इस साल साहित्य के लिए नोबेल पानी वालीं स्वेतलाना अलेक्सियेविच की किताबें अपने समय की महत्वपूर्ण घटनाओं से जुड़े लोगों के साक्षात्कारों से रचा गया ऐसा लेखन है जो साहित्य के परंपरागत सांचे में फिट नहीं बैठता
‘वे पिछले तीस या चालीस वर्षों से सोवियत संघ और उसके विघटन के बाद के लोगों को दर्ज कर रही हैं. लेकिन यह घटनाओं का इतिहास नहीं है. भावनाओं का इतिहास है. वे हमारे सामने भावनाओं का संसार रखती हैं.’ नोबेल पुरस्कार समिति की स्थायी सचिव सारा डान्यूस ने इन्हीं शब्दों में स्वेतलाना अलेक्सियेविच के साहित्य का परिचय कराते हुए उन्हें इस साल साहित्य के नोबेल से नवाजे जाने की घोषणा की थी.
जो लोग स्वेतलाना की रचनाओं से परिचित हैं उनके लिए सारा के वक्तव्य से असहमति की कोई गुंजाइश नहीं है. स्वेतलाना के अतीत पर नजर डालें तो इस बात की गुंजाइश भी नहीं दिखती कि उनके जैसे एक बेचैन और साहित्यिक मन के लिए उस दौर में, इससे अलग रच पाना संभव भी रहा होगा. 31 मई, 1948 को जन्मी स्वेतलाना का बचपन और लगभग सारा जीवन बेलारूस में ही बीता है. द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात जो बेलारूस का इतिहास रहा, कमोबेश वही स्वेतलाना का भी है.
स्वेतलाना की सबसे चर्चित किताब ‘वॉईसेज फ्रॉम चेर्नोबिल’ है. इसके दायरे में चेर्नोबिल आणविक हादसे वाले दिन और उसके बाद का वह जीवन है जो कभी वैसा नहीं रह पाया जैसा उसे होना था
द्वितीय विश्व युद्ध में बेलारूस की तकरीबन एक चौथाई आबादी खत्म हो गई थी. इस युद्ध ने बौद्धिक वर्ग का तो पूरी तरह ही सफाया कर दिया था. इन घटनाओं का बेलारूस के समाज पर लंबे समय तक असर रहा. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह देश सोवियत संघ का हिस्सा बन गया था और वहां से भारी तादाद में लोगों का बेलारूस आना शुरू हुआ. अब यहां धीरे-धीरे सोवियत संस्कृति मुख्यधारा में आ रही थी. स्वेतलाना इसी दौर की पली-बढ़ी हैं.
पत्रकारिता से अपना करियर शुरु करने वालीं स्वेतलाना बेहद जल्द वह ‘फॉर्म’ ढूंढने लगी थीं जिससे वे अतीत और वर्तमान को उसकी मूल भावनाओं के साथ दर्ज कर सकें. इस काम के लिए उन्हें प्रचलित विधाएं, जैसे कहानी, कविता, उपन्यास, नाटक या निबंध, लगभग अक्षम लगते थे. ऐसे में, जिसे स्वेतलाना खुले मन से स्वीकारती हैं, हमवतन अलेस अदामोविच के लेखन से उनका परिचय हुआ. अदामोविच का का मानना था कि बीसवी शताब्दी की क्रूरताएं और भय गल्प के जरिए दर्ज करना संभव नहीं है. यह सिर्फ इकबालिया बयानों और साक्षात्कारों से ही संभव है. उनके साथ विडंबना यह रही कि वे ‘द ख्तयान स्टोरी’ जैसे कुछ चर्चित उपन्यास तो लिख पाए लेकिन दूसरी दिशा में आगे नहीं बढ़ सके. हालांकि स्वेतलाना के लिए उनका मशविरा ठीक वही रास्ता साबित हुआ जो उनके साहित्यक मन को संतुष्ट कर सकता था. स्वेतलाना की सारी किताबें अपने समय की महत्वपूर्ण घटनाओं से जुड़े लोगों की गवाही से रचा गया लेखन हैं. ये भविष्य के लिए दर्ज वर्तमान और अतीत के दस्तावेज हैं.
स्वेतलाना की पहली किताब ‘अनवूमेनली फेस ऑव वार’ 1985 में प्रकाशित हुई. स्त्रियों के आत्म संभाषण या मोनोलॉग के शिल्प में रची गई यह किताब कभी न दर्ज किए गए दास्तानों का दस्तावेज है. दूसरी किताब ‘द लास्ट विटनेसेज- द बुक ऑव अनचाईल्ड लाइक स्टोरीज’ में यही कोशिश स्वेतलाना ने बच्चों के मार्फत की है. इसकी पृष्ठभूमि सोवियत-अफगान युद्ध है. सोवियत संघ के विघटन के बाद ऐसे बहुत से निराश लोगों ने आत्महत्या कर ली या करने की असफल कोशिशें कीं जो खुद को कम्युनिस्ट विचारधारा से अलग करने में असमर्थ थे. स्वेतलाना की ‘एनचेंटेड विद डेथ’ नाम से प्रकाशित हुई किताब का विषय यही लोग हैं.
