इस समय साहित्य अकादमी अपने गौरवशाली अतीत की वह घटना याद कर सकती है जब उसने एक रूसी साहित्यकार के अधिकारों की लड़ाई लड़ी और जीती थी.
हिंदी के प्रसिद्ध लेखक उदय प्रकाश ने पिछले महीने की चार तारीख को साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने की घोषणा की थी. कन्नड़ साहित्यकार एमएम कलबुर्गी की हत्या और अन्य लेखकों को मिल रही धमकियों पर अकादमी की चुप्पी का विरोध करते हुए उनका कहना था, ‘अब यह चुप रहने का और मुंह सिलकर सुरक्षित कहीं छुप जाने का पल नहीं है. वरना ये खतरे बढ़ते जाएंगे.’
उस समय लग रहा था देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले के विरोध की यह छोटी-सी शुरुआत हिंदी के इस साहित्यकार तक ही सिमट जाएगी. लेकिन डेढ़ महीना होते-होते यह मुहिम काफी आगे बढ़ चुकी है. अब पंजाबी, गुजराती, हिंदी और दूसरी भाषाओं के आधा दर्जन से ज्यादा लेखकों ने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने की घोषणा कर दी है और यह सिलसिला जारी है.
जब बोरिस पास्तेरनाक के लिए सोवियत संघ में विरोधी माहौल बढ़ने लगा तो जवाहरलाल नेहरू ने साहित्य अकादमी के अध्यक्ष की हैसियत से सोवियत सरकार के सामने विरोध दर्ज कराया था
इस बीच अकादमी के अध्यक्ष विश्वनाथ तिवारी ने इस पूरे घटनाक्रम पर संस्था का पक्ष रखते हुए कुछ दिन पहले बड़ा ही महत्वपूर्ण वक्तव्य दिया है. तिवारी का कहना है, ‘लेखकों को विरोध करने का अलग तरीका अपनाना चाहिए और साहित्य अकादमी जैसी स्वायत्तशासी निकाय का राजनीतिकरण नहीं करना चाहिए.’ तिवारी ने साथ में यह सवाल भी उठाया कि यदि साहित्य अकादमी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पाबंदी के खिलाफ विरोध जताएगी तो क्या वह अपने प्राथमिक कार्य से भटक नहीं जाएगी? अकादमी के अध्यक्ष ने अपनी बात के समर्थन में संस्था के 60 सालों के इतिहास का हवाला भी दिया.
लेकिन तिवारी उस घटना का उल्लेख करना भूल गए जब अकादमी एक लेखक की अभिव्यक्ति के स्वतंत्रता के पक्ष में डटकर खड़ी हुई थी और इस विरोध की राजनीतिक ताकत के बूते उसे जीत हासिल हुई थी. इस घटना का सबसे हैरतभरा पक्ष है कि तब अकादमी ने एक विदेशी लेखक के अधिकारों की लड़ाई लड़ी थी.
यह 1958 की बात है. उस वर्ष नोबेल समिति ने सोवियत संघ के कवि बोरिस पास्तेरनाक को साहित्य के क्षेत्र में नोबेल के लिए चुना था. समिति ने वैसे तो पास्तेरनाक के तमाम साहित्य को महत्वपूर्ण माना था लेकिन आधिकारिक रूप से उसने उनके उपन्यास डॉ झिवागो को पुरस्कार के लिए चुना. इस उपन्यास में सोवियत व्यवस्थाओं की कटु आलोचना की गई थी और इस वजह से तत्कालीन सोवियत सरकार को नोबेल समिति का फैसला नागवार गुजरा.
बोरिस पास्तेरनाक
बोरिस पास्तेरनाक
सोवियत सरकार की नाराजगी की एक वजह यह भी रही कि उसकी लाख कोशिशों के बावजूद डॉ झिवागो का प्रकाशन हो गया था. इस किताब की पांडुलिपि चोरी-छिपे मॉस्को से इटली के मिलान लाई गई और वहीं पहली बार प्रकाशित हुई. 1957 में यह उपन्यास इटैलियन में प्रकाशित हुआ और एक साल बाद इसका अंग्रेजी संस्करण आ गया. यह संस्करण कुछ ही महीनों में पूरे यूरोप में लोकप्रिय हो गया था और इसे नोबेल के लिए चुन लिया गया.
