोगों के विशेषज्ञ प्रमुख संस्थानों से हटा दिए गए थे. जब तत्कालीन चिकित्सा पद्धति, जिसमें सिंथेटिक दवाएं तैयार की जाती हैं, के जरिए मलेरिया रोधी दवा के विकास में कुछ खास प्रगति नहीं हुई तो चीन की सैन्य सरकार ने प्रोजेक्ट 523 की जिम्मेदारी बीजिंग स्थित एकेडमी ऑफ ट्रेडिशनल चाइनीज मेडिसन को दे दी. प्राचीन चीन की चिकित्सा पद्धतियों के विकास को समर्पित इसी संस्थान में टू यूयू भी काम करती थीं.
यूयू ने पश्चिमी चिकित्सा विज्ञान के साथ-साथ चीन की प्राचीन चिकित्सा पद्धति का भी अध्ययन किया था. उनकी इसी योग्यता को देखते हुए उन्हें 1969 में इस प्रोजेक्ट का हिस्सा बना दिया गया. वे एक अखबार से बातचीत में कहती हैं, ‘हमें सरकार ने ये काम सौंपा था. जब आपको कोई असाइनमेंट मिल जाता है तो फिर आप उसके लिए अपनी सर्वश्रेष्ठ कोशिश करते हैं. उस समय तक मलेरिया की नई दवा खोजने की दिशा में प्रोजेक्ट कुछ खास नहीं कर पाया था और अब हमें कुछ करके दिखाना था.’ 39 साल की यूयू उसी साल एकेडमी की अध्यक्ष भी नियुक्त हो गईं और अब यह प्रोजेक्ट उनकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी बन गया.
यूयू को इस प्रोजेक्ट के लिए अपने पारिवारिक जीवन में भी कई समझौते करने पड़े. सांस्कृतिक क्रांति के दौर में उनके पति को देश के दूसरे में हिस्से में काम के लिए भेज दिया गया तो वे खुद अनुसंधान के लिए दक्षिण चीन के हैनान प्रांत आ गईं. मलेरिया का सबसे ज्यादा प्रकोप इसी क्षेत्र में होता था. इस समय उन्हें अपनी चार वर्षीय बेटी को छह महीने के लिए बीजिंग की एक नर्सरी में छोड़ना पड़ा. लेकिन प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए उन्हें अनिवार्य रूप से यह करना ही था.
एक बार जब आर्टिमाइसिनिन की खोज हो गई तो इसका पहला इंसानी परीक्षण यूयू ने खुद अपने ऊपर किया और यह पूरी तरह सफल था
बीजिंग लौटने के बाद उन्होंने लगातार दो साल तक चीन की प्राचीन किताबों में दर्ज बुखार से संबंधित जड़ी-बूटियों का अध्ययन किया. इस दौरान उनकी टीम ने वनस्पतियों से प्राप्त सैकड़ों तरह के अर्क से मलेरिया ठीक करने की कोशिश की और आखिरकार 1971 में उन्हें आर्टिमाइसिनिन का पता चला. एक बार जब आर्टिमाइसिनिन की खोज हो गई तो इसका पहला इंसानी परीक्षण यूयू ने खुद अपने ऊपर किया और यह पूरी तरह सफल रहा. बाद में इसके और भी सफल परीक्षण हुए और यह साबित हो गया कि यह दवा मलेरिया की रोकथाम में पूरी तरह कारगर है.
आर्टिमाइसिनिन की खोज का एक और दिलचस्प पहलू ये है कि 1977 में पहली बार यह खोज मीडिया और मेडिकल जर्नल से सार्वजनिक हुई लेकिन इसमें कहीं भी यूयू का जिक्र नहीं था. हालांकि उस समय तक माओ की सांस्कृतिक क्रांति अपने अंतिम दौर में थी फिर भी ऐसी किसी भी उपलब्धि का श्रेय एक व्यक्ति को नहीं दिया जाता था. चीन में यूयू का नाम लंबे अरसे तक उस टीम की सदस्य के रूप में ही पहचाना जाता रहा जिसने आर्टिमाइसिनिन की खोज की थी. हालांकि बाद में जब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आर्टिमाइसिनिन को मलेरियारोधी सबसे प्रभावी दवा के रूप में पहचान मिली तो धीरे-धीरे यूयू को इसका श्रेय दिया जाने लगा. अब तो नोबेल जीतने साथ इस खोज के लिए उन्होंने अपना नाम इतिहास में दर्ज करा ही लिया है.