स्वेतलाना की ‘एनचेंटेड विद डेथ’ सोवियत संघ के विघटन से निराश हुए उन लोगों की बात करती है जिन्होंने इसके बाद आत्महत्या कर ली थी या इसकी कोशिश की
स्वेतलाना की सबसे चर्चित किताब ‘वॉईसेज फ्रॉम चेर्नोबिल’ है. इसके दायरे में चेर्नोबिल आणविक संयत्र के हादसे वाले दिन 26 अप्रैल, 1986 तथा उसके बाद का वह जीवन है जो वैसा नहीं रह पाया, जैसा होना था. यह दुर्घटना तो किसे याद न होगी? जब उस पावर संयत्र का चौथा स्टेशन उड़ गया तब सोवियत अधिकारियों ने उस आणविक भट्टी में हजारों मजदूरों को लगभग झोंक दिया. इन मजदूरों के पास संयंत्र को सुधारने की तकनीकी कुशलता नहीं थी और न ही इनके पास संयंत्र सुधारने के लिए जरूरी औजार थे. इस किताब में ऐसे 500 से अधिक लोगों के साक्षात्कार दर्ज हैं जो किसी न किसी रूप में उस घटना और उसके बाद के प्रभाव से जुड़े रहे हैं. इस किताब का जिक्र करते हुए सहज ही यह ख्याल आता है कि अपने देश में भी 1984 में ऐसा ही एक कांड भोपाल में हुआ था. उस पर लिखी ज्यादातर किताबें यह दर्ज करती हैं कि वह घटना कैसे घटी? उसके अपराधी कौन थे? उन अपराधियों का क्या हुआ?
इसके बाद आई स्वेतलाना की किताब ‘सेकेंड हैंड – टाइम’ एक अलग मायने में काफी दिलचस्प है. यह सोवियत संघ के विघटन पर एक बेहतरीन बयान तो है ही साथ में इस बात को भी दर्ज करती है कि सोवियत स्वप्न और संघ के धराशायी होने का जो अंतराल है, इसने कैसे मानव बनाए हैं.
स्वेतलाना की रचनाओं पर बात करते हुए सामान्य ज्ञान जैसे एक तथ्य का जिक्र करना भी जरूरी है कि वे पहली ऐसी पत्रकार हैं जिन्हें नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है. विचार करने के लिए एक तथ्य यह भी है कि कहीं यह पुरस्कार उन दिनों की स्मृति तो नहीं है जब दुनिया में दो ध्रुव थे. शीत युद्ध था. यह मानना कि साहित्यिक कारणों और योग्यताओं के साथ ही अन्य वजहों से इस साल का नोबेल स्वेतलाना को मिला है, पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता.
स्वेतलाना ने जो लिखा वह निश्चितरूप से बेहतर समाज और बेहतरीन मनुष्यता के लिए है पर सवाल है कि क्या यह सब सिर्फ रूस और तत्कालीन सोवियत संघ में ही हुआ या है?
पिछले कुछ वर्षों में रूस फीनिक्स पक्षी की तरह, राख झाड़कर फिर उठ खड़ा हुआ है. उसकी आवाज और गतिविधियों में धमक है. अमेरिकी और पश्चिमी साम्राज्य के राजनीतिज्ञों की शैली भले ही आक्रामक हो लेकिन उनकी बातों से अब रूस का भय झलकता है. बीते वर्षों में रूस के युक्रेन में हस्तक्षेप से यूरोप और अमेरिका की नींद उड़ी हुई है. अभी रूस ने सीरिया में मौजूद आतंकी ठिकानों पर जो हमला किया है, उसे अमरीका अपने लिए चेतावनी की तरह ले रहा है.
ऐसे में वह दौर याद आना असामान्य नहीं है जब सोवियत विरोध दुनिया पश्चिमी दुनिया का लाड़ला बन जाने का एक उपयोगी हथियार था. यहां हम स्वेतलाना के लेखन पर कोई सवाल नहीं उठा रहे हैं. उसपर कोई सवाल उठाया भी नहीं जा सकता. उन्होंने जो लिखा वह निश्चित रूप से बेहतर समाज और बेहतरीन मनुष्यता के लिए है. पर सवाल है कि क्या यह सब सिर्फ रूस और तत्कालीन सोवियत संघ में ही हुआ या है? भूलना नहीं चाहिए कि पहले भी पश्चिमी प्रभाव से आक्रांत नोबेल समिति ने उन लोगों का खुले कंठ से स्वागत किया है जो सोवियत विरोधी रहे हैं.
लेकिन यह नोबेल की समस्या है, हमारी नहीं और स्वेतलाना की तो बिल्कुल नहीं. स्वेतलाना ने जो रचा है, वह आने वाली पीढियों के लिए दस्तावेज है. भावनाओं का यह इतिहास, नया लिखना सीखने और विषय को बरतना सीखने का अंदाज सिखाता हुआ उनका लेखन, विश्व राजनीति के तमाम दांवपेंचो के बीच स्वागत योग्य है.