जवाहरलाल नेहरू ने नई दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कहा कि सोवियत संघ का पास्तेरनाक के प्रति जो रवैया है वह भारत की राय के विपरीत जाता है
सोवियत संघ की सरकार का मानना था कि पश्चिम के पूंजीवादी देशों ने साम्यवाद के खिलाफ अभियान चलाने के लिए इस उपन्यास को नोबेल दिलवाया है. सोवियत सरकार के इस रवैए परिणति यह हुई कि पास्तेरनाक के खिलाफ देश में अभियान चलने लगा. इनकी अगुवाई सरकार समर्थक तत्वों के हाथ में थी. वहां इस बात की चर्चा भी जोरों पर थी कि यदि पास्तेरनाक नोबेल लेने स्वीडन गए तो उन्हें वापस नहीं लौटने दिया जाएगा. इन घटनाओं के चलते पास्तेरनाक पर इतना दबाव बना कि आखिरकार उन्होंने नोबेल समिति को पत्र लिखकर यह पुरस्कार लेने से मना कर दिया. इसके बाद भी उनके लिए मॉस्को में बना विरोधी माहौल कम नहीं हुआ. इसी समय भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस विवाद में दखल दिया था.
नेहरू के जीवनी लेखक सर्वपल्ली गोपाल ने इस घटना का वर्णन कुछ इन शब्दों में किया है, ‘जब सोवियत सरकार ने बोरिस पास्तेरनाक को नोबेल पुरस्कार लेने से मना कर दिया तो नेहरू ने प्रधानमंत्री के बजाय साहित्य अकादमी के अध्यक्ष की हैसियत से सोवियत सरकार को अनौपचारिक संदेश भिजवा दिया कि पास्तेरनाक के साथ जो अन्याय किया जा रहा है वो सोवियत संघ की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाएगा.’
शीतयुद्ध के दौरान दो ध्रुवों में बंटी दुनिया में उस वक्त नेहरू अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावशाली नेता थे. सोवियत सरकार के सामने भले ही यह बात उन्होंने किसी भी हैसियत से कही हो लेकिन उनकी बात में वजन था. गोपाल ने आगे लिखा है, ‘ सोवियत सरकार ने उन्हें आश्वस्त किया था कि पास्तेरनाक को कोई खतरा नहीं है.’
नेहरू ने सोवियत संघ के राष्ट्रपति निकिता खुश्चेव को फोन करके कहा कि वे पास्तेरनाक की सुरक्षा में बनने वाली कमेटी की अध्यक्षता करेंगे.
नेहरू यहीं पर नहीं रुके. उन्होंने नवंबर, 1958 में दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर साफ किया कि पास्तेरनाक के प्रति सोवियत संघ का जो रवैया है उससे ‘कुछ हद तक हमें तकलीफ पहुंची है’ क्योंकि यह भारत की राय के खिलाफ है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रबल पक्षधर नेहरू का कहना था, ‘यदि कोई जानामाना लेखक देश में प्रचलित मुख्यधारा के मत के विरोध में राय जाहिर करता है तो भी उसपर पाबंदियां लगने के बजाय उसका सम्मान होना चाहिए.’
इस विवाद में नेहरू की भूमिका का जिक्र बोरिस पास्तेरनाक के बेटे येवगेनी ने अपने पिता की जीवनी में भी किया है. वे लिखते हैं कि उन्हें सीधे-सीधे देश से निष्कासित किया जाता लेकिन नेहरू ने सोवियत संघ के राष्ट्रपति निकिता खुश्चेव को फोन करके कहा कि वे पास्तेरनाक की सुरक्षा में बनने वाली कमेटी की अध्यक्षता करेंगे.
माना जाता है कि उस समय नेहरू के इस प्रस्ताव की चलते पास्तेरनाक निष्कासन से बच गए. हालांकि इस संवेदनशील लेखक के लिए यह विवाद इतना पीड़ादायक रहा कि इसके बाद उनकी सेहत दिनोंदिन बिगड़ने लगी और दो साल बात ही 70 साल की उम्र में उनका देहांत हो गया.